जदुवंशियों के प्राचीन राज्य शूरसेन प्रदेश के इतिहास का पौराणिक अध्ययन—–

जदुवंशियों के प्राचीन राज्य शूरसेन प्रदेश के इतिहास का पौराणिक अध्ययन —

वर्तमान मथुरा तथा उसके आस –पास का प्रदेश ,जिसे अब ‘ब्रज ‘ कहा जाता है ,प्राचीन काल में यह ‘शूरसेन प्रदेश या जनपद के नाम से प्रसिद्ध था |इसकी राजधानी मधुरा या मथुरा नगरी थी |
शूरसेन जनपद आरम्भ से ही महाजनपद के रूप में विकसित हुआ था |उसके राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास की प्रभाव पूर्ण छाप समस्त उत्तर भारत के इतिहास पर भी पड़ी |इस प्रभाव के तीन व्यापक क्षेत्र है –धर्म ,कला और भाषा |धर्म के क्षेत्र में शूरसेन जनपद की महती देन समन्वय –प्रधान द्रष्टिकोण है ,जिसे एक सूत्र में भागवती दृष्टि  भी कह सकते है |भगवान वासुदेव श्री कृष्ण को महाविष्णु का अवतार मान कर  और उन्ही में  रख कर उनके साथ अनेक देवी –देवताओं के समन्वय का प्रतिपादन किया गया |शूरसेन जनपद में जो यज्ञ पूजा ,नागपूजा और मातृदेवी की पूजा प्रचलित थी ,उन तीनों को स्वीकार करते हुए ,उन्हें विष्णु की ही विभूति कहकर ऊँचे धरातल पर मान्यता प्रदान की गई |गोवर्धन पूजा के रूप में गिरिमह, इन्द्र पूजा के रूप में इन्द्रमह और यमुना पूजा के रूप में नदीमह नामक प्राचीन उत्सव प्रचलित थे |उन तीनों का समन्वय भी भागवत मान्यता के साथ मथुरा में सम्पन्न हुआ |इसी प्रकार बौद्ध ,हिन्दू और जैन –इन तीनों धर्मों की त्रिवेणी भी पारस्परिक विरोध को छोड़ कर समन्वय और संप्रीति के साथ शूरसेन जनपद में लगभग एक सहस्त्र वर्ष तक साथ –साथ प्रवाहित हुई और पारस्परिक आदान –प्रदान से एक –दुसरे को हितसंवर्धन करती रही |इन्हीं तीनों धर्मों के अनुसार पल्लवित होने वाली जैन ,बौद्ध और ब्राह्मण कलाएं भी मथुरा-कला के अंतर्गत पूर्ण विकास को प्राप्त हुई |उन्होंने जिस सौन्दर्य –लोक की सृष्टि की उसमें एक ओर धर्म की उद्दात साधना हमें मिलती है ,दुसरी ओर स्त्री –पुरुष की सुन्दरतम रूपों की अनुपम अपरिमित  सृष्टि |न केवल कलाओं के क्षेत्र में ,बल्कि जीवन –साधन के त्रिविध उपायों का भी शूरसेन जनपद में एक समान महत्व था |गौ –वंश की रक्षा ,हलधर बलराम की कृषि ,और उदीच्च और प्राच्य के बीच में वाणिज्य का अक्षरय भण्डार –ये तीनों मथुरा की जीवन की विशेषताएं थीं |पाटिलपुत्र ,कौशाम्वी और साकेत से आने वाले सार्यवाह मथुरा में मिलते थे और दुसरी ओर कपिशा ,तक्षशिला और शाकल से आने वाले उदीच्च सार्यवाह मथुरा में पहुँच कर अपनी वस्तुओं का व्यापारिक आदान –प्रदान करते थे |

शूरसेन प्रदेश का नामकरण —–

ब्रज की प्राचीन संज्ञा  “शूरसेन प्रदेश ” थी।मथुरा के आस –पास इस राज्य का प्राचीन नाम ‘शूरसेन ‘ प्रदेश मिलने के विषय में इतिहासकारों के अलग –अलग मत है |यह नाम किस व्यक्ति विशेष के कारण पड़ा , यह विचारणीय है।पुराणों की वंश -परम्परा सूचियों को देखने से पता चलता है कि शूर या शूरसेन नाम के कई व्यक्ति प्राचीन काल में हुए ।
मथुरा के प्रसिद्ध इतिहासकार श्री कृष्णदत्त जी बाजपेयी का मत है कि इस प्रदेश का यह नाम शत्रुघ्न जो श्री राम के छोटे भाई थे ,उनके पुत्र शूरसेन के नाम पर पड़ा , जो कदाचित अपने बड़े भाई सुबाहु के बाद यहाँ का राजा हुआ |मथुरा के निर्माण के समय देवताओं ने शत्रुघ्न जी को वरदान दिया था कि यह नगरी ‘’शूरसेना ‘’ वाले राजाओं की राजधानी होगी |बाल्मीकि जी ने उक्त कथन को श्री बाजपेयी जी ने अपने मत के समर्थन का अस्पष्ट संकेत समझा है |लेकिन इस विषय में श्री बाजपेयी जी का कथन सत्य नहीं है |बाल्मीकि रामायण में ही लिखा गया है कि इस प्रदेश पर शूरसेन नाम शत्रुघ्न तथा उनके पुत्रों का इससे सम्बन्ध होने से पूर्व ही प्रसिद्ध हो चुका था |अंगद जब सीता जी की खोज के लिए वानर सेना को जिन प्रदेशों में जाने के लिए कहा था ,उसमें  ‘’शूरसेन ‘’का भी नाम का उल्लेख हुआ है |शत्रुघ्न के पुत्र का रामायण में नाम शत्रुघाती  लिखा गया है ,न कि शूरसेन ,शत्रुघ्न जी ने उसे वैदिस का राज्य [आधुनिक विदिशा ] दिया था |कालिदास कृत रघुवंश में शत्रुघाती को मथुरा तथा सुबाहु को विदिशा का राज्य दिए जाने का उल्लेख किया गया है ,किन्तु उसमें भी शूरसेन का नामोल्लेख नहीं है |इससे यह प्रमाणित होता है कि शत्रुघ्न ने मथुरा नगरी की स्थापना अवश्य की थी ,किन्तु इस प्रदेश का नाम शूरसेन उससे पूर्व ही पड़ चुका था |शत्रुघ्न जी कम से कम 12 वर्ष मथुरा नगरी एवं आस -पास के प्रदेश के शासक रहे ।यह नाम किस यदुवंशी राजा शूरसेन के नाम पर पड़ा या प्रसिद्ध हुआ ,यह विषय विचारणीय एवं मंथनीय है |
दुसरे मत के अनुसार शूरसेन प्रदेश का नाम श्री कृष्ण जी के पितामह शूरसेन के नाम पर पड़ा जो कई प्रकार से संभव नहीं हो सकता –
1 – श्री कृष्ण जी के परदादा शूरसेन जी और शत्रुघ्न के पुत्र शूरसेन में भी लगभग 400 वर्षों का अंतर पाया जाता है। जब कि जनपद का नाम शत्रुघ्न के पुत्र शूरसेन से भी पूर्व प्रचलन में था |
2 – वसुदेव जी के पिता शूरसेन जी  उग्रसेन के समकालीन  थे |उस समय इस मंडल पर कई पीढीयों पूर्व से ही अन्धक वंशियों का शासन रहा है |शूरसेन वृष्णि यादव थे जिनका शासन वटेश्वर में होना पाया गया है |इस लिए उनके नाम पर इस प्रदेश का नामकरण होना संभव प्रतीत नहीं होता |
यदुवंशियों के एक प्राचीन हैहय वंश में राजा कार्तवीर्य अर्जुन या सहत्रार्जुन हुए उनके सौ  पुत्र थे , जो परशुराम ने युद्ध में मार डाले थे जिनमें केवल पांच पुत्र ही बचे थे उनमें एक शूरसेन भी थे |लिंग पुराण में लिखा है कि उसी शूरसेन के नाम पर इस प्रदेश का नाम ‘’ शूरसेन ‘’ प्रसिद्ध हुआ था ,जो सत्य प्रतीत होता है |
जनपद का शूरसेन नाम प्राचीन लेखकों , हिन्दू , बौद्ध एवं जैन साहित्य में तथा यूनानी लेखकों के वर्णनों में मिलता है।मनुस्मृति में शूरसेन को ” ब्रहर्षि देश ” के अंतर्गत माना है।प्राचीन काल में ब्रहावर्त तथा ब्रहर्षिदेश बहुत पवित्र समझा जाता था।और यहां के निवासियों का आचार-विचार श्रेष्ठ एवं आदर्शरूप माना जाता था।ऐसा प्रतीत होता है कि शूरसेन देश की संज्ञा लगभग ईस्वी सन के आरम्भ तक जारी रही।जब इस समय से यहां विदेशी शक-क्षत्रयों तथा कुषाणों का प्रभुत्व हुआ , सम्भवतः तभी से जनपद की संज्ञा उसकी राजधानी के नाम पर  “मथुरा ” हो गई।तत्कालीन तथा उसके बाद के जो अभिलेख मिले हैं उनमें मथुरा नाम ही मिलता है शूरसेन नहीं ।साहित्यक ग्रंथों में भी अब शूरसेन के स्थान पर मथुरा नाम मिलने लगा है।
इस परिवर्तन का मुख्य कारण यह हो सकता है कि शक-कुषाण कालीन मथुरा नगर इतनी प्रसिद्धि प्राप्त कर गया था कि लोग जनपद या प्रदेश के नाम को भी मथुरा नाम से पुकारने लगे होंगे और धीरे -धीरे जनपद का नाम शूरसेन नाम जन-साधारण के स्मृति -पटल पर से उतर गया होगा ।प्राचीन काल में यदुवंशी राजा शूरसेन का होना भी श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध , अध्याय 1 में श्लोक 27 एवं 28 में इस प्रकार वर्णित है ।
शूरसेनो यदुपतिर्मथुराभावसन पूरीम ।
माथुराजछुर सेनाश्च  विषयान बुभुजे पुरा।। 27
राजधानी तत: साभूत सर्वयादव भुभुजाम ।
मथुरा भगवान यत्र नित्यं संनिहतो हरि:।।28

वे मथुरापुरी में रहकर माथुरमण्डल और शूरसेन मण्डल का राज्यशासन करते थे।उसी समय से मथुरा समस्त यदुवंशी नरपतियों की राजधानी हो गयी।भगवान श्रीहरि  सर्वदा वहां विराजमान रहते हैं ।यदुवंशियों का शूरसेन प्रदेश तथा मथुरा से घनिष्ठ सम्बन्ध प्राचीन काल से ही रहा है।इस श्लोक से  इस्पष्ट हो जाता है कि दोनों मण्डल अलग -अलग नाम से एक ही थे और इनका शासक भी एक ही था , और यह भी स्पष्ट है कि शूरसेन जनपद शत्रुघ्न जी के पुत्र शूरसेन तथा  श्री कृष्ण के दादा शूरसेन से पूर्व बसा था।

शूरसेन जनपद की सीमायें —–

शूरसेन जनपद की सीमायें समय –समय पर बदलती रही है |कालांतर में मथुरा नाम से ही जनपद अधिक प्रसिद्ध हुआ |6 वीं शताब्दी में जब चीनी यात्री हुएनसांग भारत आया था तब उसने लिखा है कि मथुरा राज्य का विस्तार 5 , 000 ली [ लगभग 833 मील ],था |इस वर्णन से पता चलता है कि 7 वीं शताब्दी में मथुरा राज्य के अंतर्गत वर्तमान मथुरा –आगरा जिलों  के अतरिक्त आधुनिक गुडगाँव ,भरतपुर ,आधा भाग अलवर ,करौली ,धोलपुर तथा उपर के मध्य भारत का उत्तरी लगभग आधा भाग [ग्वालियर ] रहा होगा |दक्षिण -पूर्व में मथुरा राज्य की सीमा जैजाक भुक्ति ( जिझौति ) की पश्चिमी सीमा से तथा दक्षिण -पश्चिम में मालव राज्य की उत्तरी सीमा से मिलती रही होगी। इसके बाद 7 वीं शताब्दी के समय में मथुरा राज्य की सीमायें घटती गयी |इसका प्रधान कारण समीप के कन्नौज राज्य की उन्नति थी ,जिसनें मथुरा तथा अन्य पड़ोसी राज्यों के बड़े भू –भाग पर कब्जा कर अपने राज्य में सम्मलित कर लिया |

प्राचीन साहित्यिक उल्लेखों के अनुसार शूरसेन जनपद या मथुरा प्रदेश के उत्तर में कुरुदेश (आधुनिक दिल्ली और उसके आस-पास का प्रदेश) था जिसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर थी।दक्षिण में चेदि राज्य(आधुनिक बुन्देलखण्ड तथा उसके समीप का कुछ भाग ) था जिसकी राजधानी सुक्तिमती नगर थी।पूर्व में पांचाल राज्य (आधुनिक रुहेलखण्ड )था जो दो भागों में विभक्त था -उत्तर पांचाल तथा दक्षिण पांचाल राज्य ।उत्तर पांचाल राज्य की राजधानी अहिच्छत्र(आधुनिक बरेली जिले में वर्तमान रामनगर ) और दक्षिणी पंचाल राज्य की राजधानी काम्पिल्य (आधुनिक कंपिल , जिला फरुक्खवाद ) थी ।शूरसेन के पश्चिम वाला जनपद मत्स्य राज्य (आधुनिक अलवर रियासत एवं जयपुर का पूर्वी भाग )था जिसकी राजधानी विराट नगर (आधुनिक वैराट ,जयपुर में ) थी।
आजकल मथुरा नगर सहित वह भू –भाग जो श्री कृष्ण के जन्म और उनकी विशेष लीलाओं से सम्बन्धित है , ‘’ब्रज ‘’ कहलाता है |इस प्रकार ’’ ब्रज ” आधुनिक मथुरामंडल तथा प्राचीन शूरसेन प्रदेश का अपर नाम और उसका एक छोटा रूप है |इसमें  मथुरा ,वृन्दावन ,गोवेर्धन ,गोकुल ,महावन ,बलदेव ,नंदगाँव ,वरसाना ,डींग तथा कामवन आदि श्री कृष्ण के सभी लीला स्थल सम्मलित हैं |इस ब्रज को चौरासी कोस माना जाता है |

ब्रज जनपद

“ब्रज ” अत्यंत प्राचीन जनपद है।यह सदा से एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में प्रसिद्ध रहा है।यद्यपि यह समय -समय पर विभिन्न नामों से बोला एवं लिखा जाता रहा है , जैसे मध्यदेश , ब्रहर्षिदेश , शूरसेन प्रदेश ,मथुरामण्डल ,ब्रज , ब्रज जनपद, अथवा ब्रजमंडल , ब्रजभूमि आदि।
ब्रज भक्ति विलास ग्रंथ में ब्रज की सीमा की एक श्लोक लिखी है ।विद्वान उसको आधार मानकर ब्रज की सीमाएं निर्धारित करते हैं ।
पूर्व हास्यवनं नीव पश्चिमस्यो पत्तारिक।
दक्षिण जहु संज्ञाकं भुवनाख्यं तथोत्तरे ।।
मथुरा के ब्रिटिश कलेक्टर एस0 एस0 ग्राउस ने अपनी पुस्तक “मथुरा -ए डिस्ट्रिक्ट मेमोयर”  में भी उनके एक दोहे के माध्यम से सीमाओं के नाम बताए हैं।
इत वरहद ,उत सोनहद,इत शूरसेन को गांव ।
ब्रज चौरासी कोस में , मथुरा मण्डल धाम।।

ग्राउस के इस दोहे के अनुसार ब्रज पूर्व में हास्यवल (अलीगढ़ जिले के बरहद गांव ) , पश्चिम में उपहारवन (सोन , गुणगांव ) ,दक्षिण में जट्टवन (वटेश्वर गांव ) ,उत्तर में भुवनवन (भ्रषण वन , शेरगढ़ ) फैला हुआ है।

मथुरा (मधुरा ,मधुपुरी ,मधुवन ) की स्थापना एवं महात्म्य ——-

पूर्व काल में ब्रह्मा जी ने मथुरा में आकर निराहार रहते हुए सौ दिव्य वर्षों तक तपस्या की |उस समय वे परम ब्रह्म श्री हरि के नाम का जप करते थे |इससे उन्हें स्वयम्भू मनु जैसे प्रवीण पुत्र की प्राप्ति हुई |सतीपति देव वर भूतेश मधुवन में एक सौ दिव्य वर्षों तक तप करके श्री कृष्ण की कृपा से तत्काल मथुरापुरी और माथुर मंडल के क्षेत्रपाल हो गये |इंद्र ने मथुरा में तप करके इंद्रपद ,सूर्य ने तप करके वैवस्वतमनु –जैसा पुत्र ,कुबेर ने अक्षयनिधि ,वरुण ने पाश और ध्रुव ने मधुवन में तप करके सम्यक ध्रुवपद प्राप्त किया |
यहीं तपस्या करके ऐक्ष्वाक वंशी राजा अम्बरीश ने मोक्ष पाया |राम ने अक्षय शक्ति एवं लवण से विजय प्राप्त की |राजा रघु ने सिद्धि पायी तथा इसी मधुवन में तप करके चित्रकेतु ने अभीष्ट फल प्राप्त किया था |यहीं के सुन्दर मधुवन में तप करके अत्यंत बलिष्ठ हुए महासुर मधु ने माधव मास में मधुसुदन माधव के साथ युद्ध –भूमि में जाकर युद्ध किया |सप्तऋषियों ने मथुरा में आकर यहीं तपस्या करके योगसिद्धि प्राप्त की |पूर्व काल में अन्य ऋषियों ने भी यहाँ तप करके सर्वतोमुखी सफलता पायी थी और गाकर्ण नामक वैश्य ने भी यहाँ तप करके महानिधि उपलब्ध की थी |इसी शुभ मधुवन में लोकरावण ने तपस्या करके स्वर्ग के देवताओं पर विजय पायी तथा राक्षसों को अधिकारी बना कर मंदिर –निर्माण करके लंका में प्रतिष्ठित हो बड़ी सोभा प्राप्त की |इसी सुंदर मधुवन में तपस्या करके हश्तिनापुर के राजा शांतनु ने अत्यंत साधु-शिरोमणि तथा तत्वार्थसागर के कर्णधार भीष्म को पुत्र रूप में प्राप्त किया था |
मथुरा का इतिहास बहुत पौराणिक है |प्रलय काल में जब धरा जलमग्न हो गयी उस समय भी मथुरा मंडल नहीं डूबा |भगवान वराह ने इसे पलेप्डपि न महता कहा है |इस प्रलय रहित भूमि से ही पुनः देव और ऋषि सृष्टि का विस्तार हुआ |वराह भगवान ने पातल से प्रथ्वी का उद्धार कर उसकी पुनर्स्थापना मथुरा में की थी ,इस लिए इसे आदिवराह क्षेत्र भी कहा जाता है |
मधुपुरी की थाह पाने के लिए मधु से परिचय जरूरी है |सतयुग के अंत में ,मधु नामक धार्मिक व न्यायप्रिय यदुवंशी शासक यहाँ राज्य करता था ,इस लिए यह भूतल पर मधुवन या मधुपुरी के नाम से विख्यात हुई |
वाल्मीकि रामायण का उत्तरकाण्ड मथुरा के निर्माण व निर्माता की गौरव शाली कथा को वर्णित कर रहा है |यदुवंशी राजाओं के वंश क्रमानुगत वर्णन के अतरिक्त इस वंश के इतिहास की कुछ उन घटनाओं का उल्लेख करना आवश्यक है जिनका सम्बन्ध इनके समसामयिक ऐक्ष्वाकु वंशी राजाओं से है |

यमुना तट प्रदेश (शुरसेन )के प्राचीन राजवंश–

मनु के कई(10) पुत्र हुए ,जिन्होंने भारत के विभिन्न भागों पर राज्य किया |बड़े पुत्र ऐक्ष्वाकु थे, जिन्होंने मध्यदेश में अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया |अयोध्या का राजवंश मानव वंश या सूर्य वंश का प्रधान वंश हुआ और इसमें अनेक प्रतापी राजा हुए |
मनु के दूसरे पुत्र नाभाग हुए और उनके लिए कहा गया है कि इन्होने तथा इनके वंशजों ने यमुना तट पर राज्य किया |यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है कि नाभाग और उनके उत्तराधिकारियों ने कितने प्रदेश पर और किस समय राज्य किया |
मनु की पुत्री इला जो चन्द्रमा के पुत्र बुद्ध को ब्याही थे उससे पुरुरवा का जन्म हुआ और इस पुरुरवा ऐल  चन्द्रवंश  चला ।इसी चन्द्रवंश को ऐल वंश भी कहते हैं ।सूर्य वंश की तरह चन्द्रवंश का विस्तार बहुत बढा और धीरे-धीरे उत्तर तथा मध्यभारत के विभिन्न प्रदेशों में इनकी शाखाएं स्थापित हुई।चन्द्रवंश में ययाति भारत के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट हुए ।जिन्होंने  अपने पुत्र द्रुहयू को यह यमुना तट के प्रदेश को दिया जो शूरसेन के नाम से बाद में जाना गया।इस प्रकार भोजगण शूरसेन प्रदेश के प्रथम ज्ञात शासक कहे जाते हैं।यदुवंश में शशिविन्दु एक प्रतापी राजा हुए जिन्होंने द्रुहा वंशी भोजों को पराजित करके उनके राज्य पर अधिकार कर लिया।इस प्रकार शूरसेन प्रदेश भी यदुवंशियों के शासन में आ गया ।शशिविन्दु के बाद यादवों का विख्यात राजा मधु हुआ।पुराणों के अनुसार उसका शासन शुरसेन से आनर्त (उत्तरी गुजरात ) तक के विशाल भू-भाग पर था।

मधुवन के  यदुवंशी राजा मधु एवं उसके  पुत्र लवण का वृतांत —

यदु वंश की हैहय शाखा जो दक्षिण में महिष्मती में शासन कर  रही थी उसमें ही कार्तवीर्य अर्जुन [सहस्त्रबाहु ] एक बहुत प्रतापी राजा  हुआ था ,जिसने रावण जैसे योद्धा को बंदी बना लिया था जिसका वध परशुराम ने किया था ।उसका एक पुत्र मधु भी था |यह संभवत वही यदुवंशी मधु था जिसके नाम पर इस वंश को ‘’माधव ‘’वंश भी कहा गया ,जो मधुवन पर राज्य करता था |यदुवंशियों में मधु एक प्रतापी व धार्मिक शासक मना जाता है |यह चन्द्रवंश की 61 वीं पीढी [ ज्ञात नामों के अनुसार 44 वीं पीढी ]में हुआ और ऐक्ष्वाकु वंशी राजा दिलीप द्वितीय अथवा उसके उत्तराधिकारी दीर्घवाहू का समकालीन था |कुछ पुराणों  के अनुसार मधु गुजरात से लेकर यमुना तट तक के बड़े भू –भाग का स्वामी था ।सम्भवतः इसी मधु ने अनेक स्थानों पर विखरे यादव राज्यों को सुसंगठित किया |पुराणों में वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में जैसा कि पूर्व में बताया गया है मधु के सम्बन्ध में जो विभिन्न वर्णन मिलते है ,उनसे बड़ी भ्रान्ति पैदा हो गई है |प्रायः मधु के साथ ‘’असुर ,दैत्य ,दानव आदि विशेषण मिलते है ,साथ ही अनेक पौराणिक वर्णनों में यह भी आया है कि मधु बड़ा धार्मिक एवं न्याय प्रिय शासक था |उसके पुत्र का नाम  ‘’लवण ‘’ दिया है |लवण को अत्याचारी कहा गया है ,इसी लवण को मार कर अयोध्या नरेश श्री राम के भाई शत्रुघ्न ने उसके प्रदेश पर अपना अधिकार जमाया था |

पुराणों एवं बाल्मीकि रामायण में मधु और लवण की कथा विस्तार  से दी हुई है |उसके अनुसार मधु नाम पर मधुपुर या मधुपुरी नगर यमुना तट पर वसाया गया |इसके आस –पास का घना वन ‘’मधुवन ‘’ कहलाता था |मधु को यमुना तीर निवासी च्यवन आदि ऋषियों ने सतयुग में ‘’लोला ‘’ नामक असुर का ज्येष्ठ पुत्र लिखा है और उसे ब्राह्मण भक्त ,धर्मात्मा ,बुद्धिमान ,शरणागतवत्सल तथा परोपकारी कहा गया है |मधु एकाग्रचित होकर धर्म के अनुष्ठान में लगा रहता था |उसने भगवान शिव की आराधना करके अमोघ त्रिशूल प्राप्त कर रखा था |मधु ने महादेव से उस त्रिशूल को अपने वंशजों के पास रखने का वरदान भी पा लिया था |मधु की पत्नी कुभीनसी विश्वावसु की संतान थी |उसका जन्म अचला के गर्भ से हुआ था |

लवण का जन्म ——

मधुवन के शासक मधु के कुभीनसी के गर्भ से लवण नामक पुत्र का जन्म हुआ | लवण बचपन से ही दुराचार में लिप्त था |बेटे की दुष्टता को देख कर मधु इस देश को छोड़ कर समुद्र में रहने के लिए चला गया और उसने अपना त्रिशूल लवण को दे दिया |लवण त्रिशूल के माध्यम से अपनी दुष्टता के कारण तीनों लोकों की विशेषतः  तपस्वी मुनियों को बहुत संताप दे रहा था |इस पर दुखी होकर एक दिन यमुना तट पर रहने वाले समस्त मुनिजन लवण से भयभीत होकर अयोध्या के राजा श्री रामचन्द्र जी के दर्शन करने की इच्छा से अयोध्या आये |वे अगणित मुनिजन भृगु पुत्र मुनि श्रेष्ठ च्यवन को आगे कर भगवान राम से अभय लाभ करने की इच्छा से आये थे |रघुकुल श्रेष्ठ रामचन्द्र जी को ऋषियों ने सभी बातें बतलाई और उनसे प्रार्थना की कि लवण के अत्याचारों से लोगों को शीघ्र छुटकारा दिलाया जाय |
शत्रुघ्न जी ने भगवान राम से लवण को मारने के लिए मधुपुरी जाने का आग्रह किया |प्रभु आप की कृपा से मैं उस दैत्यरूपी मधु पुत्र लवण को अवश्य मार डालूंगा |शत्रुदमन श्री राम जी ने शत्रुघ्न को अपनी गोद में उठा लिया और कहा –‘’मैं आज ही तुम्हारा [लवण की राजधानी ] मथुरा के राज्य पर अभिषेक करूंगा |ऐसा कह लक्ष्मण जी से अभिषेक की सामग्री मंगा शत्रुघ्न जी की इच्छा न होने पर भी श्री राम जी ने उनका प्रातिपूर्वक अभिषेक कर दिया ,फिर उन्हें दिव्य वाण  देकर कहा – कि तुम संसार के कण्टकरूप लवण को इस वाण से मार डालना |लवण अपने घर में ही त्रिशूल की पूजा कर नाना प्रकार के जीवों को खाने व मारने के लिए वन को जाया करता है |अतः जब तक वह  लौट कर घर नहीं आवे ,वन ही में रहे ,उससे पूर्व ही तुम नगर के द्वार पर धनुष –धारण कर खड़े हो जाना ,लौटने पर क्रोधपूर्वक तुम से लडेगा और उसी समय मारा जायगा |इस प्रकार महाक्रूर लवण को मारकर उसके मधुवन में नगर वसा कर मेरी आज्ञा से वहीं रहो ।ऐसा कह कर श्री राम ने शत्रुघ्न को आशीर्वाद से अभिनंदन कर उन्हें मुनियों सहित विदा किया |शत्रुघ्न जी ने प्रभु श्री राम जी की आज्ञानुसार जैसा कहा वैसा ही किया |उन्होंने मधु पुत्र लवण को मार कर ‘’मथुरापुरी ‘’बसाई और दान –मान से [लोगों को संतुष्ट कर ] उन्होंने मथुरा को एक सम्रद्ध शाली नगर बना दिया |
चन्द्रवंश की 61 वीं पीढी में हुआ उक्त मधु ,तथा लवण –पिता मधु एक ही थे अथवा नही ,यह विवादास्पद है |पुराणों आदि की तालिका में पूर्वोक्त मधु के पिता का नाम देवन तथा पुत्र का नाम पुरुवश दिया हैऔर इस मधु को अयोध्या नरेश रघु के पूर्ववर्ती दीर्घवाहू का समकालीन दिखाया गया है  न कि राम या दशरथ के समकालीन |इससे तथा पुराणों के हर्यश्व –मधुमती उपाख्यान से भाषित होता है कि संभवत यदुवंशी मधु तथा लवण पिता मधु एक न व्यक्ति थे |इसमें संदेह नहीं कि लवण एक शक्तिशाली शासक था |शत्रुघ्न ने मथुरा पर 12 वर्ष स्वयं राज्य किया | जब अयोध्या के अपने कुल का नाश का समाचार दूतों द्वारा सुनकर तुरंत शत्रुघ्न जी ने अपने दोनों पुत्रों को बुलाया और उनमे से महाबली सुबाहु को मथुरा के और यूपकेतु को विदसा नगरी के राज्य पर अभिविक्त कर स्वयं बड़ी शीघ्रता से रघुनाथ जी के दर्शन के लिए अयोध्या चले आये |
कुछ पुराणों में शत्रुघ्न के पुत्र शूरसेन को मथुरा का शासक लिखा है जो सही सिद्ध नही होता | कुछ ग्रंथों में शत्रुघ्न के पुत्र का नाम शत्रुघाती लिखा है जो विदिसा का शासक कहा गया है | जैसा कि पूर्व में  बताया जा चुका है | कुछ इतिहासकारों का मत है कि उसी शत्रुघ्न पुत्र शूरसेन के नाम पर मथुरा प्रदेश का नाम शूरसेन प्रदेश पड़ा | लिंग पुराण के आधार पर यह सिद्ध होता है कि इस प्रदेश का नाम कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन  हैहयवंशी राजा के पुत्र शूरसेन के नाम पर पड़ा | मधुवन का राजा मधु भी इसी सहस्त्रार्जुन  का एक पुत्र भी था  जो धर्मात्मा था  और उसके नाम पर इस प्रदेश का नाम मधुवन या मधुपुरी पड़ा हो या तालजंघ के वंश में भी उसका एक पुत्र मधु था | रामायण में असुर लिखा है | परन्तु प्राचीनकाल में राक्षसों की संस्कृति भी बड़ी समुन्नत थी, उनमे भी अनेक धर्मात्मा और सत्यपरायण लोग हुए हैं | प्रहलाद और बलि आदि शुभ -चरित्र वाले व्यक्तियों की उत्पत्ति भी असुर वंश में हुई थी | मधु भले ही असुर संस्कृति  का मानने वाला हो वह  था तो यदुवंशी  क्षत्रिय ही | मधु की नगरी मधुपुरी के जो वर्णन प्राचीन साहित्य में मिलते हैं उनसे ज्ञात होता है की उस नगरी का स्थापत्य उच्च कोटि का था | शत्रुघ्न भी उस रम्य पूरी को देख कर चकित हो गये और अनुमान करने लगे की वह देवों के द्वारा निर्मित हुई होगी |

शौरीपुर (वर्तमान वटेश्वर ) –

वृष्णि वंश में शूरसेन जो वसुदेव के पिता थे | उन्होंने अपने नाम पर शौरिपुर (वर्तमान वटेश्वर )में अपना प्रथक राज्य स्थापित किया था | यह शूरसेन महाराज अंधक वंशी उग्रसेन के समकालीन थे | यह पौराणिक एवं धार्मिक स्थल है | ज्ञान, योग , कर्म के अधिष्ठाता भगवान श्रीकृष्ण के पितामह महाराज शूरसेन की यह नगर राजधानी थी | वृष्णि शाखा के  यादव यही राज्य करते थे  जिसके अधिपति वसुदेव जी थे | यह नगर कालांतर में यमुना के तट पर स्थित था जो आज तीन भागों में – शौरीपुर – वटेश्वर – रपडी में विभक्त हो गया | यह भदावर क्षेत्र का सर्वाधिक चर्चित पौराणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक सिद्ध क्षेत्र और तीर्थ स्थल है | यह कभी विशाल नगरी थी | यमुना, चम्बल और ऊंटगन नदियों के मध्य ऊँची नीची कगारों पर बसे शौरीपुर- वटेश्वर को देखकर कौन कह सकता है कि यह शूरसेन साम्राज्य की वैभवपूर्ण राजधानी होगी ।
संदर्भ–
1-प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग -लेखक सत्यकेतु विद्यालंकार
2-ब्रज के धर्म -सम्प्रदायों का इतिहास -डा0 प्रभुदयाल मीतल ।
3-ब्रज का इतिहास (भाग 1, 2 -डा 0 कृष्णदत्त वाजपेयी ।
4-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास -प्रभुदयाल मीतल ।

5-प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति -डा0 कृष्ण चंद श्रीवास्तव ।

6-मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास – प्रोफेसर चिंतामणि शुक्ल ।
7-प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य -लेखक बाबू वृन्दावनदास ।
8-पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ ऐशियन्ट इंडिया पंचम संस्करण कलकत्ता ,1950, -राय चौधरी  ,
9-ग्रॉउज -मेम्बायर द्वियीय संस्करण इलाहाबाद ,1882 ।
10-कनिघम -आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया -एनुअल रिपोर्ट जिल्द 20 (1882-83 ) .।
11-मथुरा के यमुना तटीय स्थलों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास -जयन्ती प्रसाद शर्मा ।

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

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