दास्ताने जादों राजपूत रियासत कोटला का इतिहास–

दास्ताने कोटला जादों राजपूत रियासत –

नगर कोटला वसत है, मीन ताल के पास
गद्दी राजा सोन की, यदुकुत करत प्रकाश
नैक दूर सिरसा नदी, खेरो शांतुन भूप शांतेश्वर महादेव को दर्शन परम अनूप

कोटल गांव को सन 1500 में कोटल खां नामक मेवाती ने बसाया था।

बयाना के राजा विजयपाल के पुत्र सोनपाल थे ।उन्होंने बयाना से जलेसर आकर मेवातियों से युद्ध किया और इस क्षेत्र पर आधिपत्य किया तथा अपने नाम से सोना गांव बसाया।राजा जैनपाल उनके पुत्र थे जिन्होंने जलेशर के पास जैनपुरा के जैन खां मेवाती को मारकर जैनपुरा पर अधिकार किया तथा यहीं से अपने राज्य का विस्तार किया ।राजा जैनपाल की बड़ी रानी राठौड़ जो राजा रामपुर एटा की पुत्री थी उनसे बीझन् पाल और पूरन पाल दो पुत्र हुए ।बीझन् पाल को 12 गांव नारखी राज्य में दिए ।करौली रियासत में स्थित अकोलपुरा निवासी जगा स्वर्गीय भैरोंलाल की जादों इतिहास पोथी के अनुसार कोटला एवं जाटउ का परिवार मूलतः नारकी के जादों की शाखा है । ये भैरों लाल जगा उस समय करौली रियासत के मुख्य जगा थे ।नारखी के राजा बीझन् पाल की 15 वीं (1-बीझन पाल ,2-आनन्द पाल,3-जतनपाल 4-धीरजपाल ,5-केशवपाल ,6-रुद्रपाल ,7-देवीपाल 8-सुमेरपाल ,9-भूपपाल ,10-गजपाल ,11-भैंरोपाल ,12-दयापाल ,13-गगनपाल ,14-कुम्भपाल ,15-राजा तुलसीदास ) पीढ़ी में राजा तुलसीदास हुये थे , जो सम्राट अकबर के दरवारी थे ।अकबर ने राजा तुलसीदास को 300 सैनिको का कमांडर (मनसवदार ) बनाया था । उनका इतिहास अकबरनामा और ऐन आई -अकबरी दोनों में दिया हुआ है ।अकबर के समय में ही उनको कोटला की रियासत प्रदान की गई । उस समय यहां पर भी कोटखां मेवाती का अधिकार था ।शायद उसी के नाम पर कोटला नाम था ।यह भी कहा जाता है कि शाहजहाँ के पुत्रों में जब राजसिंहासन के लिए युद्ध हो रहा था तब मेवातियों ने कोटला पर अधिकार कर लिया था ।
राजा तुलसीदास की 6 वीं ( 1-राजा अधिराजपाल ,2-ययातिपाल , 3-तालिमपाल ,4-ममरेजपाल ,5-सीतलपाल ,6-राजा हरिकिसनपाल ) पीढ़ी में राजा हरिकिशन दास हुये उन्होंने कोटला ,फारिहा ,लतीपुर को मेवातीओं से मुक्त करा लिया ।यह घटना औरंगजेव काल की है ।राजा हरिकिशनदास को औरंगजेब ने “बहादुर ” के पदवी से नवाजा था ।इन्होंने पास के काफी गांवों को अपने क्षेत्र में ले लिया था । लेकिन सन 1784 ई0 में जब सिंधिया ने फीरोजाबाद पर चढाई की तो कोटला के राजा हरिकिशन दास के पुत्र पोहप सिंह सिंधिया के विरुद्ध लड़ते हुए मारे गये थे और इनका अधिकांश राज्य सिन्धिया के कब्जे में आ गया था ।उस समय कोटला रियासत में 55 गांव थे ।सन् 1804 में जब जनरल लार्ड लेक ने दौलतराव सिंधिया के विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ किया तो राजा पोहप सिंह के पुत्र राजा ईश्वरी सिंह ने मराठों के विरुद्ध जनरल लॉर्ड लेक की सहायता की थी , जिसके फलस्वरूप उन्होंने 42 गांवों की इस्तमरारी पटटे पर प्राप्त कर ली ।लेकिन सन् 1810 के आस -पास मालगुजारी अदा न कर सकने के कारण कंपनी सरकार ने कोटला राज्य को इस्तमरारी पटटे पर अवागढ़ के ठाकुर हीरा सिंह को दे दिया गया ।सन् 1831 में अवागढ़ के ठाकुर हीरा सिंह की मृत्यु हो चुकी थी।और इसी वर्ष में ईश्वरी सिंह के पुत्र राजा सुमेर सिंह ने मालगुजारी का रुपया अदा कर दिया और कोटला रियासत पुनः उनको वापस मिल गयी ।यह वाक्या अवागढ़ के राजा पीताम्बर सिंह के समय का है ।
राजा सुमेर सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र राजा चतुर्भुज सिंह रियासत के मालिक हुये ।उनकी पत्नी का नाम महताव कँवर था ।राजा चतुर्भुज सिंह का देहांत सन् 1845 में हुआ ।उस समय से रानी महताब कँवर राज्य का काम -काज सम्हालने लगी ।राजा चतुर्भुज सिंह की एक मात्र संतान लली जस कँवर थी जिनका विवाह इटावा जिले में स्थित मसौली रियासत के राज पुत्र लाल लोकपाल सिंह से हुआ था ।रानी महताव कँवर ने अपनी रियासत के 12 गांव अपनी पुत्री के दहेज़ में दिए थे ।
रानी महताव कँवर बहुत तेजस्वी और दबंग महिला थी ।प्रायः तीर्थयात्रा पर जाती रहती थी ।पुत्र न होने के कारण रियासत के भविष्य के बारे में चिंतित रहती थी ।उन्होंने अपने परिवार के लाल धराधर सिंह नामक एक लड़के को गोद लिया था किन्तु यह लड़का कुछ दिन बाद स्वर्गवासी हो गया ।इससे रानी साहिबा और भी दुखी हो गयी ।इसके बाद भी उन्होंने अपने ही परिवार के किसी और लड़के को गोद लेने का प्रयास किया किन्तु धराधर सिंह की मृत्यु से भयभीत परिवार के किसी व्यक्ति ने अपना पुत्र देना स्वीकार नही किया ।तब रानी साहिब ने अपने ही खानदान के जाटऊ के जमींदार ठाकुर जालिम सिंह जी के पुत्र उमराव सिंह को अपने पास रखने लगी ।उमराव सिंह जी उन्ही के पालन पोषण में बड़े हुये थे ।लेकिन कुछ समय बाद रियासत के मालिकाना हक़ को लेकर रानी साहिबा और उमराव सिंह में कटुता पैदा हो गयी ।रानी साहिबा को यह संदेह हो गया था कि उमराव सिंह उनकी हत्या करवा कर रियासत पर दखल कर लेना चाहते है ।आगरा के कलेक्टर को रानी महताव कँवर ने कोटला बुलाया और उमराव सिंह से रक्षा करने के लिए कहा ।कलेक्टर महोदय ने उमरावसिंह के कोटला में प्रवेश पर पावंदी लगा दी ।
ठाकुर उमराव सिंह ने इसके बाद अदालत की शरण ली और इस आधार पर रानी साहिबा के विरुद्ध दावा दायर कर दिया कि रानी ने उनको अपना दत्तक पुत्र बनाया था ।रानी साहिबा ने इंकार कर दिया और कहा कि विधवा को न गोद लेने का अधिकार है और न मैने उमराव सिंह को कभी दत्तक पुत्र के रूप में ग्रहण किया है ।मैने धराधर सिंह को गोद लिया था जिनकी मृत्यु हो चुकी है ।दत्तक पुत्र ग्रहण करनेकी रस्म भी नही हुई ।इसके उत्तर में ठाकुर उमराव सिंह अदालत में यह कह गये कि यदि जिया लली जस कँवर .,रानी साहिबा की पुत्री न्यायाधीश के समक्ष यह कह दे कि रानी ने मुझे दत्तक पुत्र के रूप में ग्रहण नही किया था तो मैं अपना दावा वापस ले लूंगा और रियासत से कोई सम्बन्ध नहीं रखूँगा ।अब लली जस कँवर पर दोनों ओर से दवाव पड़ने लगा ।जसकँवर कोई ब्यान देने को तैयार न थी ।अंत में अपनी मां के कहने पर उन्होंने उमराव सिंह के विरुद्ध बयान दे दिया ।इस पर उमराव सिंह जी का दावा ख़ारिज कर दिया गया ।
दैवयोग से लली जस कँवर के बयान देने के 4 या 6 दिन बाद ही उनके पति लाल लोकपाल सिंह की मृत्यु हो गई ।इससे लली जस कँवर के ह्र्दय में बात बैठ गई कि उनके द्वारा झूठा बयांन देने के कारन ही उनको वैधव्य की यातना भोगनी पडी है ।इसके बाद लली जस कँवर ने अपनी मां रानी महताव कँवर से अपने सम्बन्ध तोड़ लिए और उमराव सिंह जी को जयपुर से बुलबाया ।तब जस कँवर के कहने पर रानी महताब कँवर ने 12 गांव ठाकुर उमराव सिंह के नाम कर दिए ।सन् 1857 में रानी महताब कँवर को 4 गांव और दे दिए थे ।
रानी महताव कँवर बहुत ठाठ वाट की रौब दार महिला थीं ।उस अंग्रेजी ज़माने में भी रानी साहिबा किसी सरकारी अधिकारी से मिलने उसके बंगले पर नहीं जाती थी बल्कि उसे अपने निवास पर ही बुलाती थी ।एक बार अयोध्या गई तो देखा कि सरयू नदी के तट पर कुछ लोग मछली पकड़ रहे थे ।रानी साहिबा ने तुरंत वहां के कलक्टर को तलब किया और उसे बताया कि अयोध्या जैसे पावन पवित्र तीर्थ में यह कृत्य हिन्दूओं की भावना को ठेस पहुंचाता है ।उस दिन से अयोध्या में सरयू नदी के तट पर मछली पकड़ना वर्जित कर दिया गया था ।
रानी साहिबा को प्रायः आगरा जाना पड़ता था ।इस लिए वहां ठहरने के लिए नीलकंठ महादेव के मंदिर का निर्माण कराया जो आज भी वह मंदिर उनकी स्म्रति की रक्षा कर रहा है ।फीरोजाबाद स्टेशन के पास भी उनके ठहरने के लिए एक गृह बनवाया गया था उसे तब कोटला राज्य का डाक बंगला कहा जाता था ।सन 1859 ई0 में रानी महताव कंवर के समय में कोटला रियासत के ठाकुर रनधीर सिंह प्रबन्धक थे।उस समय ठाकुर श्योराज सिंह नारखी -कातकी के जमींदार थे तथा ठाकुर पीताम्बर सिंह जाटउ के जमींदार थे।
फीरोजाबाद स्टेशन के कर्मचारी को ,खलासी से लेकर स्टेशन मास्टर तक को ,कोटला राज्य की ओर से उसे मिलने वाले एक मास के वेतन के बराबर धन प्रत्येक वर्ष दिया जाता था ।इसी प्रकार तहसील के प्रत्येक कर्मचारी को भी एक माह का वेतन कोटला रियासत बख्शीस के तौर पर देती थी ।यह धन दो किस्तों में मिलता था ।खरीफ की फसल पर 15 दिन का वेतन और रबी की फसल पर 15 दिन का वेतन ।ऐसी रानी महताब कँवर को लोकप्रिय होना ही था ।रानी महताब कँवर की मृत्यु सन् 1889 में हुई ।इसके बाद उनकी पुत्री जस कँवर का कोटला रियासत पर अधिकार होगया ।जस कँवर के भी कोई पुत्र नही था ।अतः उन्होंने अपनी ससुराल की रियासत अपने पति के भतीजे लाल तेज पाल सिंह को दे दी और 31 मई सन् 1905 ई0 को ठाकुर उमराव सिंह के बड़े पुत्र कुशलपाल सिंह जी को कोटला की रियासत प्रदान कर दी ।
रानी जस कँवर ने 1905 ई0 में कुँवर कुशलपाल सिंह के पक्ष में जो हिबैनामा लिखा था उसके निम्नांकित शब्द कोटला राज परिवार के इतिहास पर भी प्रकाश डालते है ।रानी जस कँवर का बयान है —–
मेरे बाप का खानदान ठाकुर जादों का वह खानदान है जो महाराजा करौली का है ।पहले जमाने में मेरे पुरखा लोग करौली में व् करौली के आसपास में बसते थे ।वहां से उठकर अक्सर लोग उस खानदानके दूसरे मुल्कों में आ बसे ।ऐसे बसने बालों का बड़ा हिस्सा आगरा के सूबे में आकर बसा है ।इस खानदान का असली घर करौली है ।*
यह हिबैनाम 13 हजार रूपये मूल्य के स्टाम्प पर लिखा गया था तथा कोटला के राज परिवार के सभी सदस्य तथा संबंधी इस अवसर पर एकत्रित हुये थे ।उनसे भी ठाकुर उमराव सिंह ने दस्तबरदारी लिखवा ली थी ।रानी जस कँवर की मृत्यु सन् 1909 में हुई ।इसके बाद कोटला रियासत पर ठाकुर उमराव सिंह जी और उनके बड़े बेटे राजा कुशलपाल सिंह जी का अधिकार होगया । कुशल पाल सिंह जी कोटला जादौन रियासत के सन् 1920 में सेन्ट्रल असेंबली के पहले चुनाव में जिसमें कुल सीटों की संख्या 104 थी,संयुक्त प्रांत (यूपी) से जमींदारों की तरफ से चुने गए पहले असेंबली सदस्य थे।

कोटला का किला— —–

कोटिला का किला किसी समय अत्यंत महत्वपूर्ण रहा होगा ।सन् 1884 ई0 के गजेटियर में इस किले की रूप रेखा इस प्रकार दी गई है ।खाई 20 फ़ीट चौड़ी तथा 14 फ़ीट गहरी ,ऊंचाई 40 फ़ीट ।भूमि की परिधि 284 फ़ीट उत्तर ,220 फ़ीट दक्षिण तथा 320 फ़ीट पूर्व एवं 480 फ़ीट पश्चिम ।अब यह किला जीर्ण शीर्ण अवस्था में देखने में लगता है ।अभी कुछ ढांचा तो विद्यमान है शायद इसमे कोई सरकारी स्कूल चल रहा है ।यहाँ इसका उपरोक्त विवरण इसी उद्देश्य से दिया गया है कि भावी पीढियाँ इसके वास्तविक स्वरूप की कल्पना कर सकें।किले को कब और किसने बनवाया इसका कोई विवरण नही मिलपाया है ।लेकिन यह किला राजा बहादुर कुशल पाल सिंह ने अपने पुत्र कुँवर गजेन्द्र पाल सिंह की त्रिपुरा राज्य से हुये विवाह से कुछ समय पूर्व ही लगभग 1925 ई0 के आस पास बनवाया था।पहले यह एक कच्ची गढ़ी होगा।बाद में कुछ जयपुर की शैली पर तरह लाल पत्थर से बना हुआ है।

References — –

1-Akbarnama
2-Ain -i -Akbari
3-Second Supplement to Who,sWho in India brought up to 1914 .
4-Social and political history of Chauhan Vansh by Ratan Lal Bansal of Firojabad U P .
5-Gazetter of Agra 1886 .
6-Gazetter of Mainpuri and Etah districts of United Provin Agra.
7-Shreeman Sujas Chandravilas book of jaipur state .

लेखक -डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन ,
गांव -लढोता ,सासनी
जिला -हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर कृषि विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा

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