मथुरा के यदुवंशी जादों (पौराणिक यादव ) क्षत्रिय राजवंश का ऐतिहासिक अध्ययन–

मथुरा के यदुवंशी जादों (पौराणिक यादव) क्षत्रिय राजवंश का ऐतिहासिक अध्ययन

क्षत्रिय वर्ण से सम्बन्ध ब्रज प्रदेश में प्राचीन काल से निवास करने वाली जातियों में यादवों  (आधुनिक जादों ,भाटी , जडेजा ,बनाफर , जाधव , चुडासमा , वाडियार ) का नाम उल्लेखनीय है ।
यादवों के मूल पुरुष यदु थे , जिनके नाम पर उनके वंशज यदु, यदुवंशी , यादव  अथवा जदु,जादव,  जादू ,जादों कहे जाते है ।यदु चन्द्र वंश के विख्यात सम्राट ययाति के ज्येष्ठ पुत्र थे जिनका प्राचीन ग्रंथों में विस्तृत वर्णन किया गया है।सबसे अधिक सर्व मान्य ग्रन्थ वेद व्यास जी द्वारा लिखित महाभारत एवं श्रीमद्भागवत में यादवों के विषय में विस्तार से वर्णन किया गया है ।श्रीमदगीता में भी यादव शब्द का अर्जुन द्वारा श्री कृष्ण जी के लिये उद्वोधन किया गया है।

“सखेति मत्व प्रसभं यदुक्तंम
हे कृष्ण !हे यादव है सखेति ।
अजानता महिमानम तवेदां
मया प्रभादात्प्रणयेन वापि ।।
(श्रेमदगीता श्लोक 41 अध्याय -11)

इस प्रकार श्रीमदगीता में भी श्री कृष्ण को हे यादव ,हे सखे  , के नाम से सम्बोधित किया गया है ।
इस प्रकार “यादव”शब्द संस्कृत का शब्द है और हिंदी में भी यही शब्द तत्सम रूप में प्रयोग किया जाता है।जादू मेवाड़ी भाषा का शब्द है ।ब्रज या अवधी भाषा में जादों कहा जाता है जिसका जगाओं एवं भाटों की पोथियों में विवरण मिलता है।आधुनिक समय में “जादों “का रूप बदलकर “जादौन “लिखना आरम्भ कर दिया गया। अधिकांश उच्चकोटि के भारतीय इतिहासकारों की पुस्तकों एवं अंग्रेजों के द्वारा लिखे गए भारतीय गजेटियर्स में यदुवंशी क्षत्रियों चाहे वे जैसलमेर के भाटी हो ,देवगिरि ,होयसल तथा विजयनगर के जाधव या यादव हों, कच्छ के जडेजा , चुडासमा हो या महोबा के बनाफर हो या करौली के जादों राजपूत हो सभी के लिए “यादवा ” शब्द का ही प्रयोग किया है ।
बृज के कवियों ने जरूर “य”वर्ण को अपनी ब्रज भाषा के अनुसार “ज”रूप में लिख कर जादों ,जदु ,जमुना ,जशोदा ,जादोंपति , जादोंराय जैसे शब्दों का प्रयोग किया है जिनके विस्तृत जानकारी सूरसागर तथा रामायण जैसे पवित्र ग्रन्थों में भी मिलती है।
स्वयं रामायण के बालकांड में तुलसीदास जी ने लिखा है-

जब जदुवंश कृष्ण अवतारा ।
होइहि हरन महा महिमारा।।
कृष्ण तनय होइहि पति तोरा।
बचनु अन्यथा होई न मोरा।।
अर्थात जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए “यदुवंश “में श्री कृष्ण का अवतार होगा ,तब तेरा पति उनके पुत्र(प्रधुम्न)के रूप में उतपन्न होगा।मेरा वचन अन्यथा नहीं होगा।ऐसा भगवान शिव ने कामदेव की पत्नी रति को वरदान दिया ।

यदुवंशियों के एक प्राचीन राजा का नाम कार्तवीर्य अर्जुन या सहस्त्रार्जुन था।उसके वंशज हैहय वंशी यादव कहलाये।उसकी राजधानी माहिष्मती थी।सहस्त्रार्जुन के सौ पुत्रों में से एक का नाम शुर या शूरसेन था , जिसके नाम पर ही यमुना तट का यह प्रदेश जिसे ब्रज कहा जाता है , प्राचीनकाल में शूरसेन कहलाता था।

भविष्यति पुरी रम्या शूरसेना न संशय: [रामा0, उत्तर0, 70, 6] तथा-स पुरा दिव्यसंकाशो वर्षे द्वादशमें शुभे । निविष्ट: शूरसेनानां विषयंश्चाकुतोभय:॥[70, 1]

↑ कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पंचाला: शूरसेनका: । एप ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तर:॥(मनु0 2, 19) शूरसेन जनपद का विस्तार दक्षिण में चम्बल नदी से उत्तर में मथुरा के लगभग 50 मील उत्तर तक था । पश्चिम में इसकी सीमा मत्स्य जनपद से और पूर्व में दक्षिण पंचाल राज्य की सीमाओं से मिलती थी (देखिए पार्जीटर-मार्कण्डेय पुराण, पृ0 351-52,)

यादवों की अन्य शाखाओं में वृष्णि , अन्धक ,कुकर और भोज भी प्रसिद्ध थीं जिनमें से अधिकांश में गणतन्त्र व्यवस्था थी।शूरसेन प्रदेश के कई यादव राज्यों ने अपना संघ बना रखा था , जो “अन्धक-वृष्णि संघ “कहलाता था ।अन्धक संघ के अधिपति उग्रसेन थे जिनकी राजधानी मथुरा थी। वृष्णि संघ के मुखिया वसुदेव जी थे जिनकी राजधानी शौरिपुर (आधुनिक बटेश्वर ) थी।
अन्धक संघ के अधिपति उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री देवकी जी वृष्णि संघ के अधिपति शूरसेन के पुत्र वसुदेव जी को ब्याही थी।उनके पुत्र योगीश्वर यदुकुल शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण जी एवं बलराम जी हुए।
अन्धक वंशी उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था , जिसका विवाह शक्तिशाली मगध सम्राट जरासन्ध की दो पुत्रियों के साथ हुआ था।महत्वाकांक्षी कंस ने उग्रसेन को जरासन्ध के प्रभाव की बजह से कैद कर स्वयं शासन सत्ता संभाल ली , जिसका कोई भी तत्कालीन यादववंशी योद्धा विरोध नहीं कर सका , क्यों कि कंस भी स्वयं उस समय का महान बलशाली योद्धा था जिसके बल को देखते हुए ही मगध नरेश जरासन्ध ने उसको अपना जमाता बनाया था , जिसका अन्त देवकीनन्दन कृष्ण द्वारा हुआ।
कंस वध के कारण जरासन्ध कृष्ण को शत्रु मानकर मथुरापुरी पर अनेकों बार (17 बार ) फौज लेकर चढ़ा जिससे यादवों की शक्ति कमजोर हुई।
जरासन्ध के आक्रमणों से बचने के लिए यादव मथुरा छोड़कर सुदूर पश्चिम की ओर चले गए।यादवों ने समुद्र तट पर द्वारिका नामक एक रमणीक नगरी बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया ।
महाभारत के युद्ध काल में द्वारिका का यादव क्षत्रिय राज वंश राज्य बड़ा शक्तिशाली था , उसका कारण श्री कृष्ण का कुशल नेतृत्व था।जब श्री कृष्ण के तिरोधाम का समय आया , तब दुर्देव से तथा गांधारी के शाप से द्वारका के यादवों में भीषण गृह -,कलह हुआ  ;जिसके कारण उनमें से अधिकांश आपस में ही लड़ कर मर गये तथा बाद में कुछ को स्वयं श्री कृष्ण ने गुस्सा होकर अपने सुदर्शन चक्र से मार डाला।
जब अर्जुन को श्री कृष्ण जी के सारथी दारुक से द्वारका के यादवों के सर्वनाश का समाचार मिला , तब वह द्वारका जाकर वहां के शेष यादवों को हस्तिनापुर लिवा लाये और उन्हें पंजाब , इंद्रप्रस्थ तथा मथुरामण्डल में बसा दिया ।इस प्रकार इस क्षेत्र में फिर से यादवों की बस्तियाँ बस गई।श्री कृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को मथुरा का शासक बनाया गया ।
वज्रनाभ के बाद उनके पुत्र प्रतिबाहु , उनके पुत्र सुबाहू, उनके पुत्र शान्तसेन तथा उनके पुत्र शतसेन हुये।
कहते है कि कुछ कालोपरान्त प्रतिवाहू से मथुरा का राज्य निकल गया ।यहां नागों का राज्य स्थापित हो गया।अतः प्रतिवाहू ने पुनः अपने पूर्वजों के राज्य क्षेत्र द्वारका जाकर नया राज्य स्थापित किया।
ख्यातों के अनुसार राजा धर्मपाल नाम के यदुवंशी ने पुनः द्वारिकापूरी से सन 810 ई0 में आकर ब्रज प्रदेश मथुरा के क्षेत्र पर कब्जा किया तथा बयाना शहर राजधानी बनाया यानी बयाना पर भी कब्जा कर लिया ।9वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में आस-पास के क्षेत्रों को जीत कर यादव वंश की पुनः नींव डाली जो कई बार पूर्व में उखड़ चुकी थी। ब्रज पर हुक्मरां रहने से इनकी औलाद ब्रजवासी भी कहलाये।उन्होंने पनिहार वंशी राजपूतों से विक्रम संवत 867 में मेवात छीन कर उनको भगा दिया जो कई पुश्त तक उनकी औलाद के अधीन रहा ।धर्मपाल की मुख्य राजधानी बयाना नगर थी।इस लिए बैराठ नगर में उनका कोई सामन्त रहता होगा क्यों कि जब महाराजा कोंकलदेवबली , आमेर  ने बैराठ नगर पर हमला किया जो उस वक्त यहां पर नैणसी जादों राज्य करता था जो मालूम होता है कि बयाना के जादों  राजवंश का कोई नुमाइंदा उनकी तरफ से हुक्मरानी को तैनात किया होगा ।इसी नैणसी जादों से विक्रम संवत 1094 में राजा कोकिल जी ने बैराठ नगर ले लिया (सन्दर्भ यादव वंशियों का इतिहास संवत 867 से 1094 तक, बीकानेर पुरातत्व अलवर विभाग )।उक्त काल का क्रमवद्ध सर्व मान्य इतिहास उपलब्ध न होने के कारण उन यदुवंशियों के विषय में विशेष ज्ञान नहीं ,फिर भी यह आधारपूर्ण तथ्य है कि इनका  वैभव काल किसी समय अतुलनीय था।
शूरसेन नामक यादव वंशजों का राज्य दक्षिण में भी पाए जाते है।स्युन प्रदेश पर तो यादवों की कीर्ति पताका विस्तृत भू-भाग पर फहराई हुई थी।द्वारसमुद्र ,देवगिरि तथा विजयनगर साम्राज्य पर होयसल ,जाधव एवं बाद में मैसूर के  यादव वंशीय वाडियार क्षत्रियों का राज्य रहा है ।इसी प्रकार जैसलमेर के भाटी यादव इसी वंश के वंशज हैं ।पश्चिमी राजपुताना प्रदेश के एक बड़े भू-भाग पर भाटी यादवों ने अपने बल पर तत्कालीन शासकों को परास्त कर अपनी सत्ता हासिल की ।
महाराजा धर्मपाल के समय भारत के मध्यवर्ती भाग में हिन्दू नरेशों का पूर्ण आधिपत्य था।उत्तरी-पश्चिमी भू-भाग में अरब जाति अवश्य अपना प्रभुत्व जमा पायी थी।जो धीरे -धीरे भारतीय जीवन में घुल मिल गयी।यवन आक्रमणकारियों ने तलवार के बल पर राज्य लिया।परन्तु अब तक यहां यवन सीमावर्ती भाग में ही उनका सीमावर्ती चक्र था।वेदों के अंतर्गत ये बाते श्रवणगत ही थीं। यहां पर सतीत्व हिन्दुधर्म ही था।हालांकि बोद्धय धर्म का भी प्रभाव काल था।महाराज धर्मपाल ने कब से कब तक इस क्षेत्र पर शासन किया , इसके सूत्र कम ही मिलते हैं और मिलते भी हैं तो अप्रमाणित ।इनके बाद इस वंश के अन्य शासक भी हुए जिन्होंने साधारण रीति से अपना समय निकाला ।उनके विषय में भी यथेष्ट ज्ञान नहीं ।
महाराजा धर्मपाल के बाद महाराजा सिंह पाल ,महाराजा यक्षपाल (जगतपाल ) , नरपाल ,संग्रामपाल , कन्थपाल , भूमिपाल ,इच्छापाल , ब्रह्मपाल तथा विनायक पाल तथा जीनपाल के नाम मथुरा के शासकों के रूप में मिलते तो है ।लेकिन इनके भी शासनकाल की कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं मिलती केवल जगा या भाटों की पोथियों के अतिरिक्त ।जगाओं की पोथियों का अवलोकन करने पर कुछ वंशावलियां जरूर मिलती है जो प्रमाणिक भी है ।
विक्रम संवत 936 ई0 सन 879 ,नवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में इच्छापाल नाम के यादव नरेश का मथुरा में राज्य होना ख्यातों एवं जगाओं की पोथियों में अंकित है।इन इच्छापाल के राज्य काल का वर्णन भी कहीं भली प्रकार से नहीं मिल पाता है।बंगाल में भी “पाल ” नामक राजाओं ने भी सत्ता इसी काल में धारण की थी।जिनके नाम भी इन “पाल यादवों ” से मिलते जुलते थे।अतः तात्कालिक तथ्यों की अल्पता के कारण पूर्ण विवरण नहीं मिल पाता है।बंगाल के पाल वंश में भी एक धर्मपाल राजा हुए है जो बहुत वीर ,योद्धा थे जिनका राज्य उत्तरी भारत के भी एक बड़े भू-भाग पर रहा है।
इन्ही इच्छापाल के दो पुत्र ब्रह्मपाल एवं विनयपाल हुए थे।इच्छापाल के देहान्त  के बाद ज्येष्ठ पुत्र ब्रह्मपाल मथुरा के राजा हुए।विनयपाल का जो वंश चला उसके वंशज बनाफर यादव नाम से विख्यात हुए।विनय पाल राज्य अधिकारी नहीं हुए अतः ब्रह्मपाल के पुत्र जयेन्द्र पाल (इन्द्रपाल) मथुरा के राज्य सिंहासन के स्वामी 10 वीं शताब्दी विक्रम संवत 1023 ई0 सन 966 अंतिम चतुर्मास कार्तिक सुदी 11को बैठे।इन्होंने 11वीं शताब्दी के अंतिम चरण तक राज्य किया।महाराजा जयेन्द्र पाल के वक्त में मेवात क्षेत्र में निकुम्भ क्षत्रियों का आगमन हुआ ।जयेन्द्रपाल ने उनको मेवात का कुछ हिस्सा दे दिया ।निकुम्भ वंशी राजा डूडीस्वर को राजधानी बना कर राज्य करने लगे।अनुमान है कि वर्वर तुर्क (महमूद गजनवी ) इनके समय मथुरा में आया था ।मन्दिरों को नष्ट किया , मूर्तियों को तोड़ा , धर्म ग्रन्थों को जलाया गया , भीषण नरसंहार करके मानवता को शर्मसार किया गया और मानवता के नाम पर लगा गया था।
महाराजा जयेन्द्रपाल की मृत्यु विक्रम संवत 1049 ई0 सन 992 में हुई थी।
जगाओं की पोथियों के अनुसार महाराजा जयेन्द्रपाल के 11 पुत्र तथा 2 पुत्रियां थी।कुछ जगाओं की पोथियों में 16 या 17 पुत्रों के नाम भी लिखे है जिनमें विजयपाल , रतनपाल, नाहरपाल ,सोनपाल आनन्दपाल , भवनपाल ,कच्छपाल , देवपाल , श्रीपाल, दीप पाल, विखमपाल,नन्हीपाल, विनय पाल, रण पाल, वागपाल,  मैनपाल ,महीपाल तथा भरतपाल आदि प्रमुख त थे।
जयेन्दपाल की दो पुत्रियों -विजय कंवर और हंस कंवर

1-विजयकंवर –इनका विवाह  ठिकाना सतपुर के राठौड़ अजीत सिंह के साथ हुआ था।
2-हंस कंवर -इनका विवाह ठिकाना नीमराना(अलवर ) के रामबल सिंह चौहान के साथ हुआ।
जयेन्द्रपाल जी के ज्येष्ठ पुत्र विजयपाल  अदम्य साहसी , उत्साही और अतीव वीर योद्धा थे । विजयपाल का जन्म दिवस विक्रम संवत 1024 विजयदशमी का है और विक्रम संवत 1052 हिजरी संवत 412 में मथुरा गद्दी पर बैठे ।जिन्होंने विक्रम संबत रोहिणी नक्षत्र चैत्र सुदी 4 को बयाना में विजयमन्दिरगढ़ दुर्ग का विक्रम संवत 1097 ई0 सन 1040 में निर्माण कराया । इनका राज्यभिषेक विक्रम संवत 1056 ई0 सन 1001 के लगभग हुआ ।उन्होंने महाराजाधिराज परम् भट्टारक के विरुद् धारण किये । इन्हीं विजयपाल को करौली यादव (जादों ) राजवंश का मूल पुरुष एवं संस्थापक कहा गया है।इन्होंने 29 शादियां की जिनसे 18 पुत्र पैदा हुए।इन्होंने 35 लड़ाईयां लड़ी तथा 53 वर्ष शासन किया।

संदर्भ

1-टॉड , 1/72 -3;आर्के 0 सर्वे0 , 20/5-6;ब्रुकमैन ,29 ।
2-बलदेव सिंह (पांडुलिपि ) ,पृष्ठ 5 ;ब्रुकमैन , 29 ;इम्पी 0 गजे0 , 15 /26 ; *
*दीक्षित ,1 और जाट जगत ,10।
3-ए0 इ0 (लखीमपुर ) ,4/243 , मुंगेर 18/304 ;दृष्टव्य -भारतीय विद्याभवन ,4/5 -6, डा0 त्रिपाठी (हिस्ट्री आफ कनौज ) , 216-230 ; विस्तृत अध्ययन के लिए द्रष्टव्य -लेखक द्वारा युगयुगीन बयाना , अध्याय 4 ।
4-आर्के0 सर्वे0 20/6 का मत है कि श्री कृष्ण की 77 वीं पीढ़ी में धर्मपाल जादों राजपूत ने जन्म लिया था और उसने आठवी सदी में अपने नाम के साथ :”पाल “शब्द लगाया था ।
5-गहलोत ,597 (पा0 टि0 ) ।
6-मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार आगरा एक प्राचीन कस्वा था ,जहाँ महाभारत काल में राजा कंस ने राजनैतिक बन्दियों के लिए कारागार बनवाया था (तारीखे दाउदी ,पृष्ठ 42 ) ।सुल्तान महमूद गजनवी की स्तुति में मसूद के लिए कसीदा के अनुसार यहां पर एक फौलादी दुर्ग था ,जिसको महमूद ने मिट्टी में मिला दिया था (तुजुके जहाँगीरी ) ।
7-बलदेव सिंह ,5 ;वाक्या राज0 2/34 ,चौबे ,1 ;ब्रुकमैन ,316-7 ।
8-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास (1966ई0) -लेखक डा0 प्रभुदयाल मितल ।

9-अलउत्तवी कृत तारीखे यामिनी (इ0 डा0) ,2/42-46;तबकाते अकबरी 10 ;अल्बदउँनी 22-25 ; फरिश्ता (इ0डा0 ) ,2 ,459-61 ; ओझा 1 /264-65 ;आशीर्वादी लाल (दिल्ली सल्तनत ) ,पृष्ठ 39-48 ;मथुरा महिमा , 61 ;डा0 मुहम्मद हबीब (सुल्तान महमूद ऑफ गजनी ) ।
10-नैणसी की ख्यात ,2/4 ;टॉड ,2/280-81 ;आमेर की ख्यातें (ओझा संग्रह );राय ,2/823 -24 ; माबेल डफ ,291 ;मार्शल 3;डा0 भार्गव (राजस्थान ) 115 ।
11-ब्रुकमैन ,317 ;दीक्षित , 1;चौबे 1;जाट जगत ,10 ;बलदेव सिंह ,5 ;वाक्या राज0 ,2/34 ।
12-इम्पी 0गजे0 , 7/137 ,15/26 ;आर्के 0 सर्वे0 ,6/54 ,20/6 ,62 ;गहलोत ,597 ;दीक्षित ,188 ;वाक्या राज0 ,2/26 ;वीर विनोद , 1497-8 ।
13-शिलालेख -इ 0ए0 ,भाग 6/55 ,14/9-10 ;काव्यमाला 129-30 ।
14-विजयमन्दिरगढ़ के दक्षिण में 14 मील , हिण्डोन के पूर्व में 14मील , करौली के उत्तर में करौली मांसलपुर राजमार्ग से 6 मील त्रिभुवनगिरि की उच्च श्रृंग पर ।शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण 1058 ई0 में हुआ था ।
15-आर्के0 सर्वे 0 ,20/3 ( भूमिका ) 5 ;इम्पी0 गजे0 ,15 /26 ;गहलोत 600।
16-आर्के0 सर्वे0 ,6/54 ।
17-विजयपाल रासौ (कविरत्न माला ) ।
18- कविरत्नमाला ,पृष्ठ 23;ब्रज का इतिहास ,2/213।
19- इम्पी0 गजे0 ,17 /313 ;ब्रुकमैन ,
20 – दीक्षित ,7 ;आर्के0 सर्वे0 ,6/55, 20/60 ।
21- इम्पी0 गजे0 ,8 /137 ,ओड़ायर 3/24 ;वीर विनोद ,1498, बलदेव सिंह ,6 ;वाक्या राज0 ,2/35 ;दीक्षित ,2;गहलोत 599।
22-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध
23-व्रज नन्दिनी मासिक हिन्दी पत्रिका वर्ष 7,अंक 7-8, 2012 ।
24-मथुरा के यमुना तटीय स्थलों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास लेखक जयंती प्रसाद शर्मा ।
25-भरतपुर संभाग :जिलेवार सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन -लेखक डॉ0 एम0 एल0 गुप्ता ।
26-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स , भरतपुर (जयपुर 1971 )पृष्ठ 45-60 ।
27-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स ,सवाईमाधोपुर पृष्ठ 32-43 O
28-गजेटियर्स ऑफ करौली स्टेट  -पाउलेट ,पृष्ठ 2-12 ।
29-उत्तर प्रदेश गजेटियर्स  मथुरा भाग 10 -21 ,1959 ,पृष्ठ 54, 85
30-उत्तर प्रदेश गजेटियर्स आगरा ,1965, पृष्ठ 26-30
31-मथुरा मेमो -ग्रॉउस ।
32-राजस्थान का जैन साहित्य 1977
33-जैसवाल जैन ,एक युग ,एक प्रतीक
34-,राजस्थान थ्रू दी एज -दशरथ शर्मा
35-आइन्ट सिटीज एंड टाउन्स ऑफ राजस्थान -लेखक कैलाश चन्द जैन
36-ब्रज संस्कृति विश्व कोष भाग 2
37-करौली पोथी एवं करौली ख्यात अप्रकाशित ।
38-पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ अनसैट इंडिया -एच0 सी0 रायचौधरी
39-हिस्ट्री एन्ड कल्चर ऑफ इंडियन पीपल ,भाग 1
40-महाभारत दीर्णपर्व  चैप्टर 144 ,पृष्ठ 6-7
41- मुंशी अकबर अली बेग कृत तवारीख-ए-करौली  ।

लेखक-डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गाँव-लढोता ,सासनी
जनपद -हाथरस,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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