श्री कृष्ण के वंशज यदुवंशी जादों क्षत्रियों के प्राचीन ऐतिहासिक नगर महावन (पौराणिक गोकुल ) का शोध–

श्री कृष्ण जी के वंशज यदुवंशी जादों क्षत्रियों के प्राचीन ऐतिहासिक नगर महावन (पौराणिक गोकुल) का शोध–

यमुना पार मथुरा से 14 किमी दूर नीचे की और बहने वाली यमुना की धारा के किनारे पर बसे हुए वर्तमान गोकुल से 4 किलोमीटर आगे, मथुरा से सादाबाद सड़क के सहारे ऊंचे टीले पर सन्निविष्ट महाबन ऐतिहासिक दृष्टि से ब्रज का अति महत्वपूर्ण प्राचीन कस्वा है। यह टीला 100 बीघा में फैला हुआ है, जो कुछ अंशतः प्राकृतिक तथा कुछ अंशत: कृत्रिम है। इसी पर महावन किला स्थित है।

जैसा कि इसके नाम से जात होता है कि किसी समय महावन सघन जंगल रहा होगा, क्योंकि बादशाह जहाँ (1634 ई०) ने यहाँ शिकार खेलने/ करने का आदेश दिया था और 4 चीते मारे गये थे। इससे इसके नाम की उपयुक्तता सिद्ध होती

महावन का गोकुल पर्यायवाची शब्द है क्योंकि यहाँ पर श्रीकृष्ण की बहुत सी चमत्कारपूर्ण साहसिक शैशवीय कौतुक-क्रीड़ाएँ सम्पन्न हुई थीं, पौराणिक साहित्य में महावन की अपेक्षा गोकुल का नामोल्लेख अधिक हुआ है। मथुरा और महावन (प्राचीन गोकुल) का परस्पर घनिष्ठ जुड़ाव (सम्बन्ध) सुदूर अतीत से रहा है क्योंकि कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ और पालन पोषण महावन में । वर्तमान गोकुल तो अर्वाचीन है , जिसको बल्लभाचार्य और उनके वंशधर विठ्ठल नाथ आदि गोस्वामियों ने आवाद किया है। वर्तमान गोकुल में 16वीं शताब्दी से पूर्व का कोई भी मन्दिर अथवा
भवनादि सम्प्रति देखने को नहीं मिलता।

महावन किला टोले की सर्वोच्च चोटी पर स्थित है तथा ऐतिहासिक है। यहाँ का जादों राजा कुलचन्द बहुत ही साहसी एवं महावीर था। उसके पास बहुत बड़ी सेना थी। उसने दुर्त्तान्त क्रूर आक्रान्त लुटेरे महमूद गजनवी (1017 ई०) का डटकर सामना किया था किन्तु दुर्भाग्यवश भवनों से पराभूत होकर उसने और उसकी पत्नी ने आत्महत्या करली। महमूद ने महावन को खूब लूटा खसेटा और धूलिसात कर दिया तथा हिन्दुओं को यमुना में खदेड़ दिया, जिससे हिन्दू उसमें डूब कर मर गये ।तब से लेकर अद्यावधि महावन अपनी पूर्व गौरव- गरिमा को प्राप्त नहीं कर सका है। किले (दुर्ग) प्रासाद- भवनों के ध्वंसावशेष अपनी दुर्दशा की करुण गाथा खण्डहरों के रूप में अपने सीने में छिपाये हुए मौन खड़े हैं। उपरोक्त का उल्लेख ‘मिनिहाज-ए-सिराज’ (1234 ई0) ने स्वयं किया है।
महावन से जादों क्षत्रिय राजा अजयपालदेव की संवत 1207 (ई0 1150) में उत्कीर्ण शिलालिपि से जाना जाता है , कि उस समय भी मथुरामण्डल जदुवंशीय शूरसेन राज अधिकार में था।वर्षों राजभोग करने के बाद शूरसेन राजवंशधर 1196 ई0 में मुहम्मद गौरी से युद्ध में पराजित होकर यह क्षेत्र हार गए और तुर्कों का पुनः अधिकार हो गया।बीच में एक बार हिन्दू अधिकार स्थापित होने पर (संभवतः महावन के जादों राजा महिपाल के वंशज) भी यह नगर अलाउद्दीन खिलजी के समय में यदुवंशियों के हाथों से पुनः निकल गया ।फिर इस नगर पर मुसलमानों का ही अधिकार रहा महाराजा अजयपाल के समय में महावन जैन धर्म का बहुत बड़ा केन्द्र था।अधिकांश जदुवंशी शासक जैनधर्म के अनुयायी थे।वे अहिंसा परमोधर्म में विस्वास करते थे।
बादशाह बाबर (1526 ई0) ने भी महावन के महत्व को अपने जीवनवृत्त में उल्लेख किया है। यद्यपि वर्तमान में महावन पुनः तहसील बन गया है, परन्तु इसके कुछ एक भवनों के द्वार देशों के मुखाग्र ही मथुरा शैली के शेष सपाट है।

महावन किले का निर्माण मेवाड़ (चित्तौड़) के राणावंशीय सरदार ‘राणा कटेह’ ने कराया था, किन्तु मैनपुरी जिले में प्रचलित परम्परा के अनुसार’राणा कटेह’ को जब मुसलमान आक्रान्ताओं ने उसे स्वदेश से बाहर निकाल दिया तो उसने महावन के राजा दिगपाल’ के यहाँ शरण ली। कालान्तर पश्चात् उसके पुत्र कान्ह कुँवर और यदिवंशी राजा दिगपाल की पुत्री में परस्पर प्रेम हो गया और वे परिणय सूत्र में बँध गये। उनके कुछ वंशज अपने आप को “फाटक ” गोत्र के अहीर बताते हैं जो सत्य प्रतीत नहीं होता क्यों कि उस कालखण्ड में महावन /मथुरा पर कभी भी अहीरों का शासन नहीं रहा था। ऐसा कोई सत्यापित प्रमाण भी नहीं मिला है ।

राणा कटेह के मारे जाने के उपरान्त उसका (पुत्र महावन (राज्य) का शासक बना। उसने अपने समग्र नगर (महावन) को अपने कुल पुरोहित पाराशर गोत्रीय ब्राह्मणों को अनुदानित कर दिया, जो आज भी विशेष उपाधि ‘चौधरी ‘ धारण किये हुए हैं। महावन में ‘चौधरी थोक’ आज भी विख्यात है द्वितीय थोक ‘सैयदत’ नाम से प्रसिद्ध है।

अलाउद्दीन खिलजी (1303 ई0) के शासनकाल में सूफी मसहाद यह, जो एक सैनिक टुकड़ी का नायक था, हिन्दू मसीहा के छद्म वेश में ‘श्यामलला रोहणी’ मन्दिर में घुस आया और उसने राणा कटेह की हत्या कर दी। उसके सार्वभौम स्वामी ने उसे (महा को) महावन का 1/3 भाग दे दिया, जिसकी कब्र जीर्ण-शीर्ण अवस्था में अनंकित रूप में, छटी पालना (छटी पूजा) के निकट विद्यमान है। जिसके ऊपर कोई चिन्ह लेख आदि अंकित नहीं हैं।

मन्दिरन ‘श्यामलला रोहणी ‘ आज भी एक छोटी कुटिया के रूप में किले की ।ऊँची ठेक पर विद्यमान है, जहाँ से यमुना जी भी दिखायी पड़ती है। यह वह स्थान है जहाँ पर यशोदाजी ने जोगनिद्रा को जन्म दिया था।

महावन के कतिपय प्रमुख ऐतिहासिक भवन, पर्व एवं स्थान —

(1) नन्दभवन
नन्दभवन को सामान्यरूप में ‘अस्सी खम्बा’ नाम से पुकारा जा सकता है, अतिभव्य इमारत है। इसमें सोलह-सोलह स्तम्भों की पाँच कतारें हैं। इसका वर्तमान भीतरी रूप (आकार/आकृति) को मुसलमानों ने इसकी सामग्री से औरंगजेब के समय में मस्जिद हेतु बनाया था। यह चार ओर को जाने वाले मार्गों में विभाजित है। इसके कुछ खम्बे भव्य है तथा कुछ कम अलंकृत है अतिशय कलात्मक एवं विभूषित हैं तथा एक सादा है जो कलियुग कहलाता है।

(2) छटीपूजा (छटीपालना) —

मैया यशोदा शुद्धीकरण हेतु श्रीकृष्ण के जन्म के छटवे दिन ‘छटीपूजन के लिये यहाँ पधारती हैं। लोग जिसे छटी पालना कहते हैं। श्रीकृष्ण के पालक माता -पिता यशोदा एवं नन्द के घर में इसका आयोजन होता है ।पालना की सभी आवश्यक वस्तुएँ परम्परानुसार जुटाई जाती है। उत्सव कई दिन तक चलता है। जनता सौहाद्रपूर्ण वातावरण में बहुत अधिक संख्या में इसे देखने पधारती हैं।

(3) जन्माष्टमी —
भादों कृष्णपक्ष की अष्टमी के दिन श्रीकृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में, यह जन्माष्टमी पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

(4) पूतना पत्तन —

कंस के द्वारा प्रेरित पूतना राक्षसी बालक कृष्ण को मारने हेतु यहाँ आयी थी। श्रीकृष्ण ने उसके स्तनों का पान करते करते उसके प्राण हर लिये। मृत पूतना को यहाँ खींचकर लाया गया जिसे पूतना पत्तन या पूतना कहते हैं ।यह मथुरा में कंसखार के समान एक नाला है।यह महावन से 1 /2 कोस यमुना की ओर जाता है।

(5) रमणरेती (खेलन वन) —

महावन और यमुना का विस्तृत बालुका पुलिन, ‘रमणरेती’ कहलाता है। यहाँ एक छोटा सा कुंज है जो ‘खेलन वन ‘ के नाम से सुज्ञात है। यहाँ नाना प्रकार की वृक्षावलियों पर भाँति-भाँति के रंग-बिरंगे पक्षी कलरव करते रहते हैं। यहाँ वैरागी की कुटिया के सामने सुविशाल पादप पंक्ति है। यहाँ प्रत्येक हिन्दू मास की एकादशी का मेला लगता है। यहाँ अलीसान परिवार के सदस्यों को दो छतरियाँ हैं।

(6) मथुरानाथ का मन्दिर–

इसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। यह मन्दिर शिखरयुक्त है।

(7) तृणावर्त मन्दिर —

इसमें बालक श्रीकृष्ण के ऊपर अपने विशाल पंख फैलाये हुए तृणावर्त राक्षस दर्शाया गया है।

(8) महामल्ल राय का मन्दिर —

यह कस द्वारा प्रेरित मल्लों के हन्ता श्रीकृष्ण से सम्बन्धित है। श्रीकृष्ण ने उन्हें पछाड़ा था, अतः वे महामल्ल राय कहलाये थे।

(9) श्याम लला का मन्दिर–

इसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। यह छोटी कोठरी के रूप में आज भी वर्तमान है। यह उस सर्वोच्च ठेक पर उपस्थित है जहां से यमुना जी देखी जा सकती हैं ।यह वही स्थान है जहां पर योगमाया (योगेश्वरी ,योगनिद्रा ) को जशोदा ने जन्म दिया था।

(10) ब्रह्माण्ड घाट–

यहाँ पर प्रत्येक रविवार को ‘रास या पवित्र नृत्य का आयोजन किया जाता है। यहाँ एक आधुनिक मन्दिर ‘मृतिका बिहारी’ है तथा मुकन्द सिंह द्वारा निर्माण करायी गयी एक छतरी भी है, जिसका बड़ा भाग नदी बहा ले गयी। यहाँ जैन मूर्ति है सम्भवतः जिसे छटीपालना से लाया गया हो, इसके समक्ष एक छोटा चबूतरा है, जिस पर बालू के गोले पड़ा में रखे होते हैं, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपने मुख में खाने के लिये रखा था और जिन्हें जशोदा जी ने श्रीकृष्ण के मुख में विकसित लघु ब्रह्माण्ड रूप में निहारा था ये ब्रह्माण्ड के ‘पेडे’ कहलाते हैं जिन्हें दर्शक भक्त जन स्मारिका के रूप में ले जाते हैं। जमुना के उच्च किला के सहारे सुन्दर वृक्षबोधी है। वहाँ जमुना पर चिन्ताहरण घाट है। वहाँ से एक किमी 0 बहाव के नीचे की ओर नीरव स्थान है, जहाँ पर प्रत्येक सोमवार को ‘रास’ का आयोजन किया जाता है। बैरागी की कुटिया को छोड़, पहले यहाँ कोई भवन नहीं था।

(11) खेलन वन —

महावन तथा फैले हुए विस्तृत बालुका प्रदेश (रमणरेती) के मध्य एक छोटा सा कुंज है, जो खेलन वन के रूप में विख्यात है। यहीं पर दो जीर्ण छतरियाँ अलीखान के परिवारी सदस्यों की हैं जिनके समीप गोप कुआ है।

महावन के प्रमुख पर्वो में ‘रामलीला’ मुख्य है। इसका शुभारम्भ सर्वप्रथम तत्तकालीन तहसीलदार स्व0 मुंशी भजन लाल ने किया था। यह क्वार के महीने में होती है। पूतना मेला कार्तिक सुदी 6 को होता है ।जखैटया मेला माघ मास में रविवार को होता है। रमण रेती फागुन सुदी 11 को यमुना के पुल पर आयोजित होती है तथा परिकम्मा गोकुल और रावल सहित कार्तिक सुदी पाँचे को की जाती है।

महावन में छोटी-छोटी कई मस्जिदें है तथा दो त्योहार हैं।उनमें एक चेतिमल मदार जमादाल-अव्वल’ 3 को , सैय्यीद वदियउद्दीन के सम्मान में मनाया जाता है। द्वितीय मुसलमानी मेला शाहमिलान का ‘उर्स दरगाह’ या सैयीद मखदूम है।

महावन की महिमा ‘ब्रह्माण्ड पुराण का विशेष अनुभाग, जो वृहद् वन माहात्म्य’ कहलाता है उसके अन्तर्गत इसके 29 तीर्थों का परिगण- निम्नवत् हुआ है अर्थात् किया गया है–

“एक विंशति तीर्थेनयुक्तां भूमिगुणान्वितम् । यमुनार्जुनपुण्यतमं नन्दकूपतवैव च ।। चिन्ताहरणं ब्रह्माण्ड कुण्डं सारस्वतं तथा । सरस्वती शिलातत्र विष्णुकुण्ड समन्वितम् ।। कर्णकूप कृप कुण्ड, गोपकूप तथैव च। रमण रमण स्थानं नारद स्थानम् एवच ।। पृतनापत्तनंस्थानं तृणावतांख्य पत्तनम् । नन्दहर्म्य नन्दगेहं, घाट रमण-संज्ञकम् ।।

मधुरानाथोद्भवनं क्षेत्रं पुण्यं पापप्रणाशनम् । जन्मस्थानं तुशेषस्य, जननं योगमायया ।”

मथुरा और महावन के विषय में यहाँ कुछ यूनानी लेखकों, विशेषकर एरियन एवं पिलनी के मतों का अति संक्षिप्त उल्लेख करना समीचीन होगा जिन्होंने महावन को ‘क्लैशोबोरा’ और मथुरा को ‘मेथोरा’ माना है अर्थात् लिखा है। जिनके मध्य यमुना ‘जैमोरा’ प्रवाहित होती है। किसी पाश्चात्य विद्वान ने ‘क्लैक्सी’ बोरा को ‘ केशवपुरा’ से जोड़ा है तो अन्य ने उसे बटेश्वर’ से । बटेश्वर का प्राचीन नाम ‘ शौरिपुर’ था। यहाँ के लोग’ शौरसैनेय’ कहलाते थे। किसी ने वृन्दावन को ‘क्लैसोबोरा’ माना है। चौनी यात्री फाह्यान ने जमुना के मथुरा एवं महावन के मध्य उल्लेख किया है जो भी हो हमें बखेड़े में नहीं पड़ना है किन्तु यह सत्य है कि महावन पुरातन ऐतिहासिक पत्तन है। ‘बृहदून’ बृहदारण्य महावन के अन्य नामान्तर है। ]

संदर्भ—
1-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध
2-व्रज नन्दिनी मासिक हिन्दी पत्रिका का लेख वर्ष 7,अंक 7-8, 2012 ,लेखक पं0 प्रेमदत्त मिश्र “मैथिल ” ।
3-मथुरा के यमुना तटीय स्थलों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास लेखक जयंती प्रसाद शर्मा ।
4-उत्तर प्रदेश गजेटियर्स मथुरा भाग 10 -21 ,1959 ,पृष्ठ 54, 85
5-उत्तर प्रदेश गजेटियर्स आगरा ,1965, पृष्ठ 26-30
6-मथुरा मेमो -ग्रॉउस ।
7-राजस्थान का जैन साहित्य 1977
8-जैसवाल जैन ,एक युग ,एक प्रतीक
9-ब्रज संस्कृति विश्व कोष भाग 2
10-मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार आगरा के पास एक प्राचीन कस्वा था ,जहाँ महाभारत काल में राजा कंस ने राजनैतिक बन्दियों के लिए कारागार बनवाया था (तारीखे दाउदी ,पृष्ठ 42 ) ।सुल्तान महमूद गजनवी की स्तुति में मसूद के लिए कसीदा के अनुसार यहां पर एक फौलादी दुर्ग था ,जिसको महमूद ने मिट्टी में मिला दिया था (तुजुके जहाँगीरी ) ।
11-बलदेव सिंह ,5 ;वाक्या राज0 2/34 ,चौबे ,1 ;ब्रुकमैन ,316-7 ।
12-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास (1966ई0) -लेखक डा0 प्रभुदयाल मितल ।

13-अलउत्तवी कृत तारीखे यामिनी (इ0 डा0) ,2/42-46;तबकाते अकबरी 10 ;अल्बदउँनी 22-25 ; फरिश्ता (इ0डा0 ) ,2 ,459-61 ; ओझा 1 /264-65 ;आशीर्वादी लाल (दिल्ली सल्तनत ) ,पृष्ठ 39-48 ;मथुरा महिमा , 61 ;डा0 मुहम्मद हबीब (सुल्तान महमूद ऑफ गजनी ) ।
14-कनिंघम आर्कयोलोजिकल टूर रिपोर्ट 1882-83.
15-मथुरा जनपद का स्वतंत्रता संग्राम का राजनैतिक इतिहास लेखक प्रो0 चिन्तामणि शुक्ला ।

लेखक-डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गाँव-लढोता ,सासनी
जनपद -हाथरस,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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