फिरोजाबाद जनपद के जादों राजपूत गांव रजावली का ऐतिहासिक अध्ययन–

फिरोजाबाद जनपद में रजावली गांव के जादों राजपूतों का ऐतिहासिक अध्ययन

पौराणिक इतिहास —

वृषभ वैवत पुराण के अनुसार मौजूदा रजावली गांव का पौराणिक नाम राजा वली के नाम पर पड़ा हुआ था जो अपभ्रंश होकर रजावली हो गया।एक प्रसिद्ध क्षेत्रीय किवदंती के अनुसार यह गांव राजा बली ने बसाया था जिनकी समाधि आज भी प्रत्यक्षरुप से “कदमखण्डी ” आश्रम के रूप में रजावली गांव में विद्यमान है।कहा जाता है कि यहां पर वामन भगवान ने राजा बली से साड़े तीन पग जमीन मांगी थी।भगवान ने तीन पगों में तीनों लोकों को नाप लिया था।आधा पग नापने के लिए राजा बली ने स्वयं अपना शरीर नपवा दिया था जो कि उनके चौरासी बीघा जमीन पड़ी हुई है।

विख्यात है रजाबली का कदमखण्डी आश्रम–

वह चौरासी बीघा जमीन आज भी “कदमखण्डी आश्रम “के नाम से विद्यमान है तथा धार्मिक स्थल के रूप में क्षेत्र में जाना जाता है ।इस आश्रम में एक एकड़ अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ एक प्राचीन तलाब है जिसमें वर्षभर जल भरा रहता है।कहा जाता है कि श्रद्धा से इस तलाब में स्नान करने से कुष्ठ रोग से निजात मिल जाती है।
काफी बड़े क्षेत्रफल में कदम के सुहावने वृक्ष ,पुराने करील की झाड़ियां इत्यादि जंगली पेड़ आज भी मौजूद हैं।आश्रम की सोभा आज भी एक अलौकिक सुन्दर उपवन की तरह मनमोहक दिखाई देती है।यह स्थान  साक्षात वृन्दावन की तरह मनोरम लगता है।यह क्षेत्र भी ब्रजभूमि का एक भाग हैं जहां यदुकुल शिरोमणि देवकीनन्दन वासुदेव श्रीकृष्ण अपनी सखी राधा जी के साथ रास लीला करते थे ऐसी क्षेत्रीय किवदंती है।

समाधि बाबा की अदभुत महिमा —

यहां आश्रम में विद्यमान एक समाधि वाले बाबा की बड़ी विचित्र महिमा है जिसका क्षेत्रीय लोग गुणगान करते हैं।कहा जाता है कि इस आश्रम में रहने वाले साधू -सन्तों को समाधि वाले बाबा ने साक्षात दर्शन भी दिए हैं।इस स्थान पर जो भी भक्तगण या आगन्तुक सच्चे मन से मनोकामना लेकर आता हैऔर पूजा-अर्चना करता है वह अपने मिशन में सफल होता है।

प्राचीन शिव मन्दिर भी  है विराजमान —

इस अलौकिक सौंदर्य से परिपूर्ण कदमखण्डी आश्रम में एक प्राचीन शिव मन्दिर भी है ।यहां पर शिवजी के गण (सर्प) काफी संख्या में विचरण करते रहते हैं परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि इन सर्पों ने कभी गांव या क्षेत्र के व्यक्ति को नहीं काटा।इस आश्रम की पूज्य भूमि की सीमा के अन्तर्गत कोई भी किसी प्रकार की  चोरी एवं सौंच क्रिया जैसी गतिविधियां नहीं कर सकता है।इस आश्रम के क्षेत्र की लकड़ी का कोई भी अपने निजी घरेलू उपयोग में प्रयोग नहीं करता है।
शिवजी के मन्दिर के अतरिक्त इस देवस्थान पर सीता-राम ,राधा-कृष्ण ,हनुमानजी , माँ दुर्गा तथा शनिदेव के मन्दिर भी स्थापित हैं जिनकी प्रतिदिन भक्तगण पूजा -अर्चना बड़े मनोयोग से करते हैं।

धर्मशालाएं भी हैं स्थापित —

आश्रम के अन्तर्गत साधू-सन्तों के निवास हेतु कई धर्मशालाएं भी हैं।यहां वर्ष में धार्मिक आयोजन होते रहते हैं।यहां पर गोवर्धन की तरह एक विशेष समय पर परिक्रमा भी भक्तगणों के द्वारा लगाई जाती है।

आश्रम पर है एक दैविक अजूबा —

सम्पूर्ण रजावली गांव का पानी खारी है जो विशेषतः पीने में नुकसान दायक है।लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस कदमखण्डी आश्रम का पानी शुद्ध एवं मीठा है जिससे सम्पूर्ण गांव की जीविका चल रही है।आश्रम के आश -पास जंगली जीवों का भृमण रहता है।

रजाबली के भृगुदे जादों ठाकुरों का इतिहास–

उमरगढ़ रियासत के रजावली ,बाघई तथा चिलासिनी प्रमुख भाई-बन्दी के गांव थे।उमरगढ़ के ठाकुर समरथपाल को रजावली गांव हिस्से में दिया गया था।समरथ पाल के पुत्र कपुरपाल ,कपूर पाल के पुत्र पदम पाल के पुत्र हरपाल के पुत्र भूरे सिंह के पुत्र गोधनपाल के पुत्र चन्द्रहन्स के पुत्र नसीरपाल के पुत्र सज्जनपाल के पुत्र देखपाल के पुत्र विजयपाल हुए।इन्हीं ठाकुर विजयपाल के दो विवाह हुए।पहली पत्नी बरहन की धाकरे राजपूत थीं जिनसे दो पुत्र हाथी सिंह तथा आहार सिंह हुए।दूसरी पत्नी चौहान राजपूत थीं जिनसे कमलसिंह तथा हेतम सिंह दो पुत्र हुए।ठाकुर विजयपाल सिंह ने रजावली जमींदारी का अपना रकवा चारों पुत्रों में बांट दिया जिसके अनुसार रजावली गांव के भृगुदे जादों चार पट्टियों (थोक ) में विभाजित हुए।

1-उन्नतीस वीं पट्टी–
बड़े पुत्र हाथी सिंह को सबसे अधिक क्षेत्रफल की जमींदारी प्रदान की गई जो उन्नतीस वीं पट्टी के नाम से जानी गई।ठाकुर हाथीसिंह के वंशज उन्नतीसवीं पट्टी के कहे जाते हैं।इस शाखा के वंश वृक्ष में  सबसे अधिक विस्तार हुआ।

1-चौथाई पट्टी —
दूसरे पुत्र अहार सिंह को दिया गया जमींदारी का भाग चौथाई पट्टी के नाम से जाना गया।इस शाखा का वंश वृक्ष भी अधिक बढ़ा ।इस शाखा से भी जादों ठाकुरों का पलायन विभिन्न गांवों में हुआ।अलीगढ़ के गंगेई गांव के भृगुदे इसी पट्टी से गये हुए हैं।ठाकुर अहार सिंह के वंशज चौथाई पट्टी के कहे जाते हैं।

3-चौबीसवीं पट्टी–
तीसरे पुत्र कमल सिंह को प्रदान की गई जमींदारी चौवीसवीं पट्टी के नाम से जानी गई।ठाकुर कमलसिंह के वंशज आज रजावली में चौबीसी पट्टी के कहलाते हैं।

4-सोलहवीं पट्टी–
सबसे छोटे पुत्र ठाकुर हेतम सिंह को दी गई जमींदारी सोलहवीं पट्टी के नाम से जानी गई।ठाकुर हेतम सिंह के  वंशज सोलहवीं पट्टी के कहलाते है। डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन , गांव लढोता के पूर्वज ठाकुर पूसे सिंह उन्नीसवीं सदी में रजावली गांव से लढोता गांव पहुंचे।इसी प्रकार अलीगढ़ जनपद के बलीपुर ,आगरा जनपद के भण्डारगढ़ी , एटा के खेरिया गांवों में भृगुदे सोलहवीं पट्टी से गये हुए हैं।

लड़ाकू एवं बहादुर भी रहे हैं रजावली एवं बाघई दोनों गांवों के जादों ठाकुर —

रजावली तथा निकटस्थ गांव बाघई दोनों जादों ठाकुरों के भृगुदे खानदान के भाई-बन्दी के गांव रहे हैं।बहुत कम लोग ये जानते होंगे कि इन दोनों गांव के जादों ठाकुरों से अंग्रेजी हुकूमत के सैन्य अधिकारी बहुत परेशान रहते थे।ये दोनों गांवों के लोग अंग्रेजों के खिलाफ कोई न कोई क्षेत्रीय उपद्रव करते रहते थे।अंग्रेजों ने इन दोनों गांवों के लोगों की बहुत आलोचना लिखी है।

रजाबली के साहसी ठाकुर गुरधान सिंह की गौरवशाली स्मृति —

धाकरे राजपूत जो एटा जनपद के निधपुर और मारहरा परगना में पाए जाते हैं पूर्व में जलेसर परगना में बहुत बड़ी संख्या में थे।जिन्होंने  मुगलों एवं अंग्रेजों को भी बहुत परेशान किया था। अंग्रेजों ने  धाकरे राजपूतों से चिढ़ कर उन्हें जलेसर से वेदखल करके भगा दिया तथा उनके पूर्वजों की शान बरहन का किला अंग्रेजों ने हस्तगत कर लिया।बाद में  अवागढ़ के राजा पृथी सिंह ने अंग्रेजों से खरीद लिया था ।जब 1857 का स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ तो अवसर पाकर धाकरे राजपूतों  ने अपने पुराने बरहन के किले पर प्रबलता सेअधिकार कर लिया । अवागढ़ राजा पृथी सिंह की मेवाती सेना बरहन किले पर अधिकार करने के लिए जो उनके पारिवारिक भाई  जलूखेड़ा के कुशालसिंह के नेतृत्व में धाकरों  से लड़ रही थी सफल नहीं हो पा रही थी । राजा पृथी सिंह ने उमरगढ़ जादों रियासत  के तत्कालीन राव टीकमसिंह से सैनिक मदद मांगी।उस समय राव टीकम सिंह के पास कुछ रजावली ,बाघई ,  एवं अन्य ठिकानों के जादों ठाकुर भाई -बन्धुओं की एक छोटी  सी लगान उगाही करने वाली फौज थी ।राव टीकम सिंह की उगाही करने वाली फौज एवं उनके  सैन्य वाहन प्रमुख  रजाबली गांव के रहने वाले ठाकुर गुरधान सिंह थे। क्षेत्रीय किवदंती के अनुसार कहा जाता है कि बरहन के किले के दरवाजे में लगी हुई नुकीली लोहे की कीलों की बजह  से हथिनी दरवाजा नहीं तोड़ पा रही थी ।ठाकुर गुरदान सिंह  ने अपनी क्षेत्रीय सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्यान में  रखते हुए एक साहसिक कदम उठाते हुए दरवाजे से चिपक गए और पीलवान को हथिनी को दरवाजे की ओर बढ़ाने का इशारा किया।हथिनी ने पुनः दरवाजे में टक्कर मारी और उमरगढ़ राव टीकमसिंह की सेना ने किले में प्रवेश किया  और इस प्रकार बरहन किले पर आधिपत्य  कर लिया गया।इस बरहन किले को फतह करने का श्रेय उमरगढ़ राव टीकमसिंह को ही जाता है क्यों कि अवागढ़ राजा पृथी सिंह की मेवातियों की सेना को कई बार वापस लौटना पड़ा था।उनको फतह नहीं हासिल हुई थी। लेकिन राव टीकम सिंह के साहसी सेना नायक रजावली के ठाकुर गुरदान सिंह मारे गए और परन्तु इस युद्ध में  धाकरे राजपूत बरहन से भगा दिए गए । कहा जाता है कि वह हथिनी पहले रजावली गांव में रुकी और फिर वहां से चल कर उमरगढ़ गांव की सीमा में आकर दम तोड़ गयी। रजावली गांव में वह स्थान भी आज उस हथिनी की स्मृति से जाना जाता है ।इस बरहन किले पर आधिपत्य की युद्ध रूपी घटना का क्षेत्रीय धाकरे राजपूतों को आज तक अफसोश है ।

स्वतंत्रता सैनानी भी रहे हैं रजाबली के जादों ठाकुर —

रजावली की सोलहवीं पट्टी के ठाकुर ध्यानपाल सिंह यदुवंशी उन्नीसौ के दशक में स्वाधीनता का अलख जगाने वाले स्वतंत्रता सैनानी रहे हैं।आप कई बार जेल में रहे और यातनाएं भी सहीं और जुर्माने भी भरे। ठाकुर ध्यानपाल सिंह यदुवंशी को सत्याग्रह आंदोलन में सन 1930-31 में  6 माह जेल 10 /रुपये जुर्माना देना पड़ा तथा  सन 1940-41 में व्यक्तिगत आंदोलन में 3 माह जेल  में रहे और 50 रुपये जुर्माना अदा करना पड़ा।जुर्माना अदा नहीं करने पर उन्हें 2 वर्ष की कैद और अतरिक्त दी गई।

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ।

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