महावन की महिमा एवं महावन के यदुवंशी शासक कुलचंद का तुर्कों से संघर्ष एवं बलिदान —

महावन की महिमा एवं महावन के यदुवंशी शासक कुलचंद का तुर्कों से संघर्ष एवं बलिदान —

महावन समस्त वनों में क्षेत्रफल में बड़ा होने के कारण इसे बृहद्ववन भी कहा गया है ।इसको महावन ,गोकुल या व्रहदवन भी कहते है ।पहले गोपराज नंदबाबा के पिता पर्जन्यगोप नंदगांव में ही रहते थे ।यहीं रहते समय उनके उपनंद ,अभिनंदन ,श्री नन्द ,सुनंद और नंदन ये 5 पुत्र एवं सनंदा और नंदिनी दो कन्यायें पैदा हुई। पर्जन्य जी ने अपने सभी पुत्र एवं कन्याओं का विवाह वहीँ रह कर किया ।मध्यम पुत्र श्री नन्द को  कोई संतान न होने के कारण वे बड़े चिंतित रहते थे ।उन्होंने अपने पुत्र नन्द के लिए संतान प्राप्ति के लिए नारायण की उपासना की और उन्हें आकाशवाणी से ज्ञात हुआ कि श्री नन्द को असुरों का दमन करने वाला महापराक्रमी सर्वगुण सम्पन्न एक पुत्र शीघ्र प्राप्त होगा ।इसके कुछ ही समय बाद केशी आदि असुरों का उत्पात आरम्भ होने लगा ।पर्जन्य गोप पुरे परिवार और सगे सम्बन्धियों के साथ इस महावन में उपस्थित हुये ।इस महावन के निकट ही यमुना बहती है ।यही भागवत में वर्णित “नंदबाबा का गोकुल “है ।जहाँ पर वासुदेव जी बाल कृष्ण को लेकर आये थे ।महावन की माटी भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का रसामृत है ।इसमे यशोदा जी का ममत्व घुला है ।भगवान श्री कृष्ण यहां घुट मन चले हैं ।
ब्रज के बारह वनों का राजा महावन आज बंजर नजर आता है ।बड़ा ही दर्द भरा एवं बलिदान का इतिहास है इस भगवान कृष्ण की  इस पावन पवित्र बचपन की मोहक भूमि का ।इतिहास कहता है कि महमूद गजनवी के आक्रमण और लूटमार के बाद महावन कभी अपने वैभव को पुनः हासिल नहीं कर पाया ।यहां आकर यह सत्य प्रतीत होता है ।सादगी की मूरत मोहन के महावन की सूरत और सीरत दोनों ही बदल गयी ।ये योगमाया के जन्म स्थान के नाम से भी जाना जाता है ।ऐसी मान्यता है कि योगमाया का जन्म यहीं हुआ था जिन्हें जदुवंश की कुलदेवीयोगेश्वरी माता” कहते है ।

महावन के यदुवंशी राजा कुलचंद का महमूद गजनवी से युद्ध—

बरन (आधुनिक बुलंदशहर )के राजा हरद्दत पर विजय पाकर महमूद गजनवी ने यमुना नदी के तट पर स्थित महावन की ओर संम्बत 1074 या 1018 ई0 में प्रस्थान किया । राजपूत काल में मथुरा नगर के सामने यमुना नदी के दूसरी ओर महावन के निकट एक सुदृड़ दुर्ग था ।इस समय महावन पर   मथुरा के यदुवंशी  शूरसैनी (जादौन)  शक्तिशाली शासक कुलचंद का शासन था और उसकी महावन में  शक्तिशाली सैनिक छावनी  भी थी ।  इस समय महावन के आस पास के क्षेत्र पर शूरसेन के वंशजों का ही शासन था जिसमे कुलचंद भी सम्भवतः उसी परिवार का सदस्य था ।महावन के अंदर कतिपय मंदिर और अनेक भवनादि थे ।कुलचंद को अपनी शक्ति पर पूर्ण भरोसा था क्यों कि अब तक के समस्त युद्धों में उसे सफलता ही प्राप्त हुई थी ।जब कुलचंद ने महमूद का समाचार सुना तो घने जंगल में अपनी सेना एवं हथियोंको खड़ा कर महमूद का सामना करने के लिए तैयार हो गया ।सुल्तान ने अपने अग्रगामी दस्तों को भेज कर किले के मार्ग का पता लगा लिया ।तत्पश्चात “अल्लाह ही अकबर” की उदघोष के साथ मुस्लिम सेना ने हिंदुओं पर आक्रमण किया ।दोंनो पक्षों में तीर और भालों से संघर्ष होने लगा ।जब हिंदुओं ने देखा कि यवनों का दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है तो उन लोगों ने दुर्ग की दूसरी ओर नदी पार करना चाहा ।मुगलों के आक्रमण के फलस्वरूप 50 हजार हिन्दू सैनिक मारे गये ।वीर कुलचंद ने जब देखा कि वह मुगलों के हाथ पड़ जायेगा तो उसने मुगलों के हाथ मरना स्वीकार न करके सर्वप्रथम अपनी पत्नी को खंजर मारकर ,स्वयं भी आत्महत्या कर ली । महमूद ने कुलचंद की पराजयकेबाद महावन के दुर्ग को तहस नहस करके उसमें विद्वयमान सभी मंदिरों और भवनों को लूटा । इस प्रकार कुलचंद की मृत्यु उपरांत सुल्तान को अन्य वस्तुओं के अतरिक्त 185 हाथी हाथ लगे ।
महावन को नष्ट एवं लूट कर महमूद वासुदेव पुत्र भगवान श्री कृष्ण की जन्मस्थली एवं हिंदुओं के पवित्र नगर मथुरा की ओर रवाना हुआ ।अनेक मंदिरों एवं मूर्तियों से युक्त इस पवित्र नगरी की प्राचीन दृढ पत्थरों से बनी हुई थी ।महमूद ने मथुरा नगरी में लूट मार करके वहां बने बहुसंख्यक मंदिर एवं देवालयों का सर्वनाश किया ।उसी समय भगवन केशवराव जी के प्राचीन मंदिर को भी ध्वस्त किया था ।इस प्रकार मुग़ल सैनिकों ने हिन्दू संस्कृति तथा कलानिधि की अपार हानि की और अपर धन सम्पति एकत्रित की ।किसीभी मुस्लिम इतिहासकार ने मथुरा के शासक का नाम नहीं लिखा है ।इससे ये अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय मथुरा पर कुलचंद का ही शासन था ।उस युद्ध में कुलचंद की मृत्यु के बाद उसका विशाल सैन्य दल एवं राज्य नष्ट हो गया था ।जो यादव उस भीषण विनाश के बाद भी बच गये थे उन्होंने बिजयपाल के नेतृत्व में मथुरा से हत कर श्रीप्रस्थ ( वर्तमान बयाना) में एक नये जादव (जादौन) राज्य की स्थापना की थी ।बिजयपाल संभवतः कुलचंद का भाई था । कई इतिहासकारों के मतानुसार  मथुरा पर शूरसैनी शाखा के जदुवंशी राजपूतों का राज्य था ।मथुरा के राजा जयेंद्रपाल की मृत्यु स0 1048/992 ई0 के बाद उसका पुत्र बिजयपाल मथुरा की गद्दी पर बैठा था जिसने 53 वर्षों तक शासन किया था ।मुस्लिम आक्रमण से मथुरा की बर्वादी के बाद राजा बिजयपाल अपनी राजधानी बयाना ले गया ।इसी ने विजयमन्दिरगढ़ नामक किला बनवाया था जिसे आज बयाना का दुर्ग कहते है ।ये अपने समय के बहुत ही शक्तिशाली राजाओं में जाने जाते थे इनको महाराजाधिराज कहा जाता था।इनके 18 पुत्र थे । राजा बिजयपाल ने भी मुगलों अबूबकर शाह आदि से बयाना पर भयंकर युद्ध किया और अंत में वीरगति को प्राप्त हुये । बयाना पर मुगलों का अधिकार होगया।कुछ समय बाद फिर 12 वीं सदी में  बयाना और महावन क्षेत्र पर  बयाना के शूरसैनी शाखा के बिजयपाल के वंशजों का पुनः शासन होगया । बयाना पर राजा कुंवरपाल का शासन था जो 1196ई0 तक रहा था ।महावन मेंएक प्रसस्ति जो मथुरा के पास से मिली उससे ज्ञात होता है कि यहां पर 1150ई0 में महाराजाधिराज अजयपाल का शासन था ।इसके बाद महावन के अन्य प्रसस्ति जो 1170ई0 का है उससे अजयपाल के पुत्र हरपाल का महावन पर शासन सुनिश्चित होता है ।इसके बाद सोहनपाल ,महीपाल ,दिगपाल आदि महावन के शासक हुये है ।महाराजा बिजयपाल के वंशजों ने ही कालांतर में कामबन तथा करौली  (1348ई0)में भी जादव /जदुवंशी (जादों ) राज्यों की स्थापना की थी और वहाँ अनेक दुर्ग और देवालय बनवाये थे ।मुग़ल शासन के अंतिम काल में बयाना और कामबन पर जाटों ने अधिकार कर लिया था ,किन्तु करौली में जादौनों का ही राज्य बना रहा ।

डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश ।
मीडिया सलाहकार नार्थ भारत
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा

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