महाराजा सर भंवरपाल देव बहादुर यदुकुल चन्द्रभाल का शासन को करौली के सतयुग की संज्ञा—

महाराजाधिराज  सर भंवरपाल देव बहादुर ,यदुकुल -चन्द्र भाल  का शासनकाल करौली के सतयुग की संज्ञा— —

महाराजा अर्जुनपाल के 1886 में देहान्त होने के बाद भंवर पाल जी  करौली के राजा बने ।महाराजा अर्जुन पाल जी के समय भंवरपाल जी हाडौती के राव थे और इनके नजदीकी भतीजे थे। |इनका जन्म 24 फरवरी 1864 को हुआ था।इनके पिता पदमपुरा के ठाकुर दुर्जनपाल थे ।इनका करौली में 14 अगस्त 1886 को राज्यभिषेक गोपाल मन्दिर में हुआ था । ई0 18 48 में प्रतापपाल के देहांत के बाद से लेकर सन 1886 ई0 में भंवरपाल जी के गद्दी पर बैठने तक भंवरपाल करौली के लगातार छठे ऐसे शासक थे जो राजा थे जो राजा का पुत्र न होकर कहीं दूसरे ठिकाने से गोद लिए जाकर करौली के राजा बने ।इनके शुरुआती समय में करौली रियासत के प्रशासनिक अधिकार पोलिटिकल एजेंट के अधीनस्थ रियासत की कौन्सिल के अधिकार क्षेत्र में ही रहे ।लेकिन जून 1887 को कुछ विशेष परिस्थितियों में महाराजा को कुछ अधिकार दिए गए।सन1889 में रियासत ने सम्पूर्ण  कर्ज चुका दिया और महाराजा भंवरपाल जी को शासन के पूर्ण अधिकार 7 जून 1889 को मिले थे | इनके शासनकाल में करौली रियासत का क्षेत्रफल 1, 242 वर्ग मील था जिसका औसत रिवेन्यू 4, 36,300 रुपये था।रियासत इस समय अंग्रेज सरकार को या अन्य किसी रियासत को कोई कर (लगान ) नहीं देती थी ।करौली रियासत इस समय में उत्तर में जयपुर और भरतपुर रियासत से , पूर्व में धौलपुर , दक्षिण में ग्वालियर तथा पश्चिम में जयपुर रियासतों से जुड़ी हुई थी। करौली परिवार के अधिकतर विवाह सम्बन्ध जयपुर ,बून्दी ,कोटा एवं सिरोही रियासतों में होते थे।सन 1782 ई0 में महाराजा मानिक पाल ने अपनी पुत्री का विवाह जयपुर के महाराजा प्रताप सिंह जी के साथ किया था।सन 1785 महाराजा मानिक पाल की दूसरी बेटी का विवाह बून्दी के राव राजा विशन सिंह के साथ हुआ था।महाराजा प्रतापपाल (1839-53) की पुत्री का विवाह सन 1854 ई0 में कोटा के महाराजा छात्रर साल के साथ हुआ था।महाराजा मदनपाल ने भी अपनी पुत्री का विवाह सन 1865 में सिरोही के राव के साथ किया था।

महाराजा भंवरपाल के नजदीकी भाई-बन्धों का विवरण

भैंरोंपाल  जी

1A -गोविन्दपाल–नारायण पाल –महाराजा जयसिंह पाल  ।

1B- मंगलपाल
1-महाराजा अर्जुनपाल
2-दुर्जनपाल—-महाराजा भंवरपाल , तत्कालीन करौली शासक जिनको महाराजा अर्जुनपाल ने गोद लिया ।
3-सुजनपाल
A-   भौंमपाल राव हाड़ौती
B- मोतीपाल ठाकुर पदमपुरा

1C-पदमपाल
A–रतनपाल –सुजनपाल —जसराजपाल एवं  जसवंत पाल ।
B–जतनपाल
1-सुरजनपाल –A -गजराजपाल , B- सरवरपाल , C-  कंचनपाल
2-सूरजपाल
3-चिमनपाल
4-छत्तरपाल

व्यक्तित्व

इनके शासनकाल को प्रजा करौली का सतयुग के नाम से पुकारती थे |इन्होने लोक प्रियता प्राप्त की थी | चहु ओर शांतिमय शुख का साम्राज्य था |बड़े धर्मात्मा राजा थे तथा गाय व ब्राह्मणों की सेवाभाव़ी  थे |जगदम्बा कैला देवी इष्ट देवी थी |प्रजाजनों  के साथ  इनका अच्छा बर्ताव था |इनको शिकार का बड़ा शोक था तथा अपने जीवन में 300 शेरों का शिकार किया |इसके अतरिक्त दो शेर पाल रखे थे जो इनके साथ रहते थे |इनको कुश्ती लड़ने का बहुत शौक था तथा अनेक पहलवान रियासत की तरफ से रोजगार पाते थे |इनका बंदूक का निशाना अचूक था |बर्छी भाले व तलवार चलाने में भी पूर्ण निपुणता थी |आप को संगीत से बड़ा प्रेम था तथा अपनी मात्र भाषा हिंदी थी लेकिन  संस्कृत व अंग्रेजी  में भी जानकारी रखते थे |नई पोशाकें पहनते तथा दाडी बढा कर रखते थे |ऊंट और घोड़े की सवारी  में भी आप निपुण थे |

शिक्षा-
भंवरपाल जी को शिक्षा प्राप्त करने के लिए मेयो कॉलेज अजमेर भेजा गया था लेकिन भोग- विलासिता की जिन्दगी ने इनको पढ़ने नहीं दिया जिससे महाराजा अर्जुनपाल को  काफी निराशा हुई।

जयपुर रियासत से सम्बन्ध —

महाराजा भंवरपाल जी जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय की पटरानी जादौन जी को अपनी बहिन मानते थे |जयपुर की ये महारानी उत्तर प्रदेश के एटा जिले की प्राचीन जादों रियासत के राव बुद्धपाल सिंह की बेटी थी जो ईसरदा ठिकाने के कायम सिंह को ब्याही थी जो बाद में माधो सिंह दुतीय के नाम से जयपुर के राजा हुए |करौली महाराजाभंवर पाल जी  एवं जयपुर महारानी जादौन जी एक दुसरे का बहुत सम्मान व आदर करते थे |ये एक दुसरे को भाई –बहिन मानते थे |10 फरवरी 1908 को महाराजा भंवर पाल जी जयपुर महारानी जादौन जी से जयपुर में जब मिले थे तो महाराजा का भव्य स्वागत महारानी द्वारा किया गया थे तथा महारानी ने मार्च में होली पर ,अप्रैल में गणगौर पर तथा अगस्त में राखी पर अपने प्रतिनिधि को करौली भेज कर महाराजा के लिए उपहार स्वरूप भेजती थीं |महाराजा भी रीती रिवाज के अनुसार बहिन को उपहार भेजते थे |जब महारानी जादौन जी के   निधन (9 नवम्बर 1909 को) का समाचार करौली आया तो महाराजा को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने करौली राज्य में भी शोक घोषित किया तथा अपने प्रतिनिधि को जयपुर भेज कर शोक –संवेदना भेजी (करौली एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट 1907 -1908 ,1908 -1909 ) । 25 अक्टूबर 1885ई . को जब महाराजा भंवर पाल जी आगरा में अंग्रेज वायसराय से मिलने गये थे तो वहाँ पर तत्कालीन आगरा जिले की कोटला जादों रियासत के राजा बहादुर कुशलपाल सिंह एवं एटा जिले की   अवागढ़ जादों रियासत के राजा  बलवंत सिंह जी  ने महाराजा करौली का आगरा में कोठी ध्यान पाल सिंह जी की बागफरजाना में  भव्य स्वागत –सत्कार किया था |

भंवरपाल जी के समय में करौली शासन व्यवस्था —

सन 1902-03 की करौली एडमिनिस्ट्रेटिव रिपोर्ट के अनुसार करौली रियासत की काउंसिल के एक सदस्य चौधरी नरपति सिंह का देहान्त हो गया ।उनकी यह जगह वर्ष के अंत तक रिक्त रही।इसके बाद   सन 1903 ई0 में  कुंवर ध्यानपाल सिंह  जादों परिवार कोटला -जाटऊ जो ठाकुर उमराव सिंह कोटला  (जो जयपुर रियासत में रिवेन्यू काउंसिल के एक सदस्य थे )के भाई नौ निहाल सिंह के पुत्र थे को सन 1905 ई0 में करौली रियासत की काउंसिल के चीफ मेम्बर बनाया गया जो पारवारिक कारणों से 15 अप्रैल 1906 ई0 को अपना उक्त पद से त्यागपत्र देकर करौली छोड़ आये।उनकी कोठी आज भी करौली में “ध्यानपाल सिंह की कोठी “के नाम से मशहूर है जिसमें वर्तमान दूर संचार का कार्यालय चलता है ।इसके बाद केवल वंशानुगत कार्यालय आफिसर राजा बहादुर लखपत सिंह और जमादार रसूल खान थे।राजा बहादुर लखपत सिंह एक ताजिमी सरदार तथा चरिट्री विभाग के अधीक्षक थे। अवंशानुगत अत्यधिक महत्वपूर्ण अधिकारियों में दीवान  बहादुर मुंशी दामोदर लाल , मुख्य काउंसिल सदस्य , बाबू भोलानाथ चटर्जी , राव साहिब ,काउंसिल के गृह सदस्य , डॉ0 भवानी सिंह , महाराजा के व्यक्तिगत डॉक्टर , बाबू जुगल किशोर  B.A. महाराजा के प्राइवेट सचिव , मुहम्मद जियाउद्दीन खान , रियासत के सिविल तथा क्रिमनल अधिकारी, फौज मुसाहिब कैप्टन रामचरन सिंह , कमांडर इन चीफ तथा मुंशी भगवानदास , डिप्टी कलेक्टर थे।

निर्माण कार्य

महाराजा की शासन अवधि 41 वर्ष रही|इस अवधि में इन्होने राज्य में बहुत परिवर्तन किये थे |कैलादेवी से करौली तक सडक निकल वायी कैलादेवी में भी बाजार का निमित्तिकरण कराया |इन्होने पाचना या गंभीर नदी पर विशाल पुल का निर्माण कराया जो अब तक अपनी दृढ़ता  का परिचय दे रहा है|करौली से मंडावर तक सडक निकल वाई |ई .1889 में आप को K.C.I.E तथा 1897 ई 0 में G. C.I.E के  खिताव से नवाजा गया |

विद्या- प्रेमी —

विद्या से अनुराग होने के कारण 1905 ई . में आप ने करौली में लड़कियों के लिए एक मिडिल स्कूल तथा लड़कों के लिए 5 मिडिल स्कूल खोले जिनमें शिक्षा लेने वाले छात्रों की संख्या 500 थी |आप ने करौली में राजकीय पुस्तकालय की स्थापना की जिसे दुर्लभ पुस्तकों  से परिपूर्ण किया गया |आप ने 4 फरवरी 1902ई .को भंवर इन्फेंट्री के नाम से एक पलटन की स्थापना की जिसमे  केवल राजपूतों को ही लिया जाता था |ई .सन 1921में महारानी चौहान जी का स्वर्गवास होने के बाद आप ने भंवर बैंक की स्थापना की जिससे कर्ज के द्वारा क्षेत्रीय व्यापार को प्रोत्साहन मिला |आप ने रियासत में हाई स्कूल एवं बिजली के लिए बिजली घर का निर्माण करवाया | इन्होने कैला देवीं के यात्रियों की सुविधा हेतु करौली से भवन तक मार्ग पक्का बनवाया |कालीसिल का पुल ,मैया की परिक्रमा तथा दुकानों का निर्माण भी करवाया |भवन के मंदिर के लिए एक रिसाला भी रक्षार्थ नियुक्त किया तथा एक बहुत बड़ी धर्मशाला तथा दुर्गा सागर कुंए का निर्माण कराया |महाराजा प्रति माह देवी की यात्रा सपरिवार करते थे |इन्होने मैया के किवाड़ और खिड़कियाँ चांदी से मढ़वाये |प्रति माह अष्टमी को राज्यचार्य और राजपुरोहित पूजा करने हेतु पधारते थे |आप कैला देवी के परम भक्त थे |चैत्र प्रतिपदा से नवमी शुक्ल पक्ष में महाराजा वहीं विराजते थे तथा यात्रा का समस्त प्रबंध स्वयं देखते थे |आगरा से आने वाले भक्तों की रक्षार्थ गार्ड की व्यवस्था भी कराई | आप के समय में करौली राज्य में बड़े –बड़े योग्य विद्वानों उपस्थिति रहती थी जिससे करौली को लघु काशी का ख़िताब मिला हुआ था |कुंवर जसराज पाल ही केवल एक ऐसे व्यक्ति थे इस करौली राज्य से जिन्होंने महाराजा भंवरपाल जी के समय मेयो कालेज अजमेर से शिक्षा प्राप्त की थी |महाराजा राज्य की तरफ से उनकी शिक्षा का खर्च अदा किया करते थे और वे जसराज पाल की उन्नति रिपोर्ट से संतुष्ट भी थे |इससे यह सिद्ध होता है की वे वास्तव में राजपूतों की शिक्षा के प्रति जागरूक थे | सन 1910-11 में कुंवर नारायण सिंह जो महाराजा के स्कूल के छात्र थे , उनको रियासत से आगरा कॉलेज में पढ़ने भेजा ।रियासत उनकी संतोषजनक उन्नतिशील रिपोर्ट से संतुष्ट थी और उनको रियासत की तरफ से 10 रुपये प्रति माह की छात्रवृति स्वीकृत की गई।उन्होंने इंटरमीडिएट परीक्षा आगरा कॉलेज जो तत्कालीन  इलाहाबाद विश्व विद्यालय के अंर्तगत संलग्न था।इनके समय में 1908-09 में अमरगढ़ , ठिकाना ठाकुर नारायण सिंह , श्रीजी मन्दिर तथा ठिकाना इनयती रियासतों की व्यवस्था कोर्ट्स ऑफ वार्डस के अंतर्गत थी। इन ठिकानों  का वार्षिक बजट रियासत करौली की काउंसिल सीधे तौर पर  नियंत्रित करती थी। इन  ठिकानों में सालाना आमदनी और खर्च अमरगढ़ का ठिकाना नारायण सिंह से अधिक ।इनका ठिकाना श्रीजी मन्दिर से अधिक ।श्रीजी मंदिर का इनायती से अधिक।जो आमदनी क्रमशः 12514 रुपये अमरगढ़ ,7266 ठाकुर नारायण सिंह , 5016 रुपये श्री जी , 4357 रुपये इनायती था ।कुल खर्चा 40, 000 रुपये के लगभग था।

विवाह
इनकी 6 शादियाँ हुई जिनमें दो राव पदवी पर रहते तथा शेष चार महाराजा की हैसियत से हुई जो इस प्रकार हैं।

राव पदवी पर रहते

1 – प्रथम विवाह राव पदवी पर रहते हुए सम्वत 1934,ई0 सन 1878 में कोटा राज्य के कोयला ठिकानेदार श्री अपजी अजीत सिंह हाड़ा की वाई से सम्बत 1934 ई0 सन 1878 में सम्पन्न हुआ।
2 दूसरा विवाह सम्वत 1936,ई0 सन 1880 में जयपुर राज्य के खण्डेला शेखावत ठिकानेदार  खुशाल सिंह की पुत्री से सम्पन्न हुआ जिनका स्वर्गवास शादी के तीन वर्ष बाद ही पुत्री को जन्म देते समय हो गया | माँ तथा बेटी दोनों ही देवलोक सिधारी ।

महाराजा की पदवी पर रहते–

1- तीसरी शादी महाराजा बनने के बाद सम्वत 1945 ई0सन 1889 में मंडावा के ठिकानेदार ठाकुर अजित सिंह शेखावत   की पुत्री से सम्पन्न हुआ जिनको उस समय 12347 रुपये की जागीर लगाई गई |
2- चौथा विवाह सम्बत 1954 ,ई0 सन 1898 में उदयपुर राज्य के बनेड़ा के ठिकानेदार श्री अक्षय सिंह सिसोदिया की पुत्री से हुआ जिनको 11250 रुपये की जागीर लगाई।
3-  पांचवी शादी सम्वत 1955, ई0 सन 1900 में ग्वालियर राज्य  के शिवपुर बडौदा के ठिकानेदार श्री शिव सिंह गौड़ की पुत्री से हुई जिनको 10309 रुपये की जागीर लगाई।

4- छटी शादी सम्बत 1958 ,ई0 . सन 1903 में  यूनाइटेड प्रोविन्सेस  के जालौन जिले (आधुनिक उत्तर प्रदेश )  की रियासत जगमनपुर के राजा रूपसिंह सेंगर की पुत्री के साथ हुई जिनको 10020 रुपये की जागीर लगाई गई |

7-तीन  खाव्वास भी थी |

देश में स्थिति

इन महाराजा के अंग्रेज सरकार के साथ अच्छे सम्बन्ध थे |इन्होने सन 1904 ई0 में मथुरा -नागदा रेलवे के लिए अपने राज्य की भूमि बिना कीमत लिए प्रदान गयी थी | करौली रियासत की तरफ से कौन्सिल सदस्य सोहनलाल ने हस्ताक्षर कर पटौदा में जमीन मुफ्त दी थी।ई .सन 1904 में यह लाइन विछाई थी|मदनपुर एवं रुंध के बाँध इसी काल में बने थे ।  सन 1906 में पहली बार रियासत में अंग्रेजी सिक्के चले और रियासती सिक्के बन्द होने के आदेश हुए।उपरान्त भी रियासत के सिक्के 1910 तक तकरीबन चले थे।  इसी वर्ष 1906 में रियासत कर्ज में आ गयी ।इस लिए इन महाराजा से कुछ   अर्थ सम्बंधित प्रशासनिक अधिकार  आर्थिक स्थिति को नियन्त्रित करने के लिए स्थाई तौर पर ले लिए गए और पूर्वी राजपूतना के पोलिटिकल एजेंट को हस्तगत  कर दिए जो 1913 तक उसी के पास सुरक्षित रहे। सन 1913 में रियासत द्वारा कर्ज अदा कर दिया गया ।

ई0 सन 1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया।अतः महाराजा भँवरपाल ने अपने राज्य के सभी अर्थ सम्बन्धी अधिकार ब्रिटिश सरकार को सौंप दिए ।इनके समय में संवत 1956 तथा 1962 (सन 1906ई0) में जनता को दो भयंकर  दुभिक्षों का सामना करना पड़ा  था तथा दोनों छ्पन्ना एवं वासटठा के नाम से प्रसिद्ध है |प्रथम दुर्भिक्ष का था दूसरा अनाज व जल का था जिससे जनता में त्राहि –त्राहि मच गयी थी महाराज ने अंग्रेज सरकार से कर्ज लेकर जनता के लिए रोजगार खोले ,जगह –जगह बाँध बनवाये तथा सड़कें भी बनवाई | 1905-06 की रियासती रिपोर्ट के अनुसार इन्होंने मदनपुर , मरोला ,रामपुर ,मंडरायल ,कोफ़ा ,कसडे में तालाब , रुघोड़ में  बांध का निर्माण अकाल के समय  कराया।अंग्रेज लोग इकना बहुत सम्मान करते थे |इन्होने अपने राज्य में देशी सिक्के बंद करके अंग्रेज सरकार का सिक्का चलाया |अंग्रेज सरकार का रियासत पर अधिक कर्ज होने की बजह से रियासत पोलिटिकल एजेंट की निगरानी में राखी गई  जो सन 1917ई . तक रही |

सम्पर्क —

सन 1902 में आप को वाइसराय कर्जन ने हिज मजेस्टी एडवर्ड सप्तम की ताजपोशी में देहली बुलाया गया |25 दिसम्बर को आप स्पेशल रेलगाड़ी से जब देहली पहुंचे तो आप का वहां 17 तोपों की सलामी से पोलिटिकल एजेंट ने स्वंय उपस्थित होकर स्वागत किया और कैम्प तक साथ –साथ सम्मान में गया |

अवागढ़ राजा बलवंत सिंह जी से भेंट—

देहली में इसी कार्यक्रम में आप से अवागढ़ राजा बलवंत सिंह जी ने भी मुलाकात की और आप का स्वागत एवं सत्कार किया जिसमें आप ने राजा  अवागढ़ को भेंट में मोरछल  दिया| महाराजा जयपुर माधोसिंह द्वितीय से आप के अधिक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध भी थे तथा आप उनकी पटरानी जादौन जी को अपनी बहिन भी मानते थे |   आप का भरतपुर एवं धोलपुर के तत्कालीन राजा भी बहुत आदर एवं सम्मान करते थे |

राजकुल की दशा —

राजा भंवर पाल जी के कोई पुत्र नहीं हुआ |वैसे इनके 7 रानियां थी जो अलग -अलग महलों में निवास करती थीं ।सभी के खर्चे के लिए जागीरें लगी हुई थीं ।आप नेअपने चचेरे भाई भीमपाल जी के पुत्र  गनेशपाल जी को भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मेयो कालेज अजमेर भी भेजा था | गणेशपाल जी के दो विवाह भी आपने किये थे ।इनके चचेरे भाई भीमपाल जी ठिकाना हाडौती के राव एवं ठाकुर मोती पाल जी थे |

स्वर्गवास –

राजा भंवरपाल जी का स्वर्गवास 3 अगस्त 1927 ई .  बुधवार तदनुसार श्रावण शुक्ला 6 सम्वत 1984 को सांय 4 बजे  हुआ |इनका दाह –संस्कार बड़ी धूमधाम एवं ठाट –वाट के साथ राजसी तरीके से भद्रावती नदी के तट पर सुख विलास बाग़ के आंचल में इनका जनप्रिय शरीर पांच तत्वों में विलीन हो गया |

संदर्भ

1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली ।
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा ।
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता ।
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग ।
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन ।
21-करौली पोथी ।
22-करौली ख्यात ।
23-ग्वालियर के तंवर -लेखक हरिहरप्रसाद द्विवेदी ।
24-जाटों का नवीन इतिहास -लेखक उपेन्द्रनाथ शर्मा ।
25-जाटों का नया इतिहास -लेखक धर्मेंचन्द्र विद्यासंकर ।
26- मुंशी अकबर अली बेग कृत तवारीख -ए-करौली ।
27-तवारीख जैसलमेर -लखमी चन्द ,तवारीख करौली राज्य , पृष्ठ 334 -338

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

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