जदुवंश शिरोमणि जादोंपति श्री देवकीनन्दन श्री कृष्ण की सन्तति एवं उनकी महत्ता —

जदुकुल शिरोमणि जादोंपति देवकीनन्दन श्रीकृष्ण की सन्तति एवं उनकी महत्ता ——–

1 – रुक्मणी जी से विवाह

रुक्मणी जी के पिता महाराज भीष्मक भी यदुवंश की विदर्भ शाखा में आते है ।राजा विदर्भ ऐक्ष्वावंशी राजा सगर के समकालीन थे ।राजा विदर्भ अपनी पुत्री सुकेशिनी का विवाह सगर से करके दक्षिण की ओर चले गये थे, जहाँ वे गये उस प्रदेश का नाम विदर्भ पड गया ।उनके कृथ ,कौशिक ,रोमपाद नामक तीन पुत्र थे ।पूर्व में भी बताया गया है कि राजा कौशिक के ही वंश में महाराज भीष्मक कुंडिलपुर के राजा थे ।उन्हीं भीष्मक के रुक्म एवं रुक्मणी सहित पांच पुत्र ,रुक्म ,रुक्मरथ ,रुक्मवाहू ,रुक्मेश ,और रुक्ममाली एवं एक रुक्मणी जी पुत्री थी ।रुक्मणी जी लक्ष्मी जी का अंश थी ।इनका भाई रुक्म चेदिराज दमघोष के पुत्र शिशुपाल से उनका विवाह करना चाहता था । वह भी इसी विदर्भ वंश का यदुवंशी राजा था और जरासंध का मित्र था तथा श्री कृष्ण की बुआ का पुत्र होते हुये भी श्री कृष्ण से शत्रुभाव रखता था ।रुक्मणी जी श्री कृष्ण जी से विवाह करना चाहती थी किन्तु उनका भाई कृष्ण को नहीं चाहता था ।रुक्मणी जी ने अपना सन्देश एक ब्राहमण के द्वारा श्री कृष्ण जी के पास भिजवा दिया ।श्री कृष्ण जी ने युक्तिसंगत तरीके से रुक्मणी जी का हरण कर लाये ।रास्ते में आकर रुक्म ने भारी सेना के साथ कृष्ण को घेर लिया ।रुक्मणी जी को लेकर रुक्म तथा श्री कृष्ण में भयंकर युद्ध हुआ ।जैसे ही श्री कृष्ण उसको मरने के लिए उद्धत हुए रुक्मणी जी ने उनका हाथ पकड़ लिया और विनम्र निवेदन पर अपने भाई रुक्म को छुडवा दिया ।और अपनी पुरी द्वारिका वापस आगये ।रुक्मी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार युद्ध में हार जाने के बाद वह कुंडिलपुर वापस तो नहीं गया ,परन्तु उसने विदर्भ देश ही में अपने रहने के लिए दुसरे विशाल नगर की स्थापना की ,जो इस भूतल पर ‘’भोजकट ‘’ नाम से विख्यात हुआ ।उस महाबली वीर ने यहाँ बल पूर्वक रह कर दक्षिण दिशा का शासन किया और राजा भीष्मक कुंडिलपुर में ही रहने लगे ।
वृष्णिवंशियों की सेना के साथ जब बलराम जी द्वारिका पहुंचे ,तब भगवान श्री कृष्ण जी ने विधिपूर्वक रुक्मणी जी का पानि -ग्रहण किया ।वह श्री कृष्ण जी की ज्येष्ठ पत्नी थी ।
रुक्मणी जी के गर्भ से दस महापराक्रमी पुत्र पैदा हुए जिनके नाम इस प्रकार हैं , महाबली प्रद्युम्न ,सुषेण ,चारुगुप्त ,चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारु ,भद्रचारु चारुविंद ,सुचारू ,चरुवाहू तथा एक पुत्री चारुमती हुई जो भजमान के वंश में पैदा हुए हार्दिक के पुत्र भोजवंशी यादव कृतवर्मा के पुत्र बली को ब्याही थी ।कृतवर्मा ,महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर लड़ा था ।
रुक्मणी जी के पुत्र प्रद्युम्न का विवाह भी अपने मामा रुक्म की पुत्री सुभांगी [ रुक्म्वती ] से हुआ था जिसके गर्भ से देवकुमार के सामान तेजस्वी अनिरुद्ध जी का जन्म हुआ ।वह अपने पराक्रम पूर्णकार्य द्वारा भूमंडल में अनुपम वीर माने जाते थे ।रुक्मी ने अपनी पौत्री रोचना [ सुभद्रा ] का विवाह भी अपने दौहिते अनिरुद्ध जी के साथ कर दिया जिससे बज्रनाभ का जन्म हुआ ।इसके बाद वृष्णि वंशी यादवों तथा विदर्भ राज परिवार के सम्बन्ध पुनः अच्छे हो गये थे ।अंत में रुक्मी का वध बलराम जी के हाथों से ही हुआ था |अनिरुद्ध जी का विवाह वाणासुर की पुत्री उषा से भी हुआ था जिससे मृगकेतन का जन्म हुआ ।

रुक्मणी जी के अतरिक्त श्री कृष्ण जी के सात प्रमुख पत्नियाँ और भी थी ,सत्यभामा ,जाम्बवंती , सत्या [ नाग्नजिती ] ,कालिंदी ,लक्ष्मणा ,मित्रविन्दा और भद्रा जिनका विवाह सम्बन्ध इस प्रकार हुआ |
2 -सत्यभामा –
यह यदुकुल के वृष्णि शाखा के ही प्रसेन के छोटे भाई सत्राजित की पुत्री थी । सत्राजित बहुत प्रसिद्ध था क्यों कि उसको साक्षात् सूर्य भगवान ने स्यमन्तक मणि दे रखी थी ।यह कथा श्रीमद्भागवत में विस्तार से दी हुई है ।इनके दस पुत्र ,भानु ,सुभानु ,स्वभार्नु ,प्रभानु ,भानुभानु ,चन्द्रभानु ,ब्रह्दभानु ,अतिभानु ,श्रीभानु तथा प्रतिभानु हुए तथा एक पुत्री भानु हुई ।

3 – जाम्बवती –
ये ऋक्षराज जाम्बवन्त की पुत्री थी । स्यमन्तक मणि को लेकर जब प्रसेन जंगल में भाग गये थे तो उनको एक सिंह ने मार डाला था ।फिर उस सिंह को जाम्बवन्त ने मारा और तत्काल मणि को लेकर अपनी गुफा में चले गये ।जब शास्त्राजित और अन्य यादवों ने प्रसेन को मारने का आरोप श्री कृष्ण पर लगाया तो वे कुछ भाइयों के साथ वन को गये और पद –चिन्हों के अनुसार पता लगाते हुए भगवान श्री कृष्ण उसी गुफा में घुस गये । वहाँ अठ्ठाईस दिनों तक श्री हरि ने जाम्बवन्त से युद्ध किया तथा उन पर श्री कृष्ण जी ने विजय प्राप्त की । जाम्बवन्त को जब ज्ञान हुआ कि ये कोई साधारण पुरुष नहीं हो सकते जो मेरे वाहुबल को हरा सकते ।हाथ जोड़ कर विनम्रता से परिचय पूछा कि आप कौन है ? तब श्री कृष्ण जी ने अपना परिचय देते हुए पूर्व अवतार के विषय में बताया कि मैं यदुकुल में पैदा हुआ देवकी एवं वासुदेव जी का पुत्र कृष्ण हूँ ,तो जाम्बवन्त ने खेद व्यक्त करते हुए उनको अपनी कन्या जाम्बवन्ति तथा मणि दोनों भेंट स्वरूप प्रदान की जिसे लेकर श्री कृष्ण द्वारिका आये और सभी यादवों के सामने मणि शास्त्राजित को दे दी और स्वयं कलंक से मुक्त हुए । इनसे साम्ब ,सुमित्र ,पुरुजित ,शतजित ,सह्स्त्रजित ,विजय ,चित्रकेतु ,वसुमान ,द्रविड़ ,क्रतु आदि दस तथा एक पुत्री मित्रवती हुई ।

4–सत्या [ नाग्नजिती ]—

ये कौशलपुर [ अयोध्या ] के अधिपति राजा नग्नजित की पुत्री थीं जो लोगों में सत्या नाम से विख्यात थी । इसके 10 पुत्र हुए – वीरचन्द्र , अस्वसेन , चित्रगु , बेगवान , वृष , आम , शंकु , वसु , श्रीमान , कुन्ति एक कन्या हुई भद्रावती ।

5-कन्लिंदी –
जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवों की सहायता के लिए इन्द्रप्रस्थ गये थे ।उन्होंने चार माह वहीं व्यतीत किये ।एक दिन अर्जुन के साथ रथ पर आरुण होकर यमुना तट पर शिकार खेलने गये ।वहाँ साक्षात् कालिंदी देवी श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा से तपस्या कर रहीं थी । अर्जुन ने उन्हें श्रीकृष्ण को दिखाया । श्रीकृष्ण कालिंदी जी को लेकर इन्द्रप्रस्थ आये और वहाँ से द्वारिका पहुंचकर उन्होंने मनोहरांगी सुर्य कन्या कालिंदी के साथ विधि पूर्वक विवाह किया तथा इनसे 10 पुत्र – श्रुत , वृष , कवि , वीर , सुबाहु , भद्र , ऐकल , शंतिदर्ष , पूर्णमास , सोमक नामक पुत्र हुए |

6-लक्ष्मणा –
मद्र्राज वृहतसेन की पुत्री थीं । भगवान श्रीकृष्ण ने इनके स्वयंवर में मत्स्य भेदन कर समस्त राजाओं को हराकर लक्ष्मणा को जीता था ।इनसे भी 10 पुत्र – प्रद्योस , मात्र्वान , सिंह , सह , बल , प्रबल , महाशक्ति , ओझ , अपराजित , अध्वर्ग ।

7-भद्रा –

कैकेय राजकुमारी भद्रा को श्रीकृष्ण उसकी इच्छा के अनुसार अपने घर ले आये । वहाँ कालिंदी की भांति उन्होंने विधि पूर्वक विवाह किया । यह इच्छा अनुसार रूप धारण करने वाली थी । इसलिए इन्हें रोहिणी नाम से भी जाना जाता है ।भद्रा भी श्रीकृष्ण की बुआ श्रुतकीर्ति की बेटी थी जो कैकेय नरेश को ब्याही थी ।इनके 10 पुत्र इस प्रकार हैं – संग्रामजित , वृहतसेन , शूर , प्रहरण , अर्जित , जय , सुभद्र , बाम , आयु एवं सत्यक ।

8-मित्रवंदा
कृष्ण की बुआ राजधदेवी जो अवन्ती के नरेश जयसेन को ब्याही थी मित्रवंदा उनकी पुत्री थी । श्रीकृष्ण भगवान इनको भी रुक्मणि की भांति स्वयंवर से हर लाये थे । इनकी सन्तति इस प्रकार है – व्रक , हर्ष , सुनील , गृध , वर्धन , उन्नाद , महाश , पावन , व्निह तथा क्षिद ।
इन आठ मुख्य पत्नियों के अतिरिक्त भगवान श्रीकृष्ण सोलह हजार एक सौ राजकुमारियां जो विभिन्न राजाओं की पुत्रियाँ थी जो नरकासुर (भौमासुर ) के कारागार में बंद थी । श्रीकृष्ण ने उस असुर का वध करके उसकी कैद से उनको मुक्त कराकर बचाया ।उन चारूदर्शना युवतियों की इच्छा देखकर वह उन्हें अपने साथ द्वारिका में ले आये ।एक ही शुभ मुहूर्त में विभिन्न भवनों रहती हुई उन युवतियों से अपनी माया से उतने ही रूप धारण करके उन सबका विधि पूर्वक प्राणि ग्रहण किया । इसके अतिरिक्त स्वयं अक्रूर जी ने अपनी भी बहिन शीलवती का विवाह श्री कृष्ण जी के साथ किया था (हरिवंश पु. पेज 136 ) जिसकी कोई सन्तति का वर्णन नहीं मिला । इस प्रकार सोलह हजार एक सो आठ पत्नियों में से प्रत्येक से श्रीकृष्ण के 10 – 10 पुत्र तथा एक – एक पुत्री को जन्म दिया ।वे सभी पुत्र गुणों में अपने पिता श्री कृष्ण के समान थे । इस प्रकार श्रीकृष्ण के पुत्र एवं पौत्रों की संख्या करोडो तक पहुंच गयी । श्रीकृष्ण के परम पराक्रमी पुत्रों में 18 तो महारथी थे जिनका यश सम्पूर्ण जगत में फैला था । यह महारथी पुत्र इस प्रकार थे – प्रद्युम्न , दीप्तमान , अनिरुद्ध , भानु , साम्ब , मधु , ब्रह्द्वान , चित्रमानु , व्रक , अरुण , पुष्कर , वेद्बाहू , श्रुतदेव , सुनंदन , कवि , चित्रबाहू , विरूप , नयग्रोध ।प्रद्युमन तथा जामवंती का पुत्र साम्ब विशेष बलवान थे । साम्ब ने दुर्योधन की कन्या लक्ष्मणा का हरण किया था । इसको लेकर कौरवों तथा यादवों भयंकर युद्ध हुआ बाद में समझौता के तहत दोनों का विवाह किया गया ।प्रद्युम्न के रुक्मी की पुत्री से अनिरुद्ध जी का जन्म हुआ जिनके भी रुक्मी की प्रपौत्री से रोचना से बज्रनाभ का जन्म हुआ ।बज्रनाभ के प्रतिबाहू , प्रतिबाहू के सुबाहु ,सुबाहु के शांतसेन और शान्तसेन के शतसेन हुए ।पार्श्वनंदिनी काश्या से साम्ब के संयोग से पांच पुत्रों का जन्म हुआ ,जो तपस्वी ,सत्यवादी ,देवों के समान सौन्दर्यशाली और शूरवीर थे |
इस यदुवंश में कोई भी पुरुष ऐसा नहीं हुआ जो बहुत सी संतानों वाला न हो तथा जो निर्धन ,अल्पायु ,और अल्पशक्ति हो ।वे सभी ब्राहमणों के भक्त थे ।इस प्रकार सैकड़ों हजार पुरुषों की संख्या वाले यदुकुल की संतानों की गणना सौ वर्षों में भी नहीं की जा सकती ।जो गृहाचार्य यादव कुमारों को धनुर्विद्या सिखाते थे उनकी संख्या 3 करोड़ 88 लाख थी । स्वयं भगवान श्री कृष्ण के अपनी सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियों से एक लाख 61 हजार एक सौ अठाठासी पुत्र एवं 16 हजार एक सौ आठ कन्याओं सहित कुल 1 लाख 70 हजार 1 सौ 88 संताने थी (विष्णु पु .पेज 291) |फिर उन महात्मा यदुवंशियों की गणना कौन कर सकता है जहां हजारों और लाखों की संख्या में सर्वदा यदुराज उग्रसेन के साथ रहते थे (विष्णु पुराण ,पेज संख्या 292 )। उग्रसेन के साथ एक नील के लगभग सैनिक रहते थे (श्रीमदभागवत ,दशम स्कन्ध ,पेज 598 ) ।ये सब के सब परम तेजस्वी यदुवंशी देवताओं के अंशभूत होकर इस मृत्युलोक में उत्पन्न हुए थे ,उन्हीं सब के विनाश के लिए ये लोग यदुकुल में उत्पन्न हुए जिसमें एक सौ एक (101 ) कुल थे ,उनका नियंत्रण व स्वामित्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने ही किया (विष्णु पु.293) ।देवासुर –संग्राम में जो महाबली असुर मारे गये थे ,वे ही भूतल पर मानव –योनि में उत्पन्न होकर सभी मनुष्यों को कष्ट दे रहे थे ।उन्हीं का संहार करने के लिए भगवान विष्णु ने यदुकुल में श्री कृष्ण जी के रूप में अवतरित हुए ।इन महाभाग यदुवंशियों के एक सौ एक कुल सब के सब विष्णु से सम्बन्धित कुल के अन्दर ही वर्तमान थे ।सभी यादव अपने नेता श्री कृष्ण की आज्ञा का पालन करते थे क्यों कि उन सभी के स्वामी श्री कृष्ण ही थे ।

श्री कृष्ण जी के बाद मथुरा की शूरसेन शाखा के वंश प्रवर्तक उनके प्रपौत्र श्री वज्रनाभ

3044 वि0पू0 महाभारत के पश्चात् 3048 वि0पू0 में यादव कुल विनाश के बाद ही अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ(अनिरुद्ध के पुत्र ) को पहले इंद्रप्रस्थ में स्थापित किया तथा बाद में परीक्षत ने वज्रनाभ जी को मथुरा लाकर उन्हें मथुरा जनपद का शासक बनाया गया।कुछ यादवों को पंजाब एवं इंद्रप्रस्थ में बसाया। महर्षि शांडिल्य बज्रनाभ के मथुरा में आने से प्रसन्न हुए और , उन्होंने बज्रनाभ को गोवर्धन के निकट पुरातन वृन्दावन, कुसुम सरोवर वन में भक्ति आराधना उत्सव करने को प्रेरित किया, तथा उन्हें श्री कृष्ण के जीवन सम्बन्धी सभी स्थल दिखाकर उनमें कदमखण्डी वन, उपवन, सरोवर, देवालय आदि बनाने को प्रयत्नशील किया। मथुरा जनपद ने पुन: नया सांस्कृतिक जीवन आया किन्तु यह अधिक समय तक टिक कर नहीं रह सका। मागध जरासंध वंशज सृतजय राजा ने बज्रनाभ वंशज शतसेन से 2781 वि0पू0 में मथुरा का राज्य छीन लिया। अव पुन: मथुरा मगधों के चंगुल में थी, तथा मगधों से प्रद्योत शिशुनाग वंशधरों पर होती हुई नन्द ओर मौर्यवंश पर आयी।पुराणों में महाभारत के युद्ध के बाद में वज्रनाभ जी से लेकर नंदों के शासनकाल तक 23 शूरसेनी राजाओं का वर्णन किया गया है जिन्होंने इस क्षेत्र पर शासन किया लेकिन इस शूरसेन जनपद पर कौन -कौन से यादव शासक हुए ,उनके नामों का पता नहीं चलता ।सम्भवतः इन राजाओं में कोई इतना प्रसिद्ध नहीं हुआ जिसकी पुराण चर्चा करते , अन्यथा जहां शूरसेन के पड़ोसी जनपद कुरु और पंचाल के अनेक शाशकों के उल्लेख मिलते हैं वहां मथुरा के कुछ राजाओं के भी नाम दिए जाते।
इस काल में कुरु -पंचाल जनपदों का राजनैतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव शूरसेन जनपद पर अवश्य पड़ा होगा ।शूरसेन की स्थिति इन दोनों शक्तिशाली राज्यों के बीच में थी ।कुरु -पंचाल में प्रचलित भाषा का उस समय शूरसेन में भी प्रचलन रहा होगा ।सम्भवतः यहां भी ब्रहामण तथा आरण्यक साहित्य का संकलन एवं कतिपय उपनिषदों का प्रणयन हुआ ।प्राक -बौद्ध काल में शूरसेन जनपद वैदिक धर्म का प्रधान केंद्र था , जिसका पता बौद्ध साहित्य से चलता है।महात्मा बुद्ध के आविर्भाव के पहिले पता बौद्ध साहित्य से चलता है ।महात्मा बुधकेआविर्भाव के पहिले भारत में सोलह बड़े जनपद थे ।प्राचीन बौद्ध और जैन साहित्य में ये “16 महाजनपद ” के नाम से प्रसिद्ध हैं। जिनमें से कई महाभारत -युद्ध के पूर्व भी विद्यमान थे ।ये सोलह बड़े राज्य इस प्रकार थे-
1-काशी ,2-कौशल ,3-मगध ,4-अंग ,5-वज्जि ,6 -मल्ल ,7-चेदि , 8-वत्स ,9-कुरु ,10-पंचाल ,11-मत्स्य , 12-शूरसेन ,13-अस्सक ,14 -,अवन्ति ,15-गन्धार तथा 16-कम्बोज।
इसके अतिरिक्त केकय , विगर्त , यौधेय ,अंबष्ठ , शिवि , सौवीर, आंध्र आदि।छोटे जनपद भी थे।महात्मा बुद्ध के समय तक आते -आते केवल मगध , कौशल ,काशी तथा अवन्ती भारत के चार प्रधान राज्य बन गए और इनके सामने प्रायःसभी अन्य जनपदों की स्थित गौण हो गयी।ये चारों अपनी शक्ति बढा कर अधिक शक्तिशाली बन गए।अवन्ती के तत्कालीन शासकों के इस काल में भी शूरसेन शासकों के साथ वैवाहिक सम्बंध बताये गये है लेकिन कोई क्रमवद्ध वंशावली उपलब्ध नहीं हुई।
सम्भवना व्यक्त की जाती है कि मथुरा की शूरसेन शाखा के वज्रनाभ का कोई वंशज सुवाहु या शतसेन पुनः मथुरा से अपने दूसरे पैतृक राज्य द्वारवती (द्वारिका ) क्षेत्र की ओर चला गया हो और वहां उन्होंने नए राज्य पुनः स्थापित किये हों। देवगिरि के यादवों तथा द्वारसमुद्र के होयसलों का ऐतिहासिक अध्ययन करने से यह आकलन किया जासकता है कि इन राज्यों के पूर्वज भी उन्हीं द्वारिका क्षेत्र में वसे सुवाहु या शतसेन आदि का कोई वंशज इनका पूर्वज हो ।इन्हीं में से विजयनगर तथा मैसूर के यादवों का उदय हुआ है ।
कृष्ण के तिरोधाम गमन के बाद उनके कुछ वंशज हिंदुकुश के उत्तर तथा सिन्धु नदी के दक्षिणी भाग एवं पंजाब में बस गए ।यह प्रदेश “यदु की डांग “कहलाया।यह “यदु की डांग ” पंजाब उत्तरी भाग का एक पहाड़ी प्रदेश है ।कालान्तर में ये लोग जबुलिस्तान , गजनी होते हुए सिन्ध के रेगिस्तान में आये और वहां से लंघा , जामडा
और मोहिलों को हराकर तन्नौट ,देरावल , लोद्रवा , तथा जैसलमेर आये ।ये यादव भाटी कहलाये ।
कृष्ण के पुत्र साम्ब के वंशज चुडासमा तथा जडेजा यदुवंशी कहलाये,जो सिंध से आकर कच्छ में बसे।

जादों वंश में 8 वीं शताब्दी में जिस धर्मपाल नामक राजा ने बयाना तथा मेवात पर आधिपत्य किया था वह द्वारिका से पुनः अपने पैतृक राज्य मथुरा की ओर आया ।वैसे 6वीं तथा 7 वीं शताब्दी में शूरसेन शाखा के कुछ शासकों के नाम कांमा के शासकों के रूप में कनिंघम ने भी उल्लेख किया है लेकिन उनकी भी कोई क्रमवद्ध ऐतिहासिक वंशावली आगे उपलब्ध नहीं है।राजा धर्मपाल जिसको श्री कृष्ण की 77 वीं पीढी में माना गया है उनसे ही कुछ क्रमवद्ध इतिहास जादों राजवंश का पुनः मिलता है जिनके वंशज (कुलचन्द ,इच्छापाल ,ब्रह्मपाल ,विनायक पाल , जयेन्द्रपाल ) पुनः मथुरा के शासक हुए जो कालान्तर में बयाना , तिमनगढ़ एवं अन्त में करौली राजवंश के संस्थापक या जनक हुए जिनमें महाराजाधिराज विजयपाल एवं उनके पुत्र तिमनपाल का नाम आता है ।विनायक पाल महोबा क्षेत्र में जाकर स्थापित हुए जिनके वंशज बनाफर जादों कहलाये।
श्रीकृष्ण जन्म और उससे जुडी हुई संख्या 8 का महत्व स्फुरित होगा ।कृष्ण के अवतार से पहले मत्स्य और वराह आदि 7 अवतार भगवान् विष्णु के माने जाते है ।यह कृष्णवतार विष्णु के 10 अवतारों में से आठवां है । इतना ही
नहीं ,देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान के रूप में श्री कृष्ण का जन्म हुआ ।कृष्ण को परमतत्व समझ कर उनसे प्रेम करने वाली राधा जी का भी जन्म भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि को ही हुआ ।क्या चमत्कार है यह आठ की संख्या जो कि अचेतन है ,फिर भी कृष्णआनुग्रह से मुख्यतत्व प्राप्त कर धन्य हो गई ।कृष्ण का संकल्प है कि वे साधुजनों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए तथा धर्म के प्रतिष्ठान के लिए हर युग में जन्म लेते है ।इस संकल्प को वेदव्यास ने भी भागवत में आठवें श्लोक के रूप में दर्शाकर इस संख्या के महत्व को और बढ़ा दिया ।
आमतौर पर सात समुद्र ,सात वर्ण ,सात लोक ,सात पर्वत ,सात ऋषि तथा संगीत शास्त्र में सप्तस्वर आदि ही प्रसिद्ध है ।जब कोई भी पदार्थ सात तक पहुँचता है तो उसे उस पदार्थ की चरम सीमा मानी जाती है ।ऐसी दशा में जब कोई आठवाँ होगा तो वह परमब्रह्म ही माना जाता है ।यही कारण है कि श्री कृष्ण ने अपने जन्मतिथि के रूप में अष्टमी को ही चुना ।इसी लिए अपने गुरुजनों से उपदेश पाकर लोग भी अष्टाङ्ग योग और अष्टाङ्ग नमस्कार आदि को अपनाते है ।
सर्वलोकहितकारी श्रीकृष्ण जी ने जन्म के समय अपने पिता वसुदेव जी को अपना वास्तविक रूप दिखा कर मोहित किया ।भगवान् श्रीकृष्ण के गुणों का जो वर्णन किया गया है उससे पता चलता है कि आदर्श उत्तम पुरुष के 8 लक्षण है।यहाँ महर्षि वेद व्यास 64 गुणों का वर्णन करते है ,जो संख्या भी आठ से आठ का गुड़नफल ही है ।श्रीकृष्ण के सखाओं की संख्या देखेंगे तो भी आश्चर्य होगा कि वह भी आठ ही है ।उज्जवल नीलमणि नामक ग्रन्थ में भी इनकी प्रियाओं में भी राधा जी ,चन्द्रावली आदि आठ सखियाँ ही मुख्य रूप से दर्शायी गई है ।श्रीकृष्ण की पत्नियों की संख्या तो सोलह हजार एक सौ आठ थी ।लेकिन उनमें से भी रुक्मिणी जी ,सत्यभामा जी ,जाम्बन्ती ,कालिंदी ,मित्रविन्दा ,नाग्नजित,भद्रा ,और लक्ष्मणा जी नाम की आठ पत्नियां ही प्रमुख थी ।
कृष्ण ,भक्ति और शरणागति से प्राप्त होते है ।सामान्य जन भी उन्हें अपनी आंतरिक पुकार से प्राप्त कर सकता है ।भगवान् श्री कृष्ण ने संसार को भक्ति और मैत्री के महत्व को अपने आचरण से सिखाया है जिसका अनुपालन हमें करना है ।जिनके नाम -श्रवण मात्र से असंख्य जन्म जन्मान्तित प्रारब्ध -बंधन ध्वस्त हो जाते है ,वे ही प्रभु जिसकी गोद में आ गये ,उसकी हथकड़ी -वेड़ी खुल जाय ,इसमे क्या आश्चर्य है ।
लीलापुरुषोत्तम भगवान् अवतीर्ण हुए मथुरा में यदुकुल श्रेष्ठ वृष्णिवंशी वसुदेव जी एवं देवकी जी के घर ,परन्तु वहां रहे नही ,वहां से गोकुल में गोपों के अधिपति नन्द जी एवं जशोदा जी के घर चले गये जो उनके पालक माता -पिता कहलाये ।वहां श्री कृष्ण जी नेअपना प्रयोजन –जो ग्वाल ,गोपी और गोंओं को सुखी करना था –पूरा करके मथुरा लौट आये ।

व्रज में गोकुल में भगवान् श्री कृष्ण 3 वर्ष 4 माह ,वृंदावन में 3 वर्ष 4 माह ,नंदगांव में 3 वर्ष 4 माह ,मथुरा में 18वर्ष 4 माह तथा द्वारिका में 96 वर्ष 8 माह रह कर अनेकों शत्रुओं का संहार किया ।

गोकुल से वृन्दावन को प्रस्थान के समय श्री कृष्ण जी की आयु 4 वर्ष थी । कालीनाग के दमन के समय आयु 8 वर्ष , गोवर्धन धारण 10 वर्ष , रास-लीलाओं के आयोजन के समय 11 वर्ष , वृन्दावन से मथुरा प्रस्थान कंस वध आयु 12 वर्ष , मथुरा में यज्ञोपवीत और संदीपन के गुरुकुल को प्रस्थान 12 वर्ष , जरासन्ध का मथुरा पर आक्रमण आयु 13 वर्ष ,मथुरा का राजकीय जीवन एवं जरासन्ध से 17 वार युद्ध आयु 13 से 30 वर्ष , द्वारिका प्रस्थान एवं रुक्मिणी जी से विवाह आयु 31 वर्ष , द्रोपदी स्वयंवर एवं पांडव मिलन आयु 43 वर्ष , अर्जुन -सुभद्रा विवाह आयु 65 वर्ष , अभिमन्यु जन्म आयु 67 वर्ष , युधिष्ठर का राजसूय यज्ञ श्री कृष्ण जी की आयु 68 वर्ष , महाभारत युद्ध आयु 83 वर्ष ,कलियुग का आरम्भ एवं परीक्षत जन्म श्री कृष्ण जी की आयु 84 वर्ष , श्री कृष्ण का तिरोधाम गमन और द्वारिका का अंत श्री कृष्ण की आयु 120 वर्ष थी।इस प्रकार श्री कृष्ण भगवान् ने जब अर्जुन को श्रीमद् भगवत गीता का उपदेश दिया था तब उनकी अवस्था 84 वर्ष की थी ।श्री कृष्ण जी ने लोगों में अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने वाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियों की मर्यादा स्थापित करने के लिए अनेकों यज्ञों के द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया ।कौरव और पांडवों के बीच उत्पन्न हुए आपस के कलह से उन्होंने पृथ्वी का बहुत सा भार हल्का कर दिया तथा युद्ध में अपनी दृष्टि से ही राजाओं की बहुत -सी अक्षोहिणी सेना को ध्वंस करके संसार में अर्जुन की जीत का डंका पिटवा दिया ।फिर उद्धव को आत्मतत्व का उपदेश किया और इसके बाद वे उन्होंने तिरोधाम को गमन किया तब उनकी अवस्था 120 वर्ष की थी ।
वेदांतदेशिक प्रार्थना करते हुए कहते है कि “नाथायैव नमः पदम् भवतु नः “अर्थात भगवान् श्री कृष्ण के लिए हमारे पास समर्पित करने के लिए मात्र “प्रणाम “ही है ।
कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनंदनाय च ।
नंदगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः।।
जो वसुदेव के पुत्र और देवकीनन्दन होने के साथ ही नन्दगोप के भी कुमार है ,उन सच्चिदानंद स्वरूप गोविन्द को बारम्बार नमस्कार ।
इस लिए भाद्रमास के रोहिणी नक्षत्र में अष्टमी तिथि को ही जन्मे यदुकुल शिरोमणि देवकीनंदनवासुदेव श्री कृष्ण —–
श्री कृष्ण संसार में अवतीर्ण होकर धर्म का परिपालन के साथ सरल और सहज जीवन बिताने का मार्ग दिखाते है ।उनके नामस्मरण से ही मोक्ष सुनिश्चित है ।कृष्ण शब्द की व्युतप्ति ब्रह्मपुराण में कई प्रकार से दरसायी गई है ।कृष्ण शब्द में तीन अक्षर विद्यमान है ।जैसे कृष +ण+अ।इनमे कृष का अर्थ है “उत्कृष्ट ,ण का अर्थ है “उत्तम भक्ति “और अ का अर्थ है देने वाला ।अर्थात उत्कृष्ट भक्ति को जो देता है या जगाता है वही “कृष्ण”है।
कृष्णम नारायणम वन्दे , कृष्णम वन्दे व्रज प्रियम।
कृष्णम दैवेपायनम वन्दे, कृष्णम वन्दे प्रथासुतम।।
कृष्ण शब्द में ही दो अक्षर कृष +ण मानकर पुराणों में जो अर्थ बताया गया है उसके अनुसार कृष का अर्थ है “परम आनंद और ण का अर्थ है दास्य कर्म अर्थात सेवा ।कृष्ण शब्द का अर्थ होगा परम आनंद और सेवा का अवसर ,इन दोनों को देने बाला ही कृष्ण है ।
कृष्ण शब्द की तीसरी व्युप्तति बताते है कि कृष का अर्थ है कोटि जन्म से अर्जित पापों का क्लेश और ण का अर्थ है उन सब पापों को दूर करने वाला ।कोटि जन्मों से किये हुये पापों को दूर करने वाला ही कृष्ण है ।
शास्त्रो में कृष्ण नाम के उच्चारण का फल भगवान् विष्णु के हजार नामों को तीन बार दोहराने के बराबर मिलता है ।वैदिक विद्वान कहते है कि सभी नामों से कृष्ण का नाम बड़ा है जिसके मुख से कृष्ण नाम का उच्चारण किया जाता है उसके सारे पाप स्वतः ही भस्मसात हो जाते है।
भागवत का उदेश्य है कि कृष्ण तत्व को दर्शाना ।श्री कृष्ण परब्रह्मा भगवान् विष्णु के अवतार माने जाते है ।इस अवतार के लिए मास ,योग्य तिथि व् नक्षत्र का चयन भगवान् कृष्ण ने बहुत सोच -विचार कर किया था ।
।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान

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