चन्द्र वंश में से यदुवंश की कैसे हुई उत्तपत्ति–

चन्द्रवंश में से यदुवंश की कैसे हुई उत्पती……

ब्रह्मा के पुत्र अत्रि थे।जिनकी पत्नी भद्रा से सोम या चन्द्रमा का जन्म हुआ।इस लिए ये वंश सोम या चंद्र वंश के नाम से जाना गया।अत्रि ऋषि से इस वंश की उत्पती हुई इस लिए इस वंश के वंशजों का गोत्र अत्री माना गया।तथा इस वंश के वंशज चंद्रवंशी या सोमवंशी कहलाये।चंद्रमा ने वृहष्पति की पत्नी तारा का चुपचाप हरण कर लिया ।उनसे बुद्ध नामक पुत्र पैदा हुआ।बुद्ध का विवाह शूर्यवंशी मनु की पुत्री इला से हुआ जिससे पुरुरुवा नाम का पुत्र हुआ।कालान्तर में वे चक्रवर्ती सम्राट हुए।इन्होंने प्रतिस्थानपुर जिसे प्रयाग कहते है बसाया और प्रयाग को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया।राजा पुरुरवा के उर्वशी के गर्भ से आयु आदि 6 पुत्र हुए।महाराज आयु के सरभानुया राहु की पुत्री प्रभा से नहुष आदि 5 पुत्र हुए।महाराज आयु अनेक आर्यों को लेकर भारत की और आयेऔर यमुना नदी के किनारे मथुरा नगर बसाया।राजा आयु के बड़े पुत्र नहुष राजा बने।महाराज नहुष के रानी वृजा से 6पुत्र पैदा हुए जिनमे यती सबसे बड़े थे लेकिन वे धार्मिक प्रवर्ती के होने के कारण राजा नही बनेऔर ययाती को राजा बनाया गया।राजा ययाती की दो रानियां थी जिन्मे एक देवयानी जो दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री तथा दूसरी शर्मिष्ठा जो दानव राज वृषपर्वा की पुत्री थी।देवयानी से यदु एवं तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा से द्रुह्यु , अनु और पुरू हुए।सभी पांचों राजकुमार सयुक्त रूप से पाञ्चजन्य कहलाये।
राजा ययाती ने अपने बड़े बेटे यदु से उनका यौवन मागा जिसे उन्होंने नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दीया।सबसे छोटे पुत्र पुरू ने अपना यौवन पिता को दे दीया।राजा ययाति ने अप्रसन्न होकर युवराज यदु को उनके बीजभूत उत्तराधिकार से वंचित करके कुमार पुरू को यह अधिकार पारतोषिक में देने की घोषणा की।राजा ययाति के पुत्रों में यदु और पुरू के ही बंशज भारतीय इतिहास का केंद्र रहे।
बुद्ध और ययाति तक के राजाओं के वंशज ही सोमवंशी या चंद्रवंशी कहलाये।राजा पुरू के वंशजोंको हीसोमवंशी या चंद्रवंशी कहलाने का अधिकार था।इस लिए कंयो क़ि यद् कुमार ने यौवन देने से इनकार कर दीया था इस पर महाराज ययाति ने यदु को श्राप दिया की तुम्हारा कोई वंशज राजा नही बनेगा और तुम्हारे वंशज सोम या चंद्र वंशी कहलाने के अधिकारी नहीं होंगे।केवल राजा पुरू के वंशज ही सोम या चंद्रवंशी कहलायेंगे।इसमे कौरव और पांडव हुए।यदु महाराज ने राजाज्ञा दी की भविष्य में उनकी वंश परंम्परा”यदु या यादव “नाम से जानी जाय और मेरे वंशज”यदुवंशी”कहलायेंगे।राजा पुरू के वंशज,पौरव या पुरुवंशी ही अब आगे से सोमवंशी या चंद्रवंशी कहलाने के अधिकारी रह गये थे।राजा पुरू ,राजा दुष्यंत के पूर्वज थे जिनके राजकुमार भरत के नाम पर इस देश का नाम “भारत या भारतवर्ष”पड़ा।राजा पुरू के ही वंश मेराजा कुरु हुए जिनके कौरव और पांडव हुए जिनमे आपस में महाभारत युद्ध हुआ। प्रयाग से मध्य-देश पर राज्य करते हुए राजा ययाति अत्यधिक अतृप्त यौनाचार से थक गए इसलिए वृद्धावस्था में राज्य त्याग कर उन्होंने वानप्रस्थ का मार्ग अपनाया और जंगल में सन्यासी का जीवन व्यतीत करने चले गये।भारत में केबल यदु और पुरू की संतती शेष रही और इन्ही के वंशजों ने भारत के भावी भाग्य का निर्माण किया।जय हिन्द ।जय चन्द्रवंश जय यदुवंश।

डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव लढोता ,सासनी
जिला हाथरस उत्तरप्रदेश।
एसोसिएट प्रोफेसर ,शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज0 ।

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