मध्यकाल के वास्तविक (पौराणिक ) यादव क्षत्रियों (राजपूतों )का ऐतिहासिक शोध–

मध्यकाल के वास्तविक यादवा चन्द्रवंशी क्षत्रियों (राजपूतों ) का ऐतिहासिक शोध—–

वास्तविक (पौराणिक )यादवा क्षत्रिय (राजपूत ) चंद्रवंश के ययाति के पुत्र यदु वंशधर हैं। मनु के चार पुत्रों इक्ष्वाकु, प्रांगु, सुद्युम्न तौर शर्वाति ने भारत में सबसे पहले आर्य -राज्य स्थापित किये । यह घटना लगभग 2000 ई. पूर्व की है। इक्ष्वाकु के वंश में रामचन्द्र हुए थे। महाभारत के समय में इस वंश का राजा बृहद्रथ था। इनका वंश सूर्यवश कहलाया।

मनु की पुत्री इला का पुत्र पुरूरवा ऐल (चन्द्रवंशी सोम (चन्द्रमा ) के पौत्र व बुध के पुत्र) का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। इसी वंश में यदु हुआ, जिसके वंशधर यादवा कहलाये। महाभारत काल में कृष्ण इसी वंश में हुए। महाभारत लगगग 1500 ई. पूर्व हुआ। इनका वंश चन्द्रवंश था ।

पुराणों में दी वशावलिाँ कहाँ तक सही हैं, ठीक से नहीं कहा जा सकता लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं कि कृष्ण व रामचन्द्र अलग-अलग वंशों में हुए थे- एक चन्द्रवंश से थे , तो दूसरे सूर्यवंश से थे।

भारत में मुसलमानों के आने के पहले यादवों का राज्य काठियावाड़, कच्छ, राजस्थान, मथुरा के आस-पास का भाग (जो अब भरतपुर, करौली, धोलपुर, गुड़गांव, आगरा और ग्वालियर कहलाता है) तक फैला हुआ था । दक्षिण में भी इसके राज्य होने के प्रमाण प्राचीन शिलालेखों व ताम्रपत्रों से मिलते हैं। दक्षिण का सेउरण प्रदेश नासिक से देवगिरी / दौलताबाद (आन्ध्र राज्य) तक का भू-भाग भी किसी समय यादवों के अधिकार था । दक्षिण में द्वारसमुद्र, (मैसूर राज्य) तथा विजयनगर (दक्षिण) यादव राजवंश के अधिकार में थे इनका प्रभुत्व सिन्धु नदी के दक्षिण भाग में तथा पंजाव में भी रहा था।

यहां ये उल्लेखित करना आवश्यक है कि भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने “यादवा ” शब्द को संस्कृति भाषा का शब्द लिखा है जिसका हिन्दी में अर्थ “जादव ” है।ब्रज भाषा में” य” वर्ण का उच्चारण “ज” बोला जाता है
हिन्दी साहित्य का अध्ययन के अध्ययन करने पर पाया गया कि ” यादवा या यादव ” शब्द का अपभ्रंशरूप 16 वीं – 17 वीं शताब्दी के भक्ति काल में दिखाई देता है। कुछ विद्वानों के अनुसार “यादव” संस्कृति का शब्द है जिसका हिंदी “जादव ” है जिससे “जादों ” हुआ ।भक्ति रचनाओं में तुलसीदास एवं सूरदास ने अपने श्रेष्ठ रचनाओं जैसे रामायण ,सूरसागर ,आदि में जदुवंश ,जादों ,जदुपति ,जादवपति ,जादोंराय आदि शब्दों का प्रयोग बहुतायत से किया है ।
तुलसीदास जी ने रामायण में कुछ इस प्रकार लिखा है—
जब जदुबंस कृष्न अवतारा।
होइहि हरन महा महिभारा।।
कृष्न तनय होइहि पति तोरा ।। .
बचनु अन्यथा होइ न मोरा।
इसी प्रकार इस चौपाई में भी यद्धपि के स्थान पर जद्धपि शब्द लिखा गया है ।
जद्धपि जग दारुन दुःख नाना।
सबते कठिन जाति अपमाना ।।
इसी प्रकार कुछ अन्य कवियों के छंदों में भी “य”के स्थान पर “ज” शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो इस प्रकार है—
उग्रसेन नृप के तपत , यह न सभा तुम योग्य।
अव मथुरा भेजहु अरहि ,भुव पति जदुकुल योग्य।।
तुमसौं कौं रन एरियो , जदुवंश नारद हूं कहो।
जवनेस सो सुनि इक्क ,संकु अनीक लै दूत उम्महो।।
जिहिं आयकैं मथुरापुरी ,जरदाय जादव बुल्लये ।
जव वेश माधव रात, सुब्बहि जानि माधव नै लये।।
वसुदेव जादव को तनुज ,रु कृष्ण नामक नाम है।
बृंयहू कहो तब विष्णु हो ,मम बेर -बेर प्रनाम है।।
हमसों जुगान्तर मैं पूरा मुनि वृद्ध गर्ग यहें कही।
जदुवंस मैं बसुदेव ग्रह ,अवतार हरि लैहिऐं सही ।।
अतः चक्रवर्ती चन्द्रवंशीय क्षत्रिय महाराजा नहुष के पुत्र ययाति के ज्येष्ठ पुत्र “यदु ” से प्रारम्भ हुए कुल को यदु-कुल या यदुवंश तथा उनके वंशजों को यादव या यदुवंशी क्षत्रिय कहा गया है।इसके प्रमाण सनातन वेदों ,उपनिषदों ,पुराणों ,महाभारत ,तथा अठारह वीं सदी के बाद लिखे गए क्षत्रियों के कुलों के आधुनिक इतिहास में भी भारतीय इतिहासकारों,लेखकों एवं 18वीं से 19वीं शताब्दी के अंग्रेज इतिहासकारों जैसे कर्नल टॉड , सी.टी. मेटकाल्फ़ , एम.कनिंगघम , कैप्टन पी पावउलेट ,कैप्टन बिंगले , एम.ऐच ,इलियट , एम.ए.शेररिंग , जेम्स बुरग्रेस , ऐच.ए.रोस , आर.वी. रसेल , ब्रिग्स जॉन , विलियम क्रूके, जे.डव्लू.वाटसन , एफ .एस .ग्राउस , एफ .ई . पार्जितर , मेजर एच.ई. ड्रेक -ब्रोचमन ,सी.एस.बेयलेय , आदि ने भी अपनी भारतीय राजवंशों पर लिखी पुस्तकों में ,इनके द्वारा तत्कालीन लिखे हुए विभिन्न प्रान्तों के डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटीयर्स (मथुरा , गुणगांव,अलवर ,भरतपुर ,अलीगढ़ ,एटा ,मैनपुरी ,वनारस , बांदा , मिर्जापुर , बदायूं , मुरादाबाद) तथा हरियाणा, पंजाब ,महाराष्ट्र ,कर्नाटक एवं गुजरात प्रान्तों के गजेटियर्स में भी वर्णित भारतीय वंश एवं जातियों (Tribes &Castes ) का वर्णन किया है उसमे भी वर्तमान करौली राज्य जादों राजवंश ,जैसलमेर राज्य के भाटी यदुवंशी राजवंश ,देवगिरि राज्य के जादव राजवंश ,कच्छ एवं भुज के जडेजा राजवंश ,जूनागढ़ के चुडासमा ,रायजादा ,रा खगार ,सरवैया राजवंशो , तथा मैसूर के ओड़ियार या बढियार राजवंश के राजाओं के वंशजों को “यादवा या यदुवंशी क्षत्रिय लिखा है ।स्वयं कर्नल जेम्स टॉड नें अनाल्स ऑफ जैसलमेर में भाटी वंश के इतिहास में समस्त यदुवंशियो के लिए यदु और जादों शब्दों का प्रयोग किया है। अनेकों भारतीय इतिहासकारों ने भी इन राजवंशों के वंशजों के नाम के साथ “यादव या यदुवंशी ” वंश उपनाम भी लिखा है जिसके अनेकों प्रमाण है। शोधों से ये ज्ञात होता है कि इतिहासानुर भक्तिकाल से पूर्व चन्द्रवंशीय क्षत्रिय यदुवंशीयों के लिये “यादवा “शब्द का प्रयोग हुआ है ।कुछ पशुपालक जातियों ने तो 1920 ई0 के बाद अपने आप को श्रीकृष्ण भगवान का वंशज घोषित करने के उद्देश्य से इस “यादव ” शब्द को अपने नामों के साथ जोड़ कर अपने को श्री कृष्ण या यदु के वंशज बनने प्रयास किया है जो निःशन्देह झूठ है।

करौली का राजवंश अपने को यादव वंशी तथा मथुरा की शूरसैनी शाखा से निकला हुआ मानता है। यदुवंशियों का राज्य जो पहले प्रयाग में था, वह श्रीकृष्ण के समय में ब्रजदेश (मथुरा) में रहा। यदुवंश में सहस्त्रबाहु अर्जुन के पुत्र शुरसेन के पीछे मथुरा और उसके आस-पास के प्रदेश का नाम ‘शूरसेन’ पड़ा। श्रीकृष्ण ने मगध के राजा जरासन्ध के ज्यादा विरोध के कारण अपनी राजधानी मथुरा के स्थान पर द्वारका बना ली। जब श्रीकृष्ण की कूटनीति द्वारा जरासन्ध मारा गया तब यादव मथुरा से स्वतन्त्र हो गये। इन यादवों का राज्य ब्रज प्रदेश में सिकन्दर के आक्रमण के समय में होना पाया जाता है। समय-समय पर शक, मौर्य, गुप्त, सीथियनों आदि ने यादवों का राज्य दबाया लेकिन मौका पाते ही यादव फिर स्वतन्त्र हो जाते थे ।

करौली राजवंश का मूल पुरुष विजयपाल मथुरा के यादक राजवंश से था। वह अपनी राजधानी मथुरा से हटाकर पास की मानी पहाड़ी पर ले गया और वहां एक किला ‘विजय मन्दिर गढ़’ (ई. सन् 1040 में) बनवाकर अपनी राजधानी स्थापित की । यही किला बाद में बयाना के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विजयपाल, श्रीकृष्ण को इठयासवीं पीढ़ी में होना बतलाया जाता है। इगणोडा (देवास राज्य) से मिले वि. सं. 1190 आषाढ सुदि 11 (ई. सन् 1133 की जून 15) के शिलालेख में इसके पुत्र ताहनपाल को, ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज’ लिखा गया है। विजयपाल के पुत्र ताहनपाल ने तवनगढ़ का किला बनवाया था। इसके राज्य मे अलवर राज्य का आधा हिस्सा, भरतपुर, धोलपुर, करौली के राज्य तथा गुड़गांव व मथुरा से लेकर आगरा व ग्वालियर के कुछ भाग भी सम्मिलित थे। बाद में इसके वंशधर कुंवरपाल को मुहम्मद गौरी से हारकर, बयाना व तवनगढ़ छोड़ने पड़े थे और कामा की ओर जाना पड़ा। इसके वंशधर अर्जुनपाल ने चौदहवीं शताब्दी (सन 1327 ) में सरमथुरा के 24 गांवों को बसाया और धीरे-धीरे अपने पूर्वजों के राज्य पर पुनः अधिकार किया। वि. सं. 1405 (ई. सन् 1348) में इसने कल्याणजी का मन्दिर बनवाकर कल्याणपुरी नगर बसाया जो अब करौली कहलाता है। यही इस राज्य की राजधानी बना ।

मुहम्मद गौरी द्वारा भगाये जाने पर बयाना के कुछ यादव उत्तर पश्चिम की ओर जाकर तिजारा व सरहट्ट (उत्तरी अलवर) में जा रहे। बाद में उनमें से कुछ ने मुस्लिम धर्म अपना लिया जो खांनजादा कहलाते हैं। यादव राजवश के राज्य मैंसूर, त्रिपुरा, जामनगर, राजकोट, गोंडल, कच्छ, मौरवी और घरौल भी थे।

ख्यातों के अनुसार यादवों को एक शाखा पंजाब के उत्तरी भाग में पहाड़ी प्रदेश में जा बसी थी। वह स्थान यदु की डाँग कहलाया। इसी वंश में रज नामक नरेश छटी शताब्दी के अन्त में पुरुषपुर (पेशाबर) में राज्य करता था। उसके पुत्र गज ने गजनीपुर तथा पौत्र शालिवाहन ने शालभानपुर (स्यालकोट) बसाये थे। शालिवाहन के पुत्र बलन्द के राज्य काल में उसके राज्य के पश्चिमी भाग पर शत्रुओं ने कब्जा कर लिया लेकिन इसके पुत्र भट्टी ने अपने पिता के शत्रुओं से बदला लिया और अपने राज्य का विस्तार किया। उसने भटनेर बसाया, जो अब हनुमानगढ़ कहलाता है। जैसलमेर राज्य के भाटी राजवंश का मूल पुरुष यही था ।
भाटी शाखा का मूल पुरुष भट्टी (भाटी) वि. सं. 680 (ई. सन् 623) में हुआ था। उसी ने वि. सं. 680 से भट्टिक-संवत चलाया था। इस संवत् के नाम के कई शिलालेख अब तक मिल चुके है।
भट्टी के पुत्र मंगलराव को गजनी के डुण्डी ने परास्त कर शालभानपुर से निकाल दिया अतः वहां से हटकर उसने राजस्थान के उत्तर पश्चिमी व भावलपुर राज्य के दक्षिण पूर्वी भाग में बसे राजपूतों के प्रदेश पर कब्जा कर लिया। इसके पुत्र मंजमराव ने नये राज्य में मरोट नामक किला तथा पौत्र केहर ने अपने प्रिय पुत्र तणु के नाम पर तणुकोट (तनोट) वि. सं. 787 ( ई. सन् 730) में बनवाया। बाद में तणु के पुत्र विजयराज को वाराह राजपूतों ने तणुकोट से निकाल बाहर किया। विजयराज लड़ाई में मारा गया । बाद में उसके पुत्र देवराज ने देरावल (भावलपुर राज्य, पाकिस्तान) बसाकर वहां अपना राज्य स्थापित किया। उस वक्त यह क्षेत्र, वल्लमाड कहलाता था। इसने अपना राज्य बढ़ाना आरम्भ किया लेकिन तब ही मण्डोर नरेश शिलुक परिहार ने इसे युद्ध में हराकर इसकी आगामी विजयों पर रोक लगा दी। देवराज ने लोदरा राजपूतों से लोद्रवा (जैसलमेर के उत्तर पश्चिम में 10 मील) जीतकर वहां अपनी नई राजधानी स्थापित की । देवराज के वंशधरों में विजयराव बहुत प्रसिद्ध है। उसके शिलालेख वि. सं. 1221, 1223 व 1232 के मिले हैं। इस समय तक हिन्दुस्तान पर मुसलमानों के काफी आक्रमण होने लग गये थे। इन आक्रमणों को विजयराव ने बड़े साहस से रोका। अतः भाटियों के लिये प्रसिद्ध हो गया “उत्तर भड़ किवाड़ भाटी” अर्थात् भाटी (मुसलमानों के) हमलों को रोकने वाले उत्तर के द्वारपाल हैं। विजयराव बड़ा दातार था, अतः वह लंजा विजयराव कहलाता था । इसकी मृत्यु के बाद भोजराज गद्दी पर बैठा लेकिन वह निसंतान मरा, अतः राजगही पर इसका चाचा जैसलदेव बैठा । जैसलदेव ने लोद्रवा को राजधानी उपयुक्त नहीं समभकर इसके 10 मील दूर एक छोटी पहाड़ी पर 1212 (ई. सन् 1155) में किला बनवाया और वहां बस्ती बसवाई। इसका नाम जैसलमेर रखा गया। वि. सं. 1234 (ई. सन् 1178) से यहां वर्ष राजधानी स्थापित कर दी गई। तब से वह राज्य जैसलमेर राज्य कहलाया।

यादवों की शाखाएँ इस प्रकार हैं:- जादों , पोर्च, सूरसैनी , बनाफर, जडेजा, जाधव, वडियार , सरवहया, भाटी, चुडासमा , रायजादा ,छोंकर , टांक, जैसवार , ।

संदर्भ–

1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली ।
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा ।
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता ।
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग ।
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन ।
21-करौली पोथी ।
22-करौली ख्यात ।
23-ग्वालियर के तंवर -लेखक हरिहरप्रसाद द्विवेदी ।
24-जाटों का नवीन इतिहास -लेखक उपेन्द्रनाथ शर्मा ।
25-जाटों का नया इतिहास -लेखक धर्मेंचन्द्र विद्यासंकर ।
26- मुंशी अकबर अली बेग कृत तवारीख -ए-करौली ।
27-तवारीख जैसलमेर -लखमी चन्द ,तवारीख करौली राज्य , पृष्ठ 334 -338।
28-मथुरा मेमो -ग्रॉउस ।
29-राजस्थान का जैन साहित्य 1977
30-जैसवाल जैन ,एक युग ,एक प्रतीक
31-,राजस्थान थ्रू दी एज -दशरथ शर्मा
32-आइन्ट सिटीज एंड टाउन्स ऑफ राजस्थान -लेखक कैलाश चन्द जैन
33-ब्रज संस्कृति विश्व कोष भाग 2
34-राजस्थान का इतिहास -कर्नल जेम्स टॉड
35-हिस्ट्री ऑफ दी राजपूत ट्राइब्स -मेटकाल्फ़
36-हैंडबुक आफ राजपूतस -कैप्टन बिंगले
37-भारत का वृहत इतिहास (भाग 1,2,3)-रमेश चंद्र मजूमदार
38-राजपूताने का प्राचीन इतिहास -पं0 गौरीशंकर ओझा
39-गजनी से जैसलमेर -हरि सिंह भाटी
40-राजपूताने का इतिहास -जगदीस सिंह गहलोत
41-दक्षिण भारत का राजनीतिक इतिहास लेखक डॉ0 अजय कुमार सिंह ।
42-भारत ज्ञानकोष
43-ऐतिहासिक स्थानावली लेखक विजेन्द्र कुमार माथुर।
44-देवगिरि के यादव लेखक राजमल वोरा
45-भारतीय इतिहास कोष लेखक सच्चिदानंद भाट्टाचार्य ।
46-दिल्ली सुल्तनत भाग 2 संपादक मोहम्मद हवीव ,खालिक अहमद निजामी ।
47-दकन का प्राचीन इतिहास संपादक जी याजदानी ।
48-विजयनगर -साम्राज्य का इतिहास , भूमिका लेखक-डॉ0 रामप्रसाद त्रिपाठी एवं लेखक -श्री वासुदेव उपाध्याय ।
49-दिल्ली सल्तनत 1206-1526 ,संपादक मोहम्मद हबीव ,खलिक अहमद निजामी
50-राजस्थान जैसलमेर गजेटियर ।

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

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