ऐतिहासिक नगर सवाईमाधोपुर के दार्शनिक स्थलों का अवलोकन–

ऐतिहासिक नगर सवाईमाधोपुर परिक्षेत्र के दार्शनिक स्थल—
मूलरूप से माधोपुर के नाम से प्रसिद्ध सवाईमाधोपुर राजस्थान का एक खूबसूरत पौराणिक नगर है।राज्य के अन्य प्रसिद्ध स्थानों की तरह यहां भी हिन्दुस्तान के गौरवशाली अतीत को महसूस कर सकते हैं ।इस प्राचीन नगर के आस-पास कई ऐतिहासिक स्मारक ,खण्डहर एवं धार्मिक स्थल मौजूद हैं जो पर्यटकों को काफी हद तक रोमांचित करने का कार्य करते हैं।यह नगर प्रसिद्द रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान के पास है ।इस विशेष लेख के माध्यम से जानिए सवाईमाधोपुर नगर और आस -पास देखे जाने वाले पर्यटक स्थलों के विषय में —-
ई. 1765 में जब सवाई माधोसिंह प्रथम ने शेरपुर की प्राचीर बनवाई तब उसका नाम बदलकर सवाई माधोपुर रख दिया। इस नगर के चारों ओर एक परकोटा बना हुआ था जिसका कुछ हिस्सा पहाड़ियों से निर्मित था।भैंरो दर्रा नामक दरवाजा नगर का प्रमुख प्रवेश द्वार था।इस नगर की योजना जयपुर जैसी ही रखी गयी थी। अतः सड़कें या तो एक दूसरे के समानान्तर हैं और या फिर समकोण पर काटती हैं ।नगर में कई मन्दिर हैं ।प्राचीन मन्दिरों में हनुमान जी , गलता जी , गोपाल जी , काला-गोरा भैंरु , नृसिंग जी , जगदीश जी , श्री जी , गोविंद जी , तथा रघुनाथ जी के मन्दिर अधिक प्रसिद्ध हैं ।
रणथम्भोर दुर्ग—
   रणथम्भौर  दुर्ग  अरावली विन्ध्याचल पर्वत मालाओं के मध्य 481 मीटर की ऊंचाई पर एक सुरक्षित अण्डाकार पहाड़ी पर निर्मित है ।यह दुर्ग भारत के सर्वाधिक मजबूत दुर्गों में से एक है जिसने शाकम्भरी के चाहमान साम्राज्य को शक्ति प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की।
रणथम्भोर दुर्ग का निर्माण–
इतिहासकार डा0 सूरज जैदी के शोध के अनुसार उनको अपने शोध के दौरान अनेक प्राचीन मूल पाण्डुलिपियाँ और एक जैन मुनि द्वारा लिखित बहुत पुरानी पुस्तक के कुछ पृष्ठ प्राप्त हुये हैं। जिनसे भी रणथम्भौर के निर्माण के सूत्र हाथ लगते हैं। जिनकी सत्यता में संदेह नहीं हो सकता है। यह किला छोटे रूप में मूलतः जादौन राजपूतों की एक उपजाति टाटू क्षत्रियों द्वारा ही वि.सं. 1001 में बनवाया गया था। चारण और भाटों की विरदावलि में जैनमुनि ने जो पाया, उसे इस प्रकार लिखा गया है :
राजां लूटैं, फौजां मोडे, नित उठि करे पौवारा दो नगर टाटूओं के, किला रणतभवंर गढ-टट्टवारा ।।१।।
टाटू ठाकुर ठेठ के आदु पीठी राज
पीपलंदे हाथी दियो, मद झरतो गजराज ||२||
टाटू राजा जगरौटी (वर्तमान गंगापुर, हिण्डौन क्षेत्र) की अर्द्ध स्वतंत्र जागीर के स्वामी थे। वर्तमान स्थान नारायणपुर-टद्वारा में भी उनका एक दुर्ग था टाटू क्षत्रिय बड़े ही बहादुर, साहसिक और महादानेश्वरी होते थे। उन्होंने निकटवर्ती खींची, तोमर, परमार राजा-महाराजाओं के गांवों-नगरों को लूटकर इस विषम दुर्ग का निर्माण करवाया। टाटू लूटमार करके इस दुर्ग में शरण ले लेते थे और कोई दुश्मन उनके पास फटक नहीं पाता था। शनैः शनैः रणतभंवरगढ़ की अभेद्यता, प्राकृतिक सुरक्षा की ख्याति सर्वत्र फैलने लगी।
नवीन अनुसंधानों से साक्ष्य मिले हैं कि इस पर्वतीय भाग में ग्यारहवीं शताब्दी तक बयाना का विशाल दुर्ग यदुवंशीयों का प्राचीन साम्राज्य का केन्द्र था। और उनके अधीन अनेक राजपूत वंशों के सामन्त भी थे, उनमें से एक जादौन राजपूत शासक भी थे। उनकी अनेक उपशाखाओं द्वारा यह क्षेत्र मीणा सैनिक प्रमुखों के सहयोग से शासित होता था। दसवीं शताब्दी में मुसलमानों के आक्रमण और बयाना दुर्ग के पतन के बाद बनास और चम्बल नदियों के इस मध्यवर्ती क्षेत्र में इन सामन्तों ने अनेक नवीन दुर्गों का निमार्ण किया। जिनमें यह दुर्ग भी था। इसी समय अजमेर में (सपादलक्ष ) चौहानों का राज्य था जो दिल्ली के तंवरों (तोमर) के अधीन थे। उन्होंने वर्षों तक इस दुर्ग पर अधिकार प्राप्त करने का प्रयास किया। कथा है कि ” एक बार दुर्ग के शासक टाटू राजा जुहारसिंह, संभवतः इसे भी जैता कहा जाता है, की कन्या का विवाह संबंध सारंगदेव चौहान से निश्चित हुआ। बारात के बहाने असंख्य चौहान वीरों ने गढ़ में प्रवेश कर सर्व टाटुओं का संहार कर दिया एवं किले को अपने अधिकार में कर लिया। इस प्रकार दुर्ग अजमेर के चौहानों के अधीन हो गया।
बलबन शिलालेख जो वि.सं. 1162 का है, से जानकारी मिलती है कि वीसलदेव के पुत्र पृथ्वीराज (प्रथम) ने प्रसिद्ध साधु अभयदेव ( मलधारी ) के उपदेश से रणस्तम्भपुर में जैन मंदिर बनवा कर उस पर स्वर्ण कलश चढ़वाया था। संभवतः उस प्रतापी नरेश ने स्वर्ण कलश चढाया है, मंदिर नहीं बनवाया। स्पष्ट है कि उस समय दुर्ग अति समृद्ध रहा होगा।
12 वीं शती ई. में पृथ्वीराज चौहान के आने तक यहाँ बयाना-तिमनगढ़ के यादवों (आधुनिक जादों राजपूत ) ने शासन किया। बाद के समय में इस  क्षेत्र के जादों शासक आपसी झगड़ों के कारण कमजोर हो गये ।हमीर के पिता जैत्रसिंह ने भी सन 1215 के लगभग ककरागिरि (आधुनिक करौली) के शासक के साथ युध्द किया था  जिसमे उसकी विजय हुई।इसके बाद पुनः हमीर ने अपने दिग्विजय अभियान के दौरान त्रिपुरारगिरि (करौली क्षेत्र आधुनिक तिमनगढ़ दुर्ग ) के शासक संभवतः त्रिलोचनपाल को हरा कर अधीनता स्वीकार  करने के लिए मजबूर किया ।हम्मीर देव (सन् 1232- 1301ई.), रणथम्भौर का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था, जिसने कला एवं साहित्य को प्रश्रय दिया एवं सन् 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का वीरतापूर्वक सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।हमीर ने अपने जीवनकाल में 17 युद्ध लड़े तथा सभी में विजय प्राप्त की ।इस दुर्ग की ख्याति का श्रेय हमीरदेव चौहान को जाता है , जिसके कारण आज भी इस पावन धरती को हठीले हमीर की धरा कहा जाता है। इसके बाद दुर्ग पर दिल्ली के सुल्तानों का अधिकार हो गया। बाद में यह राणा सांगा (1509-1527 ई.) तथा तत्पश्चात मुगलों के नियंत्रण में रहा । अन्त में 19दिसम्बर 1754 को यह दुर्ग जयपुर नरेश सवाई माधोसिंह प्रथम के आधिपत्य में आ गया  और देश स्वतंत्र होने के वाद भी काफी समय तक जयपुर राजपरिवार के ही अधीन रहा।
यह दुर्ग रणथम्भौर बाघ अभ्यारण्य के ठीक मध्य में स्थित है। रक्षा प्राचीर से सुदृढ़ इस दुर्ग में सात दरवाजे- नवलखा पोल, हथिया पोल, गणेश पोल, अंधेरी पोल, सतपोल, सूरजपोल एवं दिल्ली पोल हैं। दुर्ग के अंदर स्थित महत्वपूर्ण स्मारकों में- हम्मीर महल, रानी महल, हम्मीर बड़ी कचहरी, छोटी कचहरी, बादल महल, बत्तीस खंभा उत्तरी, झंवरा – भंवरा (अन्न- भंडार), मस्जिद एवं हिन्दू मंदिरों के अतिरिक्त एक दिगम्बर जैन तथा एक दरगाह स्थित है। यहाँ स्थित गणेश मंदिर पर्यटकों के सर्वाधिक आकर्षणका केन्द्र है।
रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान—
सवाईमाधोपुर जिले में अरावली और विंध्याचल पर्वत मालाओं का संगम स्थल सघन वनों से आच्छादित होकर वन्यजीवों की शरण स्थली रहा है।392 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला यह रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान की टाइगर सफारी के साथ नैसर्गिक सुंदरता के लिए  विशेष प्रसिद्धि है।इसमें बाघ , बघेरा ,साँभर ,चीतल ,जंगली सुअर ,भालू ,नीलगाय ,चिंगारा , मगरमच्छ आदि अनेक प्रकार के जीव-जन्तु तथा पक्षीयों की लगभग 272प्रजातियां मलिक तलाब , राजबाग तालाब , पदम् तालाब , रण थम्भोर दुर्ग एवं झालरा क्षेत्र में  विचरण करते हुए मिलते हैं।जयपुर रियासत की इस शिकारगाह को स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1955 ई0 में वन्य जीव अभ्यारण घोषित किया गया था।सन 1973 में भारत सरकार ने इसे बाघ परियोजना का दर्जा दिया था।सन 1980 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। वर्ष 1991 में इस बाघ परियोजना का दायरा 392 वर्ग  किलोमीटर से बढ़ा कर 1334 किमी0 कर दिया है इसमें वर्ष 1984 में घोषित सवाई मानसिंह सेंचुरी , कैलादेवी सेंचुरी तथा कुवाल जी गेम रिजर्व शामिल है ।यह उद्यान एक पारितांत्रिक द्वीप है जो लगभग 96 गांवों से घिरा हुआ है।इस राष्ट्रीय उद्यान में 300 प्रजातियों  के वृक्ष पाए जाते हैं। उद्यान में 80 प्रतिशत पेड़ धौंक के हैं ।इसके अलावा जाल ,छीला , खेर , खेजड़ी ,कदम ,नीम ,इमली ,चिरेल ,जंगल जलेवी , आम , बरगद ,अमलतास , जामुन ,चबेणी ,तथा घोटाथुर बहुतायत संख्या में मिलते हैं ।
गणेश मन्दिर–
ऐतिहासिक विश्व धरोहर में शामिल रणथम्भोर दुर्ग के भीतर बना हुआ है ।सम्पूर्ण राजस्थान  में  गणेश जी के  मन्दिर की  मान्यता प्रसिद्ध है ।मन्दिर के निमार्ण के बारे में अनेक किवदन्तियां हैं। परन्तु यह निर्विवाद है कि सन् 944 ई. में दुर्ग निर्माण से पहले इस मन्दिर का निर्माण किया गया था। चौहान राजाओं के काल से यहां “गणेश चौथ” का मेला समारोहपूर्वक भरता चला आ रहा हैं। ऐतिहासिक ग्रन्थों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां हिन्दू सूर्यवंशी चौहान हम्मीर की रानी  रंगादेवी एवं पुत्री देवलदे प्रतिदिन आरती का थाल सजाकर उपासना करती थी। उनके समय से ही यहाँ प्रतिवर्ष गणेश चतुर्थी को मेला लगाया जाता था। उस समय विशेष साज-सज्जा और उत्सव आयोजित किए जाते थे। वह परम्परा आज भी अक्षुण्ण है। रणथम्भौर के गणेश त्रिनेत्री हैं और केवल मुख भाग ही प्रकट है, शेष प्रतिमा शिलाखण्ड में अदृश्य है। रणथम्भौर पर मुस्लिमों के हमले हुए और मुग़लों, खिलज़ी शासकों के अधीन भी यह दुर्ग रहा किन्तु अपनी चमत्कारिक शक्ति से यह देवालय सदियों से सुरक्षित रहा है और आज भी अपने गौरवशाली अतीत को छोटे से गर्भगृह में समेटे जन-जन की विशाल आस्था का वंदनीय स्थल बना हुआ है।
मिश्रीदर्रा-
यह दुर्ग का मुख्य प्रवेश द्वार माना जाता है, जहाँ द्वार के पास बांयी ओर
गौमुख से एक कुण्ड में पानी गिरता है। ऊपर सैलानियों के बैठने के लिए पक्के स्थान हैं। यह वर्षभर सैलानी आते रहते हैं। कुण्ड का पानी पर्वतीय चट्टानों में लुका छिपी का खेल खेलत है, कहाँ लुप्त कहाँ प्रकट बहता रहता है। ऊँची-ऊँची पर्वत मालाएं आकाश को चूमती दिखाई देती हैं ।यहां साधु लोग तपस्या करते हैं। जंगल में वन्य जानवरों की निगरानी हेतु अभ्यारण में कार्यरत पहरेदारों की एक चौकी भी है ।
आड़ा बालाजी—
मिश्री दर्रे से थोड़ा आगे चल कर यह हनुमान जी का इस सुन्दर -सुरम्य स्थान है जहां पर भक्तिभावना का एक केंद्र है ।जंगल से आच्छादित शुद्ध  हवा से युक्त यहां का प्राकृतिक  वातावरण है ।
जोगी महल-
वन अभयारण्य में भ्रमणार्थ आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के आवास हेतु पूर्ण आधुनिक सुविधा से युक्त किन्तु प्राकृतिक छटा के मध्य स्थित यह एक आवास गृह है। दुर्ग के प्रवेश द्वार के सामने एक विशाल तालाब के किनारे स्थित होने से इसकी रमणीयता दर्शनीय है। वर्तमान में यह साधन सम्पन्न पर्यटकों का आवास आश्रय है। किन्तु इसका मूल निर्माण योगियों के लिए हुआ बताया जाता है। किवदंती के अनुसार जयपुर के महाराजा माधोसिंह ने एक साधू के लिए उसकी इच्छा अनुसार तालाब के किनारे एक कुटिया बनवाई और वहाँ साधु संन्यासी रहते रहे, इसलिए ‘जोगी महल’ नाम पड़ा। कुछ लोग इसे किले के प्रवेशद्वार पर सैन्य उपयोग का स्थान भी मानते हैं। कालान्तर में यह स्थान खण्डहर हो गया था। सन् 1961 में वन विभाग ने इसे अपने अधीन लेकर पर्यटकों की सुविधार्थ सभी आधुनिक सुविधाओं शौचालय, स्नानगृह, विश्राम कक्ष आदि से युक्त किया । राजपूती काल में ‘मुजरों’ की परम्परा का जीवन्त रूप यहाँ देखा जा सकता है। तालाब के किनारे झरोखों में बैठकर वन्य पशुओं के विचरण का एवं वनराज सिंह के दर्शन का आनन्द यहाँ से प्राप्त किया जा सकता है। वृक्षों को ही काटकर उनके स्टूल व सौफे यहाँ की प्राकृतिक कलात्मकता का परिचय देते हैं। कमल पुष्पों से आच्छादित ‘पदम सागर’ के तट पर निर्मित इस जोगी महल से प्रति सांझ-सवेरे वन्य पशुओं के स्वच्छंद विचरण व पक्षियों का आनन्द लेना एक रोमांचक अनुभूति है।
झूमर बावड़ी-
सवाई माधोसिंह जी (प्रथम ) के शासन काल में निर्मित ‘हौदी’ नामक यह शिकार गाह (हौदी) तत्कालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। तत्कालीन भवन में सुविधाओं को ही नया रूप प्रदान करके इसे एक विशिष्ट अतिथि गृह स्थल का रूप दिया गया है। ऊँची पहाड़ी पर स्थित यह एक अर्वाचीन साधनों से युक्त विश्राम गृह है। जहाँ आवास भोजनादि की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। पुराने शिकार गाह को आधुनिक विश्राम गृह में परवर्तित करके देशी -विदेशी पर्यटकों की सुविधा हेतु इसका निर्माण हुआ है ।वन क्षेत्र में पहाड़ों पर स्थित होने के कारण इसका सौंदर्य एवं मनमोहक आकर्षण सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है जो सर्व विदित है।
गलता जी–
सवाई माधोपुर की गलता का निर्माण जयपुर के नरेश सवाई माधोसिंह प्रथम के समय जयपुर की गलता के तत्कालीन आचार्य श्रियाचार्य जी ने किया। कहते हैं कि जब  सवाई माधोसिंह ने जब सवाई माधोपुर नामक शहर बसाया तो उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि जयपुर की गलता की तरह एक और पवित्र ‘गलता’ इस नये शहर में भी बनाई जाए। इस स्थल की व्यवस्था श्रियाचार्य की देख रेख में ही रखी गई। पवित्र गलता निर्माण के लिये गलता जयपुर के आचार्य को सवाई माधोपुर में पर्याप्त भूमि दी गई। इसके लिये स्थल रणथम्भोर किले के पास वाला पहाड़ी क्षेत्र चुना गया। वहां मंदिर, बाग, कुंआ और जयपुर की गलता की तरह रघुनाथ गढ़ का भी निर्माण किया गया। यहां की प्रमुख मूर्तियों में ठकुरानी की प्रतिमा मुख्य है।
सवाई माधोपुर में बसाई गई गलता का धार्मिक महत्व तो है ही साथ ही स्थापत्य कला के क्षेत्र में भी यह स्थल अपने आप में अनूठा माना जाता है। सवाई माधोपुर की गलता के बारे में जयपुर रियासत के समय दो सरकारी हुक्मनामे जारी किये गये। इनमें एक सवाई माधोसिंह ने किया। दूसरा सवाई प्रतापसिंह के समय हुआ। इन दोनों पट्टों में उक्त स्थल के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई है। श्रीयाचार्य ने सवाई माधोपुर में रामकुंवरजी का वृहद मंदिर बनवाया तथा ठाकुर जी की प्रतिष्ठा करवाई। यह गलता जयपुर के आचार्य के प्रबंध व देखरेख में है।
लक्ष्मी नारायण मंदिर —
जब सवाई माधोपुर बसाया गया था उस समय किले की तलहटी बना में गांव बसे थे एवं घना जंगल था। इन जंगलों जो में अलाउद्दीन खिलजी के घेरे के समय के गांव,  बावडियां एवं मन्दिरों इत्यादि के अवशेष भी  थे। महाराजा सवाईमाधोसिंह प्रथम  ने इनका पुनरुद्धार भी करवाया उनमें  लक्ष्मी नारायण मन्दिर भी सम्मलित हैं। यह मन्दिर बहुत प्राचीन है। स्थापत्य की दृष्टि से 11-12वीं शती का  प्रतीत होता है। इसका केवल गर्भगृह और शिखर का वाला हिस्सा ही पुराना है, संभवतः बाकी हिस्सा किसी युद्ध में ध्वस्त हो गया और उपेक्षित पड़े रहने की के कारण आस-पास जंगल उग आया। 18वीं शती में जब नई बसावट आरम्भ हुई तो महाराजा  सवाईसिंह प्रथम का ध्यान इस मन्दिर की ओर गया ।तब इसके मण्डप आदि का नव -निर्माण करवा कर चारों तरफ से घेर दिया गया।मुख्य मूर्ति पूर्व से ही लापता थी ।अठारहवीं शताब्दी में काले पत्थर की मूर्तियों का ही प्रचलन था और वैष्णव सम्प्रदाय के प्रभाव से यहां वैष्णव मन्दिर बन गया ।
काला गौरा भैरव मन्दिर  —
काला गौरा भैरव, अरावली व विंध्याचल पर्वत शृंखलाओं की तलहटी में कलात्मक ढंग से बने विशाल नौ मंजिले मंदिर में स्थापित हैं। यह मंदिर राज्य में ही नहीं बल्कि देश में अपना विशेष महत्व रखता है। सवाई माधोपुर शहर के मुख्य प्रवेश द्वार पर स्थापित काला गोरा भैंरूंजी की मान्यता से यहां बड़ी संख्या में लोग दर्शनार्थ आते हैं। मंदिर का एक अन्य आकर्षण, जो इसे देश के गिने-चुने मंदिरों की गिनती में ले जाता है, वह यहां की तांत्रिक विद्या पर आधारित मूर्तिकला है। इस मंदिर में भैरव की दो प्रतिमाएं हैं जिनमें एक प्रतिमा काला भैरव की व दूसरी गोरा भैरव की है। इसी कारण इस मंदिर का नाम ‘कालागोरा’ भैरूजी हैं। दो द्वारों पर चार हाथियों को देखकर राह चलते व्यक्ति का ध्यान अनायास ही इस मंदिर की ओर आकर्षित हो जाता है। इस मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ते समय एक विशाल गणेश प्रतिमा है। यह गणेश प्रतिमा आमतौर पर दिखाई देने वाली सामान्य प्रतिमाओं से अलग बनी हुई है। इस मूर्ति को बहुत ही उग्र रूप में किसी राक्षस पर बैठे हुए दिखाया गया है। लम्बाई, चौड़ाई व मोटाई में अलग ही दिखाई देने वाली इस गणेश प्रतिमा को तांत्रिक नियमों के अनुसार बनाया गया है। मंदिर में एक तरफ पत्थरों पर कलात्मक ढंग से खुदाई करके यज्ञ मण्डप बनाए हुए हैं, दूसरी तरफ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा को दिखाया गया है ।पत्थर के एक लम्बे पैनल पर सप्त मातृकाएं भी बनी हुई हैं। इन्हें की भाषा में सात बहिनें कहते हैं। शास्त्रों में इनके नाम श्री, लक्ष्मी, धृती, मेधा, प्रज्ञा, पुष्टि व सरस्व बताए गए हैं। यहां नवदुर्गाओं को भी दिखाया गया है जो अपने-अपने वाहनों पर सवार इसी प्रकार एक जलहरी में आठ व दूसरी में ग्यारह शिवलिंग बने हुए हैं, ये एकादश रुद्र के न से जाने जाते हैं। शास्त्रों में भैरव को क्षेत्रपाल के नाम से जाना जाता है। क्षेत्रपाल नामावली भैरव को 50 विभिन्न नामों से उल्लेखित किया गया है। प्रचलितनामों में भैरव को क्षेत्रपाल भैंरुजी तथा वटुक भैंरुजी कहा जाता है।
गोपाल जी का मंदिर- —
नगर प्रवेश के बाद काला गौरा भैरों जी के थोड़ा सा आगे गोपाल जी का कलात्मक मंदिर है। मंदिर में भगवान के विग्रह के आगे चौक में एक बहुत बड़ा कुण्ड है, जो कभी पहाड़ी जल से लबालब भरा होता था पर अब सूखा है। मंदिर का भव्य निर्माण रियासत के समय का है।धार्मिक भाव के साथ ही पहाड़ी की तलहटी में एक बड़े नाले के किनारे विद्यमान यह मन्दिर एक सुन्दर पर्यटन स्थान भी है ।सड़क मार्ग से मन्दिर तक एक नाला पार करके जाना पड़ता है।वर्तमान समय में आस्था का  केन्द्र यह भव्य एवं कलात्मक मन्दिर कुछ उपेक्षित स्थित में है। आस्था के साथ -साथ यह एक प्राचीन धरोहर भी है इस लिए यहां विकास किया जाना आवश्यक है ।
रंगजी मन्दिर–
सवाईमाधोपुर नगर के बीच स्थित मुख्य बाजार में दक्षिण शैली की श्री रंगजी की मूर्ति है जो देखने में बहुत आकर्षक है जो अपने भक्तों के मन को मोह लेती है।
अमरेश्वर—
रणथम्भोर दुर्ग की ओर जाने वाले मार्ग पर लगभग 7 किमी. की दूरी पर दाहिनी ओर दो पर्वतों के बीच 40 फीट की ऊँचाई से गिरते झरने का जल नीचे तलाई में इकट्ठा होता है, फिर तलाई से सहस्त्र धाराओं में विभाजित हो कर इस प्रकार बहता है मानो शिवशंकर की जटा से बह कर निकलने को सुरसरि मचल उठी हो, पर्वतों की अपार श्रृंखलाऐं, हरित परिधान में सजी प्रकृति के इस रूप को देख कर मन ठगा सा रह जाता है। यहाँ एक बड़ी चट्टान के नीचे शिवलिंग स्थापित है, जिसका चट्टानों से रिसते जल से वर्ष पर्यन्त अभिषेक होता रहता है। पर्यटकों के लिए यह एक अच्छा व रमणीय स्थान है। पास ही आकर्षक राम-जानकी धाम है।
गुप्तगंगा–
रणथम्भौर दुर्ग में त्रिनेत्र गणेश मन्दिर से करीब 2 किलोमीटर दूर पहाड़ियों में दुर्गम रास्तों के बीच एक रहस्यमयी  गुप्त गंगा जो सदियों से  स्थित है जिसके विषय में बहुत कम लोग ही जानते हैं ।इस स्थल पर दुर्गम पहाड़ी मार्ग एवं जंगली जानवरों के भय के कारण लोगों का कम ही आवागमन हैं। यहां पर भगवान शिव का एक छोटा शिवलिंग भी मौजूद है। इसी के साथ माता पार्वती की मूर्ति लगी हुई है।
शोलेश्वर–
सघन वन क्षेत्र में स्थित यह देवस्थान बाघों का मनपसन्द विचरण क्षेत्र है।  यहां पर प्राचीन शिव पूजा स्थल तथा कुण्ड बने हुए हैं कुण्डों में वर्षभर पानी भरा रहता है।घाटी का प्राकृतिक सौंदर्य सुहावना है ।यह  स्थान रणथम्भोर  के चौहान शासकों का पूजा स्थल बताया जाता है ।कहा जाता है कि हम्मीर की पुत्री देवलदे नित्य- प्रति इनकी पूजा-अर्चना करती थी। यह स्थान दुर्ग के दक्षिण में लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर दुर्गम घाटियों में स्थित है। शहर से भी खण्डार रोड़ व जीरावजी की बावड़ी होकर पैदल मार्ग से भी जाया जा सकता है। जिसकी दूरी लगभग 10 कि.मी. है।
केलेश्वर—
यह धार्मिक स्थल सवाईमाधोपुर नगर के दक्षिण-पश्चिम में लगभग 4 किमी. की दूरी पर भूतल से 200 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केलेश्वर महादेव की एक दम सीधी सैकड़ों सीढ़ियाँ हैं जिनपर चढ़ कर इस स्थान तक पहुंचा जा सकता है।यहां पर एक शिव मन्दिर तथा हनुमान जी का भी मन्दिर है । प्रकृति की नैसर्गिक छटा से परिपूर्ण यहाँ गौमुख से निरन्तर एक कुण्ड में पानी गिरता रहता है। वर्षा ऋतु में घूमने के लिए उत्तम स्थान है।
गोरेश्वर —
यह सुन्दर मनमोहक स्थल है। रणथम्भौर दुर्ग के पहले मोड़ अथवा  सवाईमाधोपुर शहर स्थित  खवासजी के बाग से पहाड़ी चढ़ाई को पार करके इस  रमणीक स्थान तक पहुँचा जा सकता है। पर्वतीय गुफा में एक शिव मन्दिर स्थापित है जिनके दर्शन किये जा सकते हैं।प्राकृतिक दृश्य का एक अनुपम स्थान है। यह स्थल ऋषियों की तपस्थली था।यहां पर  वर्षाकाल में मनमोहक गिरते हुए झरनों व बहते हुए पानी का भरपूर आनन्द उठाया जा सकता है।इसके पास ही एक पहाडी में बर्रे की खान थी ।यही से ढाई पगदे कि बाबड़ी जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है होते हुए आलनपुर की शाही जमाने के मकबरों को भी देखा जा सकता है।
पहाड़ी परकोटे के बराबर 2 पुरानी छतरियाँ जिसमे छतरी में छतरी बनी हुई है देखने योग्य है।
भूतेश्वर–
यह स्थान  सर्किट हाउस के पीछे स्थित भूतेश्वर तन्त्र-विधि के शिवोपासकों का प्रमुख केन्द्र रहा है।यह स्थान प्राचीन है। इसके प्राचीन रूप को समाप्त कर, नया रूप दे दिया गया है।यहां पर बहुत से कुण्ड हैं ,इनमें अनेक तो मिट्टी में दब कर समाप्त हो चुके हैं। आवासीय कॉलोनी के पास होने के कारण यहाँ अधिक लोगों का आवागमन होता है।यहां पर पंचमुखी बालाजी के सामने वाले मार्ग जो स्काउट वन की तरफ से भी आवागमन किया जा सकता है ।इससे लगभग 4 किलोमीटर दूरी पर सीतामाता खोह है जो प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है।
कुँवलेश्वर (कपिलेश्वर)—
कँवलेश्वर सवाईमाधोपुर की सीमा पर स्थित प्रसिद्ध  मध्यकालीन पवित्र धार्मिक तीर्थ स्थल है। नागरशैली के ऊँचे शिखर वाले मंदिर का निर्माण इतिहास प्रसिद्ध हम्मीर के पिता जैत्रसिंह ने अपने राज्यकाल में चाखन नदी के तट पर करवाया था। समीप के जलाशय में लगे शिलालेख से पुष्टि होती है वि. स. 1345 में चक्रातटिनी {चाखन) में ऐसे अनेक मन्दिरों की स्थापना की गई थी। जिसके अवशेष चारों ओर फैले पड़े हैं। शिखर के ऊपरी भाग में नटराज के अतिरिक्त अनेक देवी-देवताओं की नृत्यरत प्रतिमायें दर्शनीय हैं, जबकि गर्भगृह में शिवलिंग स्थित है। मंदिर के पीछे वाले भाग में सिद्ध आचार्यों की योग साधना में लीन प्रतिमायें हैं, जो तेरहवीं शताब्दी की योगिक क्रियाओं को दर्शाती हैं। शिल्प विधान का इससे उत्कृष्ट उदाहरण दूसरा नहीं है।इन्दरगढ़ से इसकी दूरी 7 किमी. है। जबकी फलौदी मार्ग से बस द्वारा यहाँ पहुँचा जा सकता है। यहाँ अनेक प्राकृतिक जल कुण्ड हैं ।इन कुण्डों में स्नान करने से कुष्ठ एवं चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है ,ऐसी स्थानीय लोगों की मान्यता है जो सत्य प्रतीत होती है।
झोझेश्वर—
यह स्थान सवाईमाधोपुर नगर से 20 किमी. दूर फलौदी मार्ग पर खनन क्षेत्र को पार कर इस स्थान तक पहुँचा जा सकता है। वर्षा ऋतु में लगभग 70-80 फीट की ऊँचाई से अनेकों झरनों के गिरने का दृश्य अत्यंत मनोरम होता है। जिसका पानी एक बड़े गहरे  तालाब में इकट्ठा होता है। वर्ष भर लोगों के आने-जाने का तांता लगा रहता है। यहां पर परतदार चट्टानों से बना हुआ पहाड़ियों की गोद में एक शिवजी का मन्दिर भी है। वर्षा ऋतू में इसका सौंदर्य अनुपम होता है ।
घुश्मेश्वर—
शिवपुराण एवं कोटि रूंद्र संहिता  में वर्णित द्वादश घुमेश्वर ज्योर्तिलिंग सवाईमाधोपुर जयपुर मुख्य रेल्वे लाइन पर ईसरदा स्टेशन पश्चिम में किमी. की दूरी पर शिवाड़ नामक ग्राम में स्थित  है ।यह ज्योर्तिलिंग जल-हरी डूबा रहता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर वि.सं. 1081 में महमूद गजनवी जब सोमनाथ पर आक्रमण था, तब इसे भी नष्ट करने प्रयास किया था।द्वादश ज्योतिर्लिंग रूप में प्रतिष्ठित हो जाने के कारण भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया जा चुका है, जहाँ  शिवरात्रि के अवसर एक बड़ा मेला लगता है। इस ग्राम के देवगिरी पर्वतमाला पर स्थित शिवाड़ के राजावत ठिकाने का गढ़ है जिसमे उनका परिवार निवास करता था।
खण्डार का तारागढ़ दुर्ग—
सवाईमाधोपुर नगर से लगभग 40 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित खण्डार दुर्ग का निर्माण चौहान शासकों के रणथम्भोर दुर्ग पर आधिपत्य करने के बाद में ही करवाया अनुमानित है। कई इतिहासकारों ने इस दुर्ग को तारागढ़ के नाम से भी सम्बोधित किया है।यह दुर्ग रणथम्भोरदुर्ग का सहाक दुर्ग कहा जाता है। इतिहास से जुड़े साक्ष्य ये सम्बोधित करते है कि जिस शासक ने इस भव्य दुर्ग को बनवाया था उसे युद्ध में कोई हरा नहीं पाया था ।रणथंभौर का दुर्ग यहाँ से लगभग 40  किलोमीटर दूर स्थित है। जब- जब रणथम्भौर दुर्ग का हस्तांतरण हुआ, खण्डार दुर्ग भी उसके साथ ही रहा।
खडार दुर्ग अरावली की पहाड़ियों एवं सघन जंगलों के बीच एक बड़ी चट्टान पर बना हुआ है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई लगभग 500 मीटर तथा निकटवर्ती भूतल से लगभग 260 मीटर है। इसके पूर्व में बनास एवं पश्चिम में गालण्डी नदी बहती है। त्रिभुजाकार आकृति में बने इस दुर्ग के चारों ओर मजबूत परकोटा बना हुआ जिसकी बनावट भामरे की तरह रखी गई है ताकि शत्रु इस पर आसानी से नहीं चढ़ सके। इस तरह के परकोटों को कमरकोट कहा जाता है। दुर्ग का निचला भाग ढलान लिये हुए है। एक पहाड़ी एवं घुमावदार मार्ग दुर्ग के मुख्य द्वार तक जाता है। दुर्ग के अंदर पहुंचने के लिये तीन द्वार पार करने पड़ते हैं। इन पर विशाल एवं सुदृढ़ दरवाजे लगे हुए हैं। मुख्य प्रवेश द्वार में प्रवेश करने के बाद मार्ग दाहिनी ओर मुड़ता है जहाँ सैन्य चौकियां दिखाई देती है। यहीं पर सैनिकों के आवास भी बने हुए हैं। आगे चलने पर एक जैन मंदिर दिखाई देता है जिसमें भगवान पारनाथ की मनुष्याकार खड़ी प्रतिमा  एवं अन्य तीर्थंकरों की प्रतिमाएं बनी हुई हैं। दीवार पर वि. सं. 1741 का एक लेख उत्कीर्ण है।
यहाँ से आगे चलने पर एक हिन्दू मंदिर दिखाई देता है जिसकी विशाल प्रतिमा लगी हुई है। हनुमानजी के पैरों में एक असुर पड़ा हुआ है।पूर्व दरवाजे से होकर किले के पीछे के भाग तक पहुंचा जा सकता है। इस दुर्ग के अन्दर  सात   तालाब एवं सात मन्दिर हैं जिनमें हनुमान मन्दिर , चतुर्भुज जी , गोविन्द जी , जगतपाल जी , जयंती माता तथा दो अन्य मन्दिर  हैं ।दुर्ग परिसर में बरुदखाना ,सिलखाना , तोपखाना आदि बने हुए हैं।साथ ही अनेक  सुन्दर भवन भी हैं।दुर्ग की प्राचीर पर बनी बुर्जों पर तोपें रखने के लिए चबूतरा बना हुआ है जिस पर लम्बी दूरी तक मार करने वाली तोपें रखी जाती थीं ।शारदा नामक अष्ट धातु से निर्मित एक तोप भी बताई जाती है जिसकी मारक क्षमता काफी दूर तक थी । किले की एक बुर्ज को बंदीगृह के रूप में प्रयुक्त किया जाता था।
ई. 1301 में जिस समय अल्लाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर दुर्ग पर आक्रमण किया था, उस समय यह दुर्ग रणथंभौर के चौहान शासक हमीर के अधीन था । हम्मीरायण में, हम्मीर के अधीन स्थानों की सूची दी गई है। उसे खण्डाआ (खण्डार) सहित समस्त जादौनवाटी प्रदेश का अधिपति बताया गया है। रणथंभौर पर खिलजियों का अधिकार होने के साथ ही खण्डार दुर्ग भी खिलजियों के अधीन चला गया। खिलजियों के बाद इस दुर्ग पर तुगलकों का अधिकार रहा। सोलहवीं शताब्दी में जब मेवाड़ में महाराणा सांगा का उदय हुआ तब यह दुर्ग मेवाड़ के गुहिलों के अधीन हो गया। उन्होंने इस दुर्ग में अनेक निर्माण कार्य करवाये । राणा सांगा ने रणथंभौर दुर्ग के साथ ही खण्डार दुर्ग भी अपनी हाड़ी रानी कर्मवती के पुत्र विक्रमादित्य सिंह तथा उदयसिंह को दिया था।
सांगा की मृत्यु के बाद ई. 1533 में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने खण्डार दुर्ग पर अधिकार कर लिया। ई.1542 में जब शेरशाह सूरी ने मालवा अभियान किया तब उसने खण्डार दुर्ग पर भी विजय प्राप्त की। ई.1569 में जब अकबर ने रणथंभौर पर अभियान किया तब बून्दी के शासक सुरजन हाड़ा ने रणथंभौर दुर्ग के साथ-साथ खण्डार दुर्ग भी अकबर को समर्पित कर दिया। जब मुगलिया सल्तनत पतन को प्राप्त होने लगी, तब
18 वीं शताब्दी में खण्डार का दुर्ग जयपुर के कच्छवाहा राजाओं के अधीन आ गया। महाराजा सवाईमाधोसिंह (प्रथम) ने पचेवर के सामंत अनूपसिंह खंगारोत को खण्डार दुर्ग का किलेदार नियुक्त किया था। कुछ समय बाद मराठों ने रणथंभौर दुर्ग पर अधिकार कर लिया।ठाकुर अनूपसिंह खंगारोत ने जनकोजी सिंधिया पर आक्रमण करके रणथंभौर दुर्ग छीन लिया तथा रणथंभौर दुर्ग को जयपुर नरेश के सुपुर्द कर दिया। इस पर महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम ने ठाकुर अनूपसिंह को ही रणथंभौर दुर्ग का भी दुर्गपति बना दिया। जयपुर राज्य के राजस्थान में विलय होने तक खण्डार दुर्ग तथा रणथंभौर दुर्ग जयपुर राजपरिवार के ही अधीन बने रहे ।
रामेश्वरम् घाट—
सवाईमाधोपुर की खण्डार तहसील में चम्बल, बनास एवं सीप नदी के संगम पर प्राचीनकालीन तीर्थ स्थल श्री रामेश्वरम्  है। यहां पर मेला लगता है।इस मेले की विशेषता  कि इसमें मध्यप्रदेश के भी यात्री बहुत बड़ी संख्या में आते हैं। मेला मध्यप्रदेश की सीमा में भरता है तो दर्शन राजस्थान की सीमा में होते हैं। मेले की व्यवस्था अपने-अपने क्षेत्र में दोनों ही प्रदेश की पंचायतें करती हैं।
यह अपनी प्राकृतिक सुन्दरता तथा वन्य जीवन के कारण पर्यटकों की एक बड़ी संख्या को आकर्षित करता है। यहाँ त्रिवेणी संगम के साथ परशुरामघाट पर भगवान चतुर्भुज नाथ का अत्यन्त प्राचीन व विशाल मन्दिर स्थित है। इसमें भगवान विष्णु के साथ जगदीश जी तथा माता लक्ष्मी की वृहद आकर्षक प्रतिमाएँ विराजमान हैं। इस मन्दिर में कई वर्षों से देशी घी की अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित है तथा पिछले तीस वर्षों से निरन्तर अखण्ड कीर्तन दिन-रात चल रहा है जिसमें आस पास के 48 गाँव वालों ने स्वयं कीर्तन की अपनी क्रमवार ड्यूटी लगा रखी है। इस मन्दिर में मूर्ति की स्थापना तिथी नन्दानी संवत् 016 सुदी है। यह लगभग 3000 वर्ष पुरानी है। रामेश्वर घाट पर चम्बल नदी में मगरमच्छ व घड़ियालों की तादाद बहुत अधिक है। मगरमच्छ यहाँ धूप सेकते नजर आ जाते हैं। यह चम्बल घड़ियाल परियोजना के अर्न्तगत आता है।
चम्बल घड़ियाल अभ्यारण–
सवाईमाधोपुर नगर से लगभग 25 किलोमीटर खण्डार क्षेत्र में चम्बल नदी में पाली गांव के पास नौकायन शुरू कर दिया गया है। यह गांव सवाईमाधोपुर जनपद के अमर शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह जी की जन्मस्थली भी है ।इसकी भी  रणथम्भोर  राष्ट्रीय उद्यान की टाइगर सफारी के साथ नैसर्गिक  सौंदर्य के लिए विशेष पहचान है।यहां चम्बल नदी में घड़ियाल , मगरमच्छ , गांगेय डॉल्फिन के साथ जल क्रीड़ा का आनंद लेते अनेक दुर्लभ जीव -जन्तु भी विद्यमान हैं।इसके अतिरिक्त यूरोप और एशियाई  देशों से अनेक प्रजातियों के प्रवासी पक्षी भी चम्बल की लहरों के अनुपम जल के प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द लेने के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा करके पधारतेहैं ।
सीतामाता का मन्दिर-
सवाईमाधोपुर  से लगभग 8 किलोमीटर दूर वर्तमान सामान्य चिकित्सालय के पीछे पक्के मार्ग से पहुँचा जाता है। ऊंची पहाड़ी पर सीढ़ियाँ चढ़कर बांई ओर एक गहरा प्राकृतिक कुण्ड है, जिसमें ऊपर पहाड़ियों से तेज झरना गिरता है। तैराक व सैलानी लोग इसमें स्नान का आनन्द लेते हैं, किन्तु यदाकदा कुंड की चट्टानों से टकराकर चोट ग्रस्त भी हो जाते हैं। दांई ओर एक पक्का कुंड है, जिसमें ऊपर पहाड़ियों से पानी आता है। इसमें भी लोग तैरने व स्नान का आनन्द लेते हैं। ऊपर सीढ़ियाँ चढ़कर सीताराम जी का मन्दिर है। भूतल झरना व दांई ओर रसोई बनाने का स्थान व एक बड़ा सभागार है। वर्षा ऋतु में प्राय: यहाँ श्रृद्धालु जन एवं सैलानी समूहों में सपरिवार दाल-बाटी-चूरमा की गोठ करने आते हैं। यहाँ बंदरों का बड़ा आतंक है। सीताराम मंदिर यहाँ होने से रामकथा में वर्णित रूद्रजटा शिखिर से श्रीराम के लंका पर आक्रमण के पूर्व अभ्यास किये जाने वाले शिखिर का रणथम्भौर की तलहटी में होने का संकेत मिलता है।
आम खोर्रा- —
रणथम्भौर बाघ परियोजना से सटे नीमली गांव के मार्ग पर वायीं ओर जंगल में यह प्राकृतिक सुन्दर रमणीक स्थान है। यहां पर वर्षा ऋतु में पहाडों से सुन्दर प्राकृतिक झरना एक कुण्ड में गिरता है। यहां एक शिवलिंग भी है। यहां तक पहुंचने के लिए जंगल में से होकर जाना पड़ता है। बारिश के दिनों में यह स्थान बहुत की आकर्षक हो जाता है। और बड़ी संख्या में लोग इस स्थान के  मनोरम प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण वातावरण का आनन्द लेने  के लिए यहां पहुंचते हैं।
गोपाल जी का मंदिर-
नगर प्रवेश के बाद काला गौरा भैरों जी के थोड़ा सा आगे गोपाल जी का कलात्मक मंदिर है। मंदिर में भगवान के विग्रह के आगे चौक में एक बहुत बड़ा कुण्ड है, जो कभी पहाड़ी जल से लबालब भरा होता था पर अब सूखा है। मंदिर का भव्य निर्माण रियासत के समय का है।धार्मिक भाव के साथ ही पहाड़ी की तलहटी में एक बड़े नाले के किनारे विद्यमान यह मन्दिर एक सुन्दर पर्यटन स्थान भी है ।सड़क मार्ग से मन्दिर तक एक नाला पार करके जाना पड़ता है।वर्तमान समय में आस्था का  केन्द्र यह भव्य एवं कलात्मक मन्दिर कुछ उपेक्षित स्थित में है। आस्था के साथ -साथ यह एक प्राचीन धरोहर भी है इस लिए यहां विकास किया जाना आवश्यक है ।
चमत्कारजी मन्दिर—
सवाई माधोपुर में आलनपुर ग्राम के प्रवेश पर ही चमत्कारजी का मन्दिर बना हुआ है। यहां स्फटिक पाषाण की बनी भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा है और प्रतिवर्ष शरद की पूर्णिमा को सड़क के किनारे ही मेला भरता है। इसे चबूतरे का मेला कहते हैं और प्रतिमा को चबूतरे पर मन्दिर के बाहर लाकर एक दिन के लिये प्रतिष्ठित किया जाता है। वैसे मन्दिर का वार्षिक मेला भगवान ऋषभदेव के जन्म दिवस के उपलक्ष में चैत्र बुदी 9 को भरता है। चमत्कारिक भगवान ऋषभदेव की यह मूर्ति एक नाथ जाति के व्यक्ति को अपने खेत में प्राप्त हुई थी और तब से ही इस स्थान को चमत्कारजी के नाम से प्रसिद्धि मिल गई
चौथ माता का मन्दिर-
सवाई माधोपुर से लगभग 15 किलोमीटर दूर चौथ का बरवाड़ा ग्राम में पहाड़ी पर स्थित चौथ माता का मन्दिर काफी प्रसिद्धि लिये हुये हैं ।सन1451 में बूंदी के हाड़ा चौहान शासक भीम सिंह ने टोंक जनपद की अलीगढ़ तहसील के पचाला गांव से चौथ -माता (पार्वती ) व गणेश जी के बाल रूप की स्थापना माघ मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को बरवाडा में पहाड़ी स्थान पर मन्दिर बनवाकर की ।मातापर्वती एवं गणेश जी की एक साथ पूजा विधान के लिए संभवतः यह पहला मन्दिर है ।इसी कारण इस स्थान का नाम चौथ का बरवाडा और दूर-दूर से हजारों भक्त गण अपनी मनोतियाँ मनाने के लिये आते रहते हैं। प्रतिवर्ष मेला भरता है और इसकी व्यवस्था बरवाड़ा की ग्राम पंचायत द्वारा की जाती है। जिले के महत्त्वपूर्ण मेलों में इसकी गणना है और यात्रीगणों की सुविधा के लिये जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में सभी आवश्यक व्यवस्थायें इस अवसर पर की जाती हैं।
बौंली दुर्ग–
  निवाई से 20 किलोमीटर पूर्व में स्थित बॉली दुर्ग मूलत: रणथंभौर के चौहानों ने 12वीं शताब्दी ईस्वी में बनवाया था। यह दुर्ग बौली कस्बे के पश्चिम की तरफ स्थित एक पहाड़ी पर बना हुआ है। दुर्ग काफी बड़ा है। दुर्ग के निर्माण का समय, दुर्ग की एक दीवार पर अंकित शिलालेख से पता चलता है। दुर्ग के चारों और का पहाड़ी भाग जंगलों से घिरा हुआ है। किले का पहला द्वार पूर्व दिशा में बना हुआ है, तथा मध्यम आकार का है। इस द्वार में प्रवेश करके आगे बढ़ने पर दो कचहरियां एवं रानियों के महल आते हैं। अब ये निर्माण काफी जर्जर अवस्था में हैं। इनके निकट एक बड़ी तोप रखी हुई है। जब बौंली दुर्ग पर जयपुर राज्य का अधिकार हुआ तब उत्तर दिशा में एक नया द्वार बनवाया गया तथा दुर्ग के आकार में पर्याप्त वृद्धि गई।
हाथी भाटा –
टोंक से लगभग 20-30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सवाई माधोपुर राजमार्ग पर हाथी भाटा स्थित है। एक ही पत्थर से निर्मित यह शानदार जीवन आकार का पत्थर का हाथी है। इस स्मारक में एक शिलालेख है जो राजा नल और दमयंती की कहानी को बताता है।
सवाई सिंह स्मारक–
सवाईमाधोपुर से 30 किमी0 दूर मामडोली गांव में एक स्मारक स्थित है। इसे सवाईसिंह का स्मारक कहते हैं। इतिहासकारों का कहना है कि मुगल काल में युद्ध में शहीद हुए एक सैनिक सवाई सिंह की याद  में इसे बनवाया गया था। पूर्व में यहां एक फकीर रहता था।
बरवाडादुर्ग–
संभवतः बरवाडा दुर्ग का निर्माण  14 वीं शताब्दी में चौहान शासकों के द्वारा ही करवाया गया होगा ।अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भोर दुर्ग पर आक्रमण करने से पहले इस  सम्पूर्ण क्षेत्र पर रणथम्भोर के चौहान हम्मीरदेव का ही आधिपत्य था।संभवतः हमीर का ही कोई सामन्त यहां निवास करता होगा।क्षेत्रीय किवदंतियों के अनुसार    सबसे  पहले किले में चौहान वंश के शासन काल के दौरान खरबूजा महल का निर्माण कार्य करवाया गया था। इसके बाद  चौहान वंश के ही हाड़ा   शासक के शासन काल में जनाना महल आदि के निर्माण कार्य करवाये गये। जनाना महल में रानी के अलावा कोई नहीं रहता था और  महल में रानी के अलावा किसी को जाने की इजाजत नही थी।  इसके बाद   राठौड़ वंश के  शासकों के शासन में मर्दाना महल का निर्माण कार्य करवाया गया था। उल्लेखनीय है कि अभी तक जनाना महल का कार्य अधूरा है।
सूरवाल झील —
इस झील में वर्षभर पानी भरा रहता है।यहां पर विदेशी पक्षियों का आवागमन रहता है जो पर्यटकों को आकर्षित करते हैं ।रणथम्भौर दुर्ग एवं  जिला मुख्यालय से करीब 12 किमी दूरी पर स्थित सूरवाल गांव के पास सूरवाल झील व डेम भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। सर्दी के मौसम में यहां विदेशी पक्षी आते है। यहां पर सर्दी के दौरान गल, ओस्प्रे, फिलेंमिंगो पेनीकन, रेपटर आदि कई प्रकार विदेशी पक्षीयों का आवगमन रहता है।
लेखक-डा0 धीरेन्द्र सिंह  जादौन
कृषि मृदाविज्ञान विभाग
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ( राज0 )322001

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