मथुरा के प्राचीन यादव/ यदुवंशी( वर्तमान जादों )राजपूतों का इतिहास –

मथुरा के प्राचीन यादव/  यदुवंशी( वर्तमान जादों )राजपूतों का इतिहास –

ब्रज की इस प्राचीन जाति के लोग चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं । इनका मूल पुरुष यदु था, जिसके नाम पर इस जाति के लोग यदुवंशी / यादव अथवा जादों  ठाकुर कहे जातें हैं| यदु , चन्द्रवंश के विख्यात राजा ययाति एवं देवयानी का ज्येष्ठ पुत्र था । जब ययाति ने अपने विशालकाय साम्राज्य को अपने 5 पुत्रों में  विभाजित किया, तब भारत का दक्षिण-पश्चिम भाग ज्येष्ठ पुत्र यदु को प्राप्त हुआ था ।इस प्रकार यदुवंशियों का आरम्भिक निवास – स्थल भारत का वह भाग था, जहाँ उन्होंने  विदर्भ ,महिष्मती ,आवन्ति और चेदी के प्रसिद्ध राज्य स्थापित किये थे ।यदुवंशियों की एक हैहय शाखा में  एक प्राचीन राजा  कार्तवीर्य अर्जुन या सहस्त्रार्जुन था । उसके राज्य का विस्तार नर्मदा से हिमालय की तराई तक हो गया था तथा उसके वंशज हैहय वंशी यदु या यादव  कहलाये और उनकी राजधानी महिष्मति थी ।सहस्त्रार्जुन का युद्ध परशुराम से हुआ था जिसमें उसकी म्रत्यु हो गयी थी।परशुराम की क्षत्राणी माता रेणुका एवं सहस्त्रार्जुन की पत्नी दोनों बहिन -बहिन थीं ।
कार्तवीर्य अर्जुन के सो पुत्र थे । जिनमे सूर या सूरसेन, वृषसेन,मधु और जयध्वज आदि प्रधान थे । जयध्वज का पुत्र तालजंग हुआ । तालजंग के अनेक पुत्रों में वीतहोत्र सबसे बड़ा था और उनमे से एक का नाम भरत था जो बड़ा प्रतापी था । भरत के वृष,वृष के मधु और मधु के वृष्णि आदि अनेक पुत्र हुए । वृष्णि के कारण यह वंश वृष्णि/वार्ष्णेय कहलायामधु के कारण इस वंश की संज्ञा मधु/माधव भी हुई । यदु के नाम पर इस वंश को यादव वंश तो पहले से ही कहा  जाता था । इस वंश का यादव नाम अधिक व्यापक और सामान्य है ।
लिंग पुराण में लिखा है कि कीर्तवीर्य अर्जुन के पुत्र सूरसेन के नाम पर ही यमुना तट का यह प्रदेश जिसे अब ब्रज कहते हैं, प्राचीन कल में  सूरसेन प्रदेश कहलाता था । इस प्रकार यादव / जादों जाति का ब्रज से अत्यंन्त प्राचीन सम्बन्ध रहा है । यादव /यदुवंशी क्षत्रियों  की कई शाखाएं थी , जिनमे उक्त हैहय वंशीयों के अतिरिक्त वृष्णि , अंधक , कुकुर और भोज विशेष प्रसिद्ध थे । इनके कई राज्य थे , जिनमे अधिकांश मे राजतंत्र नहीं  हो कर गणतंत्र प्रचलित था । उनका अधिपति कोई परम्परागत  राजा नहीं  हो कर उक्त राज्यों के निवासियों द्वारा निर्वाचित होता था ।
श्री कृष्ण के जन्म से पहले सूरसेन प्रदेश के कई यादव /जादों राज्यों ने अपना एक संघ बना रखा था , जो ‘’ अंधक-वृष्णि संघ  “ कहलाता था ।श्री कृष्ण के कारण यदुवंश गौरवशाली हुआ । श्री कृष्ण के समय में भी यह अंधक-वृष्णि संघ बना हुआ था । यह संघ अंधक और वृष्णि गोत्रों के यदुवंशी क्षत्रियों  का था । अंधक गोत्र  संघ के अधिपति उग्रसेन , उस संघीय गणराज्य के राज प्रमुख निर्वाचित हुए थे । और मथुरा उनकी राजधानी थी ।उग्रसेन के छोटे भाई देवक की पुत्री  देवकी का विवाह वृष्णि संघ के अधिपति सूरसेन के पुत्र वसुदेव के साथ हुआ था । सूरसेन यदुवंश की वृष्णि शाखा में उत्पन्न हुए थे । उन्होंने अपने नाम पर सोरपुर ( वर्तमान वटेश्वर ) वसा कर अपना प्रथक राज्य स्थापित किया था । यह  सूर, अंधक वंशीय उग्रसेन के समकालीन थे । वसुदेव के देवकी से भगवान श्रीकृष्ण तथा दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम ( बलभद्र जी ) दो पुत्र  हुए ।उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था , जिसका विवाह तत्कालीन  सर्वाधिक शक्तिशाली मगधराज जरासंध की दो बेटियों के साथ हुआ था ।
कंस बड़ा शूरवीर और महत्वकांशी योद्धा था ।वह अपनी  चचेरी बहिन  देवकी को बहुत प्यार करता था ।कंस ने अपने ससुर जरासंध की सहायता से अपने पिता  उग्रसेन के विरुद्ध विद्रोह किया और उन्हें राज्य प्रमुक के पद से हटा कर स्वयं अंधक-वृष्णि राज्य का स्वेछाचारी राजा बन गया था । मगध नरेश जरासंध यादवों से बहुत  चिढ़ता था क्यों कि यादवों ने उसकी दासता को कभी भी स्वीकार नहीं किया ।वे स्वयं में भी शक्तिशाली थे ।अंत में , कंस का स्वयं के ही भांजे देवकीनंदन वासुदेव श्रीकृष्ण के द्वारा उसका अंत हुआ ।अपने जमाता कंस का बदला लेने के लिए मगध-सम्राट जरासंध ने यदुवंशियों के विरुद्ध अनेक बार ( सत्रह ) भीषण आक्रमण किये थे । यधपि उनमें  जरासंध को पूरी सफलता प्राप्त नही हुई , तथापि उनसे यदुवंशियों की शक्ति का बड़ा हास हुआ था । अंत में उन आक्रमणों से बचने के लिए यदुकुल शिरोमणि वासुदेव श्रीकृष्ण ने बड़ा नीतिज्ञयतापूर्ण कदम उठाया । उन्होंने सजातियों बंधुओ (यादवों )  को संम्बोधित करते हुए कहा कि  जिन जातियों ( वृष्णि यादवों  ) की वजह से जरासंध के आक्रमण होते रहते  हैं ,  उन्हें अब मथुरा का परित्याग कर देना चाहिये । श्रीकृष्ण तो परमज्ञानी , दूरदर्शी एवं चतुर राजनीतिज्ञ  थे । उनकी यह राय बहुत से लोगो (यदुवंशियों )  को पसंद आई और थोड़े से कुकुर- महा-भोजियों के अतरिक्त समस्त अंधक-वृष्णि संघ के यादव प्रमुख श्रीकृष्ण के साथ मथुरा का परित्याग करने को तैयार हो गये । इस योजना को इतिहास में  “महाभिनिष्क्रमण काल” कहते  हैं । पुनर्वास  के लिए सुदूर पश्चिम की ओर जाने का निश्चय किया था ।
मथुरा से निष्क्रमण करने वाले यदुवंशियों को राजस्थान के पथरीले एवं रेतीले भाग में  स्थापित होना उचित ज्ञात नही हुआ । यदुवंशी और सुदूर पश्चिम की ओर बढते हुए आनर्त ( उतरी गुजरात ) और सौराष्ट्र की समतल एवं उपजाऊ भूमि  में जाकर बस गए । आनर्त प्रदेश का राजा रेवत श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का ससुर था ।अत:  यादवों क्षत्रियों को वहां बसने में सुविधा थी । उन्होंने उस भू-भाग में समुद्र के तट पर द्वारका नामक एक रमणीक पुरी  बसाई और उसे  ही अपनी राजधानी बनाया था ।इस द्वारिकापूरी की शोभा इंद्रपुरी से अधिक थी।इस नगरी की स्थापना विश्वकर्मा ने की थी।
महाभारत के युद्ध मे इस देश के अनेक राज्यों के राजवंशों  और निवास करने वाली अनेक जातियों का सर्वनाश हुआ था, किन्तु द्वारका का यादव राज्य तब भी बड़ा शक्तिशाली था । उसका कारण श्रीकृष्ण जैसे युगांतरकारी महापुरुष  का कुशल नेतृत्व था । जब श्रीकृष्ण के तिरोधाम गमन का समय आया ; तब तपस्वनी देवी  गांधारी एवं ऋषियों के शाप से द्वारका के यादवों मे भी भीषण गृह – कलह  हुआ ; जिसके कारण उनमे से अधिकांश आपस में ही लड़ करके मर गये । उस समय वहां कुछ युवा ,बुजर्ग , विधवा स्त्रियाँ और बालक ही शेष रहे थे ।
इस भयानक नर-संहार को देख कर बलराम जी को इतना क्षोभ हुआ कि वह समुद्र यात्रा को चले गये । और वहाँ से फिर नहीं लोटें । श्रीकृष्ण अपने दारुक सारथि सहित प्रभास क्षेत्र से द्वारिका वापस आये और दारुक को सब वृतांत कह कर अर्जुन को लिवा लाने के लिए तथा अपने पिता वसुदेव एवं अंधक-वृष्णि संघ के राजप्रमुख उग्रसेन जी को यदुवंशियों के इस भयानक नरसंहार की सूचना देने के लिए भेजा । उनका अभिप्राय यह था कि जो कुछ यदुकुल के स्त्री , बच्चे और वृद्ध बचें हैं उनको अर्जुन यहाँ आकर लिवा ले जायें और अपनी इच्छानुसार उन्हें बसा दें ।  तथा अब इस यदुकुल का राजा हमारे बाद वज्र होगा । तदुपरांत श्रीकृष्ण स्वयं देहोत्सर्ग क्षेत्र मे जरा नामक व्याध के तीर से परमधाम को पहुंचे । श्रीकृष्ण जी का अंत एक निराश राजनीतिज्ञ के रूप में हुआ, जो अपने गणराज्य की गांधारी एवं ऋषियों  के श्राप को सत्यापित करने की वजह से आंतरिक समस्याओं को सुलझाने में प्राय: सक्षम होते हुए भी असफल रहें ।
जब अर्जुन को दारुक द्वारा द्वारिका के यदुवंशियों के उस सर्वनाश का समाचार मिला , तब अर्जुन के द्वारिका आने तक वसुदेव, देवकी ,उग्रसेन आदि अनेक वृद्धजनों एवं श्रीकृष्ण की रुक्मणी  सहित आठ पत्नियों ने शरीर त्याग दिए । अर्जुन जब द्वारिका आये तो उन को महान कोलाहल करते हुए स्त्रियाँ , बच्चे और वृद्धजन ही मिले । अर्जुन  उन सब यदुवंशी  बच्चों ,बृद्धजनों एवं स्त्रियों  को लेकर द्वारका से हस्तिनापुर को  चल दिए । उनके द्वारका से प्रस्थान के बाद समुद्र ने भगवान श्री कृष्ण के महल को छोड़कर सम्पूर्ण द्वारकापूरी को जल में डुबो दिया । मार्ग में ही आभीरों ने सब धन सम्पति और कुछ स्त्रियों को भी लूट लिया  (विष्णु पुराण ,अ038 ,पेज 422, महाभारत )जैसे – तैसे शेष बचे हुए बच्चों , बुजर्गों एवं  स्त्रियों को वहाँ से लाकर उनको श्रीकंठ ( पूर्वी पंजाब ) प्रदेश में बसा दिया । श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को अर्जुन ने अपने पौत्र परीक्षत के सुपुर्द किया । इसके बाद परीक्षत को इन्द्रप्रस्थ के राज्य -सिंहासन पर बैठा कर पांडवगण अपनी जीवन लीला को समाप्त करने चले गये हिमालय पर चले गए । कुछ समय बाद परीक्षित ने वज्रनाभ को मथुरा के राज्य-सिंहासन पर अभिषिक्त किया ।
इस समय , जरासंध के सत्तरह बार किये गए आक्रमणों के कारण माथुरा प्रदेश की दशा अत्यंत ही दयनीय थी । इस बात से व्यथित हो कर वज्रनाभ ने परीक्षत  को अपनी चिंतनीय व्यथाओं से अवगत कराया ,  क्यों कि उस समय मथुरा एक निर्जन वन ही था l  और वहाँ की प्रजा कहाँ चली गयी , इस बात को लेकर वज्रनाभ जी बहुत व्यथित थे  , क्यों कि राज्य का सुख तो तभी है जब प्रजा रहें l
तब परीक्षत  ने वज्रनाभ का संदेह मिटाने के लिए गोपों के पुरोहित  महर्षि शांडिल्य को बुलाया । यही महर्षि शाडिल्य गोकुल में पहले नन्द आदि गोपों के कुल पुरोहित थे । शाडिल्य जी परीक्षत के आग्रह पर वहां आये ,  उनका विधि -पूर्वक आदर- सत्कार किया । उनके  बताए अनुसार “ ब्रज “ शब्द का अर्थ है व्याप्ति । इस वृद्ध वचन के अनुसार व्यापक होने के कारण ही इस भूमि का नाम ब्रज पड़ा है।  सत्व, रज , तम – इन तीन गुणों से अतीत जो परम ब्रह्म  हैं ।वही व्यापक हैं ,  इसलिए उसे ही ब्रज कहतें हैं । इस लिए वज्रनाभ तुम तनिक भी चिंता न करो ।तुम मेरी आज्ञा से यहाँ बहुत से गाँव बसाओ  । इससे निश्चय ही तुम्हारे मनोरथों की सिद्धि होगी । योगीश्वर श्रीकृष्ण ने जहाँ -जहाँ जैसी लीलाएँ की हैं , उसके अनुसार उस स्थान का नाम रख कर तुम अनेकों गावं बसाओ और इस प्रकार दिव्य ब्रजभूमि का सेवन करतें रहो । गोवर्धन , दीर्घपुर ( डींग ) , मथुरा , महावन ( गोकुल ) , नंदिगावं ( नंदगांव ) और ब्रह्त्साणु ( बरसाना ) आदि में तुम्हें अपने लिए छावनी बनानी चाहिए । इस ब्रज भूमि पर मैं तुम्हें  आशीर्वाद देता हूँ कि मेरी कृपा से यदुकुल शिरोमणि देवकीनंदन वासुदेवश्रीकृष्ण की लीलाओं के जितने भी स्थल हैं , सबकी तुम्हें ठीक-ठीक पहचान हो जाएगी । वज्रनाभ इस ब्रजभूमि का सेवन करतें रहने से तुम्हें किसी दिन परमयोगी यदुकुल पंडित एवं भगवान श्री कृष्ण के परम् प्रिय सखा एवं भक्त उद्धव जी भी मिल जायेंगें , फिर तो अपनी माताओं सहित तुम उन्हीं से इस पावन पवित्र मोक्ष – दाहिनी यदुवंशियों की जन्मभूमि ,कर्मभूमि एवं रणभूमि का रहस्य जान लोगे । इसके बाद वज्रनाभ ने महर्षि शांडिल्य जी के आशीर्वाद से गोवर्धन( दीर्घपुर ),  मथुरा ,  महावन , गोकुल( नंदीग्राम ) और वरसाना आदि स्थान  छावनी बनाये।और उद्धव जी के उपदेशानुसार बहुत से गांव बसाये । राजा परीक्षत ने इंद्रप्रस्थ से मथुरा में हजारों  बड़े- बड़े सेठों को बुलाकर मथुरा में रहेने की जगह दी ,  इसके अलावा परीक्षत ने मथुरा मंडल के ब्राह्मणों तथा प्राचीन वानरों जो भगवन श्रीकृष्ण के बड़े ही प्रेमी थे बुलाया और उन्हें आदर के योग्य समझकर मथुरा नगरी में  बसाया । इस प्रकार राजा परीक्षत की मदद और  महर्षि शांडिल्य की कृपा से वज्रनाभ ने उन सभी स्थानों की खोज की जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रेमी गोप-गोपियों के साथ नाना प्रकार की लीलाएं की थीं । लीला स्थलों का ठीक ठीक निश्चय हो जाने पर उन्होंने वहां की लीला के अनुसार उस स्थान का नामकरण किया । भगवान श्रीकृष्ण  के लीला विग्रहों की स्थापना की तथा  उन स्थानों पर अनेकों गांव वसाए । स्थान – स्थान पर भगवान श्री कृष्ण के नाम से कुण्ड और कूए खुदवाएं एवं कुंज व बगीचे लगवाये । शिव आदि देवताओ की स्थापना की। गोविन्द , हरिदेव आदि नामो से भववृद्धि गृह स्थापित किये । इन सब शुभ -कर्मों के द्वारा वज्रनाभ ने अपने राज्य में सब ओर एक मात्र श्री माधव- भक्ति     का प्रचार -प्रसार किया और बड़े ही आनंदित हुए ।  प्रजाजन सदा वज्रनाभ के राज्य की प्रसंशा किया करतें थे । उद्धव जी से मिलने के बाद वज्रनाभ जी ने अपने पुत्र प्रतिवाहु को मथुरा का राजा बना दिया और माताओं को साथ ले , उसी स्थान पर जहाँ उद्धव जी प्रकट हुए थे , जाकर श्रीमद भागवत सुनने की इच्छा से रहेने लगे
। यह स्थान गोवर्धन के निकट वृन्दावन के भीतर कुसुम सरोवर पर जो सखियों की विहार – स्थली है  वहां पर लताओं , अंकुरों और बेलों के रूप में है जहां अवश्य ही उद्धव जी  निवास करतें हैं ।इस प्रकार वज्रनाभ जी को ही मथुरा का पुनः संस्थापक के साथ-साथ यदुकुल पुनः प्रवर्तक भी माना जाता है ।इनसे ही समस्त यदुवंश का विस्तार हुआ माना जाता है। बज्रनाभ जी को ही भगवान श्री कृष्ण का प्रतिरूप माना गया है ।वज्रनाभ जी की ही बजह से ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा आरम्भ हुई।उन्होंने ही ब्रज में 4 प्रसिद्ध देव प्रतिमा स्थापित की।मथुरा में केशव देव ,वृंदावन में गोविन्ददेव ,गोवर्धन में हरि देव ,बलदेव में दाऊजी स्थापित किये थे ।पुराणों में वज्र के पुत्र प्रतिबाहू , प्रतिबाहू के सुबाहु ,सुभाहू के शांतसेन और शांतसेन के सतसेन तक का वर्णन मिलता हैं । इन यदुवंशियों का राज्य ब्रज प्रदेश में सिकंदर के आक्रमण के समय में भी होना पाया जाता है ।समय -समय पर शक, हूर्ण ,मौर्य,गुप्त और सिएथियन आदि ने इन शूरसेन वंशी यादव क्षत्रियों के मथुरा राज्य को दबाया /छीना गया , लेकिन मौका पाते ही यादव  फिर स्वतंत्र हो जाते थे ।जब चीनी यात्री सन 635 ई.वी में भारत आया था उस समय मथुरा का शासक कोई सूद्र था ।लेकिन मथुरा के आस पास के क्षेत्र जैसे  मेवात ,भदानका / शिप्रथा (आधुनिक बयाना) ,कमन (8 वीं तथा 9 वीं सदी ) के शासक शूरसैनी शाखा के ही थे जिनके नाम भी प्राप्त है । इस काल में मथुरा पर शासन कनौज क्षत्रिय के गुर्जर-प्रतिहार शासकों था ।इस समय में यदुवंशी उनके अधीनस्थ रहे हों ।लेकिन इसी समय में मथुरा के शासक यदुवंशी ( जादों ) राजा धर्मपाल  (भगवान श्रीकृष्ण के 77वीं पीढ़ी में )  का मथुरा के आस पास के क्षेत्र के शासक होना पाया जाता है । जिनके कई प्रमुख वंशज ब्रह्मपाल ,जयेंद्र पाल मथुरा के शासक 9 वीं सदी तक मिलते है। इसके बाद महमूद गजनवी के काल में भी मथुरा /महावन पर (1018 ई.)यदुवंशी राजा कुलचंद का शासन था । जब मोहम्मद गजनबी ने स.1074 (1018 ई. )ने महावन पर आक्रमण किया था तब वहाँ के राजा कूलचंद ( कुलचंद) से उसका भीषण युद्ध हुआ था | यधपि कुलचंद की वंशावली उपलब्ध नहीं हुई हैं , तथापि ऐसा प्राप्त स्रोतों से  अनुमान होता है कि वहाँ कोई जादों राजा था इस युद्ध में कूलचंद की म्रत्यु हुई थी और उसका विशाल सेन्यदल एवं राज्य महमूद ने नष्ट कर  दिया था । जो जादों उस भीषण विनाश के बाद भी बच गयें थे , उन्होंने विजयपाल के नेतृत्व में मथुरा से हट कर श्रीप्रस्थ ( वर्तमान बयाना ) में एक नयें जादों राज्य की स्थापना की थी । विजयपाल संभवतः कुलचंद के पारिवारिक  भाई ही था ।
उक्त विजयपाल के वंशजों ने ही कालान्तर में कामबन तथा बयाना में यादव राज्यों की स्थापना की थी और वहां  अनेक दुर्ग एवं देवालय बनवाएं । सूरसेन शाखा के भदानका /शिप्रथा (आधुनिक बयाना );त्रिभुवनगिरी (आधुनिक तिमनगढ़ ) पर कई यदुवंशी शासकों  जैसे राजा विजयपाल (ई01043),राजा तिमनपाल (ई01073), राजा कुंवरपाल प्रथम (ई01120), राजा अजयपाल जिनको महाराधिराज की उपाधि थी (ई01150) नें महावन के शासक थे इनके बाद इनके वंसज हरिपाल (ई01180), सोहनपाल (ई01196) तथा अंतिम शासक दिगपाल महावन के राजा रहे थे । कुछ पुस्तकों में महावन के राजा दिगपाल को अहीर लिखा गया है जो निराधार गलत है । इस तथ्य की अप्रमाणिकता इस बात से भी सिद्ध होती है कि तत्कालीन  मेवाड़ राजपरिवार का कोई राजा कैसे अहीर राजा की बेटी से अपने पुत्र का विवाह कर सकता है , जो आजतक भी सम्भव नहीं है ।
इसी समय बयाना और त्रिभुवनगिरी पर राजा धर्मपाल के बेटे कुंवरपाल दुतीय का शासन था , जिसका युद्ध मुहम्मद गौरी एवं उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक से ई0 1196 में बयाना एवं तिमनगढ़ में  हुआ था ।इसके बाद भी महावन के राजा महिपाल यदुवंशी क्षत्रिय रहे है । मुग़ल शासन के अंतिम समय  में बयाना और कामबन पर जाटों ने अधिकार कर लिया था जिनकी वंशावली भी बयाना के जादों राज -वंश से है , जो भरतपुर राजवंश के सिनसिनवार जाट कहलाते है ।
विजयपाल के वंशजों ने सन 1348 में करौली राज्य की स्थापना की थी।अंग्रेजी शासनकाल तक ब्रज में करौली ही जादों का एकमात्र प्रसिद्ध राज्य था , जिसकी परम्परा भगवन श्रीकृष्ण तक जाती थी ।देश के स्वाधीन होने पर अन्य राज्यों के साथ करौली भी राजस्थान में विलीन हो गया । इस समय वास्तविक (पुराणिक )यादवों को जादों क्षत्रिय ( राजपूत ) कहा जाता है , जिनकी संख्या राजस्थान में करौली , धोलपुर  एवं  भरतपुर जिलों में ,  मध्य प्रदेश के भिंड , मुरेना( सबलगढ़ एवं सुमावली – जौरा क्षेत्र ), श्योपुर जिले में पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के मथुरा , अलीगढ़ , आगरा , हाथरस , एटा , फिरोजाबाद , बुलंदशहर , ग्रेटर नॉएडा , कानपुर ,इटावा ,कालपी , मोहवा , बांदा , हमीरपुर एवं कोशाम्बी आदि जिलों में बहुत अधिक मात्रा में पाए जातें हैं | बिहार के भागलपुर , मुंगेर , बाका आदि जिलों में भी जादों ठाकुर बहुतायत में पाये जाते है।
यदुवंश की महिमा और उसके भौगोलिक फैलाव के बारे में गुजरात से कविराज मयूख जी द्वारा लिखा गया यह दोहा….

जदुवंस असंखा जात साखा जिका
खड़वा करौली मैसूर खाटी
सिख पंजाब गिरनार  पत सरवैया
भुज जाडेच जैसाण भाटी।।।
–कविराज मयूख (गुजरात के गढ़वी)

सन्धर्व—
1-ऋग्वेद -दयानद संस्थान ,दिल्ली
2-यजुर्वेद -दयानन्द संस्थान ,दिल्ली
3-मनुस्मति -मनु कृत-वेंकटेश्वर प्रेस ,बम्बई
4-श्रीमद्भागवत महापुराण -गीताप्रेस ,गोरखपुर
5- संक्षिप्त महाभारत-गीता प्रेस ,गोरखपुर
6-वायुपुराण
7-विष्णुपुराण
8-हरिवंश पुराण
9-मत्स्यपुराण
10-अग्नि पुराण
11-रामायण तुलसी एवं बालमिक कृत
12-सूरसागर महात्मा सुरदास
13-राजस्थान का इतिहास -कर्नल जेम्स टॉड
14-हिस्ट्री ऑफ दी राजपूत ट्राइब्स -मेटकाल्फ़
15-हैंडबुक आफ राजपूतस -कैप्टन बिंगले
16-भारत का वृहत इतिहास (भाग 1,2,3)-रमेश चंद्र मजूमदार
17-राजपूताने का प्राचीन इतिहास -पं0 गौरीशंकर ओझा
18-गजनी से जैसलमेर -हरि सिंह भाटी
19-राजपूताने का इतिहास -जगदीस सिंह गहलोत
20-यदुवंश का इतिहास – महावीर सिंह यदुवंशी
21-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास प्रथम भाग -प्रभु दयाल मित्तल
22-मथुरा -ए डिस्ट्रिक्ट मेमॉयर -ग्रोउस
23-ब्रज का इतिहास प्रथम खण्ड-कृष्णदत्त वाजपेयी
24-मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास-प्रो0 चिन्तामणि शुक्ल
25-प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग-,सत्यकेतु विद्याशंकर
26-विद्याभवन राष्ट्रभाषा ग्रंथमाला पुराण -विमर्श -आचार्य बलदेव उपाध्याय
27-प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य -बाबू बृन्दावन दास
28-प्राचीन भारत का इतिहास रमाशंकर त्रिपाठी
29-पाणिनीकालीन भारतवर्ष -डा0 वासुदेव शरण अग्रवाल
30-दकन का प्राचीन इतिहास -जी0 यजदानी
31-राजपूत आफ सौराष्ट्र -वीरभद्र सिंह
32-सुर वंश का इतिहास -डा0 शिव बिन्देश्वरी प्रसास
33-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट – पी 0 पोवलेट
34-भारतीय पूरा -इतिहास कोश-अरुण
35-ऐष्यन्त इंडियन हिस्टारिकल ट्रेडिसन -पाजितर
36-अर्ली हिस्ट्री ऑफ राजपूत -सी0 वी0 वैद्य
37-जादों वंशियों का इतिहास -करौली का विजयपाल ,न019/27 ,अलवर पुरालेखय ,राजस्थान ,आर्काइव्ज आफिस ,बीकानेर
38-यादव वंशों  का इतिहास  संवत 867 विक्रमी से 1094 तक ,न0 269,8/27 ,अलवर पुरालेखीय , राज0 आर्काइव्ज आफिस ,बीकानेर
39-जैसलमेर ख्यात –डा0 नारायण सिंह भाटी
40-करौली ख्यात एवं करौली पोथी
41-यदुवंश -गंगा सिंह
42-जाटों का नया इतिहास-डा0 धर्मेंद्र विद्यालंकार
43-वैष्णव धर्म का उद्धव और विकास -सुवीरा जायसवाल

लेखक – डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन 
गांव-लढोता, सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह ,राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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