चुडासमा यदुवंशी राजपूतों के ऐतिहासिक दुर्ग जूनागढ़ का अवलोकन —

दुर्गों के अवशेषों में जूनागढ़ (ऊपरकोट) दुर्ग काफी प्राचीन लगता है। जूनागढ़ दुर्ग गिरनार पहाड़ी पर है। गिरनार पहाड़ी गुजरात की सबसे ऊंची पहाड़ी है। यहां अशोक कालीन शिलालेख आज भी ज्यों के त्यों है। जूनागढ़ का शाब्दिक अर्थ ही पुराना किला है। जूनागढ़ के आज दो रूप है- एक खूबसूरत शहर और दूसरा प्राचीन किला, जिसमें मंदिरों, गुफाओं, शिलालेखों, पुण्यो की प्रचुरता है। आज का जूनागढ़ ऊपरीकोट (गढ़) का विस्तृत अंश है और इसकी स्थापना सन् 875 में चूड़ासामा यदुवंशी राजपूत वंश के ग्रहारियू प्रथम ने की थी। इतिहास में जूनागढ़ का अस्तित्व 250 ईसा पूर्व में भी था। क्षेत्र में मौर्य , गुप्त, मैत्रक, छत्रपों, राजपूतों और मुस्लिम सुल्तानों की सत्ता बदलती रही है। राह खेगण ने सन् 1094 में किल्ले पर आक्रमण कर जीता और पाटण के राजा सिद्धराज जयसिंह की वाग्दाता पत्नी रणकदेवी से विवाह किया।किले में उसके लिए महल बनवाया।सिध्दराज से हुई लड़ाई में खेगण मारा गया। 15 वीं शताब्दी में इस क्षेत्र से राजपूतों की सत्ता सदा के लिए अन्त हो गया और सुल्तान महमूद बेगड़ा और उसके वंशजों के पांव जम गए।

जूनागढ़ अहमदाबाद से 327, राजकोट से 105 और सोमनाथ 92 किलो मीटर की दूरी पर है। गिरनार पहाड़ी का पुराणों में काफी स्तुतिगान है।स्कन्द पुराण के प्रभाष खण्ड में वर्णित पहाड़ी के 21 शिखरों में पांच शिखर आज भी महत्वपूर्ण है, इन्हें अम्बामाता , गोरखनाथ, औगढ़, कालिका ,और गुरु दत्तात्रेय शिखर कहा जाता है। जैन धर्म के 22वें तीर्थकर नेमिनाथ का मंदिर भी यही है।

एक हजार मीटर ऊंचाई पर किला यानी ऊपर कोट का फाटक है। कोट में ज्यादातर मंदिर है। इनका स्थापत्य शिल्प चालुक्य यूगीन वैभव की याद दिलाता है। इसके अलावा आदिपादि बाव ,वनघन कूप ,चूड़ावल तोपें और जामी मस्जिद है। पनीलम और जामी मस्जिद है। नवधन कूप और आदिपादि बाव का निर्माण आज के मानक के अनुसार सरल नहीं है। जहिर है कि ऊपरकोट के किले में मीठे पानी के लिए कितना प्रयत्न किया गया होगा। जामी मस्जिद रणकदेवी का महल था, जिसे सन् 1570 में महमूद बेगड़ा ने मस्जिद में बदल दिया था। 136×103 फुट लम्बे हाल में कुल ग्रेनाईट पत्थरों के 140 स्तंभ है। महमूद बेगडा ने किले का नाम मुस्तफ़ाबाद रखा था। मध्ययुग में इस क्षेत्र में पुर्तगालियों का प्रभाव बढ़ गया था और उन्हें हटाने के लिए सुल्तान सुलेमानमाह ने 1538 में तुर्की से नीलम और चूडावल दो तोपें मंगवाई थी। ये दो तोपें आज भी किले में है।

रक्षात्मक बिन्दु से जूनागढ़ किले का कभी अपना सामरिक महत्व रहा होगा। किले में बौद्धकालीन गुफाएं है और प्रियदर्शी अशोक के 14 शिलालेख (257 ई.पू.) इतिहास की अनुपम निधि है। शिला लेख में खुदे शब्द नीति व धर्म विषयक हैं , जिन्हें 4-15 पंक्तियों में लिखा गया है। प्रत्येक पंक्ति में 25 अक्षर है। ऐसे शिलालेख शाहबाज गढ़ी (पेशावर पाकिस्तान), येरागढी (कुर्नूल), जोगुड़ा व धौली (उड़ीसा) में भी मिले है। इससे स्पष्ट है कि यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य में विशिष्ट स्थान रखता था। इन्हीं लेखों पर छत्रप रुद्रदामन (150 ई) और सम्राट स्कन्दगुप्त (459 ई.) द्वारा पुनर्निमाण का जिक्र है और ये ग्रेनाईट गोलाश्मों पर खुदे है। विभिन्न गुफाओं के तोरण -द्वारों पर नक्काशी और खम्भों पर अलंकरण के काम को देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है।

ऊपरकोट में बौद्ध गुफाओं के अलावा राजपूती महल, कूप, दामोदर कुण्ड तथा मुसलमान शासकों के शिलालेख है। आसपास गिरनार पहाड़ी पर जैन मंदिरों का समूह, अम्बा माता का प्राचीन मंदिर और अनेक ऐसे रमणीक स्थल है, जिन्हें देखकर पर्यटक अतीत में खो जाता है। अब किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सरंक्षण में है।

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रपदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

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