ब्रज जनपद के जादों (प्राचीन यादव ) कुलीन राजवंश का ऐतिहासिक अध्ययन —

ब्रज जनपद के जादों (प्राचीन यादव )कुलीन राजवंश का ऐतिहासिक अध्ययन —

मुस्लिम धर्म के प्रसार व प्रचार के समय भारत की पश्चिमोत्तर सीमाओं पर यादव कुलीन परिवार आबाद थे और इन परिवारों ने मुस्लिम साम्राज्यवादियों की प्रगति को दीर्घकाल तक रोकने में सफलता प्राप्त की। अन्त में यदुवंशी भाटी राजपूतों ने सिन्ध अथवा पंजाब प्रान्त को छोड़कर राजपूताना में शरण ली और  जडेजा यदुवंशी राजपूतों ने मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया। इस सीमान्त संघर्षकाल में यदुवंशियों का विशुद्ध रक्त, उनके मौलिक अधिकार, रक्त की पवित्रता, हिन्दू संस्कृति की भावना विद्यमान थी और आज भी यह कुल आबाद हैं। इन जादौ (यादव) परिवारों ने मर्यादित भारतीय सीमाओं का किसी भी युग में उल्लंघन नहीं किया और मथुरा (मधुरा) को छोड़कर अन्त में चम्बल नदी के पश्चिमी भू-भाग में विजयमन्दिरगढ़’ तथा करौली राज्य की स्थापना की (1) ।

विजयमन्दिरगढ़ के जादौ राजपूतों का वंश विस्तार—

‘विजयमन्दिरगढ़’ के यादव कुलों का पश्चिमोत्तर सीमाओं से केवल राजनयिक सम्बन्ध था। वास्तव में विक्रमादित्य की सातवीं शताब्दी में श्रीकृष्ण के प्रपौत्र, बज्रनाभ की साठवीं पीढ़ी में सिन्धुपाल नामक जादों  (यादव) राजपूत ने उत्कल (उड़ीसा) भुक्ति से आकर शौरसेन (ब्रज) भुक्ति में यादव राजवंश पुर्नस्थापित किया था (2)। मुंगेर तथा खलीमपुर प्रशस्तियों से पता चलता है कि आठवीं शती में मथुरा के आस-पास यादवों का राज्य विद्यमान था और यह कान्यकुब्ज (कन्नौज ) के  करद शासक थे (3) ।दसवीं  शताब्दी में कान्यकुब्ज के गुर्जर प्रतिहारों के  विशाल साम्राज्य का पतन होने लगा और आर्यावर्त के अनेकों योद्धा सामन्त, शक्ति सम्पन्न कुलों ने स्वाधीन राजतन्त्रों की स्थापना करना शुरू कर दिया था। इस राजनैतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर सिन्धुपाल की छठवीं पीढ़ी में इच्छापाल ने मथुरा को अपनी राजधानी (879 ई०/936 विक्रम सम्बत ) बना लिया था। इसके बाद उसके पुत्र ब्रह्मपाल ने उत्तराधिकार प्राप्त किया (4)। इसका पुत्र तथा उत्तराधिकारी जयन्द्रपाल अति  प्रतापी तथा रणधीर योद्धा था, जिसने आगरा (5) के आस-पास जादों पंचायती राज्य (966-992 ई0) की राजधानी स्थापित की (6) इसका उत्तराधिकारी सन्तपाल (993-1020 ई०) था। सम्भवतः इसके एक पुत्र कुलचन्द था और यह विजयपाल का भाई था( 7)। इसने महावन में महमूद गजनवी का प्रतिरोध करके जादौ राजपूत कबीलों की वीरता का परिचय दिया (8 ) ।

परम भट्टारक महाराजाधिराज विजयपाल ( 1030 -1094 ईo) —-

सुल्तान महमूद गजनवी के आक्रमण ने कच्छपघात  (कछवाहा राजपूत)  राजवंश की राजनैतिक प्रभुसत्ता को नष्ट कर दिया था ( 9) । 1018 ई0 में मथुरा,  वृन्दावन, महावन, आगरा, कन्नौज प्रदेश तथा अन्य राज्यों को भी भीषण बरबादी सहन करनी पड़ी थी। इन प्रदेशों के नागरिकों ने अपनी सम्पत्ति को छोड़कर पहाड़ तथा जंगलों से आच्छादित चर्मण्यवती मंडल अथवा भादानक प्रदेश और उसकी राजधानी श्रीपथ ( श्री प्रस्थ) में आकर शरण ली। सम्भवतः इस आक्रमण से पूर्व ही जादों  परिवारों ने भादानक प्रदेश में अधिकांश भूमि पर जमीदारियाँ प्राप्त कर ली थी। ग्यारहवीं शताब्दी के तृतीय दशक में (लगभग 1023 ई0 )  मे सन्तपाल (10 ) के यशस्वी पुत्र विजयपाल ने ‘भादानक’ प्रदेश तथा ‘श्री प्रस्थ’ दुर्ग पर अधिकारकर लिया। अनुमानतः 1030 ई० में शान्तिपुर -श्रीप्रस्थ दुर्ग की मरम्मत कराई तथा शोनितगिरि ( दमदमा) के बाह्यि ढलानों पर ‘विजयमन्दिरगढ़’ नामक नवीन परकोटा, प्राचीर, महल, मन्दिर आदि का निर्माण करा कर राजधानी स्थापित की (11 )। इगणोंडा  (मालवा) प्रशस्ति (1133 ई०) के अनुसार विजयपाल ने ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ का विरुद धारण किया था। यद्यपि इसका प्रशासनिक काल अभी तक अनिश्चित है, फिर भी काल निर्धारण के लिए विजयमन्दिरगढ (1043 ई० / 1100 वि० सं० ) और इगणोडा ( 1133 ई0) के शिलालेख महत्व पूर्ण हैं(12 ) ।
मिस्टर कारली के अनुसार उसके तिहुनपाल और ऋतुपाल ( रतनपाल ) नामक दो पुत्र और बीजल नामक एक पुत्री थी। कनिंघम के मतानुसार उसने अपने जीवनकाल में विजयमन्दिरगढ़ के अतिरिक्त मदनगढ़, दक्षिण में तवनगढ़; थानगढ़, (13) जगनेर के समीप बीजलपुर, भुसावर के दक्षिण में लगभग 6मी रीतबार आदि कई नवीन दुर्गों 9 का निर्माण कराकर अपनी राजधानी को सुरक्षित कर लिया था। ‘विजयमन्दिरगढ़ राज्य में   कमर्म(काँमा), त्रिभुवनगिरी (तवनगढ़) धवलपपुरी (धौलपुर) मधुरा (मथुरा), वैराठ (मत्स्य) , द्यौसा (दौसा) आदि प्रमुख नगर तथा दुर्ग शामिल थे। इस प्रकार पूर्व में यमुना नदी का पूर्वी भाग, पश्चिम में बनास तथा मोरेल के पार रणस्तम्भपुर (रणथम्भौर),  खंडार  तथा ढुंढाड़ (आधुनिक जयपुर पर्यन्त भुभाग), उत्तर में हरितका (हरियाणा), गुड़गाँवा और दक्षिण में चम्बल नदी के 32 मील पार सबलगढ़ तक सीमायें फैल चुकी थी (14 )। उसने पड़ौसी राज्यों के साथ ‘पारिवारिक मंगल सूत्र ‘ द्वारा राजनैतिक प्रभुत्व प्राप्त कर लिया था (15) । उसकी नियमित चमू (सेना) में हाथी, घोड़ा, ऊँट, रथ तथा पदाति सैनिक थे और यह विशाल कटक एक लाख के लगभग था (16) । विजयपाल धर्मात्मा, साहित्यिक तथा राष्ट्रीय सम्राट था। उसने विजयपाल रासो के लेखक ‘नरपति नल्ल सिंह को हिण्डौन  के अनेक गाँव, हाथी, घोड़ा तथा अपार धन देकर सम्मानित किया था (17) । स्वयं शिवोपासक था और वैष्णव धर्म राजधर्म था। जादों नरेश की नीति तथा पराक्रम को देखकर दिगम्बर तथा स्वेताम्बर जैन साहूकार तथा जैन आचार्यों  ने राजधानी में आकर निवास किया। करौली की ख्यातों के अनुसार विजयपाल की गजनी के तुर्कों के साथ कई बार मुठभेड़ हुई और जादौ सेनाओं ने तुर्कों को परास्त करके विजय कीर्ति उपलब्ध की थी (18 )। यह निर्विवाद सत्य है कि महमूद के आक्रमणों के बाद विजयमन्दिरगढ़ या भासीयाना (भादानक)  साम्राज्य पर तुर्कों का एक भी हमला नहीं हुआ था। यह सम्भव हो सकता है कि विजयपाल ने दिल्ली के तंवरों , शाकम्भरी के चहवान राजपूतों को सहायता देकर भारतीय एकता तथा वीरता का कीर्तिमान उपार्जित कर लिया था। अन्तिम विजय के बाद जौहर की ज्वाला से उद्विग्न होकर उसने अपना शीश शिवजी के चरणों में अर्पण कर दिया (19) ।

महाराजा तिहूनपाल और उसकी सन्ताने—

सम्राट विजयपाल के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र तिहुनपाल (तवनपाल ) परम भट्टारक महाराजाधिराज’ का विरुद धारण करके गद्दी पर बैठा ( 20) । सम्भवतः अर्नोराज चौहान की विस्तारवादी योजना (21 ) की सफलता के कारण ही इसको ‘विजयमन्दिरगढ़’ त्याग कर बारह वर्ष के लिये अज्ञातवास में रहना पड़ा। चौहान विग्रहराज चतुर्थ के राज्य उपलब्ध करते ही तिहुनपाल ने एक योगी का आर्शीवाद प्राप्त करके तवनगढ़ को अपनी राजधानी बनाया (22)। सम्भवतः अच्युतध्वज तथा ब्रह्मनाथ योगियों ने इसको सत्तारूढ़ करने में योग दिया(23) और तंवर राजपूत एवं गूजरों  की कन्यायें वरण करके
राजनैतिक  प्रभुत्व प्राप्त किया । वृत- विलास ग्रन्थ के अनुसार  तिहुनपाल ने अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किया  (24) था।इसके  (1) धर्मपाल (2) हरपाल (3) चन्द्रपाल (4)  सोनपाल (संग्रामपाल),  (5) मदनपाल , (6) बन्धपाल ,(7 ) शेरपाल (8) अभयपाल आदि बारह पुत्र थे (25) ।  तिमनपाल ने धर्मपाल को धोलदेरा (धोलपुर ) जनपद की व्यवस्था प्रदान की थी और द्वितीय पुत्र की योग्यता,  क्षमता तथा वीरता से मुग्ध होकर जादों मण्डप (राज्य गद्दी ) का उत्तराधिकार प्रदान किया (26) । परन्तु तिमनपाल की मृत्यु के बाद धर्मपाल ने हरपाल को परास्त करके विजयमन्दिरगद तथा तवनगढ़ पर अधिकार कर लिया (27) । ” इसके वंशजों ने करौली राज्य की नींव डाली। चन्द्रपाल के वंशज कछवाहा यादव कहलाने लगे। सोनपाल के वंशजों ने बिछौर राज्य की स्थापना की। मदनपाल के वंशजों ने 18 वीं शताब्दी में भरतपुर जाट राज्य की स्थापना की (28 ) ।बन्धपाल ने काँमा की पहाड़ियों में शरण ली और इसके वंशज मेवात के खानजादों  मेव कहलाने लगे (29) । धर्मपाल की मृत्यु (1112 ई0) के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र कुँवरपाल प्रथम पुनः क्रमशः अजयपाल, हरीपाल, सहनपाल और कुँवरपाल द्वितीय गद्दी पर आरूढ हुये (30)। सन 1195-96 ई0 में सुल्तान मुहम्मद गौरी ने स्वयं कुतुबुद्दीन ऐबक और बहाउद्दीन तुगरिल के सेनापतित्व में विजयमन्दिरगद, तवनगढ़, कुंवरगढ़ , झीरी आदि के दुर्गों पर आक्रमण किया और इन पर तुकों ने अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। कुंवरपाल ने अपने मामा के यहाँ अंधेराकोटिला (रीवा के पास) में जाकर शरण ली (31 ) । तुर्क सेनापति बहाउद्दीन तुगरिल ने बयाना में दासवंश की स्वाधीन सत्ता स्थापित की।जादों परिवारों ने इन तुर्कों की अधीनता स्वीकार नहीं की और ये लोग विशाल टोलियों में इधर-उधर बिखर गये (32 )।

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संदर्भ–

1- टॉड, 1 /72-3 ; आर्के सर्वे०, 20 /5-6  ;
ब्रुकमैन, 29 ।
2- बलदेवसिंह (पाण्डुलिपि), पृ० 5 ब्रुकमैन, 26;  इम्पी० गजे०, 15 /26 ; * 5६
*दीक्षित, 1 और जाट जगत, 10 ।
आर्के0 सर्वे 0 20/6 का मत है कि श्री कृष्ण की 77 पीढ़ी में धर्मपाल जादौ राजपूत ने जन्म लिया था और उसने आठवीं शताब्दी में अपने नाम के साथ ‘पाल’ शब्द लगाया था।

3- ए० इ० ( खलीमपुर), 4 /243 (मुंगेर) 18/ 304 ; दृष्टव्य –भारतीय विद्या भवन, 4 /5-6 , डा० त्रिपाठी (हिस्ट्री ग्राफ कन्नौज), 216-230; विस्तृत अध्ययन के लिये दृष्टव्य लेखक कृत युगयुगीन बयाना ‘ अध्याय ४ ।

4-गहलोत, 597 (पा० टि०) ।

5- मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार आगरा एक प्राचीन कस्बा था, जहां महाभारतकाल में राजा कंस ने राजनैतिक बन्दियों के लिये कारागार बनवाया था (तारीखे दाऊदी, पृ० 42 ) । सुल्तान महमूद गजनवी की स्तुति में मसूद के लिखे कसीदा के अनुसार यहाँ पर एक फौलादी दुर्ग था, जिसको महमूद ने मिट्टी में मिला दिया था (तुजुके जहाँगीरी, 1/4) ।

6-बलदेवसिंह, 5; वाक्या राज०, 2 /34, चौबे, 1 ; ब्रुकमैन, 316-7 ।

7-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास, 1966 ई०) पृ० 68 !

8-अलुत्तवी कृत तारीखे यामिनी (इ० डा०), 2 / 42-46 ; तबकाते अकबरी 10 ; अलबदाऊनी 22 25 ]  ; फिरिश्ता (इ० डॉ०) 2 /459-61  ;  ओझा 1 /264- 65 ; आर्शीवादी लाल (दिल्ली सल्तनत), पृ०, 39-48 ; मथुरा महिमा, 61 ;  डा० मुहम्मद हबीब (सुल्तान महमूद आफ गजनी ) ।

9-नैणसी की ख्यात, 2 /4 टॉड, 2 /280- 81 ; आमेर की ख्यातें(ओझा संग्रह); राय, 2 /823 -24 ; माबेल डफ, 291 ;  मार्शल 3 ; डा० भार्गव (राजस्थान) 115 ।

10- ब्रूकमैन, 317 ; दीक्षित, 1; चौबे, 1 ; जाट जगत, 10 ; यलदेवसिंह, 5;
वाक्या राज०, 2/ 34 ।

11- इम्पी० गजे०, 7 /137 , 15 / 26 ; आर्के० सर्वे०, 6/ 54, 20 /6 , 62 ; गहलोत, 597 , दीक्षित, 188 ;  वाक्या राज०, 2 / 26 ; वीर विनोद, 1497-8 ।

12-शिलालेख – इ० ए०, भाग 6 /55 , 14 /9 -10 ;  काव्यमाला 129-30  ।

13- विजयमन्दिरगढ़ के दक्षिण में 14 , हिन्डौन के पूर्व में 14 मील, करोली के उत्तर में करौली मांसलपुर राजमार्ग से 6 मील त्रिभुवनगिरि की उच्च श्रृंग * पर शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण 1058 ई० में हुआ था ।
14- आर्के सर्वे०, 20 /3 ( भूमिका) 5 ; इम्पी० गजे०, 15 /26 ; गहलोत 600 ।
15-आर्के0 सर्वे 0 6 / 54 ।
16- विजयपाल रासो (कविरत्न माला) |
17 -कविरत्नमाला, पृ० 23 ।
आधुनिक समय में  यह धारणा विद्यमान है कि नल्लसिंह ने ‘विजयपाल रासो’ की रचना की थी। लेकिन अद्यतः रासो की प्रति उपलब्ध नहीं हो सकी है ! डा० मोतीलाल गुप्ता के अनुसार इसकी एक प्रति करौली के किसी मन्दिर में प्राप्त है, जहां केवल दर्शन किये जा सकते हैं। (मत्स्य राज्य की हिन्दी साहित्य को देन) । -डा० गुप्ता ने लेखक के नाम अपने एक पत्र में इस कथन को भ्रांन्ति मात्र मान लिया है। विजयपाल रासो के कुछ प्रश ‘कविरत्न माला’ में प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें अल्ली तरखान (तुर्क?) तातारखां पर विजय प्रात करना, सिद्धराज -विजयपाल, पङ्ग जादौ युद्ध का वर्णन है ( पृ० 23-27) । भाषा, शब्द-विन्यास तथा वर्णन की दृष्टि से यह रासो समकालीन था निकट समकालीन रचना स्वीकार करना सम्भव नहीं है। इसमें विजयपाल के राज्यारोहरण का समय वि० सं0 1093- 1037 ई० लिखा गया है। यह समय प्रायः प्रशस्तियों के अनुरूप ही है। दिग्विजय में कथित नामों का पता भी नहीं लगाया जा सकता है। रासो के औचित्य के लिये दृष्टव्य मिश्र बन्धु विनोद, 1 /207 ; मोतीलाल मेनारिया (राजस्थान का पिंगल में
*साहित्य), पृ० 55 ; ब्रज का इतिहास, 2 /213 |

अभी हाल में दुर्गा प्रसाद शर्मा ने रासो के आधार पर ‘राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस जोधपुर अधिवेशन ‘ में विजयपाल का तुर्कों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया है। आपने ‘तारीखे सुबुक्तगीन’ का प्रयोग अवश्य किया है किन्तु श्रापके निष्कर्ष स्वीकारणीय नहीं हैं (पृ० 39- 41 ) ।

18-इम्पी० गजे०, 8 / 313 ; ब्रुकमैन, 20;  दीक्षित, 7;  आर्के० सर्वे०, 6 /55 , 20 /60 ।

19- इम्पी० गजे०, 17/ 313 ; ओडायर  3 /24 ; वीर विनोद, 1498 , बलदेवसिंह, 6 ; बाक्या राज०, 2 /35 , दीक्षित, 2 , गहलोत 526  ।

20 -इ० ए०  6 /55 ; गहलोत 600 ।

21- डा० दशरथ शर्मा (अर्ली चौहान डाईनेस्टी), पृ० 44 ; भार्गव ( राजस्थान) ,पृष्ठ 31-32 ।
22-बलदेवसिंह, ४. वाक्या राज०, 2 /35 ; दीक्षित, 2 ; गहलोत 599 ।
23- आर्के० सर्वे०, 20 /60 ।
24-ओझा निबन्ध संग्रह 3/ ब 4 / 1 ।
25-बलदेवसिंह , 7; वाक्या राज०, 2 /35 और दीक्षित, 2 ; केवल प्रथम पांच पुत्रों के नामों का उल्लेख करते हैं। आर्के 0 सर्वे०, 20 /10  में बन्धपाल का नाम मिलता है। बुलन्दशहर में आबाद जादौ ठाकूर अपने आपको शेरपाल तथा अभयपाल की सन्ताने मानते हैं। सम्भवतः शेरपाल ने कोसी के पूर्व में 11 मील यमुना नदी के किनारे शेरगढ़ और अभयपाल ने इसी के समीप अभयगढ़ की स्थापना की थी।
26-गहलोत 600  ; वीर विनोद, 1498 ।
27-  उपरोक्त  आर्के 0 सर्वे, 20 / 7 ; ब्रुकमैन, 317 ।
28- ब्रुकमैन , 26 ; बलदेवसिंह 7 ; वाक्या राज० 2 /36 ; दीक्षित, 2 ; आर्के०
सर्वे० खण्ड 20, पृष्ठ 7 ।
29-आर्के० सर्वे०, 20 / 10 ।
30-ओझा निबन्ध संग्रह 3 व 4 / 1 -2 राजपूताना थ्रू दी एजेज, 1 / 561 ।

31-आर्के 0 सर्वे 20 /7 , ,62 , 89 ; इम्पी० गजे०, 15 /26 ; तबकाते अकबरी *
*1/ 40 ,48-9 और ताजुल मआसिर ( इ0 डा0 ) , 226- 7 तबकाते नासिरी140-145 ; अलबदाऊंनी 80, फरिश्ता 1 /179 , 202 ;हबीबुल्ला 66 ; आर्शीवादी लाल (दिल्ली सल्तनत ) ,पृष्ठ 93 , वीर विनोद ,पृष्ठ 1428 , और मार्शल , 2 ।

32-आर्के0 सर्वे 0 , 20 /10 , मदनपाल सिनसिनी नामक गाँव में आकर बसा और इसी गांव में उसकी मृत्यु हुई (ब्रुकमेंन 317) ,जब कि ओडायर , 3 /25 ; बलदेव सिंह , 8 ; वाक्या राज 0, 2/35  ;चौबे ,2 और दीक्षित , 3 का मत है कि सुये ठाकुर सिनसिनी गांव में आकर बसे थे।

लेखक-डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गाँव-लढोता ,सासनी
जनपद -हाथरस,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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