क्षत्रिय यदुवंश :अखण्ड आर्यावर्त का प्रतीक–

क्षत्रिय यदुवंश : अखण्ड आर्यावर्त का प्रतीक —-

( उत्तर-पूर्वी राजपूताने – मथुरा, करौली , भरतपुर ,अलवर ,धौलपुर के यादव (जादों ), जैसलमेर के यादव भाटी ,जूनागढ़ एवं जामनगर के चुडासमा, सरवैया,रायजादा और जडेजा यादव ,देवगिरि के जाधव यादव ,द्वारसमुद्र तथा विजयनगर के यादव ,  मैसूर के वडियार यादव ,महोबा के बनाफर यादव )

समस्त राजपूतों के इतिहास में साहस, शौर्य, एवं बलिदान और शहीदों का वर्णन मिलता है। अपनी रियासत राज्य व संस्कृति के गौरव को अक्षुण्ण बनाये रखने में राजपूतों का योगदान इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णिम आभायुक्त है। नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के इस उज्ज्वल अतीत से प्रेरित होकर समाज के संगठन को मजबूत कर जाति सेवा व राष्ट्र सेवा में समर्पित भावना से अपना बहुमूल्य योगदान कर सकती है। अपने पूर्वजों, वंशों, कुलों का ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है। इसी प्रसंग में जातीय बन्धुओं के लिये क्षत्रियों अथवा राजपूत वंशों की जानकारी परमावश्यक है।
यहां मैं यदुवंश के विषय में लिखना अति आवश्यक समझता हूं क्यों कि आज कल समस्त क्षत्रियों के इतिहास में कुछ समाज विशेष जोड़-तोड़ कर अपनी महत्वाकांक्षा के लिए अपना गौरवशाली इतिहास बनाने की जुगत में योजनावद्ध तरीके से लगे हुए हैं।यदुवंश में तो बहुत पहले से ही अतिक्रमण हो रहा है ।कुछ हमारे क्षत्रिय युवा भी अन्य समाजों की तरह एक जाति विशेष के द्वारा यदुवंश में किये जारहे अतिक्रमण को समझ नहीं पा रहे हैं।इस लिए यदुवंश के यथार्थ इतिहास एवं उसमें आने वाले राजवंशों के विषय में जानकारी देना परम् आवश्यक है।

प्राचीन ग्रंथों में भी यादव (यदु, यदुवंशी, यदु भाटी, जादव, जादों )  क्षत्रियों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।
स्वयं अर्जुन के द्वारा श्री कृष्ण को “यादव ” शब्द के सम्बोधन से  पुकारा गया है।

“सखेति मत्व प्रसभं यदुक्त हे कृष्ण ! हे यादव है सखेति । अजानता महिमानं तवेद मया प्रभादात्प्रणयेन वापि ॥” (श्रीमद् गीता श्लोक 41 अध्याय-11)

अर्थात् हे परमेश्वर सखा ऐसे मानकर आपके इस प्रभाव को न जानते हुए मेरे द्वारा प्रेम से अथवा प्रमाद से भी हे कृष्ण! हे यादव! हे सखे इस प्रकार जो कुछ दृढ़ पूर्वक कहा गया है। श्रीमद् गीता में भी कृष्ण को हे यादव, हे सखे, के नाम से सम्बोधन किया गया है।

इस प्रकार यादव शब्द संस्कृत का शब्द है और हिन्दी में भी यही शब्द तत्सम रूप में प्रयोग किया जाता है।वैसे “यादव ” शब्द की हिन्दी शुद्ध रूप में “जादों ” ही है। महाराजा यदु के वंशज यादव कहलाए जिनको यदु /जदु भी कहा जाता है, जादौं भी कहा जाता है, यदुवंशी भी कहा जाता है एवं जदु भी कहा जाता है इस प्रकार जादु ठेठ मेवाड़ी भाषा का शब्द है। ब्रज या अवध भाषा में जादों कहा जाता है।ब्रज भाषा “य ” को “ज “के रूप में उच्चारित किया जाता है जैसे यमुना को जमुना ,यशोदा को जशोदा ,यदु को जदु और यादव को जादव।यही यादव शब्द जाधव /जादव अपभ्रंश होते “जादों “हो गया। जगाओं की पोथी में भी जादों राजपूत जाति लिखी गयी है।विभिन्न प्रसिद्ध भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने यदुवंशी राजपूतों के लिए विभिन्न पुस्तकों ,लेखों तथा विभिन्न प्रान्तों के जिला गजेटियर ( मथुरा , आगरा ,अलीगढ़ एटा ,मैनपुरी ,जैसलमेर, गुणगांव, भरतपुर ,सवाईमाधोपुर ,अलवर ,करौली, के अतिरिक्त गुजरात एवं  दक्षिण राज्यों के सभी जिलों के गजेटियर में लिखित इतिहास में  यादव /जाधव /जादव /जादों शब्दों का उल्लेख  केबल भाटी ,जादों ,जडेजा ,बनाफर ,जाधव ,चुडासमा , वडियार आदि राजपूतों के लिए किया है। इन सरकारी रिकार्ड्स के प्रमाणों को कोई बदल नहीं सकता और नहीं इसमें अतिक्रमण करके अपना इतिहास लिखवा सकता है।

जिस पौराणिक वंश में कृष्ण हुए वह यदुवंश कहलाता है। यह वंश सोम अर्थात चन्द्र  से चला आ रहा है । राजवंशी क्षत्रियों के दो  पौराणिक मुख्य कुल हैं- एक सूर्यवंश तथा दूसरा चन्द्रवंश ।जब -जब भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर अवतार लिए है , तो वे क्षत्रिय कुल में  ही प्रकट हुऐ हैं, क्यों कि उन्हें धर्म की संस्थापना करनी होती है | वैदिक प्रणाली के अनुसार क्षत्रिय कुल मानव जाति का रक्षक होता है। जब भगवान विष्णु श्री रामचन्द्र के रूप में अवतरित हुए तो  वे सूर्यवंश  में हुए जो रघुवंश के नाम से विख्यात हुआ । और जब भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुए तो यदुवंश के नाम से विख्यात हुआ है ।
इस प्रकार निम्न रामायण चौपाई से भी यदुकुल की जानकारी सिद्ध होती है.

जब जदुवंश कृष्ण अवतारा । होइहि हरन महा महिमारा ।
कृष्ण तनय होइहि पति तोरा । बचनु अन्यथा होई न मोरा ।।’

अर्थात् जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए यदुवंश में श्री कृष्ण का अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा। मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा ।यह वचन शिव जी ने कामदेव की पत्नी रति को दिया था क्यों कि भगवान शिव ने अपनी दिव्य दृष्टि से रति के पति कामदेव को भष्म कर दिया था।(गोस्वामी तुलसीदास विरचित बालकाण्ड ,तुलसीकृत रामायण )

ऋग्वेद में मनु की पुत्री इला के पुत्र पुरुरवा से चन्द्रवंश चला।इसी वंश वृक्ष में महाराजा यदु हुए।यदु के वंशधर यादव /यदुवंशी कहलाये।इसी चन्द्रवंश की शाखा यदुवंश में जैसलमेर के भाटी यादव, देवगिर के जाधव , जूनागढ़ के चुडासमा यादव ,जामनगर के जड़ेजा यादव, विजय नगर यादव वंश, महोबा के बनाफर यादव,  उत्तरी पूर्वी राजपूताने के जादों यादवों का उल्लेख मिलता है। महाभारत तथा भागवत के अनुसार यदुवशियों का पहले राज्य प्रयाग में था। महाभारत में 56 कोट यादवों का वर्णन है, किन्तु राजपूताना गजेटियर (1908 ई.) में मेजर आसीकिन ने यादवों के 56 घराने माने हैं।यदुवंश में सहस्त्रबाहु अर्जुन के हैहय शाखा में पैदा हुए  महाराज शुर / शूरसेन के नाम पर ही इस प्रदेश का नाम ‘शूरसेन पड़ा था। भगवान श्रीकृष्ण के समय में शूरसेनी राज्य का विस्तार हुआ। मगध के राजा जरासंध से निरन्तर संघर्ष के कारण श्रीकृष्ण ने अपनी राजधानी द्वारिका बनाली। जरासंघ के मारे जाने के बाद यादवों का राज्य मथुरा के आस-पास पुनः स्थापित हुआ। श्री कृष्ण के परमधाम गमन के बाद अर्जुन उनके परिवार को इन्द्रप्रस्थ ले गया, उन्हीं में उनका प्रपौत्र वज्रनाभ था। वज्रनाभ ने ब्रज में अपना राज्य स्थापित किया और वर्तमान गांव बहज के स्थान पर अपने नाम पर राजधानी का नाम वज्रनाभपुर रखा । श्रीकृष्ण के शेष वंशज पांडवों के महाप्रस्थान को जाते समय साथ-साथ चले गये, जिसे गिरिव्रज अथवा यदु की डांग कहते हैं। गिरिदेश में कुछ समय रहने पर असुविधा हुई तो उस शैलमंडित भूभाग को छोड़कर सिन्धुनदी की दूसरी पार जावालिस्थान नामक देश में गये और प्रसिद्ध गजनी नगरी की प्रतिष्ठा की तथा राज्य को समरकन्द तक विस्तारित किया ।भट्ट ग्रंथ के अनुसार कालान्तर में यादवों ने फिर भारतवर्ष में अपना राज्य विस्तार किया। पुनः भारत भूमि में आने पर यादव पंजाब में बसे और शालिवाहनपुर (सियालकोट) नामक नगर बसाया । पहले इस मरूस्थल में लहंग, जोहिया और महिल जातियाँ निवास करती थीं। यादव लोगों ने उनको निकालकर इस देश में अपना अधिकार कर लिया। समयानुसार फिर कई नगर बसाये। इस संदर्भ में निम्न ऐतिहासिक कथन प्रसिद्ध है

मथुरा काशी प्रागवड, गजनी अरू भटनेर । दिगम दिरावल लोद्रवों, नम्मो जैसलमेर।

शूरसेन प्रदेश के यादव

ऐतिहासकि संदर्भों के अनुसार ईसा से आठ सौ वर्ष पूर्व शूरसेन साम्राज्य चर्मोत्कर्ष पर था। कांमा (कामवन) की ‘चौरासी खम्भा’ नाम की मस्जिद में जो हिन्दू मन्दिरों को गिराकर उनके पत्थरों से बनाई गई थी, के एक स्तम्भ पर शूरसेन वंशी यादव राजा वत्सदामा का खण्डित शिलालेख विद्यमान है, जिसकी लिपि झालरापाटन वाले राजा दुर्गगण के विक्रम स० 746 (ई0स0 689) के शिलालेख की लिपि से मिलती हुई है। यदि कामां का लेख वि० स० की आठवीं शताब्दी के अंत का भी माना जावें तो भी उसमें लिखे हुए बत्सदामा के पूर्व के सातवें राजा फक्क का समय प्रत्येक राजा के राज्य समय का औसत बीस वर्ष मानने से वि० स० 680 (ई सन् 623) के आस-पास स्थिर होता है। शूरसेन जनपद में मथुरा तथा उससे लगा हुआ अलवर का क्षेत्र, भरतपुर, धौलपुर एवं करौली थे। शूर सैनिक अपने ज्ञान के लिए वीर रस गीतों (महाभारत कर्णपर्व) उद्धृत है–

–“सत्यम् मत्स्य शूरसेनश्च यजनम”

अपभ्रंश पांडुलिपि के अनुसार यह प्रदेश भण्डानक या भानया जो बाद में बयाना हो गया जाना जाता है। बयाना का प्राचीन नाम बाणासुर नगरी तथा श्रीपथ भी कहा जाता है।ई० स० 639 के करीब जब चीनी यात्री ह्वेनसाग भारत भ्रमण करने आया तब मथुरा के इलाके पर शूरसेनी यादवों का राज्य था। ख्यातों से ज्ञात होता है कि शूरसेन वश में सन् 879 ई० में इच्छापाल मथुरा का राजा था (मिसल हाकेयत गांव बहज तहसील डीग (भरतपुर) सं० 1954) जिसके ब्रह्मपाल तथा विनयपाल नाम के दो पुत्र हुए। इच्छापाल के बाद मथुरा का राजा ब्रह्मपाल हुआ विनयपाल के वंशज बनाफर यादव कहलाए। ब्रह्मपाल के बाद विक्रम सं० 1023 (ई० स० 966) में उनका पुत्र जयेन्द्रपाल गद्दी पर बैठा। जगा के सजरा में इसे सन्तपाल  भी लिखा है इसका देहान्त सं० 1049 कार्तिक सुदी 11 को हुआ। इसके ग्यारह पुत्रों में ज्येष्ठ महाराजा विजयपाल थे, जिसने 53 वर्ष तक राज्य किया। यदुनाथ कृत वृतविलास नामक ग्रंथ में उपलब्ध यदुवंशावली में विजयपाल को कृष्ण की 88 पीढ़ी में निर्धारित किया गया है। 1018 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा मथुरा लूटी जाने पर विजयपाल अपनी राजधानी मानी पहाड़ी पर ले गया। इसी पहाड़ी पर इसने 1040 ई0 में विजयमन्दिरगढ़ नाम के एक विशाल किले का जीर्णोद्वार करवाया। करौली की ख्यातों के अनुसार विजयपाल का युद्ध गजनी के मुसलमानों से हुआ, जिसमें उसने उन्हें परास्त किया। विजयपाल के 18 पुत्रों में ज्येष्ठ तिमनपाल ने बयाना से 29 मील दूर तिमनगढ़ की तामीर कराई। इसके करौली, गुड़गांव व मथुरा से लेकर आगरा व ग्वालियर के कुछ भाग भी सम्मिलित थे। तिमनपाल के पौत्र एवं धर्मपाल के पुत्र कुँवरपाल का 1196 ई० में मोहम्मद गौरी से घमासान युद्ध हुआ। गोरी की विजय के बाद कुंवरपाल को बयाना व तवनगढ़ छोड़ने पड़े थे और इनके वंशजों ने इस क्षेत्र से विभिन्न क्षेत्रों में पलायन किया ।कुछ  को पुनः कामा एवं मथुरा की ओर जाना पड़ा। कुंवरपाल के वंशज अर्जुनपाल ने चौदहवीं शताब्दी में सरमथुरा के 24 गाँवों को बसाया और धीरे-धीरे अपने पूर्वजों के राज्य पर पुनः अधिकार कर लिया। वि० स० 1405 (ई०स० 1348) में इसने करौली नगर बसाया। तिमनपाल के पुत्र धर्मपाल ने धौलपुर बसाया।

जैसलमेर के भाटी यादव

जैसलमेर की तवारीख वहाँ के नरेशों के पूर्वज यादव वंशी महाराजा गज को (विक्रम की छठी शताब्दी में) गजनीपुर में होना माना है। कर्नल टॉड गज को कृष्ण की 7 वीं पीढ़ी में मानते है, किन्तु यह उचित नहीं है । जैसलमेर के यादव राजा अपना निकास गजनी से मानते हैं । इतिहास ग्रंथों के अनुसार इस्लाम के दबाव के साथ वे पंजाब में सालपुर (सियालकोट) होते हुए आ पहुँचे थे । भाटी शाखा का मूल पुरुष भट्टी (भाटी) विक्रम सम्वत् 680 (ईस्वी सन् 623) में हुआ था। उसी ने वि० स०680 से भट्टिक सम्वत् चलाया था । इस सम्वत् के नाम के कई शिलालेख अब तक मिल चुके हैं। महाराजा गज द्वारा जावालिस्तान में बसाये गजनी शहर से दूर किये जाने पर यादव जब पुनः भारतवर्ष में लौटे तो उनमें बहुत से छोटे-छोटे गोत्र विख्यात थे । उन गोत्रों में भट्टि लोग विशेष पराक्रमी हुए । सन 1155 ईस्वी में महारावल जैसलदेव ने जैसलमेर नगरी बसायी थी । इस नगरी की प्रतिष्ठा करने से पहले भाटी यादवों ने किसी प्राचीन जाति से लोहदुवीपट्टन (लोद्रवा) नामक नगर को अधिकार में किया एवं कुछ काल तक वहाँ रहे । महारावल जैसलदेव के बाद भाटी यादवों का शासन जैसलमेर राज्य में अन्त तक कायम रहा ।

जामनगर के जड़ेजा यादव

यदुकुल की यह प्रसिद्ध शाखा भट्टि कुल के नीचे ही स्थान पाये हुए हैं । इन दोनों शाखाओं के सम्बन्ध में लगभग एकसा ही वृतान्त पाया जाता है। यदुकुल ध्वंस होने के बाद ठीक एक समय में ही इन दोनों शाखाओं के अगुवे शेष यादवों को साथ लेकर भारत के पश्चिमी प्रदेश की ओर चले गये थे, परन्तु जाड़ेचा शाखा भाटियों के समान अपने राजत्व को अधिक दूर विस्तार नहीं कर सकी। सिन्धु नदी के पश्चिमी किनारे पर शिवस्थान नामक जनपद था। सिकन्दर के समय के इतिहास ग्रंथों से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि वहां जाड़ेचा लोगों ने अखण्ड प्रताप से शासन किया ।कहते है कि मसीडीनिया के वीरों ने जिस समय भारत पर चढाई की थी तब जाडेचा कुल पूर्वज साम्ब नाम राजा उनके विरुद्ध युद्ध करने के लिए सामने आया । महाराजा साम्ब का उद्भव श्रीकृष्ण से ही है। इनकी उत्पति जामवती से हुई थी महाराजा साम्ब श्याम नगर में राज्य करते थे, परन्तु ग्रीक वाले इनको मीनगढ़ का राजा बताते हैं । आधुनिक ठट्ठा के पास जहां सिन्ध का डेल्टा दो भागों में बंट जाता है, शाम्य नगर है। इसका उल्लेख सुम्मकोट के नाम से भी मिलता है। दूसरी शताब्दी में यह नगर इण्डोसीथिक राजा की राजधानी था।

जूनागढ़ के यादव–

श्रीकृष्ण के मथुरा से द्वारिका प्रस्थान के बाद उनके वंशजों का राज्य विस्तार काठियावाड़ में हुआ भागवत के अनुसार कृष्ण की प्रधान राजधानी कुशस्थली द्वारिका थी, उसकी प्रतिष्ठा प्रयाग एवं मथुरा से बहुत पहले हुई थी । महाराजा इक्ष्वाकु के सबसे छोटे भ्राता आनर्त ने इस नगरी को बसाया परन्तु यदुवंशियों ने कब प्रतिष्ठा पाई, इसका वृतान्त नहीं मिलता है । जूनागढ़ के राव चन्द्रचूड यदु थे। द्वारिका के मन्दिर में कृष्ण भक्तिकाल से पूर्व बुधत्रिविक्रम की पूजा होती थी। वर्तमान में उसी देवालय के बाहरी कक्ष में कृष्ण की मूर्ति भी स्थापित है। यहाँ कृष्ण का पूजन रणछोड के रूप में होता है। यह वह रूप है जब मगध के बौद्ध राजा जरासंघ ने कृष्ण को पितृदेश शौरसेन से भगा दिया था। जूनागढ के यदु श्रीकृष्ण की पत्नि रुक्मणि के वंशज है। रुक्मणि के पुत्र प्रद्युम्न के वंशजों में ही रूद्रपाल हुए। इसी क्रम में आगे माण्डलिक और खंगार हुए। खंगार देवडी रानी से विवाह करने के लिए अणहिलवाडा के राजा सिद्धराज का प्रतिस्पर्धी था, क्योंकि सिद्धराज जूनागढ़ प्रायद्वीप को भी अपने विजय किये हुए अठारह राज्यों में ही गिनती करता था। सम्भवतः खंगार की स्वतंत्रता उसकी शौर्याग्नि में बलिदान हो गयी। यादवों के चारणों की प्रचलित गाथा के अनुसार जूनागढ-गिरनार की राज वंशावली में चार माण्डलि नौ-नवधन, पांच-सूरजमल और आठ रूद्रपाल हुए हैं। गिरनार के भवनों से प्राप्त जूनागढ़ शिलालेख में माण्डलिक, महीपाल खंगार एवं जयसिंह यदु राजओं की प्रशस्ति की गई है।

विजयनगर यादव राजवंश

प्राचीन शिलालेख एवं ताम्रपत्रों में दक्षिण में भी यादव वंशी राजाओं के राज्य होने के प्रमाण उपलब्ध हैं । दक्षिण का सेउ प्रदेश जो कि नासिक से दौलताबाद तक का भूभाग है वह भी किसी समय यादवों के अधिकार में था । दक्षिण में द्वार समुद्र जो मैसुर राज्य के अन्तर्गत है, विजयनगर यादव राजवंश के अधीन इनका प्रभुत्व सिन्धु नदी के दक्षिणी भाग में तथा पंजाब में भी मैसुर के शासक पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को हराया और साम्राज्य का विस्तार किया। इसके पतन के बाद देवगिरी के यादवों एवं द्वार समुद्र के होयसिलों के बीच कर्नाटक का बटव हो गया। चौदहवीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई। इसी शताब्दी के अन्त में ही मैसूर  यादव राज्य भी विजय यादव साम्राज्य के अधीन हुआ | 1565 ई० में विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद मैसुर स्वतंत्र यादव राज्य बन गया। इस राज्य के संस्थापक मूल पुरुष विजयराज एवं कृष्णराज वडियार नामक यादव थे, जिन्होंने द्वारिका से चलकर 1399 ई० में दक्षिण में अपना राज्य स्थापित किया। विजयराज को ओडियार या बढियार की सम्मान सूचक उपाधि मिली। जहाँगीर के शासन काल में सिंदखेडा के जादव विठोजी का पुत्र लखोजी जादौराय नाम से विख्यात था। बादशाह द्वारा उसे पाँच हजार सवार की सहूलियत दी गई थी। लखोजी का उत्तराधिकारी पौत्र पतंगराव भी शाहजहाँ द्वारा जादोंराय की पदवी से सम्मानित किया गया।

उत्तरपूर्वी राजपूताने के यादव

मुहम्मद गोरी के बयाना आक्रमण के बाद यहाँ के यादव राजपूतों की एक शाखा की स्थापना उत्तरी अलवर के उस भाग में हुई थी, जिसे मेवात का कोहपाया कहते हैं। वे राजपूत मेवों और खानजादों के पूर्वज थे, जिनको कनिघम के अनुसार फीरोज तुगलक के शासन तक मुसलमान नहीं बनाया गया था। इसीलिये पूरी 13वीं शताब्दी तक पूरा मेवात हिन्दु जादाँ राजपूतों के अधिकार में था। उत्तरपूर्वी राजपूताने में यादवों द्वारा कांमा , तिजारा और शरहदा (उत्तरी अलवर) में अपना राज्य स्थापित किया था। इल्तुतमिश ने इस क्षेत्र को विजित करके अपने राज्य में शामिल किया । वर्तमान में इस क्षेत्र में रहने वाले हिन्दु एवं मुसलमान रीति रिवाजों का व्यवहार करते हैं, किन्तु मुस्लिम धर्म से अधिक प्रभावित हैं। सोलहवीं शताब्दी में इन्होंने सक्रिय होकर दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों के लिए काफी परेशानी पैदा की थी।

यदुवंशी राजपूतों की राजधानियाँ एवं खांपे-

1-करौली राज्य —
करौली राज्य के यादव आजकल जादों राजपूत कहे जाते हैं। यहां के राजा साहब को 17 तोपों की सलामी होती थी।
2- जैसलमेर राज्य–
जैसलमेर राज्य के यादव राजपूत आजकल भाटी  कहलाते हैं। यहाँ के राजा साहब को 15 तोपों की सलामी होती थी।

3- सिरमोर राज्य–(पंजाब में)–
सिरमौर के यादव आधुनिक भाटी वंश के है। यहां के राजा साहब को 11 तोपों की सलामी होती थी।

4-मैसूर राज्य(दक्षिण भारत कर्नाटक में)-
मैसूर के यादव आधुनिक समय में वडियार राजपूत कहे जाते हैं। यहाँ के राजा साहब को 21 तोपों की सलामी होती थी।

5-जामनगर राज्य—

यहां के यदुवंशी राजपूत आजकल जाड़ेजा कहलाते हैं। यहाँ के राजा साहब को 15 तोपों की सलामी होती है।
6- राजकोट राज्य— (काठियावाड़) यहाँ के राजा साहब को 9 तोपों की सलामी होती है।

7– गौण्डल राज्य
यहां के राजा साहब को 11 तोपों की सलामी
होती थी ।

8– -कच्छ राज्य (रेवान्तक में) —
यहाँ के राजा साहब को 17 तोपों की सलामी होती थी।
9-मौरवी और घरोल (काठियावाड़ में)राज्य– यहाँ के राजा साहब को 11 तोपों की सलामी होती थी।
10 जूनागढ़ (गिरनार )राज्य–

यहां के यादवों को आजकल चुडासमा ,सरवैया एवं रायजादा नामों से जाना जाता है।

11-देवगिरि राज्य —

देवगिरि के यादव आजकल महाराष्ट्र में जाधव नाम से जाने जाते हैं।इनके पूर्वजों को जादोंराय के नामों से भी सम्बोधित किया गया है।

सन्धर्व—
1-ऋग्वेद -दयानद संस्थान ,दिल्ली
2-यजुर्वेद -दयानन्द संस्थान ,दिल्ली
3-मनुस्मति -मनु कृत-वेंकटेश्वर प्रेस ,बम्बई
4-श्रीमद्भागवत महापुराण -गीताप्रेस ,गोरखपुर
5- संक्षिप्त महाभारत-गीता प्रेस ,गोरखपुर
6-वायुपुराण
7-विष्णुपुराण
8-हरिवंश पुराण
9-मत्स्यपुराण
10-अग्नि पुराण
11-रामायण तुलसी एवं बालमिक कृत
12-सूरसागर महात्मा सुरदास
13-राजस्थान का इतिहास -कर्नल जेम्स टॉड
14-हिस्ट्री ऑफ दी राजपूत ट्राइब्स -मेटकाल्फ़
15-हैंडबुक आफ राजपूतस -कैप्टन बिंगले
16-भारत का वृहत इतिहास (भाग 1,2,3)-रमेश चंद्र मजूमदार
17-राजपूताने का प्राचीन इतिहास -पं0 गौरीशंकर ओझा
18-गजनी से जैसलमेर -हरि सिंह भाटी
19-राजपूताने का इतिहास -जगदीस सिंह गहलोत
20-यदुवंश का इतिहास – महावीर सिंह यदुवंशी
21-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास प्रथम भाग -प्रभु दयाल मित्तल
22-मथुरा -ए डिस्ट्रिक्ट मेमॉयर -ग्रोउस
23-ब्रज का इतिहास प्रथम खण्ड-कृष्णदत्त वाजपेयी
24-मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास-प्रो0 चिन्तामणि शुक्ल
25-प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग-,सत्यकेतु विद्याशंकर
26-विद्याभवन राष्ट्रभाषा ग्रंथमाला पुराण -विमर्श -आचार्य बलदेव उपाध्याय
27-प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य -बाबू बृन्दावन दास
28-प्राचीन भारत का इतिहास रमाशंकर त्रिपाठी
29-पाणिनीकालीन भारतवर्ष -डा0 वासुदेव शरण अग्रवाल
30-दकन का प्राचीन इतिहास -जी0 यजदानी
31-राजपूत आफ सौराष्ट्र -वीरभद्र सिंह
32-सुर वंश का इतिहास -डा0 शिव बिन्देश्वरी प्रसास
33-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट – पी 0 पोवलेट
34-भारतीय पूरा -इतिहास कोश-अरुण
35-ऐष्यन्त इंडियन हिस्टारिकल ट्रेडिसन -पाजितर
36-अर्ली हिस्ट्री ऑफ राजपूत -सी0 वी0 वैद्य
37-जादों वंशियों का इतिहास -करौली का विजयपाल ,न019/27 ,अलवर पुरालेखय ,राजस्थान ,आर्काइव्ज आफिस ,बीकानेर
38-यादव वंशों  का इतिहास  संवत 867 विक्रमी से 1094 तक ,न0 269,8/27 ,अलवर पुरालेखीय , राज0 आर्काइव्ज आफिस ,बीकानेर
39-जैसलमेर ख्यात –डा0 नारायण सिंह भाटी
40-करौली ख्यात एवं करौली पोथी
41-जाटों का नवीन इतिहास -उपेन्द्नाथ शर्मा
42-कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन तिमनगढ़ दुर्ग -रामजी लाल कोली
43-वीरविनोद करौली की तवारीख-श्यामलदास
44-मथुरा के यमुना तटीय स्थलों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास 12 वीं शताब्दी तक-जयन्ती प्रसाद शर्मा
45-सल्टनतकाल में हिन्दू प्रतिरोध -अशोक कुमार सिंह
46-मुंशी अकबर अली बेग कृत तवारीख-ए-करौली
47-भरतपुर एवं सवाईमाधोपुर जिला गज़ेटियर
48-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन -मोहनलाल गुप्ता
49-भरतपुर जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन -मोहनलाल गुप्ता
50-जाटों का नया इतिहास -डा0 धर्मे चंद्र विद्यालंकार
51-यदुवंश -गंगा सिंह
52-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली
53-हिन्दी विश्वकोश संपादक नागेन्द्रनाथ वसु

लेखक – डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लढोता, सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह ,राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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