मथुरा के प्राचीन पौराणिक यदुवंशी जादों क्षत्रिय राजवंश का ऐतिहासिक अवलोकन

मथुरा के प्राचीन पौराणिक यदुवंशी जादों क्षत्रिय राजवंश का ऐतिहासिक अवलोकन —–

श्री कृष्ण के पूर्व शूरसेन जनपद पर जिन राजवंशों ने शासन किया उनके सम्बन्ध में कुछ विवरण पौराणिक तथा अन्य साहित्य में मिलते हैं। सबसे प्राचीन सूर्यवंश मिलता है, जिसके प्रथम राजा-वैवस्वत मनु से इस वंश की परम्परा मानी गयी है। मनु के कई पुत्र हुए, जिन्होंने भारत के विभिन्न भागों पर राज्य किया। बड़े पुत्र इक्ष्वाकु थे, जिन्होंने मध्य देश में अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया। अयोध्या का राजवंश मानव या सूर्य वंश का प्रधान वंश हुआ और इसमें अनेक प्रतापी शासक हुए।

मनु के दूसरे पुत्र का नाम नाभाग मिलता है और इनके लिए कहा गया है कि इन्होंने तथा अंबरीष आदि इनके वंशजों ने यमुनातट पर राज्य किया। यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है कि नाभाग तथा उनके उत्तराधिकारियों ने कितने प्रदेश पर और किस समय तक राज्य किया।

चंद्रवंश—–

मनु की पुत्री का नाम इला था, जो चन्द्रमा के लड़के बुध को व्याही गयी। उससे पुरुरवा का जन्म हुआ और इस पुरूरवा ऐल से चन्द्रवंश चला। सूर्य वंश की तरह चन्द्र वंश का विस्तार बहुत बड़ा और धीरे-धीरे उत्तर तथा मध्य भारत के विभिन्न प्रदेशों में इसकी शाखायें स्थापित हुई।

पुरूरवा एवं प्रतिष्ठान —

पुरुरवा ने प्रतिष्ठान ( 1 ) में अपनी राजधानी स्थापित की । पुरुरवा के उर्वशी से कई पुत्र हुए। सबसे बड़े का नाम आयु था, जो प्रतिष्ठान की गद्दी का अधिकारी हुआा। दूसरे पुत्र अमावसु ने कान्यकुब्ज (कनौज) ने में एक नये राज्य की स्थापना की। आयु के बाद अमावसु का पुत्र नहुष मुख्य शाखा का अधिकारी हुआ। इसका लड़का ययाति भारत का पहला चक्रवर्ती सम्राट हुआ, जिसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया (2) । ययाति के दो पत्नियां थीं—देवयानी और शर्मिष्ठा। पहली से यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्र हुए और दूसरी से दुह्य, पुरु तथा अनु हुए। पुराणों से यह भी पता चलता है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गया था और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य न प्राप्त होगा (3 ) । ययाति अपने सबसे छोटे लड़के पुरु को बहुत चाहता था और उसी को उसने राज्य देने का विचार प्रकट किया। परन्तु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया (4 ) । यदु ने पुरु के पक्ष का समर्थन किया और स्वयं राज्य लेने से इनकार कर दिया। इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाला का शासक हुआ। उसके वंशज ‘पौरव’ कहलाये।
अन्य चारों भाइयों को जो प्रदेश दिये गये उनका विवरण इस प्रकार है-यदु को चर्मण्वती (चंबल), क्षेत्रवती (बेतवा) और शुक्तिमती (केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। तुर्वसु को प्रतिष्ठान के दक्षिण का भू-भाग मिला और दृहा को उत्तर-पश्चिम का। गंगा-यमुना दोआव का उत्तरी भाग तथा उसके पूर्व का कुछ प्रदेश, जिसको सीमा अयोध्या राज्य से मिलती थी, अनु के हिस्से में आया।

यादव वंश- —

यदु अपने सब भाइयों में प्रतापी निकला। उसके वंशज ‘यादव’ नाम से प्रसिद्ध हुए। महाभारत के अनुसार यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, दुह्य से भोज तथा अनु से म्लेच्छ जातियों का आविर्भाव हुआ (5 )।

यादवों ने कालांतर में अपने केन्द्र दर्शाण, अवन्ती, विदर्भ, और माहिष्मती में स्थापित कर लिये। भीम सात्वत के समय में मथुरा और द्वारका यादव-शक्ति के महत्वपूर्ण केन्द्र बने। इसके अतिरिक्त शाल्व देश (वर्तमान आबू तथा उसके पड़ोस का प्रदेश) में भी यादवों की एक शाखा जम गयी, जिसकी राजधानी पर्णाश नदी (आधुनिक बनास) के तट पर स्थित मार्तिकावत हुई।

अन्य राजवंशों के साथ यादवों को कशमकश बहुत समय तक चलती रही। पुरुरवा के पौत्र तथा आयु के पुत्र क्षेत्रवृद्ध के द्वारा काशी में एक नये राज्य की स्थापना की गयी थी। दक्षिण के हैहयवंशी यादवों तथा काशी एवं आयोध्या के राजवंशों में बहुत समय तक युद्ध चलते रहे। हैहय यदुवंशियों ने अपने आक्रमण सूर्यवंशी राजा सगर के समय तक जारी रखे। इन हैहयों में सब से प्रतापी राजा कृतवीर्य का पुत्र कार्तवीर्य अर्जुन हुआ, जिसने नर्मदा से लेकर हिमालय की तलहटी तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया।

हैहयों की उत्तर की ओर बढ़ती हुई शक्ति को रोकने के लिए राजा प्रतर्दन के बेटे वत्स ने प्रयाग के समीप ‘वत्स’ राज्य की स्थापना की। इस राज्य की शक्ति कुछ समय बाद बहुत बढ़ गयी, जिससे दक्षिण की ओर से होने वाले आक्रमणों का वेग कम पड़ गया।

पुरुवंश की लगभग तैंतालीसवीं पीढ़ी में राजा दुष्यंत हुए, जिन्होंने कण्व ऋषि की पोषिता कन्या शकुन्तला के साथ गंधर्व विवाह किया। शकुन्तला से उत्पन्न भरत बड़े प्रतापी शासक हुए। उनके वंशज भरतवंशी कहलाये। इस वंश के एक राजा ने गंगा यमुना दोआब के उत्तरी भाग पर अपना आधिपत्य जमाया। यह प्रवेश कालांतर में भरतवंशी राजा भ्रम्यश्व के पांच पुत्रों के नाम पर ‘पंचाल’ कहलाया। भ्रम्यश्य के एक पुत्र का नाम मुद्गगल था, जिसके पुत्र वध्र्याश्व तथा पौत्र दिवोदास के समय पंचाल राज्य का विस्तार बहुत बढ़ गया। दिवोदास के बाद मित्रायु, मैंत्रेय, सोम, श्रृंजय और चवन इस वंश के क्रमशः शासक हुए। च्यवन तथा उसके पुत्र सुदास के समय में पंचाल जनपद को सर्वतोमुखी उन्नति हुई । सुदास ने उत्तर-पश्चिम की ओर अपने राज्य की सीमा बहुत बढ़ा लो (6) । पूर्व में इसका राज्य अयोध्या की सीमा तक जा लगा। सुदास ने हस्तिनापुर के तत्कालीन पौरव शासक संवरण को मार भगाया। इस पर संवरण ने अनेक राजाओं से सहायता ली और
सुदास के विरोध में एक बड़ा दल तैयार कर लिया। इस दल में पुरुओं के अतिरिक्त दुह्य, मत्स्य, तुर्वसु, यदु, अलिन, पक्व, भलनस, विवानी और शिवि थे (7 ) । दूसरी ओर केवल राजा सुदास था। उसने पणोनदी (रावी) के तट पर इस सम्मिलित सैन्यदल को परास्त कर अतुल शौर्य का परिचय दिया। संवरण को बाध्य होकर सिन्धु नदी के किनारे एक दुर्ग में शरण लेनी पड़ी।

कुछ समय बाद संवरण ने अपने राज्य को पुनः प्राप्त किया। उसका पुत्र कुरु प्रतापी राजा हुआ । उसने दक्षिण पंचाल को भी जीता और अपने राज्य का विस्तार प्रयाग तक किया। कुरु के नाम से सरस्वती नदी के आस-पास का प्रदेश ‘कुरुक्षेत्र’ कहलाया।

प्रश्न है कि उपर्युक्त दाशराज्ञ युद्ध के समय यादवों की मुख्य शाखा का राजा कौन था। पौराणिक वंश परम्परा का अवलोकन करने पर पता चलता है कि पंचाल राजा सुदास का समकालीन भीम सात्वत यादव का पुत्र अंधक रहा होगा। इस अंधक के विषय में मिलता है कि वह शूरसेन जनपद के तत्कालीन गणराज्य का अध्यक्ष था। संभवतः अंधक अपने पिता भीम के समान वीर न था। दासराज युद्ध से पता चलता है कि अन्य नौ राजाओं के साथ वह भी सुदास से पराजित हुआ ।

यदु से भीम सात्वत तक का वंश—

अब हम यदु से लेकर भीम सात्वत तक की यादव वंशावली पर विचार करेंगे। विभिन्न पुराणों में यदुवंश की इस मुख्य शाखा के नामों में अनेक जगह विपर्यय मिलते हैं। पार्जेंटर ने पुराणों के आधार पर जो वंश तालिका दी है (8 ), उसे देखने पर पता चलता है कि यदु के बाद उसका पुत्र कोष्ठ या कोष्ट्रि प्रधान यादव शाखा का अधिकारी हुआ (9 ) । उसके जिन वंशजों के नाम मिलते है वे ये हैं —-स्वाहि, यशद्गु, चित्ररथ और शशबिंदु । शशबिंदु प्रतापी शासक हुआ। उसने दुह्य लोगों को हराकर उन्हें उत्तर-पश्चिम की ओर पंजाब में भगा दिया, जहां उन्होंने कालांतर में गांधार राज्य की स्थापना की। शशबिंदु ने पुरुओं को भी पराजित कर उन्हें उत्तर-पश्चिम की ओर जाने के लिए विवश किया। इन विजयों में शशबिंदु को अपने समकालीन प्रयोध्या नरेश मांधाता से बड़ी सहायता मिली। मांधाता इक्ष्वाकु वंश में प्रसिद्ध राजा हुआ । उससे अच्छे सम्बन्ध बनाये रखने के लिए शशबिंदु ने अपनी पुत्री बिंदुमती का विवाह उसके साथ कर दिया। मांधाता ने कान्यकुब्ज प्रदेश को जीता और आनवों को भी पराजय दी।

शशबिंदु से लेकर भीम सात्वत तक यादवों की मुख्य शाखा के जिन राजाओं के नाम मिलते हैं वे ये हैं–बुधवस, अंतर , सुयज्वा, उशनस, शिनेयू , मरुत , कम्बलवहिर्स , रुक्म-कवच, परावृत, ज्यामघ, विदर्भ, कृथभीम, कुन्ति, धृष्ठ, निवंति, विदूरथ , दशाहं, ब्योमन, जीभूत, विकृति, भीमरथ, रखवर, दशरथ, एकदशरथ, शकुनि, करम्भ, देवरात, देवक्षेत्र, देवन, मधु , पुरुवश, पुरुद्वंत , जंतु या अभ्शु, सत्वत और भीम सात्वत।

उक्त सूची में यदु और मधु के बीच में होने वाले राजाओं में से किस-किस ने यमुना तटवर्ती प्रदेश पर (जो बाद में शूरसेन कहलाया) राज्य किया, यह बताना कठिन है। पुराणादि में इस सम्बन्ध में निश्चित कथन नहीं मिलते। पुराणों में कतिपय राजाओं के विषय में यत्र-तत्र कुछ वर्णन अवश्य मिलते हैं पर वे प्रायः अधुरे हैं। जैसे उशनस के सम्बन्ध में आया है कि उसने एक सौ अश्वमेध यज्ञ किये । कृथभीम को विदर्भ का शासक लिखा है। उसके भाई कौशिक से यादवों के चेदिवंश का प्रारम्भ हुआ। कृथभीम के बाद विदर्भ का प्रसिद्ध यादव शासक भीमरथ हुआ, जिसकी पुत्री दमयंती निषादराज नल को व्याही गयी।

मधु और लवण—-

यादवों में मधु एक प्रतापी शासक माना जाता है। यह चंद्रवंश की 61 वीं पीढ़ी के (ज्ञात नामों के अनुसार 44 वीं पीढ़ी) में हुआ। वह इक्ष्वाकु वंशी राजा दिलीप द्वितीय अथवा उसके उत्तराधिकारी दीर्घबाहू का समकालीन था। कुछ पुराणों के अनुसार मधु गुजरात से लेकर यमुना तट तक के बड़े भू-भाग का स्वामी था। संभवतः इस मधु ने अनेक स्थानों में बिखरे हुए यादव राज्यों को सुसंगठित किया। पुराणों, वाल्मीकि रामायण आदि में मधु के सम्बन्ध में जो विभिन्न वर्णन मिलते हैं, उनसे बड़ी भ्रांति पैदा हो गयी है। प्रायः मधु के साथ असुर , दैत्य , दानव आदि विशेषण मिलते हैं (10) । साथ ही अनेक पौराणिक वर्णनों में यह भी पाया हूँ कि मधु बड़ा धार्मिक एवं न्यायप्रिय शासक था। उसके पुत्र का नाम लवण दिया है। लवण को अत्याचारी कहा गया है। इसी लवण को मार कर अयोध्या नरेश श्रीराम के भाई शत्रुघ्न ने उसके प्रवेश पर अपना अधिकार जमाया।

पुराणों तथा वाल्मीकि रामायण में मधु और लवण की कथा विस्तार से दी हुई है। उसके अनुसार मधु के नाम पर मधुपुर या मधुपुरी नगर यमुना तट पर बसाया गया (11 ) । मधु को लोला नामक असुर का ज्येष्ठ पुत्र लिखा है। उसे बड़ा धर्मात्मा, बुद्धिमान और परोपकारी कहा गया है। मधु ने शिव की तपस्या कर उनसे एक अमोघ त्रिशूल प्राप्त किया। मधु की स्त्री का नाम कुभीनसी था, जिससे लवण का जन्म हुआ। लवण बड़ा
होने पर लोगों को अनेक प्रकार से कष्ट पहुंचाने लगा। इससे दुखी होकर कुछ ऋषियों ने अयोध्या जाकर श्रीराम
से सब बातें बतायीं और उनसे प्रार्थना की कि लवण के अत्याचारों से लोगों को शीघ्र छुटकारा दिलाया जाय ।अन्त में श्रीराम ने शत्रुघ्न को मधुपुर जाने की आज्ञा दी। शत्रुघ्न संभवतः प्रयाग के मार्ग से नदी के किनारे -किनारे चलकर मधुवन पहुंचे और वहां उन्होंने लवण का संहार किया (12) ।

चन्द्रवंश को ६१ वीं पीढ़ी में हुआ उक्त मधु तथा लवण-पिता मधु एक ही थे अथवा नहीं, यह विवादास्पद है। पुराणों आदि की तालिका में पूर्वोक्त मधु के पिता का नाम देवन तथा पुत्र का नाम पुरुषश दिया है और इस मधु को अयोध्यानरेश रघु के पूर्ववर्ती दीर्घबाह का समकालीन दिखाया गया है, न कि राम या दशरथ का । इससे तथा पुराणों के हर्यश्व -मधुमती उपाख्यान (13 ) से भासित होता है कि संभवतः यदुवंशी मधु तथा लवण-पिता मधु एक व्यक्ति न थे। इसमें संदेह नहीं कि लवण एक शक्तिशाली शासक था। हरिवंश से पता चलता है कि लवण ने राम के पास युद्ध का संदेश लेकर अपना दूत भेजा और उसके द्वारा कहलाया कि “हे राम
तुम्हारे राज्य के निकट ही में तुम्हारा शत्रु हूं। मुझ जैसा राजा तुम्हारे सदृश बलदृप्त ‘सामंत’ को नहीं देख सकता” (14 ) । लवण ने यह भी कहलाया कि रावणादि का वध करके राम ने अच्छा काम नहीं किया, बल्कि एक बड़ा कुत्सित कर्म किया है आदि ।

इस वर्णन से प्रतीत होता है कि लवण ने अपने राज्य का काफी विस्तार कर लिया था। इस कार्य में उसे अपने बहनोई हर्यश्व से भी सहायता मिली होगी। शायद लवण ने अपने राज्य की पूर्वी सीमा बढ़ाकर गंगा नदी तक कर ली थी और इस लिए राम को कहलाया था कि “मैं तुम्हारे राज्य के निकट ही शत्रु हूं।” लवण की दक्पोंति तथा राम के प्रति उसकी खुली चुनौती से प्रकट होता है कि इस समय लवण की शक्ति प्रबल हो गयी थी। अन्यथा उन राम से, जिन्होंने कुछ ही समय पूर्व रावण-जैसे दुष्ट शत्रु का संहार कर अपने शौर्य की धाक जमा दी थी, युद्ध मोल लेना हंसी-खेल न था। लवण के द्वारा रावण की सराहना तथा राम की निंदा इस बात का सूचक है कि रावण की बुरी नीति और कार्य उसे पसन्द थे। इससे अनुमान होता है कि लवण और उसका पिता मधु संभवतः किसी अनार्य शाखा के थे। हो सकता है कि ये दोनों शक्तिशाली यक्ष रहे हों। इस अनुमान की पुष्टि के लिए अभी अवश्य ही अधिक पुष्ट प्रमाणों की आवश्यकता है। मधु की नगरी मधपुरी के जो वर्णन प्राचीन साहित्य में मिलते हैं उनसे ज्ञात होता है कि उस नगरी का स्थापत्य उच्चकोटि का था। शत्रुघ्न भी उस रम्य पुरी को देख कर चकित हो गये और अनुमान करने लगे कि वह देवों के द्वारा निर्मित हुई होगी। प्राचीन वैदिक साहित्य में असुरों के विशाल तथा दृढ़ किलों एवं मकानों के अनेक उल्लेख मिलते हैं। संभव है कि लवण-पिता मधु या उसके किसी पूर्वज ने यमुना के तटवर्ती प्रदेश पर अधिकार कर लिया हो। जैसा कि ऊपर कहा गया है, यह अधिकार लवण के समय से समाप्त हो गया।

सूर्यवंश का आधिपत्य – —

शत्रुघ्न और लवण का युद्ध महत्व का है। इस युद्ध में शत्रुघ्न एक बड़ी सेना लेकर मधुवन पहुंचे होंगे। उनकी यह विजय यात्रा संभवतः प्रयाग होकर यमुना नदी के किनारे के मार्ग से हुई होगी। लवण ने उनका मुकाबला किया, परन्तु वह परास्त हुआ और मारा गया । शायद हर्वश्व भी इस युद्ध में समाप्त कर दिया गया। लवण के पिता मधु की मृत्यु इस युद्ध के पहले ही हो चुकी थी। इस विजय से अयोध्या के ऐक्ष्वाकुओं की धाक सुदूर यमुना तटवर्ती प्रदेश तक जम गई। रावण के वध से उनका यश पहले ही दक्षिण में फैल चुका था। अब पश्चिम की विजय से वे बड़े शक्ति शाली गिने जाने लगे और उनसे लोहा लेने वाला कोई न रहा।

शत्रुघ्न ने कुछ समय तक नये प्रदेश में निवास कर उसकी व्यवस्था ठीक की। यहां से जाते समय उन्होंने अपने पुत्र सुबाहू को इस नये ‘शूरसेन’ जनपद का स्वामी नियुक्त किया ( 15) ।लवण का वध करने के पश्चात् शत्रुघ्न ने जंगल (मधुवन) को साफ़ करवाया और मथूरा नामक पुरी को बसाया (16 ) इस प्रकार उस घने जंगल के कट जाने तथा पुरी का संस्कार हो जाने से नगर एवं जनपद की शोभा बहुत बढ़ गयी (17 )

ऐसा प्रतीत होता है कि मधुवन और मधुपुरी में निवास करने वाले लवण के अधिकांश अनुयायिओं को शत्रुघ्न ने समाप्त कर दिया। शेष भयभीत होकर अन्यत्र चले गये होंगे। तभी शत्रुघ्न ने उस पुरी को ठीक प्रकार से बसाने की बात सोची होगी। संभवतः उन्होंने पुरानी नगरी (मधुपुरी) को नष्ट नहीं किया। उन्होंने उससे दूर एक नई बस्ती बसाने की भी कोई आवश्यकता न समझी होगी। प्राचीन पौराणिक उल्लेखों तथा रामायण के वर्णन से यह प्रकट होता है कि उन्होंने जंगल को साफ़ कर वाया तथा प्राचीन मधुपुरी को एक नये ढंग से आबाद कर उसे सुशोभित किया। रामायण में देवों से वर मांगते हुए शत्रुघ्न कहते हैं-

“हे देवगण, मुझे वरदान दीजिए कि यह सुन्दर मधुपुरी या मधुरा नगरी, जो ऐसी लगती है मानों देवताओं द्वारा बनायी गयी हो, शीघ्र ही बस जाय।” (18 ) देवताओं ने ‘एवमस्तु’ कहा और कुछ समय बाद पुरी आबाद हो गयी। बारह वर्ष के अनन्तर इस मथुरा नगरी तथा इसके आस-पास के प्रदेश की काया ही पलट गयी।

यादव वंश का पुनः अधिकार-

पौराणिक अनुश्रुति से ज्ञात होता है कि शत्रुघ्न की मृत्यु के बाद यादव-वंशी सात्वत या सात्वत के पुत्र भीम सात्वत ने मधुरा नगरी तथा उसके आस-पास के प्रदेश पर अधिकार कर लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि हर्यश्व और मधुमती की संतति का संबंध भीम सात्वत और उसके वंशजों के साथ रहा। सम्भवतः इसीलिए हरिवंश में कहा गया है कि हर्यश्व का वंश यदुवंश के साथ घुलमिल जायगा।

भीम सात्वत के पुत्र अंधक और वृष्णि थे। इन दोनों के वंश बहुत प्रसिद्ध हुए। अंधक का वंश मथुरा प्रदेश का अधिकारी हुआ और वृष्णि के वंशज द्वारका के शासक हुए। महाभारत युद्ध के पूर्व मथुरा के शासक उग्रसेन थे, जिनका उत्तराधिकारी उनका पुत्र कंस हुआ। द्वारका के वृष्णि वंश में उस समय शूर के पुत्र वसुदेव थे। उग्रसेन के भाई देवक की सात पुत्रियां थीं, जिनमें देवकी सब से बड़ी थी। इन सातों का विवाह वसुदेव के साथ हुआ। वसुदेव को देवकी से कृष्ण पैदा हुए। वसुदेव की बहन कुन्ती राजा पांडु को ब्याही गयी, जिससे युधिष्ठिर , भीम ,अर्जुन आदि पांडवों का जन्म हुआ।

अंधक और वृष्णि द्वारा परिचालित राज्य गणराज्य थे, अर्थात् इनका शासन किसी एक राजा के द्वारा न होकर जनता के चुने हुए व्यक्तियों द्वारा होता था। ये व्यक्ति अपने में से एक प्रधान चुन लेते थे, जो ‘गण मुख्य’ कहलाता था। कहीं-कहीं इसे ‘राजा’ भी कहते थे, पर नृपतन्त्र वाले स्वेच्छाचारी राजा से वह भिन्न होता था। महाभारत के समय ग्रंधक और वृष्णि राज्यों ने मिल कर अपना एक
संघ बना लिया था। इस संघ के दो मुखिया चुने गये- अंधकों के प्रतिनिधि उग्रसेन और वृष्णियों के कृष्ण थे। संघ की व्यवस्था बहुत समय तक सफलता के साथ चलती रही और उसके शासन से प्रजा सन्तुष्ट रही।

प्राचीन मथुरा का वर्णन-

शत्रुघ्न के समय में और उसके बाद मधुरा या मथुरा नगरी के आकार और विस्तार का सम्यक् पता नहीं चलता। प्राचीन पौराणिक वर्णनों से इस सम्बन्ध में किचित् जानकारी प्राप्त होती है।

हरिवंश से ज्ञात होता है कि पुरानी नगरी यमुना नदी के तट पर बसी हुई थी और उसका आकार अष्टमी के चन्द्रमा जैसा था। उसके चारों ओर नगर-दीवाल थी, जिसमें ऊंचे तोरण-द्वार थे। दीवाल के बाहर खाई बनी हुई थी। नगरी धन-धान्य और समृद्धि से पूर्ण थी। उसमें अनेक उद्यान और वन थे। पुरी की स्थिति सब प्रकार से मनोज्ञ थी । मकान अट्टालिकाओं और सुन्दर द्वारों से युक्त थे। उनमें विविध वस्त्राभूषणों से अलंकृत स्त्री-पुरुष निवास करते थे। ये लोग राग – रहित और वीर थे। उनके पास बहुसंख्यक हाथी, घोड़े और रथ थे। नगर के बाजारों में सभी प्रकार का क्रय-विक्रय होता था और रत्नों के ढेर विद्यमान थे। मथुरा की भूमि बड़ी उपजाऊ थी और समय पर वर्षा होती थी। मथुरा नगरी के रहने वाले सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्न-चित्त दिखाई पड़ते थे (19) ।

यमुना नदी का प्रवाह प्राचीन काल से बदलता आया है। मधु और शत्रुघ्न के समय में यमुना की धारा उस स्थान के पास से बहती रही होगी जिसे अब महोली कहते हैं। वर्तमान मथुरा नगरी और महोली के बीच में बहुत से पुराने टीले दिखाई पड़ते हैं। इन टीलों से विविध प्राचीन अवशेष बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं, जिनसे इस बात की पुष्टि होती है कि इधर पुरानी बस्ती थी। इस भू-भाग की व्यवस्थित खुदाई होने पर सम्भवतः इस बात का पता चल सकेगा कि विभिन्न कालों में मथुरा की बस्ती में क्या-क्या परिवर्तन हुए।

वराह पुराण (अध्याय १६५, २१ ) से ज्ञात होता है कि किसी समय मथुरा नगरी गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी के बीच बसी हुई थी और इनके बीच की दूरी अधिक नहीं थी। वर्तमान स्थिति ऐसी नहीं है, क्योंकि अब गोवर्धन यमुना से काफी दूर है। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी समय गोवर्धन और यमुना के बीच इतनी दूरी न रही होगी जितनी कि आज है। हरिवंश पुराण में भी कुछ इस प्रकार का संकेत प्राप्त होता है। (20 )

संदर्भ–

1 -प्रतिष्ठान के सम्बन्ध में विद्वानों के विभिन्न मत है। कुछ लोग इसे प्रयाग के सामने वर्तमान झूसी और उसके पास का पीहन गांव मानते हैं। अन्य लोगों के मत से गोदावरी के किनारे वर्तमान पैठन नामक स्थान प्रतिष्ठानपुर था। तीसरे मत के अनुसार प्रतिष्ठान उत्तर के पर्वतीय प्रदेश में यमुना तट पर था। चितामणि विनायक वैद्य का अनुमान है कि पुरुरवा उत्तराखंड का पहाड़ी राजा था और वहीं उसका उर्वशी अप्सरा से संयोग हुआ। उसके पुत्र ययाति ने पर्वत से नीचे उतर कर सरस्वती के किनारे (वर्तमान अम्बाला के आस-पास) अपना केन्द्र बनाया। (वैध-दि सोलर ऍड लूनर क्षत्रिय रेसेज ग्राफ इंडिया, पू० ४७-४८) ।

(2 ) पुराणों के अनुसार ययाति ने सप्तद्वीप पृथ्वी को जीता। दे० हरिवंश १,३०,७ तथा १६ ।

(3 ) हरिवंश १,३०, २९ ।

(4 ) महाभारत ( नवीन पूना संस्करण, १९३३), १,८०,१३-१५
(5) “यदोस्तु यादवा जातास्तुसोयंबना सुता: । दुह्योरपि सुता भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः ।”
( महाभा०, १,८०,२६ )

(6 ) दे० अग्नि पु० २७७,२०६ गरुड़ पु० १,१४० ६ आादि ।
(7) ऋग्वेद (७,१८ १९ ६,६१-२) में इस दासराज्ञ युद्ध का उल्लेख मिलता है।

(8) पार्जेंटर-ऐश्वंट इंडियन हिस्टारिकल ट्रेडीशन, पू० १०५-१०७ ।
(9 ) यदु के दूसरे पुत्र सहस्रजित से हैहयवंश का प्रारम्भ हुआ, जिसकी कालांतर में कई शाखाएं हुई।
(10) हरिवंश १, ५४, २२, विष्णु पु० १,१२,३ आदि। इसका एक कारण यह कहा जा सकता है कि पुराणकारों आदि ने भ्रमवश मधुकैटभ दंत्य और उक्त मधु को एक समझ लिया।
(11 ) यही नगर बाद में ‘मथुरा’ या ‘मथुरा’ हुआ।

(12 ) रामायण, उत्तरकांड, सर्ग ६१-६६

(13 ) इस उपाख्यान के अनुसार अयोध्या के इक्ष्वाकु वंशी हर्यश्व ने मधु दैत्य की पुत्री मधुमती से विवाह किया। अपने भाई के द्वारा बहिष्कृत किये जाने पर हर्यश्य सपत्नीक अपने श्वसुर मधु के पास मधुपुर चले आये। मधु ने हर्यश्व का स्वागत कर उनसे उस प्रदेश पर शासन करने को कहा और यह भी कहा कि लवण उनकी सब प्रकार से सहायता करेगा। मधु ने हर्यश्व से फिर कहा “तुम्हारा वंश कालांतर में ययाति वाले यदुवंश के साथ घुल-मिल जायेगा और तुम्हारी संतति चन्द्रवंश की एक शाखा हो जायगी”

“यायातमपि वंशस्ते समेष्यति च यादवम् ।
अनुवंशं च वंशस्ते सोमस्य भविता किल ॥”

(हरि० २,३७,३४)
इसके बाद हर्यश्व के द्वारा राज्य विस्तार करने तथा उनके द्वारा गिरि पर एक नगर (संभवतः गोवर्द्धन) बसाने का उल्लेख है और उनके शासन की प्रशंसा है।
(14 ) “विषयासन्नभूतोऽस्मि तव राम रिपुश्च ह । नच सामन्तमिच्छन्ति राजानो बसबपितम्॥”
(हरि० १,५४,२८)

(15 ) कहीं-कहीं शत्रुघ्न द्वारा जनपद पर सुबाह के स्थान पर दूसरे पुत्र शूरसेन के नियुक्त करने का उल्लेख मिलता है। उदाहरणार्थ देखिए कालिदास

“शत्रुधातिनि शत्रुघ्नः सुबाही च बहुश्रुते ।
मथुराविदिशे सम्वोनिदधे पूर्वजोत्सुक: ॥”
(रघुवंश, १५, ३६)

हो सकता है कि पहले सुबाहु कुछ दिन शूरसेन जनपद का शासक रहा हो और उसके यहां से चले जाने पर शूरसेन वहां का स्वामी बना हो। इसी शूरसेन के नाम पर जनपद का नामकरण होने की चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

(16 ) “हत्वा च लवणं रक्षो मधुपुत्रं महाबलम्।
शत्रुघ्नो मधुरो नाम पुरों यत्र चकार वे।”
(17 ) “छित्वा वनं तत्सौमित्रिः निवेशंसोऽभ्यरोचयत् ।
भवाय तस्य देशस्य
पुर्याः परमधर्मवित् ॥” ( हरिवंश १, ५४, ५५ )
(विष्णु पु० १, १२, ४)

(18 ) “इयं मधुपुरी रम्या मधुरा देवनिमिता |
निवेशं प्राप्नुपाच्छो प्रमेष मेऽस्तु वरः परः ॥”
( रामा० उत्तर०, ७०, ४)
(19 ) “सा पुरी परमोदारा सादृप्राकारतोरणा । स्फीता राष्ट्रसमाकीर्णा समृद्धबलवाहना ॥ ५७॥
उद्यानवनसंपन्ना सुसीमा सुप्रतिष्ठिता । प्रांशुप्राकारवसना ॥ ५८ ॥
चलाट्टालक के पूरा प्रासादवरकुण्डला । सुसंवृतद्वारवती चत्वरोद्गारहासिनी ॥ ५३॥
भरोगवीरपुरुषा हस्त्यश्वरथसंकुला | अर्द्धचन्द्रप्रतीकाशा यमुनातीरोमिता ॥ ६०॥
पुण्यापणवतो दुर्गा रत्नसंचयर्गावता ।
क्षेत्राणि सस्ययंत्यस्याः काले देवश्च वर्षति ॥ ६१॥ नरनारी प्रमुदिता सा पुरी स्म प्रकाशते ।”
हरिवंश पुराण (पर्व १, ०५४)

(20) “गिरिगॉवधंनो नाम मथुरापास्स्वदूरतः। ” हरिवंश, (१,४५, ३६ )

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

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