पुरातन सम्पदा का अमूल्य खजाना है जदुवंशियों की ऐतिहासिक धरोहर तिमनगढ़ दुर्ग–

पुरातन सम्पदा का अमूल्य खजाना है जदुवंशियों की ऐतिहासिक धरोहर तिमनगढ़ दुर्ग —

जदुवंशी क्षत्रियों का मध्यकालीन यह तिमनगढ़ दुर्ग राजस्थान का खजुराहो कहा जाता है । पाषाण की मूर्तियों के अमिट खजाने और हस्तशिल्प कला के बेजोड़ नमूनों के लिए तिमनगढ़ का किला प्रसिद्ध है। यह किला जिला मुख्यालय करौली से 40 किमी. की दूरी पर मासलपुर कस्बे के पास आज भी अपने सुनहरे अतीत की कहानी कह रहा है।

तिमनगढ़ के किले को राजस्थान के प्राचीन किलों में से माना जाता है। इस किले के निर्माण काल को लेकर इतिहासकारों में विभिन्न मत है। प्रचलित मान्यता के अनुसार  बयाना के  यदुवंशी जादों राजा तिमनपाल ने इस किले का निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य (ई0 1058 ) कराया था, जो बयाना राज्य के शासक विजयपाल के पुत्र थे। लेकिन कुछ इतिहासकार इस किले को एक हजार वर्ष से अधिक प्राचीन बताते है। किले से खुदाई में निकली प्रतिमाओं को पुरातत्व विभाग ने एक हजार वर्ष से ज्यादा प्राचीन बतला कर इस किले के निर्माण समय को विवादित रूप दिया है। जानकारों का अनुमान है कि इस किले को तिमनपाल ने नया स्वरूप देकर  अपने नाम पर इसका नाम रखा। किले के अन्दर कई शिलालेखों, उपलब्ध प्राचीन कृतियों से पता लगता है कि इसे किसी शिल्प  कला प्रेमी ने बसाया और उसके बाद यह यदुवंशी शासकों के कब्जे में चला गया।

    यहां के यादव /यदुवंशी (आधुनिक जादों राजपूत )  क्षत्रिय राजा शूरसेन जनपद (प्राचीन मथुरा राज्य ) के उन चन्द्रवँशी यादवों के वंशज थे जिनके नेता श्री कृष्ण थे । सन 1146 ई0 के लगभग त्रिभुवनगढ़ में श्री जिनचंद्र सूरि पधारे थे ।त्रिभुवनगिरि के यादव राजा कुँवरपाल ने जैनमुनि जिनदत्त सूरि से प्रतिबोध प्राप्त किया था।सन 1196ई0 में शाहबुद्दीन गौरी ने अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक और बहाउद्दीन तुगरिल के साथ त्रिभुवनगढ़ पर आक्रमण किया ।
ताजुल-मआसिर में इस स्थान का नाम “थंगर ” लिखा है और तबकाते -नासिरी उसे ” थन कीर “लिखा है ।फरिश्ता ने उसे “बयाना “से अभिन्न माना है ।फरिश्ता के कथन को आधुनिक इतिहासकारों ने भी माना है ।वास्तविकता यह है कि “थनकीर  या “थंकर ” त्रिभुवनगढ़ या ताहनगढ़ के लिए प्रयुक्त हुए है ।उससे 14 मील दूर यह नगर है जिसे बयाना कहा जाता है ।इसका मूल नाम श्रीपथ नगर था , उसे विजयगढ़ भी कहा जाता था ; वही बाद में बयाना कहलाया ।जिस प्रदेश में श्रीपथ और त्रिभुवनगढ़ नगर थे , उसे “भादानक देश “कहा जाता था (1).ताहनगढ़ , बयाना से 14 मील दक्षिण में है ।इसे तिमनपाल यादव (आधुनिक जादों ) राजा ने ग्यारहवी सदीं में बनवाया था और उसी गढ़ के आस -पास की बस्ती तिमनगढ़ कहलाने लगी ।यह गढ़ मध्यकाल में बड़ा सामरिक महत्व रखता था ।अतः यवनों के आक्रमण निरन्तर होते रहते थे और इसी कारण यह नगर शीघ्र उजड़ गया।यहाँ कई जैन व शैव मन्दिर थे लेकिन मुस्लिम आक्रमणों के कारण केवल खण्डहरों में ही तब्दील हो गए।

किले का निर्माण की दृष्टि से दो भागों में बांटा गया है, जो जगनपोर एवं सूर्यपोर के नाम से जाने जाते हैं। इस किले की मजबूती रणथम्भौर दुर्ग से कहीं कम नहीं है। किले के चारों ओर 5 फीट मोटा व करीब 30 फीट ऊंचा परकोटा स्थापत्य  कला का अनूठा नमूना है। अनूठा यों कि परकोटा नीचे से 10-12 फीट चौड़ा है और ऊपर उठते-उठते इसकी मोटाई घटती गई दुर्ग के अन्दर अलग-अलग छोटी-छोटी चौकियों का भी निर्माण आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से किया हुआ है। आम लोगों के लिए किले के भीतर फर्श, बगीची, बाजार, मंदिर, कुएं एवं ताल इत्यादि मौजूद हैं। शाही आवास के वास्ते प्रसादों व महलों का निर्माण है। बाहरी तौर पर एक किले के रूप में नजर आने वाले इस तिमनगढ़ में अंदर एक नगर बसा है। यही वजह है कि इस किले तत्कालीन समय में त्रिपुरारि नगरी /त्रिभुवनागिरि नगरी के नाम से भी जाना जाता था। प्रवेश द्वार पर अमूमन ब्रह्मा, गणेश आदि की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं, लेकिन इस किले के द्वार पर प्रेत व राक्षसों के चित्र देखने को मिलते हैं। राक्षसों व पशुओं के मुखौटों वाली प्रतिमाओं देखने से यह जाहिर होता है कि इसका निर्माण किसी शासक ने नहीं कराया था, वरना देव प्रतिमाओं के साथ राक्षस या पशुओं की मूर्तिया नहीं होती l
किले में अंदर जाने को पूर्व एवं पश्चिम में विशाल द्वार बने हुए हैं, जिनके ऊपर छतरियां एवं सुरक्षा के लिए मचान बनी हैं ।किले में प्रवेश के लिए यहाँ दो दरवाजे हैं। दो दरवाजों के बीच लंबा चौड़ा दालान पड़ा हुआ है। मुख्य किले के भीर जाने को दो द्वार  हैं। इन दोनों द्वारों  पर लाल पत्थर की सीढ़ियों बनी हुई है तथा दरवाजे पर विभिन्न आकृतियों की सुसज्जित स्थापत्य कला की मूर्तियां लगी हैं।

किले में पूर्वी ओर जाने पर फूटे महल, शिल्प बाजार, राजगिरी, घुडसाल, रनिवास, बाबड़ी तथा उत्तर की ओर बना महल नजर आता है। यह सभी शिल्पकला का बेजोड़ नमूना प्रस्तुत करते हैं। छतों में पत्थरों को जिस ढंग से जोड़ा गया है, आश्चर्य चकित कर देने वाला है। पत्थरों को जोड़ने के विशेषता (कला) यह है कि चूना, मिट्टी या अन्य कोई पदार्थ का उपयोग किए बिना पत्थरों को एक के ऊपर एक इस तरह जोड़ा गया है कि दो पत्थरों के बीच से पानी चूने (रिसने) या रोशनी आना बिल्कुल असंभव है। रंगशालाओं में बड़े-बड़े शिला खंडों पर उकेरे गए फूल एवं अन्य आकृतियां मुंह से बोलती नजर आती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की इस दुर्ग में कदम-कदम पर ऐतिहासिक वैभव और उच्च कोटि की हस्तशिल्प कला की झलक मिलती है। प्रत्येक पत्थर शिल्पकला से लदा है और एक से बढ़कर एक है। दुर्ग में एक तालाब भी बना हुआ है, जिसमें सदैव पानी भरा रहता है। तालाब के उत्तर में छोटे-छोटे कमरे बने हैं, जो शायद नहाने के बाद कपड़े बदलने के काम आते होंगे। इस तालाब से आगे चलने पर 12 खम्भों की विशाल छतरी आज भी गौरवशाली प्राचीन स्थापत्य कला की गवाह है। ऐसा लगता है कि वह छतरी अधिक खम्भों की बनी हुई थी और बाद में इन खंभों को तोड़ा गया है क्योंकि अनेक खंभों के अवशेष इधर-उधर बिखरें हैं। इन खंभों पर व छतरी में विभिन्न देवी-देवताओं व पशुओं की प्रतिमाएं तराशी हुई हैं।

इस किले की कला सम्पदा को असामाजिक तत्वों ने काफी क्षत-विक्षत किया है। किले में जगह-जगह बिखरी पड़ी टूटी प्रतिमाऐं उन पर किए गए जुल्म की स्वयं साक्षी हैं। बिखरी पड़ी इस सम्पदा से आभास होता है कि वह किला हजारों वर्ष प्राचीन है, क्योंकि यदुवंशी हिन्दू शासकों के कब्जे में रहे इस किले में हिन्दुओं के देवी-देवताओं के अलावा बौद्ध, जैनधर्म की भी अनेक मूर्तियां हैं।

समय-समय पर असामाजिक तत्वों से पुलिस द्वारा इस किले की बरामद हुई प्रतिमाओं को पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों ने सैकड़ों वर्ष प्राचीन तथा लाखों रूपये की आंकी है। इस लिहाज से तो यहां ऐसी हजारों प्रतिमाएं हैं, जो जंगल में बसे इस किले को अरबों, खरबों रूपये की सम्पदा वाला बनाती है।

कला सम्पदा के इस अमूल्य खजाने में से बहुत कुछ चले जाने के बाद भी पर्यटकों को आकर्षित करने और पुरातन विशेषज्ञों या इतिहासकारों के लिए नए तथ्य खोजने को यहां काफी कुछ बाकी है। इतिहास की गहराई में जाने वालों त शिल्पकला के प्रेमियों को यह किला चुनौती पूर्ण आमंत्रण देता हैं।

संदर्भ—

1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन
21-बयाना-ऐ कांसेप्ट ऑफ हिस्टोरिकल आर्कियोलॉजी -डा0 राजीव बरगोती
22-प्रोटेक्टेड मोनुमेंट्स इन राजस्थान-चंद्रमणि सिंह
23-आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया रिपोर्ट भाग ,20.,पृष्ठ न054-60–कनिंघम
24-रिपोर्ट आफ ए टूर इन ईस्टर्न राजपुताना ,1883-83 ,पृष्ठ 60-87.–कनिंघम
25-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटर्स -भरतपुर ,पृष्ठ,. 475-477.
26–राजस्थान का जैन साहित्य 1977
27-जैसवाल जैन ,एक युग ,एक प्रतीक
28-,राजस्थान थ्रू दी एज -दशरथ शर्मा
29-हिस्ट्री ऑफ जैनिज़्म -कैलाश चन्द जैन ।
30-ताहनगढ़ फोर्ट :एक ऐतिहासिक  सर्वेक्षण -डा0 विनोदकुमार सिंह
31-तवारीख -ए -करौली -मुंशी अली बेग
32-करौली ख्यात एवं पोथी अप्रकाशित ।
33- करौली का यादव राज्य, रणवाकुरा मासिक में (जुलाई 1992) कुंवर देवीसिंह महावा का लेख ।
34-राजपूताने का इतिहास पृ० 308, ले० डॉ० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ।

लेखक–– डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता, सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह ,राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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