ब्रज (शूरसेन प्रदेश ) के मध्यकालीन यादवा कुलीन जादों ठाकुरों के वंश विस्तार का ऐतिहासिक अध्ययन —

ब्रज (शूरसेन प्रदेश ) के  मध्यकालीन यादवा  कुलीन जादों ठाकुरों के वंश-विस्तार का ऐतिहासिक अध्ययन —

यादवों के राजवंशीय इतिहास के लिए सूचना के मुख्य स्रोत पुराण ,महाकाव्य और जैन साहित्य है।पुराण परम्परा के अनुसार वैवस्वत मनु की पुत्री ऐला -पुरुरवा चन्द्रवंश के संस्थापक थे तथा ययाति के परदादा थे , जो एक प्रसिद्ध सम्राट एवं विजेता थे।ययाति का सबसे बड़ा पुत्र यदु था जिसकी संतान को कालान्तर में  यादवों के रूप में जाना गया।इस समय प्रथम दृष्टा  प्रमुख चन्द्र वंश प्रमुखता में आया।इसके अलावा लगभग अपने इतिहास की शुरुआत से ही यादव जिनके हस्तिनापुर के पांडवों से वैवाहिक संम्बन्ध थे शूरसेन देश से जुड़े पाये जाते है , जिसमें मथुरा, आगरा ,अलवर ,भरतपुर जुड़े पाये जाते है।लेकिन इस क्षेत्र का नाम कब और कैसे शूरसेन देश पड़ा या अधिग्रहण किया गया  यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है ,लेकिन संभावना यह है कि इस प्रदेश का नाम हैहय यदु शाखा के राजा कीर्तवीर्य अर्जुन या सहस्त्रार्जुन के पुत्र शूरसेन के नाम पर पड़ा हो ।इस क्षेत्र के निवासी , शूरसेनी (वृष्णि ) भी कहलाते है जिसका वर्णन पुराणों एवं महाभारत में मिलता है ।

महाभारत युद्ध के लगभग 30 वर्ष बाद गुजरात के प्रभास क्षेत्र में यदुकुल शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण के सामने ही  यादवों (जादों क्षत्रियों ) में भीषण गृह-,कलह हुआ , जिसमें अधिकांश यदुवंशी परिवार नष्ट हो गए ।शेष जो बचे थे वे इधर -उधर भारत एवं विदेशों में छितरा गए ।महाभारत में वर्णन मिलता है कि जब महाराज युधिष्ठर को इस यादवी -संघर्ष की सूचना श्री कृष्ण के द्वारा भेजे गए संदेशवाहक उनके  सारथी दारुक से मिली तो वे बहुत दुखी हुए।उन्होंने अर्जुन को यादवों के परिवार के अवशिष्ट स्त्री-पुरुषों व बच्चों को सुरक्षित हस्तिनापुर लाने के लिए अर्जुन को द्वारिका भेजा ।अर्जुन द्वारिका में सभी मारे गए यदुवंशियों का दाह -संस्कार करके जब बचे हुए यादव स्त्री -पुरुषों को अपने साथ हस्तिनापुर की ओर लेकर आरहे थे तो पाटन (जिला मेहसाना ) में आकर अहीरों (आभीरों ) ने यादवों की स्त्रियों एवं पुरुषों  को लूटा था।अर्जुन सक्षम होते हुए भी उनकी रक्षा नहीं कर सके ।

समय के साथ -साथ अर्जुन का तेज-बल भी बिना नारायण श्री कृष्ण के क्षीर्ण  हो चुका था ,वास्तविक सत्यता यही है ।दूसरी बात इससे यह भी स्पस्ट है कि अहीर (आभीर )  यादव नहीं थे ,वे गोप या ग्वाला थे जिनके  अधिपति गोकुल के नन्द जी थे , जो श्री कृष्ण के पालक पिता थे।  श्री कृष्ण के माता -पिता वसुदेव व देवकी यादवों की वृष्णि एवं अन्धक शाखा के थे ।श्री कृष्ण के बाद उनके प्रपौत्र श्री वज्रनाभ यदुवंश के उत्तराधिकारी हुये ।पुराणों के अनुसार वे ही अर्जुन के साथ अन्य यदुवंश की स्त्री -पुरुष एवं बच्चों के साथ हस्तिनापुर  आये ।साथ आये हुए यादवों के परिवारों को पांडवों ने पंजाब ,इंद्रप्रस्थ तथा मथुरामण्डल में बसा दिया ।इस प्रकार इस ब्रजमंडल में पुनः यादवों की बस्तियाँ बस गई तथा मथुरा नगर को उन्होंने अपना केंद्र बनाया ।यह क्षेत्र जरासंध के आक्रमणों की बजह से तहस -नहस हो चुका था ,जिसका राजा परीक्षत के सहयोग से विकास एवं विस्तार किया गया।
वज्रनाभ के पश्चात शूरसेन प्रदेश पर किन राजाओं ने राज्य किया  या और उनमें से कितने वज्रनाभ के वंशज थे तथा उनका क्या नाम था -इन सब बातों का प्रमाणिक विवरण उपलब्ध नहीं है।

महाभारत के बाद से बुद्ध के पूर्व तक -शूरसेन देश—-

महाभारत -युद्ध के बाद आर्यावर्त के अन्य जनपदों की तरह शूरसेन जनपद का भी व्यवस्थित इतिहास उपलब्ध नहीं है ।पुराणों से केवल इतना ज्ञात होता है कि महाभारत काल के बाद से मगध नरेश महापद्यमनंद तक शूरसेन प्रदेश पर तेईस राजाओं ने राज्य किया था ।लेकिन उनकी नामावली पुराणों में भी नहीं मिलती ।परीक्षत के समय इस प्रदेश के राजा बज्रनाभ थे तथा इसके वाद जनमेजय के समय में बज्र के पुत्र प्रतिबाहु का शासन सम्भवतः होगा।”गर्ग संहिता “में वज्र के पुत्र और उत्तराधिकारी का नाम प्रतिवाहू लिखा गया है।प्रतिबाहू का पुत्र और उत्तराधिकारी सुबाहु था , जो बड़ा यशस्वी राजा था।सुवाहु का पुत्र शान्तसेन और उसका पुत्र शतसेन हुआ ।ऐसा उल्लेख श्रीमद्भागवत में भी मिलता है।वैसे जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में भी वुद्ध के पूर्ववर्ती मथुरा के एक राजा का नाम सुबाहु मिलता है।
पुराणों में शूरसेन जनपद के राजाओं की नामावली नहीं दी गई , जब कि उसी काल के कुरु और पंचाल जनपदों के राजाओं की विस्तृत नामावलियां उनमें उपलब्ध है ।इससे समझा जा सकता है कि उस काल में शूरसेन के राजागण कुरु और पंचाल प्रदेशों के राजाओं के समान महत्वपूर्ण नहीं हुए होंगे ।इसी लिए पुराणों में उनके नामों का उल्लेख करना आवश्यक नहीं समझा गया ।इस काल में कुरु एवं पंचाल जनपदों का राजनैतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव शूरसेन जनपद पर अवश्य पडा होगा।शूरसेन प्रदेश की स्थिति।इन दोनों शक्तिशाली राज्यों के बीच में थी ।
प्राकृ-बौध्दकाल में शूरसेन जनपद वैदिक धर्म का एक प्रधान केन्द्र था , जिसका पता बौद्ध साहित्य से चलता है।महात्मा बुद्ध के आविर्भाव के पहले भारत में सोलह बड़े महाजनपद थे।प्राचीन बौद्ध एवं जैन साहित्य में ये ” सोलह महाजनपद ” के नाम से प्रसिद्ध थे ।इनमें से कई महाभारत -युद्ध से पूर्व भी विद्यमान थे ।
1-काशी (राजधानी वाराणसी ) ,2- कौशल (श्रावस्ती ) ,3-मगध ( गिरिब्रिज ), 4-अंग ( चंपानगरी ) , 5-वज्जि (वैशाली ), 6-मल्ल ,7-चेदि ( सूक्तिमति ), 8-वंस या वत्स (कौशाम्बी ) ,9-कुरु (इंद्रप्रस्थ ) ,10-पंचाल (उत्तर पंचाल जिसकी राजधानिअहिच्छत्रा और दक्षिण पंचाल की राजधानी कांपिल्य ) ।पंचाल को आधुनिक रुहेलखण्ड भी कहते है।11-मत्स्य (विराट ), कुरु राज्य के दक्षिण तथा यमुना के पश्चिम में यह राज्य था।12-शूरसेन , मत्स्य राज्य के पूर्व में था ।राजधानी मथुरा थी ।13-अस्सक या अश्मक (पाटन ) ,14-अवंती(आधुनिक पश्चिमी मालवा जिसकी राजधानी उज्जयनी थी ), 15-गन्धार ( तक्षशिला ) ,16- कम्बोज
उपर्युक्त 16 बड़े जनपदों के अतिरिक्त तत्कालीन भारत में अनेक छोटे जनपद भी थे जैसे केकय ,त्रिगर्त ,यौधेय ,अम्बष्ठ ,शिवि ,सौवीर तथा आंध्र आदि।16 जनपद बहुत काल तक यथापूर्व स्थिति में नहीं रह सके ।इनमें से कुछ को दूसरों ने हड़प कर अपना विस्तार बढ़ाने की भावना बढ़ी , विशेषकर पूर्वी जनपदों में ।काशी ,मगध ,अंग तथा वत्स आदि राज्यों में यह बात स्पस्ट रूप से पायी जाती है ।इस का परिणाम यह हुआ कि विभिन्न जनपदों के बीच संधि-विग्रह की घटनाएं द्रुतगति से बढ़ने लगी ।महात्मा बुद्ध के समय तक आते -आते मगध, कौशल ,वत्स तथा अवन्ति ये भारत के चार प्रधान राज्य बन गए और इनके सामने प्रायः सभी अन्य जनपदों की स्थिति गौण हो गई ।

मगध साम्राज्य के अंतर्गत शूरसेन जनपद

इन चारों राज्यों, मगध ,कौशल ,वत्स तथा अवन्ति   ने अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इन्होंने अपने समीपवर्ती जनपदों के साथ वैवाहिक संबन्ध भी स्थापित किये।अवन्ती के तत्कालीन शासक चन्द्रप्रद्योत ने अपनी पुत्री का विवाह शूरसेन देश के राजा के साथ किया , जिससे अवन्तिपुत्र का जन्म हुआ।तत्कालीन समृद्ध एवं विशाल अवन्ती राज्य के साथ शूरसेन राज्य का वैवाहिक संबंध इस बात का सूचक है कि उस समय भी शूरसेन जनपद  की स्थिति महत्वपूर्ण समझी जाती थी।यह भी सम्भव है कि इस वैवाहिक संबंध द्वारा अवन्ती राज्य के कुछ प्रभाव से शूरसेन जनपद भी स्थापित हो गया हो।

बौद्ध साहित्य में शूरसेन एवं मथुरा —
बौद्ध साहित्य में सोलह जनपदों के अंतर्गत शूरसेन जनपद एवं उसकी राजधानी मथुरा का उल्लेख मिलता है । अवन्तिपुत्र का नाम बौद्ध साहित्य में कई स्थानों पर मिलता है ।ललित विस्तर ग्रंथ में शूरसेन देश के राजा सुबाहु का भी उल्लेख आया है ।यह नहीं कहा जा सकता कि सुबाहु और अवन्तीपुत्र में क्या संबंध था ।शूरसेन देश का राजा अवन्तीपुत्र पहले वैदिक धर्म का अनुयायी था ,परंतु बाद में यह बुद्ध के संपर्क में आने पर बौद्ध धर्म का  उसने इस क्षेत्र में बहुत विस्तार किया ।यदि यह बात सत्य है कि मथुरा का तत्कालीन यदुवंशी शासक अवन्तिपुत्र बौद्ध हो गया , तो हो सकता है कि यहां की अधिकांश जनता ने भी बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया हो ।
अष्टधायी में पाणिनि ने भी अपने साहित्य में मथुरा क्षेत्र में पांचवी ई0 सी0 में मध्य श्री कृष्ण के अन्धक- वृष्णि शुरसेनियों के होने के विषय में लिखा है जो कृष्णभक्ति को मानने वाले थे।ऐसा प्रतीत होता है कि मगध में शिशुनाग वंश के समय तक शूरसेन जनपद ने अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रहा।सम्भवतः अवन्तीपुत्र के बाद उसके वंशजों का यहां पर शासन रहा हो।
पांचवी सती ई0 पूर्व के अंत में मगध नंद वंश के अधिकार में आया ।इस वंश में महापद्मनन्द प्रतापी शासक हुआ ।साम्राज्यवाद की महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर महापाध्यनन्द ने तत्कालीन उत्तर भारत के अनेक छोटे -बड़े राज्यों के क्षत्रियों का अस्तित्व समाप्त कर दिया ।इन्ही कारणों से उसे पुराणों में “अखिल क्षत्रान्तक ” तथा ” एक्चक्षत्र “कहा गया है ।महापद्मनन्द ने कलिंग ,चेदि , मिथिला , काशी ,कुरु और पंचाल आदि अनेक जनपदों पर अपना अधिकार कर लिया ।शूरसेन प्रदेश को भी जीत कर उसने इस प्रदेश को भी अपने विशाल साम्राज्य में मिला लिया होगा।
नन्द वंश की समाप्ति के वाद मगध पर मौर्य वंश का शासन प्रारम्भ हुआ इसमें शूरसेन जनपद एवं मथुरा क्षेत्र भी शामिल था ।चंद्रगुप्त मौर्य (ई0पूर्व 325-298 ) इस वंश का पहला शासक था जिसका मंत्री चाणक्य या कौटिल्य था जिसकी मदद से मगध साम्राज्य को बहुत बढ़ाया गया ।कौटिल्य ने भी शुरसेनियों के लिए वृष्णि तथा कुकुर संघ का वर्णन किया है ।मौर्य शासन काल में मथुरा की उन्नति हुई।मैगस्थनीज ने भी शुरसेन प्रदेश तथा शुरसेनियों की भी चर्चा की है ।वह लिखते है कि-“शौरसेनाइ “एक भारतीय जाति के लोग “हेराक्लीज़” को बहुत आदर की दृष्टि से देखते हैं। शौरसैनाई लोगों के दो बड़े नगर है – “मेथोरा ” और क्लीसोबोरा ,उनके राज्य में जोबरेस नदी बहती है ,जिसमें नावें चलती है ।सम्भवतः यह नदी यमुना ही है ।इससे यह।सिद्ध होता है कि मैगस्थनीज के समय में।मथुरा जनपद शूरसेन देश कहलाता था और उसके निवासी “शौरसेन ” ।हेराक्लीज से यहां तातपर्य श्री कृष्ण से है ।

इन यादवों का राज्य ब्रज प्रदेश में ,सिकन्दर के आक्रमण के समय में , होना पाया जाता है।समय -समय पर शक ,मौर्य ,गुप्त ,हूण तथा सीथियनों आदि ने मथुरा में राज्य किया और यादवों का राज्य दबाया लेकिन अवसर मिलते ही यदुवंशी फिर स्वतंत्र हो जाते थे ।
मथुरा का शायद अंतिम नाग राजा गनपतिंगा था , जिसको लगभग चतुर्थ शताब्दी के मध्य गुप्त साम्राज्य के सम्राट समुद्रगुप्त ने पराजित किया।समुद्रगुप्त से युद्ध के बाद मथुरा धीरे -धीरे समाप्त होने और नाग सम्राज्य की राजधानी नहीं रहा ।साथ ही एक स्वतंत्र राज्य के रूप में भी अस्तित्व नहीं रहा ।मथुरा क्षेत्र गुप्त साम्राज्य से जुड़ गया किन्तु उसकी शासन व्यवस्था के विषय में ज्ञात नहीं है।राजकुमारों की एक पीढ़ी मुख्यतः यादव वंश की थी जिसका शासन बयाना (जो भरतपुर जिले से जुड़ा हुआ है ) पर तृतीय शताब्दी के कुछ समय से लेकर चतुर्थ शताब्दी के अंत तक रहा जिसका प्रमाण संवत 428 (सन 371) शिलालेख में मिलता है जिससे लगता है कि  सम्पूर्णरूप से   अथवा आंषिकरूप से मथुरा राज्य  गुप्त शासन के अधीन माना जा सकता है।
लगभग 6वीं शताब्दी के मध्य में कन्नौज के मौखरी स्वतंत्र और शक्तिशाली हो गए थे ।उनका शासन सम्भवतः  वर्तमान उत्तरप्रदेश की सीमा में आता था जिसमे मथुरा क्षेत्र भी सम्मलित था ।कामा के पुराने किले में जो भरतपुर जिले में है ,एक पत्थर प्रस्तर खम्भ जिस पर 37 पंक्तियों का एक संस्कृति में अभिलेख मिला है जो  शायद 8 वीं शताब्दी का प्रतीत होता है , जिसमें शूरसेन परिवार के 7 शासकों का उल्लेख मिलता है जिन्हें शौरी कृष्ण के वंशज कहा गया है जिनमें अंतिम नाम वत्सदामन  है।कामा के अभिलेख जो 8 वीं शताब्दी का है उसके रिकार्ड के अनुसार विष्णु भगवान का मंदिर वत्सदामन के शासनकाल में बनवाया  गया था जो कि शूरसेन वंश के फक्का का सातवां वंशज था ।यदि हम वत्सदामन को 750 या 775 ई 0 सन का मानते हैं तो  फक्का इस परिवार  का प्रथम व्यक्ति या मुखिया  था जो 6वीं शताब्दी के अंत तक जीवित रहा था और उनका परिवार मथुरा की शूरसेनी (शूरसेन के कुलज )  या यादवा  शाखा  में आता है ।दूसरे रूप में हम कह सकते है कि फक्का के ये वंशज मथुरा के शूरसेनी या यादवा (जादों )थे।
मौखरिस शासक यशोधर्मन वृतांत के तुरंत बाद या 7 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जब मौखरी शासन का प्रभुत्व समाप्त हुआ पुनः शूरसेन शाखा के इन यादवों ने मथुरा को प्राप्त कर लिया तथा  अपनी राजधानी बना लिया।

   ह्वेनसांग का  मथुरा के संदर्भ में मत-

हुएन -सांग   सम्भवतः मथुरा नहीं आया और उसने अपनी त्वरित यात्रा में थोड़े से ही क्षेत्र में घूमा ।उसके एक छोटे से वाक्य में स्थानीय राजाओं का उल्लेख मिलता है ।राजा और उसके अनुयायी (मन्त्रीगण ) अच्छे कार्यों में संलग्न थे ।उनका नाम उल्लेखित नहीं किया गया ।किन्तु कनिघम के अनुसार उस समय मथुरा के क्षेत्रीय शासक के रूप में  शूरसेन राजा फक्का या उनका पुत्र और वंशज कुलभट्ट  अथवा उसके बाद के शासक के  पुत्र एवं  वंशज अजीत हो सकता है ।तत्कालीन मथुरा राज्य की सीमा का विस्तार शायद पश्चिम , दक्षिण और पूर्वी सीमाओं के पार हो चुका था ।
हर्ष की मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य टूट गया और आधी शताब्दी तक अन्धकार और अव्यवस्था /अराजकता उत्तरी भारत में विद्यमान रही थी , जिसने यद्धपि मथुरा साम्राज्य को भी प्रभावित नहीं किया था।मथुरा साम्राज्य पर शूरसेन वंश के राजा अजीत , दुर्गभट्ट एवं दुर्गदामा का शासन रहा ।इस समय एक राजकुमार जिन्नदत्त जो मथुरा के एक यादव राजा का पुत्र था उसने जैन धर्म अपना लिया और वह दक्षिण भारत के हम्मच्चा  क्षेत्र में चला गया और उसने वहां उसने  संतार राज्य स्थापित किया ।
7वीं शताबदी के अंत और 8 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में कन्नौज के राजा यशोवर्मन ( सन 690-740 )  शक्तिशाली हुआ और सम्पूर्ण भारत का शासक /स्वामी वन गया ।उसने सम्भवतः मथुरा को भी जीत लिया किन्तु शायद  शूरसेन राजाओं सम्भवतः देवराज एवं वत्सदामन को अपने सामन्त के रूप में बढ़ने दिया । शायद इस शूरसेन वंश के अंतिम राजकुमार वत्सदामा के पुत्र अन्यदामा थे ।कल्हण  के राजतरंगिणी के अनुसार कश्मीर के राजा ललितादित्य  ने अस्थायी रूप से यशोवर्मन के साम्राज्य को  (जिसमें मथुरा भी सम्मलित था ) जीता था और इसके कुछ थोड़े समय बाद लगभग 8वीं  शताब्दी के बन्द होने तक कश्मीर में एक मंदिर मथुरा के तत्कालीन शासक के  दामाद द्वारा बनवाया गया था।
ए 0 कनिंघम की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार कामां शिलालेख के अनुसार मथुरा राज्य के प्रसिद्ध शूरसेनी शाखा के प्रमुख कामां के शासकों के नाम क्रमशः इस प्रकार है –1-फक्क -पत्नी देयिका , 2-कुलाभट (पुत्र )- पत्नी द्रंगेनी ,3-अजित (पुत्र ) -पत्नी अप्सराप्रिया , 4- दुर्गभट  (पुत्र )- पत्नी वच्छलिका  ,5 दुर्गादमन (पुत्र)- पत्नी वच्छिका , 6-देवराज (पुत्र) -पत्नी यजनिका , 7-वत्सदमन (पुत्र) , 8-अन्यदामा ।
रानी वच्छलिका जो शूरसेन शासक दुर्गभट की पत्नी थे ने कामां में विष्णु मंदिर बनवाया था।
इस विवरण से यह भी प्रमाणित होता है कि 200 वर्ष के इस कालखण्ड में मथुरा का शूरसेन राज्य  उत्थान -पतन के दौर से गुजरते हुए भी बरकरार विद्यमान रहा ।

  विक्रम संवत 1012 / 955ई0 के बयाना अभिलेख से ज्ञात होता है कि फक्का के परिवार में एक बपुक्का नाम का राजा हुआ जिसके पुत्र का नाम राजयिका था जिसकी पत्नी का नाम सज्जनी था जो मयूरिका परिवार से थी ।राजयिका के पुत्र के पुत्र का नाम ज्ञात नहीं है लेकिन वह परमार वंश की महिला यसोकारी से विवाहित था जिससे प्रमाणित होता है कि शुरसेनियों का सम्बंध आधुनिक ग्वालियर के परमार राजपूतों से रहा था ।राजयिका की पुत्री का नाम चित्रलेखा था जिसका विवाह मंगला राजा के साथ हुआ और उनके चार पुत्र हुए जिनमें बड़े पुत्र का नाम ज्ञात नहीं है , बाकी तीन पुत्रों के नाम इंद्रजीत , लक्षमणराजा एवं चामुंडाराजा थे ।ये पूर्व के शूरसेन शासक सम्भवतः कन्नौज के प्रतिहारों के सामन्त होंगे।956 ई0 में राजा महिपाल के शासन में उनकी रानी चित्रलेखा ने विष्णुभगवान का मंदिर बनवाया ।ऐसा प्रतीत होता है कि महिपाल प्रतिहार शासक थे , इस समय प्रतिहार राजोर (अलवर ) जो बयाना के पास में है प्रतिहारों के अधीन था।

     8 वीं शताब्दी से लेकर 12 वीं शताब्दी तक  (800-1200 ई0 सन )के कालखण्ड  को इतिहासवेत्ताओं ने “राजपूत काल “ का नाम दिया है ।इस कालखण्ड में मथुरा राज्य की स्थिति कुछ इस प्रकार रही –
9 वीं  शताब्दी के दौरान एवं 10 वीं शताब्दी के अधिकांश भाग में मथुरा राजाओं की राजधानी नहीं रहा ।यह क्षेत्र शायद बयाना के यादवों (जादों ) के अधीन था जिन्होंने अपने आप को धर्मपाल के नेतृत्व  में 9 वीं शताब्दी के आरम्भ में  कन्नौज के गुर्जर -प्रतिहारों( प्रतिहार राजा भोज प्रथम तथा महिपाल द्वितीय ने इस क्षेत्र पर भी अपनी सत्ता स्थापित की )  के सामन्त के रूप में स्थापित किया था।ये यादव कामा के पुराने शूरसेनीयों से जुड़े हुए थे और बाद में इस क्षेत्र के शासकों के रूप में स्थापित हो गये ।ये कामां के शूरसेनी यादव मथुरा के प्रसिद्ध  प्राचीन शूरसेन राजवंश की एकमात्र शाखा के वंशज थे।

लगभग 10 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य क्षीर्ण (छिन्न -भिन्न ) होने पर उनके अन्य सामन्तों के साथ , यादव भी स्वतंत्र होने की कोशिश में लगे हुए थे ।स्वतंत्र होने पर अन्य राजपूत सामन्तों के साथ ही यादवों ने भी अपने अलग राज्य स्थापित किये।  लगभग उसी  समय (एक दूसरे  यदुवंशी शासकों का परिवार ) जो सम्भवतः बयाना घराने की शूरसेनी यादव शाखा  या पुराने कामा की  शुरसेनों की शाखा से सम्बंधित यादवों  ने अपने आप को महावन  (यमुनापार मथुरा से 12 किलोमीटर दक्षिण -पूर्वी क्षेत्र है ) पर स्थापित कर लिया और सम्पूर्ण  ब्रज (जिसमें  सम्पूर्ण मथुरा जिला आता है ) पर शासन करने लगे।

ई0 1018 में जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया तब मथुरा के निकट महावन में यदुवंशी कुलचन्द शासन करता था।महमूद गजनवी बरन (आधुनिक बुलन्दशहर ) के राजा हरद्दत को पराजित करके महावन पहुंचा ।महावन के शासक कुलचन्द के अधीन कई दुर्ग थे तथा आस -पास के अनेक राजा उसके अधीन थे।जब कुलचन्द ने सुना कि महमूद नामक म्लेच्छ अपनी विशाल सेना  (जिसमे 1 लाख घुड़सवार तथा 20 हजार पैदल सैनिक ) लेकर आ रहा है तो वह घने जंगलों के बीच स्थित अपने दुर्ग में चला गया और वहां उसने महमूद गजनवी का सामना किया ।हिन्दू सैनिक म्लेच्छों के क्रूर कृत्य से घबरा गए ।हजारों हिन्दू सैनिक मौत के घाट उतार दिए गए और सैकड़ों ने जीवित ही यमुना में कूद कर अपने धर्म की रक्षा की।कुलचन्द ने कोई उपाय शेष न जानकर अपनी रानी की हत्या कर दी और स्वयं भी उसी के साथ यमपुर चला गया ।इस युद्ध में 5000 या 50000 हिन्दू वीर खेत रहे ।इस विजय से महमूद को 185 बढ़िया किस्म के हाथी तथा बहुत बड़ा खजाना हाथ लगा जिसे लेकर वह मथुरा चला गया और मथुरा को भी उसने खूब लुटा और सभी मन्दिरों को एवं उनमें विद्यमान सभी देवताओं एवं देवियों की मूर्तियों को तहस -नहस कर नष्ट कर दिया ।महमूद के द्वारा मथुरा की बरबादी की चर्चा अन्य कई मुसलमान लेखकों ने भी की है ।इनमें बदायूंनी तथा फरिश्ता के विवरण उल्लेखनीय है ।रे
मथुरा एवं महावन के पतन के बाद इस क्षेत्र को बयाना के यादवों द्वारा ग्रहण किया गया था ।सम्भवतः इसी यदुवंश का राजा जयेन्द्र पाल 11वीं शताब्दी में यादवों की गद्दी पर बैठा।उसका उत्तराधिकारी विजयपाल हुआ ।इसी विजयपाल का उल्लेख बयाना के ई0 1044के शिलालेख में विजय नाम से हुआ है।विजयपाल का उत्तराधिकारी तहनपाल था जिसने बयाना से 22किमी0 दूर तहनगढ़ दुर्ग का निर्माण कराया ।इसका शासन मथुरा ,भरतपुर ,आगरा ,अलवर ,गुणगांव तथा कुछ भाग ग्वालियर क्षेत्र को जोड़ते हुए सम्पूर्ण डांग क्षेत्र पर था।विजयपाल  से 4 या 5 वां वंशज अजयपाल हुआ (ई0 1135-1160 )जिसका शिलालेख विक्रम संवत 1207 या ई0 सन 1150 अस्सी खम्भा नाम की मस्जिद के खम्मे में महावन किले में अंकित  है जिसे नन्द महल भी माना जाता है।महावन के राजा अजयपाल का वर्णन जैन साहित्य में भी मिलता है , उस समय महावन जैन धर्म का केंद्र भी था तथा वहां का शासक महाराजाधिराज अजयपाल देवा जैन धर्म का अनुयायी भी था ।यह इमारत मूलतः मन्दिर थी जिसे बाद में महमूद ने मस्जिद में तबदील कर दिया था।इसी जगह एक और शिलालेख में अजयपाल का वंशज हरीपाल (ई0 सन 1170 ) का भी उल्लेख मिलता है ।इसके बाद हरीपाल का पुत्र सहनपाल महावन  का राजा हुआ ।अघापुर से ई0 1192 का एक लेख एक मूर्ति के नीचे से मिला है ।अघापुर पूर्व भरतपुर रियासत का हिस्सा था।इस शिलालेख में राजा सहनपाल देव का उल्लेख है ।इसके बाद अनंगपाल राजा हुआ।उक्त प्रमाणों के आधार पर माना जा सकता है कि यदु वंश के जादों शासकों ने इस मथुरा क्षेत्र पर मुस्लिम आक्रमणों से पूर्व और कुछ दशक बाद तक शासन किया था।कहा जा सकता है कि वैदिक काल से यमुना के पश्चिम में यादवों ने अपनी सत्ता किसी न किसी रूप में बनाये रखी।यह समय -समय पर घटती बढ़ती तो रही।ग्यारहवीं एवं बारहवीं शताब्दी में यादवों ने अपनी सत्ता श्रीपथ  (आधुनिक बयाना ) के आस -पास केंद्रित कर ली।श्रीपथ उनकी राजधानी रही ।

संदर्भ —

1-राजपूताने का प्राचीन इतिहास -पण्डित गौरी शंकर ओझा ।
2-ब्रज के धर्म -सम्प्रदायों का इतिहास -डा0 प्रभुदयाल मीतल ।
3-ब्रज का इतिहास (भाग 1, 2 -डा 0 कृष्णदत्त वाजपेयी ।
4-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास -प्रभुदयाल मीतल ।
5-ब्रज की कलाओं का इतिहास -प्रभुदयाल मीतल ।
6-प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति -डा0 कृष्ण चंद श्रीवास्तव ।
7-हिन्दू धर्म कोष -संपादक राजबली पांडेय ।
8-मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास – प्रोफेसर चिंतामणि शुक्ल ।
9-उत्तरभारत का राजनैतिक इतिहास -डा0 विशुद्धानंद पाठक
10-पाणिनीकालीन भारतवर्ष -डा 0 वासुदेवशरण अग्रवाल ।
11-भारत का इतिहास -रोमिला थापर ।
12-सल्टनतकालीन भारत का इतिहास -आबिद रिजवी ।
14-दिल्ली सल्तनत -डा0 आशावार्दी  श्रीवास्तव ।
15-कौटिल्य कालीन भारत -आचार्य दीप शंकर ।
16-कन्नौज का इतिहास -आनंदस्वरूप मिश्र।
17-राजस्थान के प्राचीन नगर एवं कस्वे -कैलाश चन्द जैन ।
18-आगरा जनपद का राजनैतिक इतिहास-प्रो0 चिंतामणि शुक्ल ।
19-प्राचीन भारत -डॉ0 सत्यकेतु विद्यालंकार ।
20-भारत का बृहद इतिहास (भाग 1, 2,3 )-रमेशचन्द मजूमदार  ।
21-मथुरा कला-वी0 एस0 अग्रवाल ।
22-पतंजलि के समय में भारत-बी0 एन0 पुरी ।
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29-पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ ऐशियन्ट इंडिया पंचम संस्करण कलकत्ता ,1950, -राय चौधरी  ,
30-दि क्लासिकल एज (बम्बई 1954 ) -मजूमदार तथा पुसलकर ।
31-ग्रॉउज -मेम्बायर द्वियीय संस्करण इलाहाबाद ,1882 ।
32-कनिघम -आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया -एनुअल रिपोर्ट जिल्द 20 (1882-83 ) .।
33-मथुरा के यमुना तटीय स्थलों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास -जयन्ती प्रसाद शर्मा ।
34-यादवा ऑफ श्रीपथा (बयाना ),शोधक ,भाग 7 ,1978 ,-राम पांडे ।
35-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट , 1874 ई0
36-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत

37-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली
38-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
39-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
40-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच
41-उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर मथुरा ,1959 ।

लेखक-डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव -लाढ़ौता, सासनी ,जिला -हाथरस
उत्तरप्रदेश
एसोसिऐट प्रोफेसर ,कृषि मृदाविज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय , सवाइमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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