यदुकुल शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण जी के जन्म एवं नामकरण -संस्कार के विषय में जाने–

  • वसुदेवस्य तनयो यदोवंशसमुद्दव : ।
    मुचुकुंदोअपि तत्रासौ वृद्ध गागर्य वचोत्स्मरत।।

    पुरा गार्ग्यऐंन कथितमष्टा विंशतिमे युगे ।
    द्वापरान्ते हरेजन्म यदुवंशे भविष्यति ।।

    मैं चन्द्रवंश के अंतर्गत यदुकुल में वसुदेव जी के पुत्ररूप में उत्तपन्न हुआ हूँ ।मुचुकुंद जी ने कहा कि पूर्व काल में गार्ग्य मुनि ने कहा था कि अट्ठाईसवें युग में द्वापर के अन्त में यदुकुल में श्री हरिका जन्म होगा ।( विष्णु पु0 पंचम अंश ,पेज 381)

    अवतीरणों यदुकुले गृह आनकदुन्दुभे:।
    वदन्ति वासुदेवेति वसुदेवसुतं हि माम ।।

    ब्रह्मा जी की प्रार्थना से मैंने यदुवंश में वसुदेव जी के यहां अवतार ग्रहण किया है ।अब मैं वसुदेव जी का पुत्र हूँ ,इस लिए लोग मुझे “वासुदेव “कहते है (श्रीमद्भावत ,दशम स्कन्ध ,पेज 383) ।

    गर्ग जी के द्वारा नामकरण —

    अथ शूरसुतो राजन पुत्रयो समकारयत ।
    पुरोधसा ब्राह्मनैश्च यथावद दिव्जसंस्कृतिम ।।
    ततश्च लब्धसंस्कारौ दिवजत्वं प्राप्य सुव्रतौ ।
    गर्गाद यदुकुलाचार्याद गायत्रं व्रतमास्थितौ ।।

    इसके बाद वसुदेव जी ने अपने पुरोहित गर्गाचार्य तथा दूसरे ब्राह्मणों से दोनों पुत्रों का मथुरा में भी विधिपूर्वक द्विजाति -समुचित यज्ञापवीत संस्कार करवाया ।इस प्रकार यदुवंश के आचार्य गर्ग जी से संस्कार कराकर बलराम जी और श्री कृष्ण जी द्विजत्व को प्राप्त हुए (श्रीमद्भभागवत ,दशम स्कन्ध ,पेज 346)

    गर्ग : पुरोहितो राजन यदुनां सुमहातपा :।
    ब्रजमं जगाम नंदस्य वसुदेव प्रचोदित :।।

    यदुवंशियों के कुल-पुरोहित थे श्री गर्गाचार्य जी ।वे बड़े तपस्वी थे ।वसुदेव जी की प्रेरणा से वे एक दिन नन्द गोप के गोकुल में आये ।नन्द जी ने बहुत सत्कार किया और कहा कि ब्रह्मावेत्ताओं में श्रेष्ठ है ,इस लिए मेरे इन दोनों बालकों के नामकरणादि संस्कार आप ही कर दीजिये ।
    यदूनामहमाचार्य :ख्यातश्च भुवि सर्वत :।
    सुतं मया संस्कृतं ते मन्यते देवकीसुतम ।।

    कंस :पापमति सख्यं तव चानकदुन्दुभे :।
    देवक़्या अष्टमो गर्भो न स्त्री भवितुम हरति ।।

    गर्ग जी ने कहा -नन्द जी ।मैं सब जगह यदुवंशियों के आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हूँ ।यदि मैं तुम्हारे पुत्र के संस्कार करूँगा,तो लोग समझेंगे कि यह देवकी का पुत्र है ।कंस की बुद्धि बुरी है ,वह पाप ही पाप सोचता है ।वसुदेव के साथ तुम्हारी बड़ी घनिष्ठ मित्रता है ।
    यदि मैं तुम्हारे पुत्र का संस्कार करदू और वह इस बालक को वसुदेव जी का पुत्र समझकर मार डाले ,तो हमसे बड़ा अन्याय हो जायगा ।

    अलक्षितोअस्मिन रहसि मामकैरपि गोव्रजे ।
    कुरु दिवजातिसंस्कारम स्वस्तिवाचन पूर्वकम ।।
    आचार्य जी ।आप चुपचाप इस एकान्त गोशाला में केवल स्वस्तिवाचन करके इस बालक का द्विजातिसमुचित नामकरण-संस्कारमात्र कर दीजिये ।औरों की कौन कहे ,मेरे सगे-सम्बन्धी(गोप बन्धु) भी इस बात को न जानने पावें ।गर्गाचार्य जी तो संस्कार करना ही चाहते थे ।जब नन्द जी ने उनसे इस प्रकार प्रार्थना की ,तब उन्होंने एकान्त में छिपकर गुप्तरूप से दोनों बालकों का नामकरण -संस्कार कर दिया (श्रीमद्भगवत ,दशम स्कन्ध ,पेज 145-46)

    यदुनैवं महाभागो ब्राहानयेन सुमेधसा ।
    पृष्ट :सभाजित : प्राह प्रश्रयावन्तं द्विज :।।

    उद्धव हमारे पूर्वज महाराज यदु की बुद्धि शुद्ध थी और उनके ह्रदय में ब्राह्मण-भक्ति थीं ।(श्रीमद्भावत , पेज 631)

    लेखक-डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
    गांव -लढोता ,सासनी जनपद -हाथरस
    उत्तरप्रदेश ।
    एसोसिएट प्रोफेसर कृषि मृदा विज्ञान
    शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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