एक स्वर्णिम झलक जादोंवाटी:बृजभूमि का राज्य करौली—

एक स्वर्णिम झलक  जादोंवाटी : ब्रजभूमि का  राज्य करौली ————

यदुकुल वंश प्रवर्तक महाराज वज्रनाभ एवं महाराजा जियेन्द्रपाल मथुरा ——–

यदुकुल शिरोमणि भगवान श्री कृष्ण वासुदेव मथुरा से द्वारिका पुरी गये।श्रीकृष्ण जी के पुत्र प्रधुम्न जी के पुत्र अनुरुद्ध जी सभी द्वारिका में रहे।अनिरुद्ध जी  के पुत्र यदुकुल वंश प्रवर्तक  महाराज श्री वज्रनाभ जी  द्वारिका से पुनः मथुरा नगरी के राजा बने ।महाराज बज्रनाभ जी के 74 पीढ़ी बाद ई0 800 के लगभग मथुरा के राजा धर्मपाल हुए । राजा धर्मपाल के नाम के साथ ही “पाल “उपनाम जादों क्षत्रियों के साथ लिखा मिला है।राजा धर्मपाल जी बाद ई0 879 में इच्छापाल मथुरा के शासक हुए ।इनके 2 पुत्र ब्रहमपाल जो मथुरा के शासक हुए दूसरे पुत्र विनय पाल महुवे के शासक हुए जिनके वंशज “बनाफर”कहलाये।ब्रहमपाल की मृत्यु के बाद उनके बेटे जायेंद्रपाल ई0 966 में मथुरा के शासक हुए ।इनके11 पुत्र हुए।इनकी मृत्यु संवत 1049 में मथुरा में हुई।इनके 11 पुत्रों में विजयपाल सबसे बड़े थे जो यवन काल में मथुरा छोड़ कर बयाना अपनी राजधानी ले आये ।

हाराजा विजयपाल मथुरा से विजयमन्दिरगढ़ दुर्ग ( श्रीपथ या बयाना)——

करौली जादोंवाटी  राज्य के मूल पुरुष महाराजा विजयपाल मथुरा के शुरसैनी शाखा के जदुवंशी /जादव राजवंश के थे जो कालान्तर में जादों कहलाये ।कहने का तात्पर्य यह है कि करौली का यह जादों राज वंश महाराजा विजयपाल से आरम्भ हुआ जो भगवान कृष्ण की 88वी पीढ़ी में माने जाते है ।यह मैदान में स्थित अपनी राजधानी  मथुरा को मुस्लिम आक्रमणों से असुरक्षित मान कर पूर्वी राजस्थान के पहाड़ी क्षेत्र में “मानी पहाड़ी “पर ले आये और वहाँ एक सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया तथा उसे अपनी राजधानी बनाया ।अपने निर्माता के नाम पर यह किला “विजय मन्दिर गढ़” कहलाया जिसका निर्माण   वि 0 सं 0 1096 (सन 1040 )में  हुआ था । ।यही दुर्ग बाद में बयाना दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।”ख्यात”के लेखक गजनी के शासक से उसके संघर्ष का उल्लेख करते है ।राजा विजयपाल एक शक्तिशाली शासक थे।समकालीन अभिलेखों में उसे ” महाराधिराज परम भट्टारक’कहा गया है जो इस वंश में उसका राजनैतिक महत्त्व निर्धारित करता है ।संभव है ये सं0 1150(ई0 सन 1093)तक जीवित रहे हों इन्होंने 53 वर्षो तक शासन किया।करौली की ख्यातों  एवं जनश्रुति के अनुसार महाराजा विजयपाल ने गजनी की तरफ से होने वाले मुस्लिम आक्रमणों का लम्बे अरसे तक सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया परन्तु निरन्तर होने वाले आक्रमणों के समक्ष अपने को असहाय पाकर उसने शिव मन्दिर में जाकर अपना मस्तक काट कर महादेव को चढ़ा दिया और 360 रानियाँ सती हुई ।विजयपाल रासो के अनुसार महाराजा विजयपाल ने वि0 संवत 1102 में कंधार के यवन शासक बूबकशाह से युद्ध करते  हुऐ वीरगति प्राप्त की ।यथा-
ग्यारह सौ दहोतरा ,फ़ाग तीज रविवार।
विजयपाल रण जूझियो ,बूबक शाह कंधार।
इस प्रकार बयाना के किले पर मुसलमानों का अधिकार हो गया ।इस प्रकार 51 वर्ष तक जादौनों का अधिकार बयाना पर रहा ।
महाकवि चन्द्र बरदाई के “पृथ्वीराज रासो “से भी ज्ञात होता है कि ईसा की 12 वीं शताब्दी में बयाना के आसपास पौराणिक यादवों (जादौ) का प्रबल प्रभाव था ।
ज्ञात इतिहास केअनुसार महाराजा विजयपाल की मृत्यु तथा बयाना के किले पर मुस्लिम अधिकार होने के उपरान्त  जादौ कुछ वर्षों तक गुप्त वेश में बयाना से बाहर किसी अज्ञात सुरक्षित स्थान पर रहे ।कुछ अन्यत्र दूरस्थ   क्षेत्रों में जाकर बस गये ।महाराजा विजयपाल के 18 बेटे थे ।

महाराजा तिमनपाल जी बयाना से तिमनगढ़दुर्ग—–

महाराजा तवनपाल जी  अपने पिता महाराजा विजयपाल के सबसे बड़े  बेटे थे, जो 12 वर्ष तक पोशीदह रहकर अपनी ननिहाल रीवा से गुप्तरूप में बयान में अपनी धाय के मकान पर आया और धाय माता ने उनकी बहुत मदद की थी ।इसके बाद तवनपाल जी ने मेडकीपाव साधु सिद्ध  (एक सिद्धयोगी ) का आशीर्वाद प्राप्त कर बयाना के अग्निकोण में 15 मील दूर 11 वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में एक दुर्ग का निर्माण करवाया जो अपने निर्माता के नाम पर यह दुर्ग” तवनगढ़” तथा किले वाली पहाड़ी त्रिभुवनगिर कहलाई है ।इन्होंने सागर नामक जलाशय भी बनवाया । बयाना के राजवंशीय तवनपाल ( ईस्वी सन 1093-1159) इस वंश के प्रतिभाशाली शासक थे।66 वर्ष के दीर्घकालीन शासनकाल में उन्होंने तवनगढ़ दुर्ग बनवा कर अपने राज्य की शक्ति बढ़ाई। उन्होंने चम्बल नदी के डांग क्षेत्र को अधिकृत किया  और  और तवनगढ़ से तवनपाल जी ने अपने पिता महाराजा विजयपाल जी की राजधानी बयाना के यवन शासक पर आक्रमण कर के उसे भी अधिकृत किया और राजपूताने का पूर्वी भाग जिसमे वर्तमान अलवर राज्य का आधा भाग तथा भरतपुर और धौलपुर के राज्य तथा मथुरा ,आगरा एवं ग्वालियर के विशाल क्षेत्र जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया।इस विशाल क्षेत्र पर उनकी सत्ता उनके विरुद्ध “परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर”पदवी से भी सिद्ध होती है ।महाराजा तवनपाल संवत 1217 (ई0 सन 1160)के लगभग स्वर्ग सिधार गये ।महाराजा तवन पाल के 12 पुत्रों में दो पुत्र धर्मपाल और हरपाल थे ।

महाराजा धर्मपाल एवं तिमनगढ़ दुर्ग —-

महाराजा तवन पाल जी के उत्तराधिकारी धर्मपाल जी बने परन्तु उनके समय में शासन की समस्त बागडोर उनके   पासवानिया भाई हरपाल के हाथ में थी जो एक वीर और पराक्रमी योद्धा था।कहा जाता है कि हरपाल गजनी के सुल्तान के घोडे छीन कर तवनगढ़ ले आया था जिससे राजा विजयपाल का बदला गजनी के सुल्तान से लिया जाना कहा जाता है इस घटना से महाराजा तवन पाल बड़े प्रसन्न हुये व राज्य का कार-भार उसके सुपुर्द किया ।गृह कलह के कारण महाराजा धर्मपाल ने तवनगढ़ छोड़ कर एक नया किला “धौल देहरा (धौलपुर)”बनवाया ।धर्मपाल जी के पुत्र कुंवरपाल ने गोलरी में एक किला बनवाया जिसका नाम कुँवरगढ़ रखा।कुछ वर्षों बाद कुंवरपाल ने हरपाल को मारकर तवनगढ़ पर अपने पिता धर्मपाल का अधिकार स्थापित किया ।इधर बयाना का शासक जो हरपाल का मित्र था हरपाल के मारे जाने की घटना से आशंकित होकर उसने तवनगढ़ पर घेरा डाल दिया ।धर्मपाल जी तवनगढ़ छोड़कर अपने पुत्र कुंवरपाल द्वारा चम्बल के किनारे झीरी के पास निर्मित निकटवर्ती कुँवरगढ़ दुर्ग में शरण ली परन्तु यहां पर भी मुस्लिम आक्रांता द्वारा घेर लिए जाने पर उसने भीषण युद्ध करते हुऐ वीरगति प्राप्त की  ।

महाराजा कुँवरपाल प्रथम एवं तिमनगढ़ दुर्ग ——
धर्मपाल जी के बाद उनके उत्तराधिकारी कुंवरपाल  जी ने दीर्घ काल तक शासन किया ।बयाना और तवनगढ़ दोनों दुर्ग उसके अधीन रहे ।जैन साहित्त्य में मुनि जिनदत्तसूरी के 1157ई0 में कुंवरपाल जी के शासनकाल में तवनगढ़ आगमन तथा एक कलशाभिषेक समारोह में भाग लेने व राजा कुंवरपाल से उनकी भेंट उल्लेख मिलता है ।सन 1196ई0 में मुहम्मद गौरी ने अपने सिपहसाला कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ जादों राज्य पर जबरदस्त आक्रमण किया ।कुंवरपाल जी ने अप्रतिम साहस औऱ पराक्रम का परिचय देते हुए आक्रांता का सामना किया परन्तु विजयश्री से वंचित रहे।इस प्रकार बायना और त्रिभुवनगिरी (तवनगढ़) दोनों दुर्गों पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो गया ।गौरी द्वारा तवनगढ़ पर अधिकार कर लिए जाने के साथ ही जादों राजपूतों की दूसरी राजधानी तवनगढ़ या त्रिभुवनगिर के गौरवशाली स्वर्णिम युग का पटाक्षेप हो गया ।सन 1196 से 1327ई0 तक इस  जादों वंश का तिथिक्रम संदिग्ध है ।ऐसा प्रतीत होता है कि इस युग मे अराजकता रही और वंश का भाग्य कुछ समय के लिए अस्त हो गया ।इस काल में भी बहुत से जदुवंशी / जादों यहां से विस्थापित होकर दूरस्थ विभिन्न स्थानों पर जा बसे ।इस काल में जादौ परिवारों का पुनः ब्रज ( सूरसेन प्रदेश मथुरा)के विभिन्न क्षेत्रों तथा गोंडवाना  (मध्यप्रदेश) के विभिन्न क्षेत्रों में विस्थापित हो गये ।
कुंवरगढ़ मुसलमानों के हाथ लग जाने के बाद कुंवरपाल ने मय अपने साथियों के अपने मामा के घर रीवां राज्य के अन्धेरा कटौला नामक गांव में जाकर निवास किया। वैसे यह तथ्य बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है ।लेकिन यह स्थान आज तक अज्ञात है ।इस घटना को कुछ इतिहासकार यह भी बताते है कि सन्1196 ई0 में मुहमूद ग़ौरी ने अपने सेनापति कुतुबुद्दीन  के साथ आकर पहले बयाना पर कब्जा कर लिया  फिर तिमनगढ़ भी ले लिया और कुंवरपाल जी के कुल  राज्य पर अधिकार कर लिया। इस लिए महाराज कुंवरपाल जी को  अपने लोगों के साथ चम्बल के जंगलों में सबलगढ़  की तरफ भागना पड़ा और वहीं अपना गुप्त रूप में शायद रहे यही सत्य प्रतीत होता है ।कुंवरपाल जी के भाई मदनपाल जी मुसलमानों से मिल गए इस कारण उनकी सन्तानें ” गोंजे “खानदान के राजपूत कहलाने लगे ।जब कि वे लोग मुसलमान नहीं हुये थे फिर भी राजपूतों की निगाहों से गिर गए।महाराजा कुँवरपाल जी के स्वर्गवास के बाद सहनपाल ,नागार्जुन ,पृथ्वीपाल ,तिलोकपाल ,वापलदेव ,साँसलदेव ,आसलदेव तथा गोकुलदेव एक के बाद दूसरे उत्तराधिकारी बने । इसी समय अधिकांश  जादों राजपूत सरदार तवनगढ़ गढ़ से विभिन्न  स्थानों पर जंहा उनको रहने को जगह मिली पलायन कर गए।दिल्ली सल्तनत की सेना ने इस तवन गढ़ के दुर्ग  को अपना निवास स्थान बनाया।इसके बाद मुगलकाल में यह दुर्ग जर्जर  होता गया और इसकी उपेक्षा होती गयी।इतने वर्ष से समय की मार को सहता हुआ जादों राजपूतों का ये दुर्ग तवनगढ या ताहनगढ़ अब भी गर्व से सीना ताने खड़ा है।

महानतम शासक एवं करौली के संस्थापक महाराजा अर्जुनपाल  जी एवं करौली स्थापना –

सन्1327 ई0में  राजा कुंवरपाल जी के भाई गोकुलदेव जी (कहीं -कहीं अनंगपाल या अजयपाल भी लिखा है ) के बेटे अर्जुनपाल जी  ने अपनी शक्ति का संचय करके अपने पूर्वजों के राज्य  को वापस लेने के लिए इन्होंने मदरायल   /मंडरायल के मुसलमान शासक मियां मक्खन को मार कर मडरायल का दुर्ग छीन लिया।धीरे -धीरे इन्होंने अपनी शक्ति बढ़ाई और बाद में   पंवार राजपूतों से मिलकर सरमथुरा के पास 24 गांव आवाद कर महाराजा  तिमन पाल के अधिकार में जो  डांग क्षेत्र के अलावा जो भी क्षेत्र था उस पर वापिस कब्जा किया ,किन्तु अर्जुनपाल जी बायना को पुनः प्राप्त नहीं कर सके ।उनके समय में बयाना पर भरतपुर के जाट महाराजा का अधिकार था ।दूसरा अर्जुनपाल जी ने तत्कालीन बयाना के जाट राजा से दुष्मनी भी लेना  उचित नहीं समझा क्यों कि उस जाट राजा के पूर्वज भी किसी समय बयाना के मूलतः यदुवंशी  क्षत्रिय ही थे जो कालान्तर में जाट बन गए ।महाराजा अर्जुनपाल जी ने 1348 ई0 में  करौली शहर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।राजा अर्जुनपाल ने ही एक महल, बाग़ और एक शहर के पास वीरवास नामक पहाड़ी पर  अंजनी का मंदिर बनबाया  जो बाद में करौली के जदौनों की कुलदेवी कहलायी और महाराजा अर्जुनपाल जी ने ही गढकोट  नामक किला  नीदा की घाटी में निर्माण कराया।इसके अलावा उन्होंने ही भगवान कल्याणजी का मंदिर भी बनबाया।इस कल्याणजी के मंदिर के पीछे ही शहर का नाम कल्याणपुरी होकर फिर उसका अपभ्रंश “करौली”प्रसिद्ध हुआ। यह नगर भद्रावती नदी के किनारे स्थित था इस कारण भद्रावती नाम से भी जाना जाता है ।अर्जुनपाल जी ने कल्याणपुरी में पक्के फर्श का बाजार ,मन्दिर ,कुएं ,ताल आदि बनवाये तथा चारों ओर नगर परकोटा खिंचवाया ।कुल 9 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में नगर की स्थापना की गई।अर्जुनपाल के बाद ई0 1361  में विक्रमादित्य गद्दी पर बैठे ।उसके बाद ई0 1382 में अभयचन्द्र और ई0 1403 में पृथ्वीपाल शासक हुए।भाटों  तथा जागाओं के बयानो के अनुसार पृथ्वीपाल जी ने ग्वालियर के राजा मानसिंह तंवर पर आक्रमण किया था और मुसलमानों ने तिमनगढ़ मुहासरह किया ,लेकिन जदौनों ने मुगलों को पुनः हटा दिया और क्षेत्र पर कब्जा पुनः कर लिया।उनके बाद उदयचंद ,प्रतापरुद्र और चन्द्रसेन राजा हुए।

राजा चन्द्रसेन एवं उंटगिरी दुर्ग ——–

मालवा के राजा ने करौली पर आक्रमण करके करौली को अपने अधिकार में ले लिया ।यदुवंशी शाखा के 15 वें राजा चन्द्रसेन खिलजी से परास्त होकर
उंटगिरी के दुर्ग में चले गये और तपस्वी का जीवन व्यतीत करने लगे। इनका अधिकार भूमि के एक छोटे से भाग पर बना रहा।इनके बारे में बड़वा लोग बहुत सी करामाती बातें कहते है ।इनके बेटे भरतीचंद रियासत के योग्य नहीं थे ,इस वास्ते राजा चन्द्रसेन के पोते गोपालदास जी अपने दादा की गद्दी पर बैठे।

‎राजा गोपालदास एवं उतगिरीदुर्ग——

गोपालदास जी दादा चन्द्रसेन के समय में ही यह ई0 1553 में गद्दी पर बैठे।इनका राज्यभिषेक अकबर के शासनकाल में गोपालदास जी ने अपने पूर्वजों के खोये हुए राज्य पर पुनः अधिकार कर लिया ।ये मुगल सल्तनत के मनसबदार थे ।इन्होंने अपने क्षेत्र के भील-मीणों का दमन किया तथा मासलपुर ,झीरी और बहादुरपुर के दुर्ग बनवाये ।ई0  1599 में गोपालदास ने अकबर के लिए दौलतावाद का दुर्ग जीता ।अकबर ने उनको 2 हजारी मनसब और रणजीत नगाड़ा निशान का सम्मान दिया।मासलपुर के 84 गांव भी गोपालदास ने अपने अधीन कर लिए ।ऐसा भी कहा जाता है कि दौलताबाद की विजय के उपहारस्वरूप राजा गोपालदास ने अकबर से अपने पूर्वजों की जन्मस्थिली मथुरा क्षेत्र भी मांगा था लेकिन आगरा का महत्व रखने की बजह से उनको अकबर ने मथुरा नहीं दिया ।जब गोपालदास अकबर के दरबार मे जाते थे तो उनके आगे -आगे नगाड़ा बजता हुआ चलता था। ई0 1566 में अकबर ने राजा गोपालदास के हाथों आगरा के दुर्ग की नींव रखवाई।गोपालदास जी ने करौली के निकट बहादुरपुर का किला तथा करौली राजमहल में गोपाल मन्दिर बनवाया ।इस मंदिर में दौलताबाद से लाई गई गोपाल जी की मूर्ति स्थापित की गई।यह मूर्ति आज भी मदनमोहन जी के मंदिर में दाईं ओर के कक्ष में देखी जा सकती है।गोपालदास जी ने मासलपुर में भी एक महल व बाग तथा चम्बल नदी के किनारे झीरी में  भी एक महल बनवाया।इन्होंने मथुरा में यमुना किनारे विश्रामघाट पर मंदिर बनवाया। संवत 1602 में मचा मीणों ने करौली में विद्रोह किया ।राजा गोपालदास जी ने मीना लोगों को हराकर इस क्षेत्र पर कब्जा करके उन्नतिशील वनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था।एक वार ये किसी युद्ध में गये हुए थे अपना राज्य एक गोहजे ठाकुर सीलोती को सम्भला गये थे।वापस आने पर गौहजों ने इनको राज्य देने से इनकार कर दिया।अतः इनको बयाना  से शाही फौज मंगवानी पड़ी जिसकी मदद से इन्होंने गौहजे ठाकुरों का दमन किया और उनकी जागीरें जप्त करली।इनका अधिकांश समय झगड़ों को शान्त करने में ही बीता।
महाराजा गोपालदास के समय में ही आयी  कैला देवी मैया —–राजा गोपालदास जी के समय में ही कैला देवी मैया करौली नगर से सोलह मील दूर आकर विराजमान हुई थी।बाबा केदार गिरी ने हिंगलाज पर्वत पर घोर तपस्या की और देवी जी उनके साथ आईं ।कैला देवी जी का मंदिर सर्वप्रथम मुकुंददास खींची द्वारा बनवाया गया था।

  महाराजा गोपालदास के देहावसान सं0 1626 ,ई0 1569 में हुई।इन के 7 रानियां थी जिनसे 5 पुत्र हुए ।महाराजा गोपालदास जी के  बाद उनके बेटे 1 -द्वारिकादास महाराजा बने।
‎2 -राव मुकटराय  जी थे जिनके वंशज सरमथुरा ,झिरी तथा सबलगढ़ के “मुक्तावत”जादौन राजपूत कहलाते है ।3तुलसमबहादुर थे जो बहादुरपुर के किले के सुवेदार हुए। जिनके वंशज बहादुर के जादौन कहलाते है। इनके वंशज सबलगढ़ में है ।अन्य 2 भाई रामसिंह व बिहारीदास थे जिनके विषय में कोई जानकारी नहीं है।

महाराजा द्वारिकादास एवं बहादुरपुर दुर्ग—-

महाराजा  गोपालदास जी के बाद ई0 1569 में द्वारिका दास जी गद्दी पर बैठे ।इनका राज्य भिषेक बहादुरपुर में हुआ ।इनके कई पुत्र  1-प्रताप सिंह (अपने पिता की मृत्यु वाद शासन सम्हाला किन्तु अपने भाई मुकुन्द जी को अधिकार देदिया)2-
मुकुन्द राव (ये गद्दी के हकदार हुए ) , 3-मगदराय (इनके वंशज पंचपीर जादों कहलाये जो मांसलपुर क्षेत्र में है) ।मगदराय जी  बड़े उपद्रवी थे ।अब ये बहादुरपुर देवता के नाम से पूजे जाते है  ,4-हरीदास जी (इनके वंशज हरीदास के नाम से जाने जाते है जो हरनगर व माची में है ), 5-शार्दूल जी (इनके वंशज जाखोदा एवं मंडरायल में है) 6-सलेदीजू (इनके वंशज सलेदू वाले कहलाते है जो वीरपुर में है ) ।
राजा मुकुन्ददास एवं बहादुरपुर दुर्ग—–

राजा मुकंददास ई0 1604 में बहादुरपुर में गद्दी पर बैठे ।इनके 6पुत्र थे जिनमें 1 जगमन गद्दी के अधिकारी हुए) ,2- राव चतुरमन जी (मिझोरा) ,3-देवमन (हाड़ौती) 4-मदनमन जी (करनपुर खोरी), 5-महामनजी (नरौली ) 6-त्रिलोकमन जी(ये महामन  के नरौली में बसे ) जो  सभी मुकुन्द के जादौन कहलाते है।इस शाखा के काफी वंशज करौली नगर के चतीकना ,गणेशगेट, फुटाकोट चौराहे पर रहते है जिनमें स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर रामसिंह खादी वाले काफी मशहूर है।

राजा जगमन जी एवं बहादुरपुर दुर्ग—-  ‎

‎राजा मुकुन्ददास जी के बाद जगमन ई0 1605 में  राजा बने ।इनका राज्यभिषेक बहादुरपुर के दुर्ग में हुआ। इनके समय बादशाह जहाँगीर का शासन था।राजा जगमन के समय सरमथुरा के मुक्तावत और सबलगढ़ के बहादुर जादौन में आपसी विवाद में युद्ध हुआ ।जगमन के कई पुत्र थे जिनमें एक अनुमन प्रमुख था जो सभी अयोग्य थे ।अनुमन के वंशज मंजूराकोटरी के जादौन कहे जाते है।

राजा छत्रमन जी एवं बहादुरपुर दुर्ग—–

राजा जगमन के बाद उनके छोटे भाई छत्रमन को जादों सरदारों की राय से ई0 1631 में राजा बने ,जो बादशाह औरंगजेब के साथ दक्षिण की लड़ाई में नायक रहे ।महाराजा छत्रमन जी  इनके 7 पुत्र थे ,1- धर्मपाल  जी,2-भूपाल जी /भूमिपाल जी,3-पृथ्वीपाल जी , 4- शस्तपालजी ,5-संम्पत पाल जी 6-खड्ग पाल जी ,7 -रामपाल  जी।   बड़े बेटे धर्मपाल जी छत्रमन जी के बाद राजा बने।दूसरे पुत्र राव भूपाल/ भूमिपाल जी थे जिनके वंशज इनायती के है इनकी बहादुरी से प्रभावित होकर इनको राव का खिताब मिला इन्ही के वंशज राव बिहारीपाल जी इनयती  उस जमाने मे साहित्य कला प्रेमी ,अच्छे कवि तथा ज्योतिष के प्रकांड ज्ञाता थे ।बिहारीपाल जी  के वंशज  आज राव शिवराजपाल जी इनायतीहै काफी मशहूर है तथा राजपूतों के इतिहास के अच्छे ज्ञात भी है । । तीसरे पुत्र शस्तपाल जी थे जिनके वंशज मनोहरपुरा के है ।
राजा धर्मपाल एवं करौली राजधानी—-

महाराजा छत्रमन जी के बाद धर्मपाल जी दुतीय महाराजा बने जिन्होंने दिल्ली के बादशाह को खुश करके अपने भाई मुक्तावतो (झिरी)  और सबलगढ़ वालों की बगावत को समाप्त किया ।विक्रम संवत 1707 को धर्मपालजीजी दुतीय ने  सबसे पहले करौली नगर को अपनी राजधानी बनाया तथा यहां पर राजमहलों सहित अनेक निर्माण कार्य करवाये ।उनका देहावसान करौली के राजमहलों में हुआ ।इनकी लोग पूजा करौली के लोग देवता के रूप में करते है । महाराजा धर्मपाल के अधिकार में तिमनगढ़ ,मंडरायल ,गढ़ मंडोरा ,बहादुरपुर ,तथा उंटगिर के दुर्ग थे ।जिन्होंने ही इन किलों की मरंबत कराई।इनकी मृत्यु ई0 1665 में हुई। महाराजा धर्मपाल जी दुतीय के  बेटे  जिनमे रतनपाल जी, कीर्तिपाल जी ,भोजपाल जी, जसपाल जी तथा गुमानपाल थे ।
राजा रतन पाल जी एवं करौली —–

‎राजा धर्मपाल के बड़े बेटे रतनपाल जी करौली के राजा बने ।दूसरे बेटे  कीर्तिपाल थे जिनके वंशज गेडेरी (कुडग़ांव)  औए हाड़ौती के जागीरदार कह लाये तथा इनको भी राव का खिताब था।सीमावन्दी के झगड़े में मुकुन्द के जदौनों ने इनका बध कर दिया ।नरौली व हाड़ौती की जागीरें राजा रतनपाल जी ने जप्त करली।और तीसरे भोजपाल हुए जिनके वंशज रांवठरा के जागीरदार है। 4- बेटे जयपाल जी के जसपुरा के जागीर दार हुए।5 -गुमानपाल ,इन्होंने भोजपाल की जागीर में हिस्सा लिया ।6-हेम पाल सपोटरा का किला बनवाया ।राजा धर्मपाल के बाद उनके बेटे रतनपाल राजा बने जिनके समय में मुक्तावत और बहादुर जादौन बागी  होगये और लगान देंने से इनकार कर दिया ,इसलिए झिरी और खेड़ला को खालिसह कर दिया लेकिन कुछ समय बाद वापस देदिया ।
‎राजा कुंवरपाल दुतीय—–
‎महाराजा रतनपाल के बाद उनके बड़े बेटे कुंवरपाल दुतीय महाराजा बने  तथा छोटे पुत्र सोनपाल जी कुरावदे के जागीरदार बने ।राजा कुंवरपाल दुतीय ने महलों में गुम्बदों वाले महल का निर्माण कराया ,इन्हीं के शासन काल में राजपूतों ने चम्बल के किनारे फिर फसाद कर दिया जिनको दिल्ली दरबार की हिमायत थी ,तब महाराजा कुंवरपाल जी ने अपने क्षेत्र के दो बादशाही थानों के आदमियों को अपना नौकर बना लिया,जिनकी औलाद अब भी करौली में मौजूद है । कुंवरपाल जी ने और औरंगजेब के शासनकाल में जयपुर नवेश बिशन सिंह जी व जयसिंह जी के साथ रत्नपाल जी के दूसरे बेटे उदयपाल जी सपोटरा के राव हुये ।महाराजा रतनपाल जी के बाद उनके बेटे  गोपाल सिंहदुतीय करौली के महाराजा बने।

करौली के इतिहास में महाराजा गोपालदास जी के बाद सर्वाधिक प्रभावशाली महाराजा गोपालसिंह जी दुतीय —

  ‎सं0 1781 में करौली की गद्दी पर बैठे।राजगद्दी पर बैठने के समय ये नाबालिग थे ।इससे राज्य प्रबन्ध दो योग्य ब्राह्मणों खंडेराव ओर नवलसिंह के हाथ में था ।इन दोनों मंत्रियों ने मरहटों से मित्रता गाँठ करके करौली पर उनका धावा नहीं होने दिया।बड़े होने पर गोपालसिंह जी ने राज-काज अच्छी तरह चलाया ।ये बहुत ही बहादुर और हिम्मत वाले थे।जिस किसी ने वगावत की तुरंत उसे दंड दिया ओर राज्य के किलों को मजबूत बनाया ।

इनके समय करौली राज्य सबलगढ़ से लेकर सिकरवारड तक  फैल गया था जो ग्वालियर से 4 किमी दूर सिकरवार की पहाड़ी तक था।इन्होंने अपने समय में झिरी तथा सरमथुरा के मुक्तावतो को अपने पक्ष में कर लिया था। इस प्रकार सं0 1805 तक राज्य में शांति स्थापित करने के बाद करौली  के महलों को बढ़ाया तथा राजधानी के चारों ओर लाल पत्थर का पक्का शहरपनाह( परकोटा) निर्माण ,गोपालमन्दिर ,दीवानेआम ,त्रिपोलिया ,नक्कारखाना तथा मदनमोहन जी का मंदिर भी इन्होंने ही बनवाये थे ।बादशाह मुहम्मदशाह ने इनको “माही मरातिव”का रुतबा दिया ।इनके समय करौली नगर की काफी उन्नति हुई ।नगर में इनकी दर्शनीय छतरी बनी हुई है।ये राजपूताने की बड़ी -बड़ी कार्यवाहियों में उदयपुर ,जयपुर तथा जोधपुर के साथ शरीक रहे ।इनके राज्य में 697 गांव थे ।13 मार्च सं0 1814 को इनका देहावसान हो गया ।

‎महाराजा गोपाल सिंह जी के बाद क्रमशः महाराजा तुरसनपाल जी ,मानकपाल जी, हरीबक्स पाल जी , प्रतापपाल जी ,नरसिंह पाल जी ,भरतपालजी ,मदनपाल जी ,लक्ष्मनपाल जी ,जय सिंहपाल जी ,अर्जुनपाल जी दुतीय,महाराजा भंवरपाल देव बहादुर यदुकुल चन्द्र भाल ,महाराजाभौमपाल देव बहादुर यदुकुल चन्द्र भाल , महाराजा गणेशपाल देव बहादुर यदुकुल चन्द्र भाल करौली की गद्दी पर बैठे ।वर्तमान में पूर्व करौली के नरेश गणेशपाल जी के पोते  महाराजा श्री
‎कृष्ण चंद्र पाल देव बहादुर यदुकुल चन्द्र भाल  करौली के राज प्रसाद में रहते है ।इनके पुत्र युवराजकुमार विवस्वतपाल जी है।
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जय हिंद।जय राजपूताना।।

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