श्री कृष्ण के बाद मथुरा में पुनः जादों राजवंश की स्थापना एवं उसके संस्थापक श्री वज्रनाभ की पुनः शासन -सत्ता का ऐतिहासिक शोध —

   श्री कृष्ण के बाद   मथुरा  में पुनः  जादों-राजवंश  की स्थापना एवं उसके संस्थापक श्री वज्रनाभ  की पुनः शासन -सत्ता का ऐतिहासिक शोध—

” प्रभास क्षेत्र में हुए जदुवंश संहार के बाद द्वारिका से सुने ब्रज में प्रकाश-पुंज बनकर आये थे श्री कृष्ण के प्रपौत्र श्री वज्रनाभ ।इन्होंने ही निर्जन अवस्था में पड़ी हुई  ब्रजभूमि को पुनः पुनर्जीवित करके वहां पर  जादों राज वंश की पुनः स्थापना की थी।इनको यदुकुल शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण का प्रतिरूप माना गया है।वज्रनाभ को ही ब्रज का पुनः निर्माता भी कहा गया है ।

मुक्ति कहै गोपाल सों मेरी मुक्ति बताय ।
ब्रज रज  उड़ि मस्तक लगै ,मुक्ति मुक्त है जाय ।।

ब्रज की पावन पवित्र रज में मुक्ति भी मुक्त हो जाती है ।ऐसी महिमामयी है ये धरा ।ब्रज वसुधा को जगत अधीश्वर  भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी लीलाओं से सरसाया ।”ब्रज “शब्द का अर्थ है व्याप्ति ।इस व्रद्ध वचन्  के अनुसार व्यापक होने के कारण ही इस भूमि का नाम “ब्रज “पड़ा है ।सत्व ,रज ,तम इन तीनों गुणों से अतीत जो परमब्रह्म है ।वही व्यापक है ।इस लिए उसे “व्रज”कहते है ।

ब्रज मथुरा, उत्तर प्रदेश तथा उसका परिवर्ती प्रदेश (प्राचीन शूरसेन), जो श्रीकृष्ण की लीला भूमि होने के कारण प्राचीन साहित्य में प्रसिद्ध है। ब्रज का विस्तार 84 कोस में कहा जाता है। यहाँ के 12 वनों और 24 उपवनों की यात्रा की जाती है। ‘व्रज’ का अर्थ ‘गोचर भूमि’ है और यमुना के तट पर प्राचीन समय में इस प्रकार की भूमि की प्रचुरता होने से ही इस क्षेत्र को ‘व्रज’ कहा जाता था। विशेष रूप से भारतीय मध्यकालीन ‘भक्ति साहित्य’ में व्रज का वर्णन प्रचुरता से मिलता है। वैसे इसका उल्लेख कृष्ण के संबंध में ‘श्रीमद्भागवत’ तथा ‘विष्णुपुराण’ आदि प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है- “जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिराशश्वदत्रहि। श्रीमद्भागवत 10.31.1. “विना कृष्णेन को व्रज:।” विष्णुपुराण 5,7,27 “तयोर्विहरतोरेवं रामकेशवयोर्वृजे।” विष्णुपुराण 5,10,1 “तत्याज व्रजभूभागं सहरामेण केशवः।” विष्णुपुराण 5,18,32 “प्रीतिः सस्त्री-कुमारस्य व्रजस्य त्वयि केशव।” विष्णुपुराण 5,13,6

हिन्दी में सूरदास आदि भक्ति कालीन कवियों ने तो व्रज की महिमा के अनंत गीत गाए है- “ऊधो मोहि व्रज बिसरत नाही।” इस पद में सूरदास के कृष्ण का ब्रज के प्रति बालपन का प्रेम बड़ी ही मार्मिक रीति से व्यक्त किया गया है।

भगवान् श्री कृष्ण के तिरोधाम गमन के बाद बिना श्री कृष्ण जी के ऐश्वर्य के ब्रजभूमि सूनी हो गयी थी ।जगत अधीश्वर कृष्ण के सभी लीला स्थल लुप्त हो गये ।तब उनके प्रपौत्र वज्रनाभ जी सूने अंधकारमयी ब्रज में प्रकाश पुंज बनकर आये ।प्रभास -क्षेत्र में यदुवंशियों के संहार में बचे हुए लोगों में वज्रनाभ जी भी प्रमुख थे ।जिनकी मथुरा का राजा बनाने की घोषणा स्वयं यदुकुल शिरोमणि श्री कृष्ण जी ने अपने तिरोधाम -गमन से पूर्व ही करदी थी और इस विषय में अपने सारथी दारुक से अर्जुन को संदेश भी भिजवाया था कि अब हमारे पीछे शुरसेनाधिपति के रुप में मथुरा का राजा वज्र होगा ।
त्वमर्जुनेन सहितो द्वारवत्यां तथा जनम ।
गृहीत्वा याहि वज्रश्च यदुराजो भविष्यति।। 63विष्णु पुराण सैंतीसवें अध्याय में वर्णित है।

बज्रनाभ के माता -पिता —
वज्रनाभ जी प्रधुम्न के पौत्र एवं  अनिरुद्ध जी के पुत्र थे। वज्रनाभ जी की माता विदर्भराज रुक्मी की पौत्री थी जिनका नाम रोचना या सुभद्रा था।प्रधुम्न जी की पत्नी एवं अनुरुद्ध जी की माता का नाम रुक्मवती या  शुभांगी था जो रुक्मणी के भाई रुक्म की पुत्री थी।

वज्रनाभ का मथुरा में शुरसेनाधिपति के रूप में राज्य – रोहण एवं पुनः उनके द्वारा यादवी -राजवंश की स्थापना —

श्री कृष्ण के बाद कलियुग आरम्भ हो चुका था।द्वारिका से अर्जुन द्वारा लाये गये यादवों को पंचनन्द (पंजाब ) , इन्द्रप्रस्थ तथा कुरुक्षेत्र के आस -पास के क्षेत्रों में यथा योग्य बसाने के बाद श्री कृष्ण के प्रपौत्र तथा अनिरुद्ध पुत्र वज्रनाभ को जिनकी उम्र उस समय सोलह वर्ष थी , पांडवों के हिमालय महाप्रस्थान से पूर्व राजा युधिष्ठर ने अपने पुत्र युयुत्स के संरक्षण में अर्जुन पौत्र परीक्षित को हस्तिनापुर का तथा श्री   कृष्ण प्रपौत्र वज्रनाभ को इन्द्रप्रस्थ में  मथुरा के राजा के रूप में राज्यभिषेक कर दिया ।
इत्थं वदन्ययौ जिष्णुरिन्द्र प्रस्थं पुरोत्तमम ।
चकार तत्र राजानां वज्रां यादवनन्दनम  ।।
(    विष्णु पु0 37 वां  अध्याय )
स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान धन्जजयः।
इन्द्रप्रस्थमं समावेश्य वज्रां तंत्राभ्यशेचयत।।24 (श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध पेज 767)
परीक्षित अवस्था में वज्रनाभ से बड़े थे ।कुछ समय बाद वज्रनाभ जी की इच्छा हुई कि क्यों न अपने पूर्वजों की मुख्य प्राचीन राजधानी मथुरापूरी को चला जाय ।वज्रनाभ की इच्छा के अनुसार शुरसेनाधिपति के रूप में वज्रनाभ के नेतृत्व में मथुरा में “यादवी -राज्य ” की पुनः स्थापना की ।उस समय मथुरा नगरी तथा सम्पूर्ण ब्रजमंडल जरासन्ध के 17 बार किये गये आक्रमणों से तहस-नहस हो चुका था । वज्रनाभ ने इधर -उधर विखरे हुए यदुवंशियों को पुनः संगठित कर उनसे मथुरा को आवाद किया , फिर भी वहां उधोग , व्यापार , विद्या और कला का विकास नहीं हो पारहा था ।यादवों के द्वारिका विस्थापन से ब्रजमण्डल सूना हो गया था ।

वज्रनाभ की चिन्ताएं एवं परीक्षित द्वारा उनका समाधान–

वज्र के मथुरा में राज्यारोहण के कुछ दिन बाद परीक्षित जी उनसे मिलने मथुरा पधारे ।वज्र ने उनका भव्य स्वागत एवं सम्मान किया ।परीक्षित जी ने वज्र को सम्बोधित करते हुए कहा कि भाई तुम्हारे पिता तथा पितामहों ने मेरे पिता एवं पितामहों को बड़े -बड़े संकटों से बचाया था तथा हरसम्भव मदद की थी। यहां तक कि स्वयं मेरी रक्षा भी अश्वस्थामा के ब्रह्नास्त्र से माँ के गर्भ में की थी।मैं उनके उपकारों का चाहते हुए भी बदला नहीं चुका सकता।इस लिए मैं तुम से कहता हूं कि तुम सुखपूर्वक राज्य करो।तुम्हें अपने खजाने , सेना तथा शत्रुओं की कोई चिन्ता नहीं करनी , जब भी तुम पर कोई आपत्ति आये तो मुझे बताना ।मैं भी तुम्हारी यथासम्भव मदद करूंगा।वज्र ने कहा कि आपका कथन सत्य है महाराज ।यद्धपि मैं मथुरामण्डल के राज्य पर अभिषिक्त तो हूँ , फिर भी मैं यहां निर्जन वन में ही रहता हूँ ।मुझे इस बात की कोई जानकारी नहीं कि यहां की प्रजा कहां चली गई।राज्य का सुख तो प्रजा से ही होता है।वज्र की इन विवसता पूर्ण बातों को सुनकर परीक्षित ने इन्द्रप्रस्थ से हजारों बड़े-बड़े सेठों को बुला कर मथुरा में बसाया।इसके बाद मथुरा के आस -पास के क्षेत्र के ब्राह्मणों , यदुवंशियों , व्यापारियों तथा कारीगरों को बुलाकर मथुरापूरी में यथा-योग्य बसाया ।इस प्रकार मथुरा पुनः एक समृद्धशाली नगरी का रूप लेने लगी , हालांकि मथुरा को राजा उग्रसेन के समकालीन गौरव तो प्राप्त नहीं हो सका था।

श्री कृष्ण लीला -स्थलों की खोज एवं उनकी पुनः स्थापना—-

वज्रनाभ जी ने माधव की लीलाओं से ब्रज चौरासी कोस को चमका दिया ।लीला- स्थलों को खोज कर वहां  पर समृति चिन्ह बनवा कर ब्रज को सजाने संवारने की पहल सर्व प्रथम वज्रनाभ जी ने ही की थी ताकि वे यादवों के विस्मृत गौरवशाली अतीत को पुनः पुनर्जीवित करके प्रेरणादायी बना सकें ।शूरसेन प्रदेश एवं उसकी तत्कालीन राजधानी मथुरा को विगत वर्षों में हुए विभिन्न आक्रमणों से उतपन्न हुई  विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था , जिनके कारण माधव के वे प्राचीन लीला एवं क्रीड़ा स्थल नष्ट हो चुके थे ।उन स्थलों के विषय में जानकारी देने वाला वहां कोई उपर्युक्त व्यक्ति भी नहीं रहा था ।तब सोच विचार करके परीक्षित ने वज्रनाभ के सन्देह मिटाने व उनकी मदद के लिए व्रजभूमि में  विद्यमान नन्द आदि गोपों के कुल पुरोहित वयोवृद्ध महर्षि शांडिल्य जी से आग्रह कर उनको बुलाया गया ।

इत्युक्तो विष्णुरातस्तु नन्दादीनां पुरोहितम ।
शाण्डिल्यमाजुहावाशु वज्रसन्देहनुत्तये ।।

वज्रनाभ ने महर्षि शाण्डिल्य जी के आशीर्वाद से गोवर्धन,  दीर्घपुर  (डींग)  मथुरा ,  महावन , (गोकुल) नंदीग्राम (नन्दगांव )  और वृहत्सानु (वरसाना )आदि छावनी बनाये।
और उद्धव जी के उपदेशानुसार बहुत से गांव बसाये।उस समय मथुरा की आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब थी।जरासंध ने सब कुछ  नष्ट कर दिया था।इस प्रकार राजा परीक्षित की  मदद और महर्षि शांडिल्य की कृपा से वज्रनाभ ने उन सभी स्थानों की खोज की जहाँ भगवान श्री कृष्ण  ने अपने प्रेमी गोप- गोपियों के साथ नाना प्रकार की लीलाएं की थीं।लीला स्थलों का ठीक  -ठीक निश्चय हो जाने पर उन्होंने वहां की लीला के अनुसार उस  स्थान का नामकरण किया।भगवान के लीला विग्रहों की स्थापना की तथा उन  स्थानों पर अनेकों गांव वसाए।स्थान -स्थान पर भगवान  श्री कृष्ण के नाम से कुण्ड , सरोवर ,घाटी  और कूए व बगीचे लगवाये।शिव आदि देवताओं  की स्थापना की। गोविन्ददेव , हरिदेव आदि नामों  से भगवद विग्रह स्थापित की ।इन सब शुभ कर्मों के द्वारा वज्रनाभ ने अपने राज्य में सब शुभ कर्मों के द्वारा वज्रनाभ ने अपने राज्य में सर्वत्र एकमात्र श्री माधव भक्ति  का  प्रचार किया और बड़े ही आनन्दित हुए।उनके राज्य में प्रजा भी सर्वत्र आनन्द का अनुभव करती थी तथा वह हमेशा वज्र के शासन की प्रसंशा करती थी।कहा जाता है कि उसी समय यदुवंश के कुल पुरोहित गर्गाचार्य जी दैवयोग से ब्रजभूमि में पधारे तथा वहां पर नौ दिन तक सभी को गर्गसंहिता सुनाई ।  यदुवंशियों इस प्रकार वजनाभ्  जी को ही मथुरा का पुनः संस्थापक के साथ -साथ यदुकुल पुनः प्रवर्तक भी माना जाता है ।इनसे ही समस्त यदुवंश का विस्तार हुआ माना जाता है। बज्रनाभ जी को ही भगवान श्री कृष्ण का प्रतिरूप माना गया है ।
वज्र-कालीन ब्रज में निर्माण कार्य—

वज्रनाभ जी की ही बजह से ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा आरम्भ हुई।उन्होंने ही ब्रज में 4 प्रसिद्ध देव प्रतिमा स्थापित की।मथुरा में केशवदेव ,वृंदावन में गोविन्ददेव ,गोवर्धन में हरिदेव ,बलदेव में दाऊजी स्थापित किये थे ।गोवर्धन में भी वज्र के द्वारा स्थापित हुए चक्रेश्वर महादेव का मन्दिर है। गोकुलेश्वर मन्दिर का गोकुल में निर्माण वज्र ने ही कराया था। ऐसा कहा जाता है कि मथुरा में होली दरवाजा के पास कंस निकन्दन मन्दिर तथा महौली की पौर में श्रीपद्मनाभ मन्दिर एवं दीर्घ विष्णु मन्दिर का निर्माण , श्री कामेश्वर महादेव मन्दिर ,श्री काशिनाथमन्दिर कांमा (भरतपुर) ,तथा श्री रणछोड़राय मन्दिर द्वारिका आदि वज्र द्वारा स्थापित किये गए हैं ।
गोकुल में कर्ण वेध कूप , श्री गिरिराज परिक्रमा के आन्यौर गांव में राधा -गोविन्द जी का प्राचीन मन्दिर , महावन में कोले-घाट ,बद्री-कांमा में बूढा बद्री मन्दिर , गणेश्वर महादेव मन्दिर गणेशरा , श्री दावानल बिहारी मन्दिर ,दावानल कुण्ड (वृन्दावन ) श्री वंशीवट- वृन्दावन , बन्दी-आनंदी देवी मन्दिर -बन्दी गांव राय -बलदेव मार्ग पर स्थित ,बड़े दाऊजी नरी गांव , गोपेश्वर महादेव मन्दिर -वृन्दावन  ,श्री भूतेश्वर महादेव मन्दिर मथुरा ,आदि सभी धार्मिक मन्दिर एवं स्थल वज्रनाभ जी द्वारा ही स्थापित किये गए है ऐसा कहा जाता है (श्रोत यदुवंश का इतिहास ,लेखक श्री महावीर सिंह यदुवंशी ) ।

वज्रनाभ का महाप्रयाण —

श्री वज्रनाभ जी का महाप्रयाण स्थल गोवर्धन के निकट (गोवर्धन -राधा कुण्ड परिक्रमा मार्ग के मध्य ) उद्धव कुण्ड है ।उद्धव कुण्ड स्थान पर आज भी शिलापट्ट पर इनके महाप्रयाण का उल्लेख मिलता है ।उद्धव जी ने उक्त स्थान पर वज्रनाभ जी उनकी माताओं सहित एक माह तक श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कराया था।कथा रस का आस्वादन करते हुए वे सभी अपने को कृष्णरूप में देखने लगे थे।
वज्रनाभ जी ने भी अपने आप को श्री कृष्ण के दाहिने चरण में स्थित देखा और श्री कृष्ण के विरह शोक से मुक्त होकर उस स्थान पर अत्यंत सुशोभित होने लगे।
उद्धव जी द्वारा श्रीमद्भागवत कथा सुनने के बाद वज्रनाभ जी अपने पुत्र प्रतिबाहु को अपना राज्य देकर योग-समाधि द्वारा उद्धव जी के साथ गोलोक धाम को चले गए।
उद्धव जी परमभागवत थे ।श्री कृष्ण जी के ही वृष्णि कुल में उनके चाचा देवभाग के पुत्र थे।श्री कृष्ण ने उद्धव जी को अपना परमभक्त एवं सखा माना है ।यदुवंश संहार के पूर्व ही उद्धव जी को सम्पूर्ण ज्ञान देकर  श्री कृष्ण जी ने बद्रिकाश्रम में भेज दिया था ।

वज्रनाभ जी की  जयन्ती ——

   भारतीय साहित्य एवं संस्कृति शोध् कर्ता डा0 अशोक विश्वामित्र कौशिक के अनुसार वज्रनाभ जी का जन्म चैत्र शुक्ला प्रतिपदा युधिष्ठर संवत 27 को द्वारिका में हुआ था और 10 वर्ष की आयु में ही संवत 38 को दिन के मध्यकाल में वह इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर विराजमान हुए थे ।जन्मतिथि के दिन ही वज्रनाभ जी का राज्याभिषेक हुआ था ।इस लिए वज्रनाभ जी को ही मथुरा में श्री कृष्ण जी के बाद जादों -राजवंश का शुरसेनाधिपति के रूप में  पुनः संस्थापक एवं ब्रज का पुनःनिर्माता माना जाता है।ब्रज में ही यदुवंशियों के गाँव करहला में वज्रनाभ जी की समाधि है ।

वज्रनाभ की संतति —

वज्रनाभ के पुत्र प्रतिवाहू ने धर्मपूर्वक मथुरा का राज्य किया और उत्तर भारत में परीक्षित पुत्र जनमेजय का शासन था  ये दोनों समकालीन थे।प्रतिवाहू के बाद उनका पुत्र सुबाहू , सुबाहू का पुत्र शांतसेन , शान्तसेन का पुत्र शतसेन हुआ ।इसके आगे पुराणों में यदुवंश का वर्णन नहीं मिलता है जब कि पुरु वंश का वर्णन काफी आगे तक जाता है।
कहा जाता है कि मगधराज जरासंध के वंशज सृतजय राजा ने बज्रनाभ वंशज शतसेन से 2781 वि0पू0 में मथुरा का राज्य छीन लिया। अव पुन: मथुरा मागधों के चंगुल में थी, तथा मागधों से प्रद्योत शिशुनाग वंशधरों पर होती हुई नन्द ओर मौर्यवंश पर आयी।

ऐसा प्रतीत होता है कि मथुरा प्रदेश पर अन्य राजवंशों ने बाद के समय में  सत्ता हासिल कर ली हो जैसा कि मथुरा के तत्कालीन इतिहास से ज्ञात होता है और ये जदुवंशी राजा लोग पुनः  दक्षिण में अपने पूर्वजों के शासन क्षेत्र द्वारवती (द्वारिका ) की ओर विस्थापित हो गए हों।वहां इन्होंने पुनः अपने राज्य स्थापित किये है । ऐसा प्रमाण मिलता है कि वज्रनाभ के वंशज सुबाहू के वंशजों में से ही  देवगिरि एवं द्वारसमुद्र के होयसल यादव थे जो उन्हीं द्वारिका के यादवों के वंशज थे  जो मथुरा से प्रतिबाहु के शासनकाल के बाद विस्थापित हो कर द्वारिका की ओर गए हों ।
वैसे इन जदुवंशियों का राज्य ब्रज प्रदेश में सिकंदर के आक्रमण के समय भी होना पाया जाता है ।समय -समय पर शक ,मौर्य गुप्त और शिएथियन आदि ने इन शूरसेन वंशी  जादव क्षत्रियों  के मथुरा राज्य को दबाया /छीना गया लेकिन मौका पाते ही जदुवंशी फिर स्वतंत्र हो जाते थे । लेकिन 6वीं तथा 7 वीं तक इन जादों राजपूतों का पुनः मथुरा तथा कामां  के निकटवर्ती क्षेत्रों पर सामन्तरूप तथा स्वतंत्ररूप में शासन बना रहा था।

कामां के प्राचीन शूरसेनी यादवी शाखा के शासक —

कामा के पुराने किले में जो भरतपुर जिले में है ,एक पत्थर प्रस्तर खम्भ जिस पर 37 पंक्तियों का एक संस्कृति में अभिलेख मिला है जो  शायद 8 वीं शताब्दी का प्रतीत होता है , जिसमें शूरसेन परिवार के 7 शासकों का उल्लेख मिलता है जिन्हें शौरी कृष्ण के वंशज कहा गया है जिनमें अंतिम नाम वत्सदामन  है।कामा के अभिलेख जो 8 वीं शताब्दी का है उसके रिकार्ड के अनुसार विष्णु भगवान का मंदिर वत्सदामन के शासनकाल में बनवाया  गया था जो कि शूरसेन वंश के फक्का का सातवां वंशज था ।यदि हम वत्सदामन को 750 या 775 ई 0 सन का मानते हैं तो  फक्का इस परिवार  का प्रथम व्यक्ति या मुखिया  था जो 6वीं शताब्दी के अंत तक जीवित रहा था और उनका परिवार मथुरा की शूरसेनी (शूरसेन के कुलज )  या यादवा  शाखा  में आता है ।दूसरे रूप में हम कह सकते है कि फक्का के ये वंशज मथुरा के शूरसेनी या यादवा (जादों )थे।
मौखरिस शासक यशोधर्मन वृतांत के तुरंत बाद या 7 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जब मौखरी शासन का प्रभुत्व समाप्त हुआ पुनःप्राचीन  शूरसेन शाखा के इन यादवों ने मथुरा को प्राप्त कर लिया तथा  अपनी राजधानी बना लिया।

   ह्वेनसांग का  मथुरा के जदुवंशियों के संदर्भ में मत–

हुएन -सांग   सम्भवतः मथुरा नहीं आया और उसने अपनी त्वरित यात्रा में थोड़े से ही क्षेत्र में घूमा ।उसके एक छोटे से वाक्य में स्थानीय राजाओं का उल्लेख मिलता है ।राजा और उसके अनुयायी (मन्त्रीगण ) अच्छे कार्यों में संलग्न थे ।उनका नाम उल्लेखित नहीं किया गया ।किन्तु कनिघम के अनुसार उस समय मथुरा के क्षेत्रीय शासक के रूप में  शूरसेन राजा फक्का या उनका पुत्र और वंशज कुलभट्ट  अथवा उसके बाद के शासक के  पुत्र एवं  वंशज अजीत हो सकता है ।तत्कालीन मथुरा राज्य की सीमा का विस्तार शायद पश्चिम , दक्षिण और पूर्वी सीमाओं के पार हो चुका था ।
हर्ष की मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य टूट गया और आधी शताब्दी तक अन्धकार और अव्यवस्था /अराजकता उत्तरी भारत में विद्यमान रही थी , जिसने यद्धपि मथुरा साम्राज्य को भी प्रभावित नहीं किया था।मथुरा साम्राज्य पर शूरसेन वंश के राजा अजीत , दुर्गभट्ट एवं दुर्गदामा का शासन रहा ।इस समय एक राजकुमार जिन्नदत्त जो मथुरा के एक यादव राजा का पुत्र था उसने जैन धर्म अपना लिया और वह दक्षिण भारत के हम्मच्चा  क्षेत्र में चला गया और उसने वहां उसने  संतार राज्य स्थापित किया ।
7वीं शताबदी के अंत और 8 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में कन्नौज के राजा यशोवर्मन ( सन 690-740 )  शक्तिशाली हुआ और सम्पूर्ण भारत का शासक /स्वामी वन गया ।उसने सम्भवतः मथुरा को भी जीत लिया किन्तु शायद  शूरसेन राजाओं सम्भवतः देवराज एवं वत्सदामन को अपने सामन्त के रूप में बढ़ने दिया । शायद इस शूरसेन वंश के अंतिम राजकुमार वत्सदामा के पुत्र अन्यदामा थे ।कल्हण  के राजतरंगिणी के अनुसार कश्मीर के राजा ललितादित्य  ने अस्थायी रूप से यशोवर्मन के साम्राज्य को  (जिसमें मथुरा भी सम्मलित था ) जीता था और इसके कुछ थोड़े समय बाद लगभग 8वीं  शताब्दी के बन्द होने तक कश्मीर में एक मंदिर मथुरा के तत्कालीन शासक के  दामाद द्वारा बनवाया गया था।
ए 0 कनिंघम की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार कामां शिलालेख के अनुसार मथुरा राज्य के प्रसिद्ध शूरसेनी शाखा के प्रमुख कामां के शासकों के नाम क्रमशः इस प्रकार है –1-फक्क -पत्नी देयिका , 2-कुलाभट (पुत्र )- पत्नी द्रंगेनी ,3-अजित (पुत्र ) -पत्नी अप्सराप्रिया , 4- दुर्गभट  (पुत्र )- पत्नी वच्छलिका  ,5 दुर्गादमन (पुत्र)- पत्नी वच्छिका , 6-देवराज (पुत्र) -पत्नी यजनिका , 7-वत्सदमन (पुत्र) , 8-अन्यदामा ।
रानी वच्छलिका जो शूरसेन शासक दुर्गभट की पत्नी थे ने कामां में विष्णु मंदिर बनवाया था।
इस विवरण से यह भी प्रमाणित होता है कि 200 वर्ष के इस कालखण्ड में मथुरा का शूरसेन राज्य  उत्थान -पतन के दौर से गुजरते हुए भी बरकरार विद्यमान रहा ।

  विक्रम संवत 1012 / 955ई0 के बयाना अभिलेख से ज्ञात होता है कि फक्का के परिवार में एक बपुक्का नाम का राजा हुआ जिसके पुत्र का नाम राजयिका था जिसकी पत्नी का नाम सज्जनी था जो मयूरिका परिवार से थी ।राजयिका के पुत्र के पुत्र का नाम ज्ञात नहीं है लेकिन वह परमार वंश की महिला यसोकारी से विवाहित था जिससे प्रमाणित होता है कि शुरसेनियों का सम्बंध आधुनिक ग्वालियर के परमार राजपूतों से रहा था ।राजयिका की पुत्री का नाम चित्रलेखा था जिसका विवाह मंगला राजा के साथ हुआ और उनके चार पुत्र हुए जिनमें बड़े पुत्र का नाम ज्ञात नहीं है , बाकी तीन पुत्रों के नाम इंद्रजीत , लक्षमणराजा एवं चामुंडाराजा थे ।ये पूर्व के शूरसेन शासक सम्भवतः कन्नौज के प्रतिहारों के सामन्त होंगे।956 ई0 में राजा महिपाल के शासन में उनकी रानी चित्रलेखा ने विष्णुभगवान का मंदिर बनवाया ।ऐसा प्रतीत होता है कि महिपाल प्रतिहार शासक थे , इस समय प्रतिहार राजोर (अलवर ) जो बयाना के पास में है प्रतिहारों के अधीन था।

     8 वीं शताब्दी से लेकर 12 वीं शताब्दी तक  (800-1200 ई0 सन )के कालखण्ड  को इतिहासवेत्ताओं ने “राजपूत काल ” का नाम दिया है ।इस कालखण्ड में मथुरा राज्य की स्थिति कुछ इस प्रकार रही –
9 वीं  शताब्दी के दौरान एवं 10 वीं शताब्दी के अधिकांश भाग में मथुरा  राजाओं की राजधानी नहीं रहा ।यह क्षेत्र शायद बयाना के यादवों (जादों ) के अधीन था जिन्होंने अपने आप को धर्मपाल (श्री कृष्ण की 77 वीं पीढ़ी में ) के नेतृत्व  में 9 वीं शताब्दी के आरम्भ में पुनः द्वारिका क्षेत्र से आकर तत्कालीन पाणिंहार और निकुम्भ क्षत्रियों से बयाना और मेवात क्षेत्र हस्तगत कर लिया और बाद के समय में  कन्नौज के गुर्जर -प्रतिहारों( प्रतिहार राजा भोज प्रथम तथा महिपाल द्वितीय ने इस क्षेत्र पर भी अपनी सत्ता स्थापित की )  के सामन्त के रूप में धर्मपाल ने स्वयं को स्थापित किया था।ये यादव कामा के पुराने शूरसेनीयों से जुड़े हुए थे या नहीं कहा नहीं जा सकता और बाद में इस क्षेत्र के शासकों के रूप में स्थापित हो गये ।
धर्मपाल के वंशजों में  इच्छापाल ,ब्रह्मपाल ,जयेन्द्रपाल , कुलचन्द , विजयपाल मथुरा, महावन तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्र श्रीपथ(आधुनिक बयाना)  प्रदेश के शासक रहे ऐसा विवरण मिलता है ।
कामां के शूरसेनी यादव मथुरा के प्रसिद्ध  प्राचीन शूरसेन राजवंश की एकमात्र शाखा के वंशज थे।लेकिन वे अधिक प्रभावशाली नहीं रहे ऐसा प्रतीत होता है ।बाद के कालखण्ड में मथुरा एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्र पर धर्मपाल के वंशजों का शासन रहा ऐसे प्रमाण मिलते हैं ।
लगभग 10 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य क्षीर्ण (छिन्न -भिन्न ) होने पर उनके अन्य सामन्तों के साथ , बयाना के यादव राजपूत भी स्वतंत्र होने की कोशिश में लगे हुए थे ।स्वतंत्र होने पर अन्य राजपूत सामन्तों के साथ ही यादवों ने भी अपने अलग राज्य स्थापित किये।  लगभग उसी  समय (एक दूसरे  यदुवंशी शासकों का परिवार ) जो सम्भवतः बयाना घराने की शूरसेनी यादव शाखा  या पुराने कामा की  शुरसेनों की शाखा से सम्बंधित यादवों  ने अपने आप को महावन  (यमुनापार मथुरा से 12 किलोमीटर दक्षिण -पूर्वी क्षेत्र है ) पर स्थापित कर लिया और सम्पूर्ण  ब्रज (जिसमें  सम्पूर्ण मथुरा जिला आता है ) पर शासन करने लगे। धर्मपाल के वंशज कुलचन्द , विजयपाल मथुरा तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्र बयाना के शासक रहे ऐसा विवरण मिलता है । बयाना के राजा विजयपाल के बाद उनके पुत्र तिमनगढ़ के शासक महाराजाधिराज तिमनपाल के शासन काल में भी यह सम्पूर्ण क्षेत्र एवं आगरा ,ग्वालियर , भरतपुर , अलवर का कुछ भाग , गुणगांव , धौलपुर तथा आधुनिक करौली तक का डाँग क्षेत्र उनके अधिकार में रहा था।कालान्तर में बयाना के शासक विजयपाल एवं उनके पुत्र  तिमनपाल के वंशज ही करौली राजवंश  के वर्तमान यादव (जादों ) राजपूत  शासक हुए।

संदर्भ

1-हरिवंशपुराण
2-श्रीमद्भागवत
3-विष्णुपुराण
4-पद्यपुराण
5-गर्गसंहिता
6-प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग -लेखक सत्यकेतु विद्यालंकार
7-ब्रज के धर्म -सम्प्रदायों का इतिहास -डा0 प्रभुदयाल मीतल ।
8-ब्रज का इतिहास (भाग 1, 2 -डा 0 कृष्णदत्त वाजपेयी ।
9-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास -प्रभुदयाल मीतल ।
10-प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति -डा0 कृष्ण चंद श्रीवास्तव ।
11-मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास – प्रोफेसर चिंतामणि शुक्ल ।
12-प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य -लेखक बाबू वृन्दावनदास ।
13-पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ ऐशियन्ट इंडिया पंचम संस्करण कलकत्ता ,1950, -राय चौधरी  ,
14-ग्रॉउज -मेमोयर द्वियीय संस्करण इलाहाबाद ,1882 ।
15-कनिघम -आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया -एनुअल रिपोर्ट जिल्द 20 (1882-83 ) .।
16-मथुरा के यमुना तटीय स्थलों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास -जयन्ती प्रसाद शर्मा ।
17-यदुवंश का इतिहास -लेखक श्री महावीर सिंह यदुवंशी ।
18-ब्रिज सेंटर ऑफ कृष्णा पिलग्रीमेज -लेखक ऐंटीविस्तले एवं फॉस्टन 1987।

लेखक -डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता ,सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राज

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