जदुवंशियों के विविध वंश एवं उनके पौराणिक राज्यों का ऐतिहासिक शोध–

जदुवंशियों के विविध वंश एवं उनके पौराणिक राज्यों का ऐतिहासिक शोध —-

ऐल-वंश के प्रतापी राजा ययाति जो भारत के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट थे उनके पांच पुत्र थे , जिन सभी ने आर्य-जाति की शक्ति का दूर -दूर तक विस्तार किया , और अपने पृथक -पृथक राज्य स्थापित किये।ये पांचों -यदु ,तुर्वसु ,द्रुहा अनु और पुरु -वंशकर राजा थे । ये पांचों पौराणिक अनुश्रुति में बहुत प्रसिद्ध हैं ।

यदोस्तु यादवा जाता स्तुर्वसोर्यवना :स्मृताः।
द्रुहा: सुतास्तु वैभोजा अनोस्तु म्लेच्छ जातय:।।(महा भा0 ,1,85 ,34)

महाभारत के अनुसार यदु अपने सब भाइयों में प्रतापी निकला उसके वंशज ” यादव” नाम से प्रसिद्ध हुए । तुर्वसु से यवन , द्रुहा से भोज तथा अनु से म्लेच्छ जातियों का आविर्भाव हुआ।
पुरु प्रतिष्ठान (आधुनिक प्रयाग ) का राजा बना , और उसी के नाम पर प्रतिष्ठान का ऐल -वंश अब पौरव कहाने लगा जिसमे बाद में कौरव एवं पांडव हुए ।
यदु द्वारा यादव वंश का प्रारम्भ हुआ ।यदु को चर्मवती (चम्बल ) वेत्रवती (वेतवा ) तथा शुक्तिमती ( केन) , का तटवर्ती प्रदेश मिला और इन नदियों की घाटियों में अपने राज्य की स्थापना की थी। इसके वंशज ” यादव ” कहलाये जिन्हें आधुनिक समय में जादों , भाटी तथा जडेजा राजपूत कहते हैं जो बाद में पुनः विभिन्न उपशाखाओं में विभाजित हो गये।
तुर्वसु को प्रतिष्ठान के दक्षिणी -पूर्व का भूभाग मिला।
दुहा को उत्तर-पश्चिम का भूभाग मिला।
अनु को गंगा -यमुना दोआब का उत्तरी भाग तथा पूर्व का कुछ प्रदेश जिसकी सीमा अयोध्या राज्य से मिलती थी मिला।
यादवों के कालान्तर में अपने केन्द्र दशार्ण , विदर्भ , अवन्ती और माहिष्मती में स्थापित कर लिए।
यदु के बाद उसका पुत्र कोष्ट्रा एकाष्टि प्रधान यादव शाखा का अधिकारी हुआ ।उनके जिन वंशजों के नाम मिलते है उनमें स्वाहि , रुषगद , चित्ररथ , और शशिविन्दु प्रमुख हैं । यदु के वंश में आगे चलकर शशिविन्दु नाम का एक चक्रवर्ती प्रतापी राजा हुआ।उसने द्रुहा और पुरु के वंशजों के राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था।पर यादवों की यह शक्ति देर तक कायम नहीं रह सकी।शशिविन्दु ने मान्धाता से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए अपनी पुत्री विन्दुमती का विवाह उसके साथ किया था ।शशिविन्दु ने पुरुओं को भी पराजित कर उन्हें उत्तर -पश्चिम की ओर जाने के लिए विवश किया ।इन विजयों में शशिविन्दु को अयोध्या नरेश मान्धाता से बड़ी सहायता मिली थी ।शशिविन्दु के जमाता मान्धाता ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए दूर -दूर तक विजय यात्रा की थी।मान्धाता के कारण यादव -वंश के राजाओं की शक्ति का विस्तार रुक गया , और शशिविन्दु ने यादवों का जो चक्रवर्ती साम्राज्य बनाना शुरू किया था , वह अपूर्ण ही रह गया ।

मान्धाता के तीन पीढी बाद यादवों को अपनी शक्ति के उत्कर्ष का फिर अवसर मिला।यादवों की एक शाखा हैहय थी , जिसका अन्यतम राजा महिष्मन्त (तेईसवीं पीढी ) पौराणिक अनुश्रुति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।जिसने हैहयों की शक्ति का बहुत विस्तार किया , और अपने नाम से माहिष्मती नगरी की स्थापना की ।
अयोध्या के ऐक्ष्वाकव वंशी सम्राट मान्धाता ने अन्य राज्यों को जीत कर जो विशाल साम्राज्य बनाया था , वह देर तक स्थिर नहीं रह सका ।अयोध्या की शक्ति निर्बल होने पर हैहयों को अपने विस्तार का अवसर मिला , और उन्होंने उत्तरी भारत पर भी अनेक आक्रमण किये ।
महिष्मन्त के उत्तराधिकारी हैहय राजा भद्रश्रेण्य ने पूर्व की ओर आगे बढ़कर काशी (आधुनिक वाराणसी ) को भी विजय कर लिया था । इस शक्तिशाली हैहय वंश में आगे चलकर (महिष्मन्त के लगभग आठ पीढी बाद ) राजा कृतवीर्य हुआ ।उसका पुत्र अर्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन ) महान विजेता था।अनुश्रुति के अनुसार उसने दक्षिण में नर्मदा नदी से लेकर उत्तर में हिमालय तक विजय की थी ।सुदूर दक्षिण का राक्षस राजा रावण भी उसके हाथ से परास्त हुआ था , और कुछ समय के लिए माहिष्मती के दुर्ग में कैद रहा था ।
हैहय शाखा ने राजा महिष्मन्त और बाद में कार्तवीर्य अर्जुन के नेतृत्व में अपनी शक्ति का विस्तार किया । कार्तवीर्य अर्जुन का वध परशुराम द्वारा ही हुआ था , और हैहयों से उन्हें बहुत द्वेष था।परशुराम ने अनेक बार क्षत्रियों का संहार किया था ।परशुराम की वीरता और द्वेष के कारण हैहय क्षत्रियों का बल कुछ समय के लिए मन्द पड़ गया ।पर इसमें कोई संदेह नहीं , कि दक्षिण की ओर आर्य-जाति का विस्तार करने में हैहय वंश ने बहुत कार्य किया ।
पर हैहय लोग अधिक समय तक दबे नहीं रहे ।कीर्तवीर्य अर्जुन के पौत्र तालजंघ के शासन काल में उनके उत्कर्ष का पुनः प्रारम्भ हुआ।तालजंघ अयोध्या के राजा रोहिताश्व (हरिश्चंद का पुत्र ) के समकालीन था ।उसने अपने पितामह के समान ही बहुत से राज्यों को जीतकर अपने अधीन किया ।कान्यकुब्ज का राज्य तालजंघ ने जीत लिया , और उसके वंशजों ने विजय की इस परम्परा को जारी रखा ।जिस प्रकार अयोध्या के राजा रघु के नाम से प्राचीन ऐक्ष्वाकव वंश रघुवंश कहाने लगा था , वैसे ही तालजंघ के नाम से प्राचीन हैहय-वंश भी तालजंघ वंश कहा जाने लगा ।हैहय-तालजंघ वंश की विविध शाखाएं खम्भात की खाड़ी से शुरू कर पूर्व में काशी तक शासन करने लगी , और कुछ समय के लिए आर्य-जाति की यह शाखा भारत की प्रधान राजनीतिक शक्ति बन गई ।
महिष्मती का हैहय वंश यादव वंश की अन्यतम शाखा था ।जिस प्रकार हैहय क्षत्रिय यादव अपनी शक्ति को बढ़ा रहे थे ,वैसे ही यादव-वंश की अन्य शाखाएं भी अपने प्रसार में लगी थी ।
इसी वंश के अन्यतम राजा विदर्भ ने अपने नाम से पृथक राज्य की स्थापना की जिसे आजकल बरार कहते हैं , और जिसका पुराना नाम विदर्भ था । राजा विदर्भ का पौत्र चेदि था ।उसने चम्बल और केन नदियों के बीच में अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की , जो उसके नाम से “चेदि ” कहाया जिसमें आगे शिशुपाल हुआ जो कृष्ण की बूआ का लड़का था जिसको श्री कृष्ण ने ही मारा था ।इसी को आजकल बुन्देलखण्ड कहते हैं ।
आगे चल कर इस विदर्भ देश में मधु नाम का एक शक्तिशाली यादव राजा हुआ , जो बड़ा प्रतापी था।उसने यादव-वंश के विविध राज्यों को मिलाकर एक विशाल चक्रवर्ती राज्य की स्थापना की ।पर यादव -राज्यों की यह एकता अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी।

शशिबिन्दु से लेकर भीम सात्वत तक यादवों की मुख्य शाखा के जिन राजाओं के नाम मिलते हैं वे ये हैं –प्रथश्र्वस , अन्तर , सुयज्वा , उशनस , शिनेपु , मरुत , कम्बलवहिर्ष , रुक्मकवच , प्रराकृत, ज्यामघ , विदर्भ , शकुनि , क्रथ , भीम , कुन्ति , घृष्ट , निवर्त , विदुरथ , करम्भ , देवरात , देवक्षेत्र , देवन , मधु , पुऋवष , पुरुदृनत , जाहु, सात्वत ,तथा भीमसात्वत ।उक्त सूची में यदु और मधु के बीच में होने वाले राजाओं में से किस -किस ने यमुना तटवर्ती प्रदेश पर (जो बाद में शूरसेन प्रदेश कहलाया ) राज्य किया ।यह बताना कठिन है।पुराण आदि में इस सम्बन्ध में निश्चित कथन नहीं मिलते ।पुराणों में कतिपय राजाओं के विषय में यत्र-तत्र कुछ वर्णन अवश्य मिलते हैं पर वे अधूरे ही हैं जैसे उशनस के सम्बंध में आया है कि उसने एक सौ अश्वमेघ यज्ञ किये।

यादवों में विदर्भ सुर्यवंशी राजा सगर का समकालीन था ।विदर्भ अपनी पुत्री सुकेशिनी का विवाह सगर से करके दक्षिण की ओर चला गया ।जहां वह गया उस प्रदेश का नाम विदर्भ पड़ गया।उसके तीन पुत्र थे क्रथ या भीम , कौशिक तथा लोमपाद । क्रथ-भीम को विदर्भ का शासक लिखा है।उसके भाई कौशिक से यादवों के चेदि वंश का आरंभ हुआ।क्रथभीम के वाद विदर्भ का प्रसिद्ध यादव शासक भीमरथ हुआ जिसकी पुत्री दमयन्ती निषादराज नल को ब्याही थी। शशिविन्दु के बाद यादवों का विख्यात राजा मधु था ।वह अत्यन्त प्रतापी , प्रजापालक तथा धार्मिक नरेश था ।पुराणों के अनुसार उसका शासन शुरसेन प्रदेश से लेकर आनर्त (उत्तरी गुजरात ) तक के विशाल भूभाग पर था ।
शशिविन्दु से मधु तक यादवों के जितने राजा हुए उनमें किन -किन का शूरसेन प्रदेश पर अधिकार रहा और उनके शासन में इस प्रदेश की क्या व्यवस्था रही , इसका निश्चित विवरण पुराणों में नहीं मिलता ।मधु के बाद चौथी पीढ़ी में सत्वत नाम का वीर हुआ , जिसने ” सात्वत “नाम से अपना पृथक वंश आरम्भ किया ।सात्वत का पुत्र भीम अयोध्या के ऐक्ष्वाकव वंशी राजा राम एवं उनके पुत्र कुश का समकालीन था।सात्वत वंश के यादव यमुना के पश्चिम में वर्तमान समय के मथुरा प्रदेश में शासन करते थे ।
ऐक्ष्वाकव राम के अनुज शत्रुघ्न ने इस प्रदेश को यदुवंशी राजा मधु के पुत्र लवण से जीत कर अपने अधीन किया।शत्रुघ्न के दो पुत्र थे , सुवाहु और शूरसेन ।कुछ इतिहासकार शत्रुघ्न पुत्र शूरसेन के नाम से मथुरा का समीपवर्ती यह प्रदेश शौरसेन कहाने लगा जो सत्य नहीं है।
कुछ इतिहासकारों का मत है कि इस प्रदेश का नाम शूरसेन देश , श्री कृष्ण के दादा शूरसेन के नाम पर पड़ा था , यह भी सत्य नहीं है ।इस प्रदेश का नाम शूरसेन देश इन दोनों के नामों एवं इनसे पूर्व कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्र शूरसेन के नाम पर पड़ा था जो सत्य प्रतीत होता है।
शत्रुघ्न के पुत्र शूरसेन ने मथुरा पर एवं दूसरे पुत्र सुबाहू ने विदिशा पर शासन किया था।शत्रुघ्न की मृत्यु के बाद उनके पुत्र शूरसेन इस प्रदेश पर अधिक समय तक अपने आधिपत्य को कायम नहीं रख सके ।

लवण के पुत्र सात्वत के पुत्र भीम ने मथुरा में पुनः यादवों की सत्ता को कायम किया ।उसने शत्रुघ्न पुत्र शूरसेन से इस प्रदेश को अधिकृत कर लिया ।भीमसात्वत के समय में मथुरा और द्वारका यादव शक्ति के महत्वपूर्ण केन्द्र बने। भीमसात्वत के अनेक पुत्र थे , जिनमें अन्धक और वृष्णि प्रसिद्ध थे ।ये दोनों वंशकर राजा थे।इनके नाम पर अन्धक और वृष्णि राज्यों का प्रारम्भ हुआ ।भीमसात्वत के बाद उसके पुत्र अन्धक का मथुरा पर शासन रहा ।पंचाल राजा सुदास का समकालीन

भीमसात्वत यादव नरेश का पुत्र अन्धक यादव शाखा का मुख्य राजा था।यह अन्धक शूरसेन जनपद के तत्कालीन गणराज्य का अध्यक्ष था।अन्धक सम्भवतः अन्धक अपने पिता भीम के समान वीर न था। “दाशराज्ञ” युद्ध से पता चलता है कि अन्य राजाओं के साथ वह भी सुदास से पराजित हुआ । मथुरा का यादव राजा अन्धक सुर्यवंशी अयोध्या के राजा श्री राम के पुत्र कुश का समकालीन था। अन्धक के बाद इस शूरसेन जनपद पर उसके के वंशजों का ही शासन रहा जो महाराज उग्रसेन तक कायम रहा ।वृष्णि शाखा का शासन शौरिपुर (आधुनिक बटेश्वर ) पर कायम रहा।
महाभारत -युद्ध से पूर्व कृष्ण , वसुदेव जी के कुल वृष्णि वंश में पैदा हुए तथा कंस अन्धक वंश में उग्रसेन के पुत्ररूप में पैदा हुआ। कंस के वध के बाद तथा महाभारत युद्ध के समय में अन्धक और वृष्णि राज्यों का परस्पर मिलकर एक संघ बना हुआ था ।

इसके अतिरिक्त ऐल -वंश की यादव शाखा के अन्य भी अनेक राज्य विदर्भ , अवन्ति , आदि में विद्यमान थे ।यादव -वंश की हैहय -शाखा का माहिष्मती का पुराना राज्य भी बहुत समय तक कायम रहा था।शाल्वदेश (वर्तमान आबू तथा उसके पड़ोस का प्रदेश )में भी यादवों की एक शाखा जम गई जिसकी राजधानी पर्णाश नदी (आधुनिक वनास ) के तट पर स्थित मार्तिकावर्त हुई।अन्य राजवंशों के साथ यादवों की कशमक़स बहुत समय तक चलती रही।दक्षिण के हैहय यादवों तथा काशी एवं अयोध्या के राजवंशों में बहुत समय तक युद्ध चलते रहे ।हैहय यादवों ने अपने आक्रमण सुर्यवंशी राजा सगर के समय तक जारी रखे ।

संदर्भ—
1-प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग -लेखक सत्यकेतु विद्यालंकार
2-ब्रज के धर्म -सम्प्रदायों का इतिहास -डा0 प्रभुदयाल मीतल ।
3-ब्रज का इतिहास (भाग 1, 2 -डा 0 कृष्णदत्त वाजपेयी ।
4-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास -प्रभुदयाल मीतल ।
5-ब्रज की कलाओं का इतिहास -प्रभुदयाल मीतल ।
6-प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति -डा0 कृष्ण चंद श्रीवास्तव ।
7-हिन्दू धर्म कोष -संपादक राजबली पांडेय ।
8-मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास – प्रोफेसर चिंतामणि शुक्ल ।
9-प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य -लेखक बाबू वृन्दावनदास ।
10-पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ ऐशियन्ट इंडिया पंचम संस्करण कलकत्ता ,1950, -राय चौधरी ,
11-दि क्लासिकल एज (बम्बई 1954 ) -मजूमदार तथा पुसलकर ।
12-ग्रॉउज -मेम्बायर द्वियीय संस्करण इलाहाबाद ,1882 ।
13-कनिघम -आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया -एनुअल रिपोर्ट जिल्द 20 (1882-83 ) .।
14-मथुरा के यमुना तटीय स्थलों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास -जयन्ती प्रसाद शर्मा ।
15-हरिवंश पुराण ।
16-वायुपुराण
17-विष्णुपुराण
18-महाभारत
19श्रीमद्भागवत
20-पद्यपुराण

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

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