करौली के महानतम शासक गोपाल सिंह द्वितीय एवं करौली विकास —

करौली के महानतम  शासक गोपाल सिंह द्वितीय एवं करौली का विकास

करौली के इतिहास में महाराजा गोपालदास जी के 135 वर्ष  बाद सन 1724 में  सर्वाधिक प्रभावशाली एवं इकबाल बुलन्द शासक महाराजा गोपालसिंह जी द्वितीय रहे थे।

ये महाराजा कुंवरपाल जी के ज्येष्ठ पुत्र थे।अपने पिता के देहांत के बाद सन 1724 ई0 विक्रम   ‎सं0 1781 में दिल्ली साम्राज्य के सम्राट मुहम्मदशाह के शासनकाल में गोपाल सिंह यदुकुल चन्द्रभाल  अबोध अवस्था में करौली की गद्दीनशीन हुए।राजगद्दी पर बैठने के समय ये नाबालिग थे । इस समय दिल्ली के बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हो चुकी थी और दुर्बल बादशाह मुहम्मद शाह का शासन था ।मरहठों के उत्पात दिनों दिन अत्यधिक बढ़ रहे थे ।वे दिल्ली की ढिलमिल राजनीति पर मराठा अपना प्रभुत्व जमाना चाहते थे।यह देख कर सम्वत 1781 में यानी सन 1732 ई0 में बादशाह मुहम्मद शाह ने जयपुर नरेश सवाई जयसिंह जी को मालवा का सुवेदार बना दिया ।इनके दमन हेतु महाराजा गोपाल सिंह  भी गए ।परन्तु ये मरहठों को रोकने में असफल रहे।गोपाल सिंह के नाबालिग काल में राज्य प्रबन्ध  मेवाड़ के दो योग्य ब्राह्मणों खंडेराव ओर नवलसिंह के हाथ में था ।इन दोनों मंत्रियों ने मरहटों से मित्रता गाँठ करके करौली पर उनका धावा नहीं होने दिया।बड़े होने पर गोपालसिंह जी ने राज-काज अच्छी तरह चलाया ।ये बहुत ही बहादुर और हिम्मत वाले थे।जिस किसी ने वगावत की तुरंत उसे दंड दिया ओर राज्य के किलों को मजबूत बनाया ।

विवाह एवं पुत्र–

गोपाल सिंह जी ने 6 विवाह किए जिनमें नरुकी जी , नरुकी जी , राजावत जी , शेखावत जी , राजावत जी , और राठौड़ जी थी जिनसे कोई पुत्र पैदा नहीं हुआ ।खव्वासियों से सन्तानें हुई ।बखत सिंह , तेजसिंह ये दोनों लाऔलाद मर गए।जोरावर सिंह की सन्तान को देवगिरि जागीर में दी गयी परन्तु आगे औलाद नहीं चली ।गोपाल सिंह बड़े हिम्मत वाले और इकबाल बुलन्द व्यक्ति थे।

राज्य -विस्तार—-

गोपालसिंह जी प्रारम्भिक अवस्था से ही बहादुर ,प्रभावशाली और इकबाल बुलन्द व्यक्तित्व वाले शासक रहे है।21 सितम्बर 1722 में जब सवाई जयसिंह ने जाटों के खिलाफ अपना दूसरा अभियान प्रारम्भ किया था उस समय बाल्यावस्था होने के उपरांत भी इन्होंने अन्य सरदारों की भांति उस अभियान में सम्मलित होकर अपनी वीरता एवं साहस का परिचय दिया। इन्होंने मराठों के खिलाफ भी सवाईजय सिंह जी के साथ युद्ध में भाग लिया ।इनके शासनकाल में करौली राज्य का काफी विस्तार हुआ। इनका राज्य प्रबन्ध इनके आरम्भिक काल में दो सुयोग्य ब्राह्मण आम मुख्यत्यार रियासत रहे नबल सिंह एवं खांडेराव द्वारा चलाया जाता था। इनकी सलाह पर उस समय शिवपुर और नरवर तक का प्रबंध होता था।ये दोनों बड़े ही चतुर और राजनीतिज्ञ थे। ये बहुत ही होशियार तथा शासन चलाने में समझदार थे ।केवल करौली को छोड़ शेष श्योपुर ,बिजैपुर पालपुर आदि की सारी व्यवस्था इन पर थी , अकसर उस समय झगड़े चलते रहते थे ।मराठों का चारों ओर से भय रहता , परन्तु इन दोनों दीवानों के मारे विरोधी रियासत से बहुत दूर रहते थे ।इन दोनों प्रधानों नबल सिंह एवं खांडेराव ने मराठा शक्ति से तालमेल बिठाया हुआ था जिसके कारण शासन के प्रारंभिक काल में करौली को कोई क्षति नहीं हुई ।जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह जी  से  अपनी  बहिन इन्द्र कँवर का विवाह कर गोपाल सिंह जी ने राजपूताने की राजनीति में स्वयं का प्रभुत्व दिखलाने का अवसर प्राप्त किया ।इस लिए सवाई जयपुर महाराज से उनकी फौज की सहायता इनको मिलती रहती थी ।नबलसिंह मंत्री का एक मित्र पठान इमामुद्दीन खां था वह करौली आया तब वह महाराज गोपाल सिंह के दर्शन कर बड़ा प्रभावित हुआ।
महाराजा गोपाल सिंह जब जवान हुये , ये बड़े महत्त्वाकांक्षी और नेक व्यवस्था करने वाले हुए।यदि किसी भाई अथवा किसी जागीरदार ने कोई झगड़ा खड़ा किया तो उसे तुरन्त फौज भेज कर समाप्त कराया , उनसे कोठरियाँ ,गढ़ियाँ खाली कराली जाती थीं और उपद्रवियों को तलवार से मौत के घाट उतार दिया जाता था।

सिकरवाड़ी के सिकरवार राजपूतों  से युद्ध–

इनके समय करौली राज्य का शासन क्षेत्र सबलगढ़ से लेकर सिकरवाडा के डोगर तक  फैल गया था जो ग्वालियर से 4 किमी दूर सिकरवार की पहाड़ी तक था।करौली की दक्षिण सीमा चम्बल नदी पार सिकरवार राजपूतों ने मरहठों से मिलकर बड़ी बगावत की तो गोपाल सिंह जी ने जयपुर नरेश सवाई जयसिंह जी से सैन्य सहायता लेकर चढ़ाई करदी ।इन्होंने अपने समय में झिरी तथा सरमथुरा के मुक्तावतो एवं बहादुर के वंशज शाखाओं के जादों भाइयों को शांत कर  अपने पक्ष में कर लिया था।परन्तु सिकरवार लड़ने को तैयार रहे।पहाड़गढ़ एवं सुरजेमा की गढ़ी पर मोर्चा लगाए हुए थे।सुरजेमा की गढ़ी का नायक अपने सैनिकों के साथ बड़ी वीरता से लड़ा था इसका नाम ठाकुर  अतराजसिंह था।नैपरी मोर्चा भी अतराज सिंह ने मजबूत बनाये रखा ।काफी लम्बे संघर्ष के उपरान्त भी सफलता नहीं मिली तो इम्मामुद्दीन खां पठान ने जो गोपाल सिंह जी की तरफ से लड़ रहा था शत्रु दल के कुछ आदमियों को घूंस देकर अपनी ओर मिला लिया ।इस प्रकार सिकरवारी का दमन किया।
ठाकुर अतराज सिंह की वीरता पर गोपाल सिंह जी बहुत मुग्ध हुए और उसे अपना मित्र बना लिया।यह युद्ध सिकरवारों के साथ कुंआरी नदी के तट पर हुआ था।युद्ध इतना घमासान एवं भयंकर हुआ था कि कुंआरी नदी के जल का रंग रक्त के समान लाल हो गया तथा लाशों के ढेर पहाड़ जैसे पड़ गए थे।अंतिम विजयश्री महाराजा गोपाल सिंह जी की हुई ।नौ लाख का परगना जीत लिया।
इस युद्ध के बाद परगना सबलगढ़ , जौरा , अलापुर ,बिजैपुर भी जीत कर अपने अधीन कर लिए और अपने राज्य में मिला लिए जो कभी मरहठों के आतंक से मुक्त नहीं हुआ।इन सब परगनों के भाई बन्धुओं ने मिलकर बगावत कर दी , सबको किले व गढ़ियों से निकाल खालसा राज कर लिया ।झिरी व सरमथुरा के राव मुकटावत पर भीअपना अधिकार कर उन्हें समझाते हुए राज्य में रहने दिया ,क्यों कि ये बागियों को करौली आने से रोकते थे।इनकी राज्य सीमा ग्वालियर से 15 किमी0 नजदीक भूरी पहाड़ी यानी सिकरवारी तक पहुंच गयी ।पश्चिम में नरवर तक तथा दक्षिण में सीमा कुंआरी नदी तक इकलोद से आगे थी।सबलगढ़ का इलाका जीत कर अपने प्रिय मित्र  नवाब इमामुद्दीन के अधीन कर  दिया।इस पठान ने बड़ी स्वामिभक्ति के साथ गोपाल सिंह की मदद की थी।

कुशल राजनीतिज्ञ थे महाराजा गोपाल सिंह–

मराठों की राजपूताने और उत्तरीभारत की ओर बढती शक्ति को देखते हुए मुगल बादशाह मुहम्मद साह और बाजीराव पेशवा में सितम्बर29 ,1736 ई0 में हुई सन्धि का एक फरमान जारी हुआ जिसके मुताविक  ” चम्बल नदी के पास तक का सारा इलाका जागीर के रूप में पेशवा को दिया जाय।इस प्रदेश के राजाओं के राज्य को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाई जाएगी।यदि वे अधीनता स्वीकार करके नियमानुसार कर देते रहेंगे ।” इस प्रकार करौली के चम्बल पार के क्षेत्र पर मराठाओं का अधिकार हो गया , परन्तु महाराजा गोपालसिंह ने कुशल राजनीतिज्ञ की भांति 13000 रुपये वार्षिक चौथ देना स्वीकार कर जहाँ क्षेत्र को पूर्ववत अपने अधिकार में रखा वहां प्रत्यक्ष रूप से मराठाओं से मित्रता भी कर ली।सवाई जयसिंह से नजदीकी सम्बन्ध होनेके कारण गोपाल सिंह उनकी प्रत्येक राजनैतिक  गतिविधियों में भाग लेकर अपनी रियासत की भूमिका को सर्वत्र प्रसारित करने का प्रयास किया करते थे।18 मई , 1741 को जब सवाई जयसिंह धौलपुर से अजमेर जाने लगे उस समय भी गोपाल सिंह उनके साथ गये।कहने का तातपर्य यह है कि राजपूताने में जहां- जहां बड़ी कार्यवाहियां होती थी गोपाल सिंह अपनी रियासत की ओर से अहम भूमिकाएं निभाया करते थे।

सैनिक संगठन एवं सुरक्षा –

यद्धपि ये दिल्ली साम्राज्य के अधीन थे किन्तु इसकी इन्होंने कोई खास परवाह नहीं की।इनके पास सेना अधिक नहीं थी।किसी भी समय काम पड़ने पर जयपुर नरेश की सेना से काम चलाते थे ।

करौली एवं रियासतीय किलों का विकास

राजा गोपाल सिंह जी ने पुराने दुर्ग उंटगिरी ,मंडरायल ,बहादुरपुर व तिमनगढ़ की मरम्मत करायी।पार्वती नदी के किनारे खेडूँ का किला बनवाया।
इस प्रकार सं0 1805,सन 1748ई0 तक राज्य में शांति स्थापित करने के बाद रियासत की माकूल व्यवस्था कर करौली  के महलों को बढ़ाया ।राजधानी का विस्तार करते हुए स्थानीय नागा साधुओं के सहयोग से राजधानी के पुराने परकोटे को तुड़वाकर सवा दो मील घेरे में  चारों ओर लाल पत्थर का पक्का शहरपनाह( परकोटा) निर्माण करा कर राजधानी को सुरक्षित किया जिसमें 6 दरवाजे (हिण्डौन दरवाजा , बजीरपुर , मांसलपुर , नदी , घूर और मेला दरवाजा ) और 12 खिड़कियां होली ,सांईनाथ , कायस्थ , गुसाईं , चोर , शुक्ल , चमर , पठान , परसराम , गणगौरी , बरखत  का बाग , हनुमान खिड़कियों के माध्यम से जनता की आमदफ़्त को व्यवस्थित किया ।यह कार्य 1728 ई0 में पूर्ण किया ।गोपालमन्दिर , सुन्दर महल महल  बनवाये थे जो दिल्ली के बादशाह के नमूने के होने के कारण मन्दिर में बदलने पड़े यानी गोपलमन्दिर बनवाया।महलों में  दीवानेआम एवं दीवाने खास भी बनवाये ,त्रिपोलिया ,नक्कारखाना दरवाजा  आदि बनवाया । सबलगढ़ में किला एवं मन्दिर बनवाये ।

बाला किला में दीवाने आम का वाक्या

आबादी शहर करौली व महलात बाजार शहर में यह सब गोपाल सिंह जी ने ही बनवाये।बाला किला में दीवाने आम , जो दिल्ली के दीवाने आम की नकल पर तैयार कराया ।क्यों कि यहां पत्थर नजदीक है किसी खबरदार (खुफिया ) ने दिल्ली बादशाह मुहम्मद शाह को इस कार्य की इत्तला पहुंचाई जो मशहूर है तुमने नकल मकानात बादशाही की तरह महल बनवाया है इस लिए राज्य के अधिकारियों को साथ लेकर नकद राशि के रूप में बादशाही खजाने में जमा कराएं ।महाराज गोपाल सिंह जी ने स्पष्ट किया कि खबर झूठी है ।हमने अपने तौर तरीके से एक संगीन मकान तैयार कराया है जो नकल बादशाही महलात नहीं है।इस बात को समाप्त कराने के लिए उन्होंने बहुत सा रुपया बादशाही ऐलकारों को दिया गया हालांकि बादशाही कमजोर थी फिर भी हुकूमत बादशाही ही जैसी थी , हालांकि महाराजा गोपाल सिंह जी के हौसले बुलन्द रहे ।एक दो बार मुकाबला मराठों से भी किया फिर भी दिल्ली बादशाह की जी हुजूरी करते थे।सन 1753 ई0 में दिल्ली बादशाह से दस्तूर के माफिक मिले ।सम्राट से सम्मान मिला उपरान्त वापिस रियासत में आये ।हालाँकि दिल्ली पहुंचने से पहले वहां के अफसरान , वजीरों , अमीरों और बादशाह से खतों कितावत करते रहे , लेकिन पहुँचने के बाद बादशाह ने बहुत प्रेम दिखलाया।

मदनमोहन जी की मूर्ति जयपुर से लाये

विक्रम संवत 1785 ई0 सन 1742 में करौली नरेश गोपाल सिंह ने मदनमोहन जी की मूर्ति को जयपुर में रखी थी को जयपुर नरेश महाराजा सवाई जयसिंह से गोसाई सुबलदास के माध्यम से करौली लाये थे ।गोपालसिंह ने संवत 1805 में वर्तमान देवालय का निर्माण कराया ,जहां आज भी आठों झांकियों में पूजा एवं दर्शन होते है।यह मूर्ति ब्रजभूमि वृन्दावन जहां अभी भी इनका मन्दिर है , से मुस्लिम आक्रांताओं (औरंगजेव )से बचा कर जयपुर लाई गई थी।गोविन्द देव , और गोपीनाथजी के साथ इनकी पूजा होती थी । एक किवदंती के अनुसार मदनमोहन जी ने गोपाल सिंह को स्वप्न्न में करौली लाने के आदेश दिए ।जब करौली नरेश ने सपने की बात जयपुर नरेश को सुनाई तो स्वप्न की सच्चाई प्रमाणित करने के लिए उन्होंने आखों पर पट्टी बांध तीनों मूर्तियों में से छांटने की शर्त रखी ।बन्द आखों से महाराजा गोपालसिंग ने मदनमोहन जी की अभीष्ट मूर्ति को ही पकड़ लिया और उसे करौली ले आये ।मदनमोहन जी जब जयपुर से करौली पधारे तब महाराज स्वयं ने मूर्ति का डोला अपने कन्धे पर उठाया ।संवत 1785 में मदनमोहन जी का मंदिर भी इन्होंने ही बनवाये थे ।मदनमोहन जी को करौली रियासत का “सर्वेश्वर ” स्वीकार किया ।संभव है उसी के बाद मुहरों तथा राज -चिन्ह में ” मदनमोहन जी सदा सहाय ” अंकित होने लगा हो ।1748 ई0 में रावले के बगल की बड़ी हबेली को हस्तगत कर उसके बृहद चौक में देवालय का निर्माण कर देवों एवं देवियों की विधिवत प्राण -प्रतिष्ठा करा कर इसके खर्चे के लिए 27000 रुपये की वार्षिक जागीर भी लगाई ।ललिता जी और राधेरानी कि भी मूर्तियां पधराई ।कैलादेवी के मंदिर का जगमोहन बनवाया ।मन्दिर में चामुंडा देवी भी पधराई ।वहां पर यात्रियों को पानी पीने के लिए एक कुण्ड का निर्माण करवाया ।इनकी ख़्वायजी ने मदनमोहन जी के मन्दिर से सटे आहते में मन्दिर बनवाकर ठाकुर जी पधराये ।
इन्होंने अपने शासनकाल में बहुत सी जागीरें दी।करौली के चौबे लोगों को करौली गांव जागीर में दिया तथा अपनी बहिन को मीना बड़ोदा दिया ।सबलगढ़ में भी जागीरी थी।
महाराज गोपाल सिंह जी अपने समय के एक महान विद्वान हिन्दू राजा थे।यह हिन्दू धर्म में अपना जीवन समझते थे परन्तु इनकी इस्लाम से भी घृणा नहीं थी।ईसाई धर्मावलंमवियों का भी आदर करते थे।इनकी सेना का शिक्षक एक फ्रांसीसी युवक था।

प्रतिष्ठा —

दिल्ली बादशाह मुहम्मदशाह ने इनको शाही दरबार में “माही मरातिव”का रुतबा दिया एवं गाजी की उपाधियों से संबोधित कह कर सम्मानित  किया,  यह वाक्या विक्रम संवत 1818 ई0 सन 1753 व हिजरी 1166 का है।।इनके समय करौली नगर की काफी उन्नति हुई ।नगर में इनकी दर्शनीय छतरी बनी हुई है। राजपूताने के राजाओं में इनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी।जयपुर नरेश सवाई जयसिंह जी का इनके ऊपर बड़ा स्नेह था ।बाजीराव पेशवा तथा सिंधिया इनका बड़ा सम्मान करते थे ।भरतपुर का सिनसिनवार जाट राजा सूरजमल जी इनको चाचा कहकर मांन बढ़ाता था।सूरजमल से गोपाल सिंह जी भाई बिरादरी के का व्यवहार रखते थे और सरमथुरा की खंडी सूरजमल को लगा दी और वे परगने बाड़ी में मिला लिए गए ।उदयपुर के दुर्बल तत्कालीन राणा भी इनसे दोस्ती भाव रखते थे। गोपाल सिंह जी  राजपूताने की बड़ी -बड़ी कार्यवाहियों में उदयपुर ,जयपुर तथा जोधपुर के साथ शरीक रहे ।जुलाई 1734 ई0के द्वितीय पखवाड़े में सवाई जयसिंह जी ने राजपूताने के सभी राजाओं की एक सभा उत्तरी मेवाड़ के अंगौचा  गांव के पास हुरडा नामक स्थान पर हुई थी जिसका मुख्य उद्देश्य अपनी मातृभूमि को दक्षिणी लुटेरों से रक्षा करना और उन्हें अपने प्रान्त से खदेड़ना था।इसमें सवाई जयसिंह , जोधपुर के अभय सिंह , नागौर के बख्त सिंह , बून्दी के राव दलेल सिंह ,करौली के महाराजा गोपल सिंह और बीकानेर ,किशनगढ़ आदि के साथ अन्य छोटे -बड़े राजा सामिल हुये थे। सम्मेलन की कार्यवाही 16 जुलाई 1734  में महाराजा जगत सिंह जी की अध्यक्षता  में हुई।

गोपाल सिंह जी के राज्य में इनके गांव–

गोपाल सिंह जी के शासनकाल में रियासत के सभी इलाकों पर ऐसा राज रहा जो तारीफ के काबिल है।हालांकि यह परगने कदीमी रियासत थे फिर भी कभी -कभी भाई बिरादरी के लोग विद्रोह कर बैठते , कभी रुपया खंडी का देते तो कभी जमा राज्य नहीं कराते तो उन्हें मारकूट कर रुपया बसूल कर हुकम जमाते।इनके समय गांवों की संख्या खास करौली में 44 ,परगना कुड़गांव मय जिरोता के 91 , परगने मासलपुर में 58, परगने बेहड़ गुड़ला में  17, परगना उंटगिर में , 12 ग्वालियर तालूखे में , 33 मंडरायल में 48 , तालूखे खुण्डे के 8 , देहात कोटरीन के 52 , माँगरौल  में 31,  सबलगढ़ में 171 , बिजैपुर में  82 । रियासत करौली में उस समय कुल 697 मौजे(गांव ) थे जो  12 परगनों में बांट रखे थे।इन्होंने अपने शासनकाल में विद्धानों को आमंत्रित कर रियासत में उन्हें आवाद किया ।पंचांग भी इनके शासनकाल में निकलना आरम्भ हुआ।

देहान्त–
सं0 1814 ई0 सन 1758 ई0 में अहमद अब्दाली ने दिल्ली पर हमला किया ।उसकी सेना ने मथुरा में लूटमार की तथा भगवान श्री कृष्ण जी व अन्य देवी -देवताओं की मूर्तियों को तोड़ा ।मन्दिर नष्ट किये ।ब्राह्मणों जो मन्दिरों के पुजारी थे उनका वध किया गया यह समाचार गोपाल सिंह जी को होली के दिन तारीख 5 मार्च सन 1757 को मिला और इसी दुख में इनका 13 मार्च सन 1757 ई0 को तदनुसार चैत्र वदी 8 शनिवार सम्वत विक्रम 1814में हो गया।इस प्रकार यादव वंश की वैजन्ती फहराने वाला एक अपूर्व वीर और अदम्य साहसी हिन्दू धर्म का सितारा इस संसार से विदा हो गया।इनके कोई सन्तान नहीं हुई।अतः इनके चाचा सोहनपाल के पुत्र तुरसमपाल राज्य के अधिकारी हुये।राजा गोपाल सिंह जी के समय में यदुनाथ नाम के कवि हुए जिन्होंने “गोपाल विलास “नामक ग्रन्थ लिखा ।ये चन्द्रवरदाई के वंशज थे।भद्रावती नदी के किनारे पर बाग में सुंदर चित्रों वाली जो छतरी दिखलाई पड़ती है वही गोपाल सिंह जी की अन्तिम स्मृति है जिसे क्षेत्रीय श्रद्धालु मनौती के साथ दैविक शक्ति के रूप में पूजते हैं ।इस क्रम में सबलगढ़ क्षेत्र के लोगों में अधिक भक्ति है । महाराज कुंवरपाल जी की छतरी  भी गोपाल सिंह जी ने बनवायी गयी।इनकी रानी देवकुमारी ने संवत 1866 में गोपाल सिंह जी की छतरी बनवायी थी। इसी छतरी के पास कुंवरपाल , उसके बाद रतनपाल की लाल पत्थर से बनी छतरियां है , इन्हें भी गोपाल सिंह ने बनबाया था।गोपाल सिंह जी की  गद्दी सबलगढ़ किले में माधोजी राव सिन्धिया ने उठवा दी थी।उससे पूर्व एक गद्दी प्रतिष्ठित रही।दशहरा आदि त्योहारों पर गद्दी का पूजन सम्मान होता था। सबलगढ़ क्षेत्र के लोगों का विस्वास है कि महाराज गोपाल सिंह के नाम से बन्द लगाने पर सांप  व अन्य कीडों का विष भी असर नहीं करता था। अब तक ये दन्तकथा वहां विख्यात है।
महाराजा विजयपाल एवं उनके पुत्र तिमनपाल की शासन विस्तार नीति , बयाना और तिमनगढ़ पतन के साथ जमींदोज हो गयी जिसे अग्रिम तीन सताब्दियों तक पुनर्जीवित करने का किसी में भी साहस नहीं हुआ।महाराजा अर्जुनदेव की दूसरी पीढ़ी में पृथ्वीराज (सन 1403-33 ई0) ने अवश्य उक्त नीति को जागृत करते हुए पहली बार ग्वालियर के  तंवर शासक राजा मानसिंह के ग्वालियर किले पर घात लगाकर उस पर अधिकार किया जिसे बाद में उसके पुत्र की मृदु प्रार्थना  को स्वीकार करते हुए बतौर उसे इनाम में वापिस कर दिया ।शेष क्षेत्र पर अपना अधिकार बनाये रखा , जिसे  करौली के परवर्ती शासक अपनी कमजोर इच्छा शक्ति , परस्पर पारवारिक झगड़ों एवं गुटवाजी के कारण स्थिर नहीं रख सके बल्कि कुंवरपाल द्वितीय तक आते-आते इनका क्षेत्र सिमटकर मात्र करौली तक ही रह गया जिसे इस इतिहासी पुरुष ने साम ,दाम ,दंड , भेद के माध्यम से पुनः हस्तगत कर अपने पूर्वजों के मान को बढ़ाते हुए अपने राज्य का विस्तृत विस्तार किया ।इस प्रकार करौली तख्त पर राज्यभिषेक कराने वाले शासकों में महाराजा गोपालसिंह जी  महानतम शासक कहलाये ।

संदर्भ–

1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद संस्करण 1986, भाग दो , खण्ड 2 पृष्ठ 1600 , -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली ।
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा ।
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता ।
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग ।
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन ।
21-करौली पोथी ।
22-करौली ख्यात ।
23-ग्वालियर के तंवर -लेखक हरिहरप्रसाद द्विवेदी ।
24-जाटों का नवीन इतिहास -लेखक उपेन्द्रनाथ शर्मा ।
25-जाटों का नया इतिहास -लेखक धर्मेंचन्द्र विद्यासंकर ।
26-करौली तवारीख नकल फ़ारसी -मुंशी अकबर अली बेग ।
27-सवाई जयसिंह ,प्रथम संस्करण 1972, -वेरेन्द्रस्वरूप भटनागर ,पृष्ठ 104।
28-मुगल साम्राज्य का पतन , भाग एक , पृष्ठ 136 ,द्वितीय संस्करण ,1972 ,सर यदुनाथ सरकार ।
29-जोधपुर राज्य का इतिहास , भाग 2 ,पृष्ठ 655-57 ,गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ।
30-राजस्थान का इतिहास -बी0 एल0 पनगढ़िया ।
31-तवारीख-ए-करौली मुंशी अकबर अली बेग – अनुवादक दामोदर लाल गर्ग
32- राजस्थान डिस्ट्रिक्ट सवाईमाधोपुर गजेटियर्स
33 -चीफ एन्ड लीडिंग फैमिलीज़ ऑफ राजपुताना -सी0 एस0 बिंगले ।
34-यदुवंशी -जादौन राजपूत इतिहास अनुशीलन -रणजीत सिंह यदुवंशी ।
35-जैसलमेर की ख्यात एवं तवारीखे जैसलमेर।

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

Leave a Comment

Your email address will not be published.

Pin It on Pinterest

Translate »
error: Content is protected !!