करौली में यादवा (आधुनिक जादों ) राज्य की स्थापना , संस्थापक एवं तत्कालीन यदुवंशी शासक —

करौली में  यादवा ( आधुनिक जादों )राज्य की स्थापना  ,संस्थापक एवं तत्कालीन यदुवंशी शासक —-

“श्री कृष्ण के वंशज यदुवंशी नरेश अर्जुन पाल देव द्वारा सन 1348 ई0 में स्थापित पूर्व देशी रियासत करौली अपने स्वर्णिम अतीत को समेटे हुये अपनी स्थापना के 670 वर्षों को व्यतीत कर चुकी है ।इस अवधि में 27 राजा सिंहासनारूढ़ हुए ।गोलाकार पर्वत श्रंखलाओं से घिरा होने के कारण इस क्षेत्र का प्राचीन नाम “कर्करालागिरी ” था ।कल्याणराय (श्री कृष्ण  जी ) का मंदिर करौली की स्थापना का पर्याय है ।नगर का प्रारम्भिक नाम ” कल्याणपुरी ” का  अपभ्रंश स्वरूप ” करौली ” हुआ ।इस नगर में लगभग 205 मन्दिर है ।महाभारत काल में करौली क्षेत्र मत्स्य प्रदेश में शामिल था ।इस क्षेत्र पर मौर्य वंश , मालव ,यौधेय तथा गुप्तवंश के शासकों का अधिकार रहा ।महमूद गजनवी द्वारा मथुरा छिन्न -भिन्न होने पर यदुवंशियों ने फिर से अपने खोये हुए इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया ।प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर शूरसेन शाखा के यादवों (जादों )  चंदवंशीय क्षत्रियों का ही अधिकार था ” ।

यादव से अपभ्रंश जादव /जादों कैसे हुआ—

यहां ये उल्लेखित करना आवश्यक है कि भारतीय इतिहासकारों एवं विदेशी लेखकों ने “यादवा या यादव ” शब्द को संस्कृति भाषा का शब्द लिखा है जिसका हिन्दी में अनुवाद “जादव या जादों ” है।ब्रज भाषा में” य” वर्ण का उच्चारण “ज” बोला जाता है
हिन्दी साहित्य का  अध्ययन करने पर पाया गया कि  है कि ” यादवा या यादव ” शब्द का अपभ्रंशरूप 16 वीं – 17 वीं शताब्दी के भक्ति काल में  दिखाई देता है। कुछ विद्वानों के अनुसार “यादव” संस्कृति का शब्द है जिसका  हिंदी  “जादव ” है जिससे “जादों ” हुआ ।भक्ति रचनाओं में तुलसीदास एवं सूरदास जैसे कवियों   ने अपनी  श्रेष्ठ रचनाओं जैसे रामायण ,सूरसागर ,आदि में जदुवंश ,जादों ,जदुपति ,जादवपति ,जादोंराय आदि शब्दों का प्रयोग बहुतायत से किया है ।
तुलसीदास जी ने रामायण में कुछ इस प्रकार लिखा है—
जब जदुबंस कृष्न  अवतारा।
होइहि हरन महा महिभारा।।
कृष्न तनय होइहि पति तोरा ।। .
बचनु अन्यथा होइ न मोरा।
इसी प्रकार  इस चौपाई में भी यद्धपि के स्थान पर जद्धपि शब्द लिखा गया है ।
जद्धपि जग दारुन दुःख नाना।
सबते कठिन जाति अपमाना ।।

   इसी प्रकार कुछ अन्य कवियों के छंदों में भी “य”के स्थान पर “ज” शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो इस प्रकार है—
उग्रसेन नृप के तपत , यह न सभा तुम योग्य।
अव मथुरा भेजहु अरहि ,भुव पति जदुकुल योग्य।।
तुमसौं कौं रन एरियो , जदुवंश नारद हूं कहो।
जवनेस सो सुनि इक्क ,संकु अनीक लै दूत उम्महो।।
जिहिं आयकैं मथुरापुरी ,जरदाय जादव बुल्लये ।
जव वेश माधव रात, सुब्बहि जानि माधव नै लये।।
वसुदेव जादव को तनुज ,रु कृष्ण नामक नाम है।
बृंयहू कहो तब विष्णु हो ,मम बेर -बेर प्रनाम है।।
हमसों जुगान्तर  मैं पूरा मुनि वृद्ध गर्ग यहें कही।
जदुवंस मैं बसुदेव ग्रह ,अवतार हरि लैहिऐं सही ।।

इतिहास से सिद्ध होता है कि शब्द व्युत्पति के क्रम में यदु ,जादव ,जादों ,यादव सभी एक ही है जो कालान्तर में अपभ्रंश होकर नए रूप में जाने गए ।वस्तुतः सभी का मतलब एक ही है ।संस्कृत शब्द “यादवा ” या ‘यादव “का हिन्दी में अर्थ जादों ही है ।सर हैनरी इलियट के अनुसार” जादों “शब्द की  उत्तप्ति “यदु और यादव से हुई किन्तु सही रूप से तो जादों ,जदु ,यादव सभी शाब्दिक रूप से समान है और मूलतः” यादव “शब्द के विकृत रूप है ।वेदों एवं पुराणों में मनु, पाणिनी , कौटिल्य  जैसे विद्वानों के अलावा भी विख्यात इतिहास लेखक – टॉड ,  कनिंघम ,रेनॉल्ड्स ,ताजुलमासिर , ग्राउस ,पौलेट , इलियट , पार्जिटर के अतिरिक्त विभिन्न जाने-माने भारतीय इतिहासकारों जिनमे मजूमदार ,रायचौधरी , जगदीश सिंह गहलौत , दशरथ शर्मा ,ओझा जी , प्रो0 इरफान हबीब , हबीबुल्ला , मथुरा के प्रभुदयाल मीतल एवं बाजपेयी तथा विभिन जैन धर्म के इतिहास लेखकों ने भी आधुनिक जादों ,भाटी ,जडेजा ,जाधव आदि को वंशानुगतरूप से मथुरा एवं द्वारिका का “पौराणिक यादव या यदुवंशी ” ही माना है ।इसके विस्तृत एवं सटीक प्रमाण भारत सरकार द्वारा लिखवाये गए विभिन्न प्रान्तों उत्तरप्रदेश के (मथुरा ,आगरा ,अलीगढ़ एटा ,मैनपुरी , बुलन्दशहर ) ,राजस्थान के (करौली ,अलवर ,भरतपुर ,धौलपुर ,जैसलमेर ) हरयाणा के (गुणगांव  एवं हिसार ) एवं पंजाब , गुजरात एवं महाराष्ट्र के डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स में आज भी मौजूद है जिन्हें कोई बदल नहीं सकता और झुठला भी नहीं सकता ।  लेकिन सन 1920 के बाद कुछ पशुपालक जातियों ने अपना सामाजिक स्तर ऊंचा उठाने के लिए  ब्रज में रहे यदुकुल शिरोमणि वसुदेव -देवकी के पुत्र श्री कृष्ण जी को गौ -पालक मानते हुए तथा श्री कृष्ण जी के पूर्वज यदु के वंश में अपना मनगढ़ंत इतिहास बना कर अन्य समाजों को भी भृमित कर रहे है  जो असत्य है।पौराणिक शुरसैनी  “यादवा ” एक चन्द्रवंशीय  क्षत्रिय /राजपूत वंश है न कि कोई जाति विशेष ।भाषाविदों के अनुसार यदि  “यादव ” शब्द के “य”को  “ज”में परिवर्तित किया जाता है तो “जादव “,शब्द मिलेगा । यादव और जादव दोनों ही रूप जायज है और अन्तःपरिवर्तनीय है ।
विभिन्न प्रान्तों के गजेटियर्स जो उन्नीसौ के दशक से पूर्व या बाद में भी लिखे गए है उनमें  में भी वर्णित भारतीय वंश एवं जातियों (Tribes &Castes ) का वर्णन किया है जिनके अंतर्गत भी वर्तमान करौली राज्य जादों राजवंश ,जैसलमेर राज्य के भाटी यदुवंशी राजवंश ,देवगिरि राज्य के जाधव/ जादव राजवंश ,कच्छ एवं भुज के जडेजा राजवंश ,जूनागढ़ के चुडासमा ,रायजादा ,रा खगार ,सरवैया राजवंशो, द्वारसमुद्र के होयसल राजवंश ,विजयनगर साम्राज्य के राजवंश , तथा मैसूर के ओड़ियार या बढियार राजवंश के राजाओं के वंशजों को “यादवा या यदुवंशी चन्द्रवंशी क्षत्रिय  ही लिखा है ।इन सभी चन्द्रवंशी “यादवा राजवंशों ” के विवाह -सम्बन्ध भी स्थानीय एवं दूरदराज के अन्य क्षत्रिय /राजपूतों से हुए है जिनके प्रमाण इतिहास में इंगित भी है ।स्वयं कर्नल जेम्स टॉड नें अनाल्स ऑफ जैसलमेर में भाटी वंश के इतिहास में समस्त यदुवंशियो के लिए यदु और जादों  शब्दों का प्रयोग किया  है। अनेकों विख्यात भारतीय इतिहासकारों ने भी इन राजवंशों के वंशजों के नाम के साथ “यादव या यदुवंशी ” वंश उपनाम भी लिखा है जिसके अनेकों प्रमाण भारतीय इतिहास की पुरातन पुस्तकों में भी इंगित  है। शोधों से ये ज्ञात होता है कि इतिहासानुर भक्तिकाल से पूर्व चन्द्रवंशीय क्षत्रिय यदुवंशीयों के लिये “यादवा “शब्द का प्रयोग हुआ है ।यादव कोई जाति विशेष नहीं है ।यह एक पुरातन चन्द्रवंश की एक शाखा है ।कुछ जाति विशेष के कथाकथित इतिहासकारों ने अपने द्वारा लिखी गई  अपनी इतिहास की पुस्तकों में अपने मूल वंशजों के इतिहास को न लिख कर यदुवंश में अपना इतिहास समाहित करने का प्रयास कर रहे है जिसे कोई भी समाज उनके अतरिक्त सत्य भी नहीं मानता ।सत्य तो सत्य ही होता है ,उस को असत्य के पर्दे से नहीं छिपाया जा सकता । आजकल  यदुकुल में जन्मे श्री कृष्ण के परदादा शूरसेन के भाई के रूप दूसरी  वैश्य माता से जन्मे पर्जन्य का नाम गोपों के अधिपति नन्द जी के पिता के रूप में जोड़ कर या उग्रसेन के पिता आहुक का नाम अपने पूर्वजों के नाम के  साथ जोड़कर कुछ विशेष समाज के लोग अपना  मनगढ़ंत इतिहास बना रहे है जिसका कोई भी प्रमाण मान्यता प्राप्त  किसी भी वेद ,उपनिषद तथा पुराणों में कहीं  भी नहीं  बताया गया है। उनके कथाकथित इतिहासकारों द्वारा लिखित  पुस्तकों का अध्ययन करने पर पाया गया है कि उन्होंने बड़ी ही चतुराई से “यादव “शब्द को जातिगत बनाते /मानते  हुए वास्तविक यदुवंशियों -करौली के जादों ,जैसलमेर के भाटी ,कच्छ एवं भुज के चुडासमा एवं जडेजाओं , देवगिरि के जादवों ,होयसल एवं विजयनगर के यादवों ,मैसूर के वड़ियारों तथा कलचुरियों ,हैहयों आदि सभी को अपने इतिहास में समाहित कर लिया है जो बिल्कुल असत्य है।इन सभी यदुवंशियों के राजपरिवारों के पास आज भी श्री कृष्ण से आज तक अपने पूर्वजों की जगाओं ,चारणों एवं भाटों द्वारा लिखी हुई वंशावलियाँ भी  उपलब्ध है  जो वास्तविक वंशज होने का प्रमाण देती हैं ।  इन कथाकथित इतिहास वेत्ताओं के पास  अपनी श्री कृष्ण से जुड़ी कोई भी वंशावली है ही नहीं जिसके आधार पर कृष्ण के वंशज होने का यथार्थ में दावा प्रेषित कर सकें ।सभी भारतीय एवं विदेशी  विख्यात इतिहासकारो द्वारा लिखित पुस्तकों एवं विभिन्न प्रान्तों के जनपदों के  गजेटियर्स में इनको वही लिखा है जो वे  वास्तविक रूप में है ।इनके लिए यादवा या यदुवंशी संबोधन कहीं भी इनके स्वंभू लेखकों /इतिहासकारों के अलावा  किसी ने भी  नहीं लिखा है ।इनकी वास्तविक उत्तपत्ति का जो इतिहास इतिहासवेत्ताओं ने लिखा है उसका इनके लेखक   जिक्र तक  भी नहीं करते है ।

जैसलमेर के भाटियों की भांति करौली के जादों सरदार भी पौराणिक यादव राजपूत है। यह राजवंश यादववंशीय तथा मथुरा की शूरसेनी शाखा से निकला हुआ है।करौली का यह यादव राजवंश महाराजा  विजयपाल से आरम्भ हुआ ।यह मथुरा से आया और पूर्वी राजस्थान के पहाड़ी क्षेत्र में बस गया , जहां 1040ई0 में उसने विजयमन्दिरगढ़ नामक दुर्ग बनाया और बयाना को अपनी राजधानी बनाया।समकालीन अभिलेखों में उसे “परम्भट्टारक ” कहा गया है । सम्भवतः गजनवियों ने  1093 ई0 में इस किले पर अधिकार कर लिया और विजयपाल मारे डाले गए या स्वयं उन्होंने  अपनी आत्महत्या कर ली ।
विजपाल के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र ताहनपाल (1093-1159) /तिमनपाल /त्रिभुवनपाल उत्तराधिकारी हुए ।उन्होंने बयाना के निकट 22 किमी0 दूर  ताहनगढ़ (तिमनगढ़ /त्रिभुवनगिर / फारसी इतिहासकारों का थंनगढ़)का दुर्ग बनवाया ।वे इस वंश के प्रतिभाशाली शासक थे । छियासठ वर्ष के दीर्घकालीन शासनकाल में उन्होंने नई विजयें कर अपने राज्य की शक्ति बढ़ाई ।तिमनपाल ने डांग ,अलवर ,भरतपुर ,धौलपुर , गुणगांव ,मथुरा , आगरा तथा ग्वालियर के विशाल क्षेत्र जीत कर अपना वर्चस्व स्थापित किया ।उन्होंने सार्वभौम शासक की तरह  “परम्  भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर “की उपाधि भी धारण की ।इससे इस विशाल क्षेत्र पर उनकी सत्ता उनके विरुद इस उपाधि से भी सिद्ध होती है  ।उनकी मृत्यु 1160 ई0 के लगभग हुई ।
ताहनपाल के बाद अगले दो उत्तराधिकारी कमजोर सिद्ध हुए ।ये दोनों शासक , धर्मपाल एवं हरिया हरपाल अपना पैतृक अधिकार स्थिर नहीं रख सके ।कुछ पारवारिक झगड़ों के कारण वे आपस में ही उलझते रहे तथा वे मुहम्मद गौरी का भी सामना नहीं कर सके जिसने ई0 1196 में बयाना और ताहनगढ़ पर अधिकार कर लिया ।
बयाना और ताहनगढ़ पर मुस्लिम आधिपत्य के बाद वहां से यदुवंशी लोग चम्बल नदी पार करके सबलगढ़ के जंगल में चले गए और उसी स्थान पर  “जादोंवाटी ” नाम से अपना राज्य स्थापित कर लिया ।कुछ इतिहासकारों के अनुसार ई0 1196 से 1327 तक इस वंश का तिथिक्रम संदिग्ध है ।ऐसा प्रतीत होता है कि इस युग में अराजकता रही और वंश का भाग्य कुछ समय के लिए अस्त हो गया ।कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद गौरी ने बयाना के तत्कालीन शासक कुँवरपाल को युद्ध में हरा दिया और उसके सम्पूर्ण राज्य पर अधिकार कर लिया । बयाना एवं ताहनगढ़ से निर्वासित यादव शासक कुंवरपाल एवं उसके कुछ  वंशजों  ने रीवा में शरण ली थी तथा कुछ  वंशज लगभग 150 वर्षों तक इधर -उधर डोलते रहे तथा कुछ ने अन्यत्र जाकर अपने आप को स्थापित कर लिया ।1234 ई0 सन में इल्तुतमिश ने इस सम्पूर्ण भाग (बयान एवं तिमनगढ़ )पर अधिकार कर लिया था ।

कहा जाता है कि गोकुलदेव का पुत्र अर्जुनपाल (1327-61 ई0)  ने  मुहम्मद तुगलक के प्रतिनिधि मंदरायल  के मुस्लिम गवर्नर मियां माखन  को , जो बहुत ही अलोकप्रिय था ,पराजित कर मंदरायल पर अपना अधिकार जमा लिया और उसने फिर स्वदेश में अपने पैर जमा लिए। इस कालखण्ड में अर्जुनपाल इस वंश का महानतम शासक हुआ ।मीना और पंवार राजपूतों का दमन कर उसने  इस क्षेत्र पर अपनी सत्ता और अधिक सुदृण कर ली ।सरमथुरा के पास  24 गावों को बसाया और धीरे- धीरे अपने पूर्वजों के राज्य पर पुनः अधिकार कर लिया ।विक्रम संवत 1405 (ई0 सन 1348 ) में इन्होंने कल्याणजी का मन्दिर बनवाकर कल्याणपुरी नगर बसाया और उसे सुन्दर भवनों ,तालाबों , बागों तथा मन्दिरों से सुंदर बनाया  ,  जो अब कल्याणजी  के नाम पर ही करौली कहलाता है (6  ) । यही इस राज्य की कालान्तर में  राजधानी बना ।अर्जुनपाल ने ही अंजनी माता का मन्दिर बनवाया तभी से करौली के जादौन अंजनी माता को अपनी कुलदेवी मानने लगे जब कि यदुवंशियों (जादों ) की कुलदेवी योगमाया (योगनिद्रा ,योगेश्वरी ) हैं जिन्होंने भगवान कृष्ण की कंस से रक्षा की थी।
अर्जुनपाल के उत्तराधिकारी, विक्रमादित्य ,अभयचन्द्र ,पृथ्वीपाल ,रुद्रप्रताप ,चन्द्रसेन ,गोपालदास ,द्वारिकदास ,मुकुंददास ,तथा जगमन आदि राजा हुए जो लगभग साधारण शासक ही थे ।निरन्तर आंतरिक पारवारिक  झगड़ों में उलझे होने के कारण , वे अपने शत्रुओं का सामना करने के लिए दुर्बल हो गये  , इस लिए करौली के यादव शासक उत्तर भारत की राजनीति में कोई महत्वपूर्ण भाग नहीं ले सके ।यद्यपि तुगलक एवं सैय्यद राजवंश के अवसान तक उनकी स्वतंत्र सत्ता विद्यमान रही ।वैसे पृथ्वीपाल के शासनकाल में अफगानों ने तवनगढ़ पर 15 वीं शताब्दी के प्रथम पच्चीस वर्षों में अधिकार कर लिया ।यद्यपि उसने ग्वालियर के शासकनमानसिंह तोमर  का आक्रमण विफल कर दिया किन्तु मीणाओं का दमन न कर सका जो दुर्जेय बन गए थे  ।
किन्तु शीघ्र ही यादव शासक चंद्रपाल या चन्द्रसेन के राज्यकाल में 858हि /1454 ई0 सन में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने करौली यादव राज्य पर आक्रमण कर चन्द्रसेन को   निष्काषित कर उस पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया । राजा चन्द्रसेन के समय में करौली की राजधनी उंटगिरी थी ।वहां के अनेक हिन्दुओं को उसने मारा  तदनन्तर विजयी सुल्तान अपने पुत्र फिदवी खां को करौली सौंप कर स्वयं  अपनी राजधानी वापस चला गया ।अपने राज्य से च्युत होने पर चन्द्रपाल उंटगढ़ में चला गया और वहां एक सन्यासी जीवन व्यतीत करने लगा ।वह एक धर्मपरायण शासक था ।उसके बेटे भारतीचन्द व पौत्र गोपालदास उंटगढ़ में ही निवास करते रहे और थोड़े से प्रदेश पर ही अपना अधिकार बनाये रहे ।कालान्तर में गोपालदास ने अकबर के  शासन काल में उसे अपनी सेना से प्रसन्न कर अपने पैतृक राज्य के कुछ भागों को पुनः पाने में सफल हो गया  ।अकबर के शासनकाल में गोपालदास मुगल सल्तनत का मनसबदार था । यह राजा अकबर समकालीन थे तथा उस समय अजमेर के सुवेदार भी थे ।गोपालदास जी ने  अपने क्षेत्र के भील आदि जनजातियों का दमन किया तथा मासलपुर तथा झिरी के दुर्ग बनवाये । ई0 सन 1566 में अकबर ने राजा गोपालदास के हाथों आगरा किले की नींव रखवायी । गोपालदास ने करौली के पास बहादुरपुर का दुर्ग तथा करौली राजमहल में गोपाल मन्दिर बनवाया । ई0 सन 1599 में गोपालदास ने अकबर के लिए दौलताबाद का दुर्ग जीत कर उसे खुश किया ।अकबर ने उसे 2 हजारी मनसब , कीर्तिचिन्ह , नगाड़ा  निशान का सम्मान दिया ।मासलपुर के 84 गांव भी गोपालदास ने अपने अधीन कर लिए ।जब राजा गोपालदास अकबर के दरबार में जाते थे तो उनके आगे -आगे नगाड़ा बजता हुआ चलता था ।अकबर ने राजा गोपालदास के हाथों आगरा किले की नींव रखवाई।इन्होंने करौली के निकट बहादुरपुर का किला तथा करौली राजमहल में गोपाल मन्दिर बनवाया तथा उसमें दौलताबाद से लाई हुई गोपाल जी की मूर्ति स्थापित की गई ।गोपालदास ने मासलपुर में भी एक महल एवं बाग तथा चम्बल नदी किनारे झिरी में भी एक महल बनवाया ।
गोपालदास के बाद करौली के विकास को गति देने वाले प्रभावशाली शासक गोपाल सिंह 1724 ई0 में गद्दी पर विराजे ।इनके शासन काल में करौली राज्य की सीमा का विस्तार चम्बल नदी पार करके ग्वालियर के सिकरवार तक हो गया ।इन्होंने मदनमोहन जी का भव्यमन्दिर बनवाया ,राजप्रसादी का विस्तार किया , नगर का सौंदर्यीकरण एवं सुरक्षा के लिए सड़कों एवं परकोटे का निर्माण करवाया तथा राजपूताने के संगठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।1753 ई0 में बादशाह मोहम्मद शाह द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार में गये ।वहां बादशाह द्वारा इन्हें माहीमरातिव की उपाधि से विभूषित किया गया ।भद्रावती नदी किनारे गोपाल सिंह जी का देवल बना हुआ है जहां लोग आकर मनोतियाँ मांगते है ।
विक्रम संवत 1707 में धर्मपाल द्वितीय ने करौली को प्रथम बार अपनी राजधानी बनाया तथा यहां पर राजमहलों सहित अनेक कार्यों का निर्माण कराया।उनकी मृत्यु करौली के राजमहलों में हुई।इस राजा को करौली क्षेत्र में देवता के रूप में पूजा जाता है।इनके बाद कुंवरपाल द्वितीय ,गोपालसिंह ,तुरसनपाल , मानकपाल ,हरिबक्सपाल , प्रतापपाल , नरसिंह पाल ,भरतपाल , मदनपाल ,लक्ष्मण पाल ,जयसिंहपाल ,अर्जुनपाल द्वितीय ,भंवरपाल ,भूमिपाल (भौमपाल ) और अंतिम शासक गणेशपाल करौली की गद्दी पर विराजमान हुए ।वर्तमान में करौली नरेश गणेशपाल के पौत्र कृष्णचंद पाल एवं उनके पुत्र युवराज विवस्वतपाल करौली के राजप्रसाद में विराजते हैं।

करौली के यादव वंशी राजा भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ जी के वंशज है।अतः अपने नाम के आगे” सिंह “न लिख कर “पाल ” लिखते है क्यों कि सिंह गाय को खा जाता है और पाल शब्द का अर्थ है पालक (पालने वाले ) ।ये राजा विष्णु धर्म के अनन्य भक्त थे ।रामजी के भक्त हनुमान जी की माता अंजना इनकी कुलदेवी है ।

संदर्भ–

1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली ।
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा ।
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता ।
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग ।
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन ।
21-करौली पोथी ।
22-करौली ख्यात ।
23-ग्वालियर के तंवर -लेखक हरिहरप्रसाद द्विवेदी ।
24-जाटों का नवीन इतिहास -लेखक उपेन्द्रनाथ शर्मा ।
25-जाटों का नया इतिहास -लेखक धर्मेंचन्द्र विद्यासंकर ।

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

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