उन्नीसौ के दशक में राजपूतों के शैक्षणिक विकास एवं सामाजिक उत्थान के अमर पुरोधा -राजा बलवंत सिंह जी अवागढ़—-

उन्नीसौ के दशक में राजपूतों के शैक्षणिक विकास एवं सामाजिक उत्थान के अमर पुरोधा -राजा बलवंत सिंह  जी अवागढ़—-

1- संस्थापक एवं प्रथम अध्यक्ष अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा 19 अक्टूबर 1897ई0।

   2- संस्थापक बलवंत राजपूत हाई स्कूल  ,1886ई0 -बलवंत राजपूत कॉलेज  वर्तमान में राजा बलवंत सिंह महाविद्यालय ,आगरा ।

अवागढ़ राजपरिवार रॉयल जादौन राजपूत करौली राजवंश से संवन्धित है जो उत्तरप्रदेश के सम्पूर्ण जादौन राजपूतों का प्रतिनिधुत्व करता है।इस राज्य के उत्पति से पहले करौली के राजा कुंवरपाल जी के पुत्र राजा आनंदपाल जी करौली से बिस्थापित हो कर मथुरा के छाता परगना के नरी गांव में जाकर बसे।इनके वंशज ठाकुर चतुर्भुज सिंह जी जो नरी गांव के जमींदार थे जलेसर में जाकर बसे उस समय जलेसर मथुरा जिले का परगना था ।अठारह वीं सदी आस -पास इन के पूर्वजों नेअवागढ़ जागीर की स्थापना की  ।ब्रिटिश साम्राज्य में अंग्रेजों ने 1803 ई0 में अवागढ़ को मथुरा से जोड़ दिया था इसके बाद 1874ई0 में इसे आगरा जनपद में मिला दिया गया था और फिर बाद में 1876 ई0 में अवागढ़ को एटा जनपद में मिला दिया गया था ।इनके वंशज ठाकुर पीताम्बर सिंह को 1838ई0 में गवर्नर जनरल लार्ड ऑकलैंड ने राजा की उपाधि से नवाजा गया जिसका समर्थन उदयपुर के महाराणा फ़तेह सिंह जी ने भी किया। इन्ही के वंश में 21 सितम्बर सन् 1853 को राजा बलवंत सिंह जी का जन्म हुआ था। जो सन् 1892में अवागढ़ रियासत के राजा के पद पर बिराजमान हुऐ। उस समय उनके उम्र 39वर्ष की थी।वे शारीरिक रूप से बहुत ही बलवान और तेज बुद्धि वाले  थे।उनके बारे में कहा जाता है क़ि उनकी लगन व्यायाम तथा शारीरिक परिश्रम की ओर अधिक  थी।वे पुरुषार्थी अधिक थे ।उनके शासन काल में अँग्रेजी साम्राज्य की नींव द्रण हो चुकी थी।उन्होंने तत्कालीन विषम परिस्थितियों में भी अपने सम्मान तथा प्रतिस्ठा को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखा।सामयिक घटनाओं की जानकारी  रखने के लिए अशिक्षित होते हुए भी नित्य समाचारपत्र सुना करते थे।अवागढ़ के राजा उस सदी उन राजाओं की श्रेणी में आते थे जिन्होंने अपने कठिन परिश्रम और वुद्धिमानी से अपना प्रभुत्व कायम रखा।सन् 1880 ई0 में अवागढ़ परिवार सम्पूर्ण अपर इंडिया  में सवसे धनी जमींदार थे।”Raja of Awa  was one of the Wealthiest Landed Proprietors in the Whole of Upper India “. अवागढ़ रियासत संयुक्त प्रान्त (United Provinces)में उस समय क्षेत्रफल के हिसाव से सबसे बड़ी रियासत थी परन्तु रेवेन्यू  बलरामपुर (गौरखपुर)का अधिक था। अवागढ़  रियासत जो  एटा ,अलीगढ ,मैनपुरी ,मथुरा और आगरा जिलों में फ़ैली हुई थी।

राजा बलवंत सिंह जी  को दिल्ली के वायसराय लॉर्ड कर्जन के समय सन् 1902 में दिल्ली दरवार में बुलाया गया।उनको मार्ले मिंटो रिफार्म के अंतर्गत प्रान्तीय कौंसिल का सदस्य नियुक्त किया गया”Member of the Legislative Council of the United Provinces “.जिसमें लगभग 2 वर्ष कार्य करने के उपरान्त उनको C.I E की उपाधि प्रदान की गई ।

Raja Balwant Singh was distinguished  for his able managment of the estate ,and was honoured by the Government in 1898 with the decoration of title of the “Companion of the Indian Empire “( with a golden medal with the ‘words'{Imperitricis Auspicis } for his excellent public services in the severe famine of 1897 and other occasions .Raja Balwant Singh was a Memberb of the Legislative Council of the United Provinces for two years . He was invited to represent the local Government ,with other Chiefs,at the Coronation of His Late Majesty King Edward Vll at London,but he could not proceed to England for certain sudden reasons.He had ,however ,his due share of honour bestowed upon him by an invitation at Delhi Darwar in 1903,connected with the above Coronation .While at Delhi Darwar he called a Sabha of the Chiefs at an expense of above Rs.40,000.At the time of interview with the Raja Saheb of Karauli at Delhi ,Raja Balwant Singh Awagarh  presented a Choukri (beautiful carriage with 4 horses) and in return Raja Saheb of Karauli presented a Morchhal and a Chanwar .

  Raja Balwant Singh extented his possessions to a great extent ,and had its ramparts and bastions of the Fort made pucca in his time .The Kshatriya Sabha , the Rajput Boarding house  and Balwant Rajput High School of Agra are living marks of his charity , benevolence and public service .

राजा बलवंत सिंह जी का राजपूत समाज के विकास के लिए योगदान ।Contribution of Raja Balwant Singh jee of Awagarh forDevelopment of Rajput Community .

1 –सन्1897 में देश के इतिहास में पहली बार अवागढ़ के राजा बलवंत सिंह जी के प्रतिनिधत्व में कोटिला के ठाकुर उमराव सिंह जी और भिंगा  ,उत्तरप्रेदश के राजा उदय प्रताप सिंह जी के सहयोग से क्षत्रियों के सामाजिक उत्थान के लिए एक संगठन “अखिल भारतीय  क्षत्रिय  महासभा  “का 19 अक्टूबर सन्1897 में रजिस्टर्ड कराई जिसके संथापक राजा बलवंत सिंह जी को बनाया गया ।
ABKM की प्रथम सभा आगरा में उनके राजपूत बोर्डिंग हाउस में हुई थी ।
2–राजा बलवंत सिंह जी ने  बनारस के बाबू सांवलसिंह जी की अध्यक्षता में प्रस्ताव पारित करके 20 जनवरी सन्1898 को  राजपूत समाज में यूनिटी और जागृती लाने के उदेश्य से एक News Latterजिसको  Rajput Monthly का नाम दिया गया प्रकाशित  कर वाया जिसके माध्यम से देश के बिभिन्न भागों में फैले हुऐ  क्षत्रिय समाज में जाग्रति एवं संगठित करने के लिए जनसम्पर्क व् सभाएं शुरू हुई।
3-अवागढ़ नरेश खुद तो अशिक्षित थे इस पीड़ा से उनके ह्रदय  में राजपूतों के शैक्षणिक विकास की भावना का दर्द जाग्रत हुआ और इसके लिए उन्होंने साक्षरता के प्रसार की ओर अपनी दूरगामी दृष्टि फैलाई।राजा साहब ने सन् 1878 ई0 में देश में राजपूतों की शिक्षा और उत्थान के लिए आगरा में राजपूत बोर्डिंग हाउस छात्रावास प्रारम्भ किया था  जो बाद में सन् 1899 में  श्रध्येय स्वर्गीय पंडित मदन मोहन मालवीय जी और कोटला के जमींदार ठाकुर उमराव सिंह के परामर्श से  राजपूत हाई स्कूल में अपग्रेड हुआ जिसके प्रथम प्रधानाचार्य चौधरी धनराज सिंह थे।स्कूल में राजपूत समाज के छात्रों को वरीयता दी जाती थी ।बाद में ये स्कूल राजा साहिब के परिवार के सहयोग से इतना विकसित हुआ क़ि आज देश के सर्व श्रेठ महाविद्यालयों में गिना जाता है तथा जिसके पास 1100 एकड़ भूमि है जो साउथ एशिया का सबसे बड़ा कॉलेज है ।उन्होंने इस कॉलेज के विकास हेतु 100 एकड़ जमीन और काफी धन दान दिया था ।
4 -इसके बाद दूसरे राजाओं में भी उनके इस कदम से राजपूतों के शैक्षणिक विकास के विषय में जाग्रति उत्पन्न हुई जिनमें भिंगा के राजर्षि राजा उदय प्रताप सिंह जी ने वनारस में अपने नाम से उदय प्रताप कॉलेज  खोला  गया।वे राजा बलवंत सिंह जी के घनिष्ठ मित्र थे।इसी तरह ईडर के राजा प्रताप सिंह जी ने जोधपुर में Chaupansni स्कूल खोला । इसके बाद शुरू हुआ पूर्व के राजपूत शासकों के द्वारा देश के विभिन्न प्रांतों में राजपूतों के लिए स्कूल व् बोर्डिंग हाउस खोलने की शुरुआत जिनमे राजकोट ,अजमेर ,लाहौर ,रायपुर और इंदौर प्रमुख थे ।

5-राजा बलवंत सिंह जी के बाद उनके बड़े पुत्र राजा सूर्यपाल सिंह जी ने प्रथम भारतीय नॉवेल विजेता स्वर्गीय रवींद्र नाथ टैगोर जी को भी उस समय शांतिनिकेतन संस्था की स्थापना में काफी धन देकर उनकीआर्थिक सहायता की थी जिससे उनकी दान वीर होने की प्रमाणिकता सिद्ध होती है ।

6-राजा बलवंत सिंह ने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे स्वतंत्रता सेनानियों को भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों से उनकी आर्थिक मदद में योगदान दिया ।राजा साहिब के निधन के बाद भी ये दान देने की परम्परा अवागढ़ राजपरिवार ने जारी रखी ।

अवागढ़ राजा साहिब के दिल में अपनी राजपूत जाति से अगाध प्रेम था।वे बड़े भाबुक ,उदारबादी होने के साथ -साथ दूरदर्शी सोच के धनी इन्सान थे जो हर समय राजपूतों के उत्थान के विषय में चिंतित रहते थे।मैं ऐसी महान पुण्य आत्मा को उनकी 166वीं जन्म जयन्ती पर सत् सत् नमन करता हुआ सादर पुष्प अर्पित करता हूँ।

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