सांस्कृतिक एवं कलात्मक धरोहर का प्रतीक मध्यकालीन यदुवंशियों का ऐतिहासिक दुर्ग ताहनगढ़ —

सांस्कृतिक एवं कलात्मक धरोहर का प्रतीक  मध्यकालीन यदुवंशियों का ऐतिहासिक दुर्ग ताहनगढ़

बयान से लगभग 23 कि.मी दक्षिण में एक उन्नत पर्वतशिखर पर मध्यकाल प्रसिद्ध दुर्ग ताहनगढ़  (तिमनगढ़) या त्रिभुवनगढ़ स्थित है। दुर्गम पर्वतमालाओं से आवृत , वन सम्पदा  से परिपूर्ण तथा नैसर्गिक सौन्दर्य से सुशोभित इस दुर्भेद्य दुर्ग की अपनी अदभुत निराली ही  शान और पहिचान है। शौर्य, वीरता और पराक्रम की अनेक घटनाओं के साक्षी इस किले में प्राचीन काल की भव्य और सजीव प्रतिमाओं के रूप में कला की एक बहुमूल्य  धरोहर  बिखरी पड़ी है जिसके कारण इसे राजस्थान का खजुराहो कहा जाता है।

समुतल से लगभग 1309 फीट की ऊँचाई पर स्थित इस दुर्ग का निर्माण बयाना के जादों राजा विजयपाल के पुत्र ताहनपाल (तिमनपाल  / त्रिभुवनपाल)  ने 11वीं  शताब्दी (1058 ई0)  ईस्वी के उत्तरार्द्ध में कराया था। अपने निर्माता के नाम पर यह किला ताहनगढ़( तिमनगढ़ ,तवनगढ़ ,थनगढ़,  त्रिभुवनगढ़ )  तथा दुर्ग वाली  पहाड़ी त्रिभुवनागिरि कहलाती है। इतिहास में  ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि मुस्लिम आधिपत्य के बाद इसका नाम इस्लामाबाद कर दिया गया  था।

विदित इतिहास के अनुसार  बयाना (विजयमन्दिरगढ़ ) के जादों महाराजा विजयपाल की मृत्यु एवं  बयाना के विजयमन्दिरगढ़ दुर्ग  पर मुस्लिम आधिपत्य  होने के  बाद यादव (आधुनिक जादों ) कुछ वर्षों तक गुप्तरूप  में बयाना से बाहर किसी अज्ञात सुरक्षित स्थान पर रहे। तत्पश्चात विजयपाल के पुत्र ताहनपाल ने एक सिद्धयोगी मेढकीदास का आशीवाद प्राप्त कर बयाना से लगभग 23 किलोमीटर दूर ताहनगढ़ का यह किला तथा सागर नामक जलाशय बनवाया ।कुछ इतिहासकारों ने इस इस दुर्ग के अन्दर बसे हुए नगर को त्रिपुरा नगरी /त्रिभुवन नगरी कहा गया है जो किसी जमाने में बहुत ही समृद्ध नगर था ।

“मुस्लिम आक्रांताओं  ने जदुवंशियों से बयाना का किला हस्तगत लिया। बयाना के जादों शासक विजयपाल के 18 पुत्र थे। सबसे बड़ा पुत्र ताहनपाल बारह वर्ष तक पोशीदह रहकर अपनी धाय  माता के घर पर आया, उसने  ताहनगढ़ का किला बयाना के अग्निकोण में 23 किलोमीटर की  दूरी पर दक्षिण दिशा में बनवाया ।”

मध्यप्रदेश में देवास के निकट इणगोड़ा नामक गाँव से विक्रम संवत 1190 आषाढ़ सुदी 11(11जून 1533ई0 ) मिले शिलालेख के अनुसार तवनपाल या तहणपाल की उपाधि ” परम् भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर “लिखी मिली है जिससे यह ज्ञात होता है कि वह एक वीर एवं शक्तिशाली शासक था। इतिहासकारों के अनुसार उसके राज्य में वर्तमान अलवर का आधा भाग, भरतपुर धौलपुर , वर्तमान करौली , गुणगाव  और मथुरा का क्षेत्र एवं वर्तमान आगरा तथा ग्वालियर का काफी भू- भाग सामिल था। ताहनपाल के दो पुत्र हुए धर्मपाल और  हरिया हरपाल थे ।तहनपालन का उत्तराधिकारी धर्मपाल था परन्तु उसके समय में शासन की समस्त बागडोर  उसके पासवानिया भाई हरियाहरपाल के पास थी जो एक वीर, साहसी और पराक्रमी योद्धा था ।आपसी कलह के कारण महाराजा धर्मपाल ने तवनगढ़ छोड़कर एक नया किला धौलदेहरा (धौलपुर) बनवाया। धर्मपाल के पुत्र कुंवरपाल (कुमारपाल) ने गोलारी में एक किला बनवाया जिसका नाम “कुंवरगढ़ ” रखा। कुछ वर्षों बाद कंवरपाल ने  अपने चाचा हरियाहरपाल को मारकर तवनगढ़ पर कब्जा करके  अपने पिता  धर्मपाल का अधिकार स्थापित किया। इधर हरियाहरपाल के मारे जाने की घटना से आशंकित होकर बयाना के मुस्लिम शासक ने तवनगढ़ पर घेरा डाल दिया। धर्मपाल ने अपने कुंवरपाल के द्वारा  चम्बल नदी के किनारे बनाये गए  कुंवरगढ़ दुर्ग में शरण ली परन्तु यहाँ भी  बयाना के मुस्लिम सूबेदार द्वारा घेर लिए जाने पर उसने भीषण युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की । महाराजा धर्मपाल के पश्चात उनके पुत्र कुंवरपाल  ने दीर्घकाल तक बयाना एवं ताहनगढ़ सम्पूर्ण क्षेत्र पर शासन किया । बयाना और ताहनगढ़ दोनों दुर्ग उसके आधिपत्य में ही रहे। जैन साहित्य में जैन मुनि जिनदत्तसूरी के सन 1157 ई० में कुंवरपाल के शासनकाल में ताहनगढ़ आगमन तथा एक कलशाभिषेक समारोह में भाग लेने व राजा कुंवरपाल से उनकी भेंट का उल्लेख मिलता है। 1196 ई० में मुहम्मद गौरी ने अपने सिपहसालार कुतबुद्दीन ऐबक के साथ  जादों राज्य पर जबरदस्त आक्रमण किया। कुंवरपाल ने अप्रतिम साहस ,वीरता और पराक्रम का परिचय देते हुए  मुस्लिम आक्रान्ता का सामना किया परन्तु विजयश्री से वंचित रहा।  बयाना और ताहनगढ़ दोनों किलों  पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो गया।  राजपूताने के मशहूर इतिहासवेत्ता डॉ० गौरीशंकर ओझा जी के अनुसार मुहम्मद गौरी ने 1195 ई० में ताहनगढ़ पर अधिकार कर लिया था।  प्रो 0 डा0 दशरथ शर्मा के अनुसार मुहम्मद गौरी द्वारा ताहनगढ़ पर अधिकार कर लिए जाने के साथ ही यादवों /यदुवंशियों  (आधुनिक जादों ) की दूसरी राजधानी  ताहनगढ़ / तवनगढ़ या त्रिभुवनगिरि के गौरवशाली स्वर्णिम युग का अन्त हो गया। समकालीन मुस्लिम इतिहासवेत्ताओं ने  अपनी तवारीखों में इस घटना का  वर्णन किया है । हसन निजामी द्वारा लिखी गई  ‘ताज-उल-मासिर’ तथा मिनहाज सिराज  कृत  ‘ तवकाते नासिरी’ मे ताहनगढ़ दुर्ग के मुहम्मद गौरी  के आधिपत्य में आने तथा उसे बहाउद्दीन तुगरिल के अधीन रखने तथा उसके शासनकाल में यहाँ की व्यापारिक प्रगति का  उल्लेख हुआ है ।इस उल्लेख में यह भी विवरण मिलता है कि  हिन्दुस्तान के दूरस्थ प्रदेशों ,  मध्य एशिया तथा खुरासान आदि  के व्यापारी लोग त्रिभुवनगिरि नगर में आते थे।

जैन मुनि न्यायचन्द्र सूरी-रचित हम्मीर महाकाव्य में ” रणथम्भौर के पराक्रमी हठीले चौहनवंशी राजा  हम्मीर के दिग्विजय – अभियान के प्रसंग में  भी त्रिभुवनगिरि के शासक द्वारा हमीर को भेंट दीये जाने का उल्लेख हुआ है। उस समय यहाँ का शासक कौन था ‘निश्चित रूप  कहना कठिन है , शायद त्रिलोचनपाल था। 14वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यादववंशीय राजा अर्जुनपाल देव ने  अपने पूर्वजों के पैतृक राज्य  एवं ताहनगढ़  दुर्ग पर पुनः  अधिकार कर लिया और सरमथुरा  के पास  24 गाँव बसाये।अर्जुनपाल ने  विक्रम संवत 1405 (1348 ई०) में कल्याणजी के मन्दिर का निर्माण करके कल्याणपूरी नगर बसाया, जो कालान्तर में करौली नाम से प्रसिद्ध हुआ। अपनी स्वतंत्र सत्ता गवां देने के उपरान्त भी  यदुवंशियों के शौर्य एवं गौरव के प्रतीक  ताहनगढ़ दुर्ग का महत्त्व बना रहा। सन 151 6 ई० में लोदीवंश के सिकन्दर लोदी ने  इस दुर्ग  पर अपना आधिपत्य कर लिया। मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल  में आलमशाह का इस दुर्ग अधिकार रहा ।

लगभग 8 कि०मी० की परिधि में फैला ताहनगढ़ /तिमनगढ़ दुर्ग शास्त्रक्तगिरि दुर्ग का उत्तम उदाहरण है। उन्नत और विशाल प्रवेशद्वार तथा ऊँच परकोटा  इस दुर्ग के स्थापत्य की प्रमुख विशेषता है। जगन पोल और सूर्यपोल  इसके दो प्रमुख प्रवेशद्वार  हैं। बीते जमाने में यह किला अपने आप में एक सम्पूर्ण इकाई था। समूचा नगर दुर्ग के भीतर बसा हुआ था। दुर्ग में 60 दुकानों से युक्त एक विशालकाय बाजार  था। इसके अतिरिक्त खास महल, बड़ा चौक, भौजाई का कुंआ ,  दुर्गाध्यक्ष के महल,  राजगिरि , सैनिकों के आवासगृह, जीर्ण -शीर्ण छतरियाँ तथा तहखाने  आदि भवन उल्लेखनीय हैं। तिमनगढ़ दुर्ग में उपलब्ध प्राचीन प्रतिमाओं के कारण  यह दुर्ग केवल ऐतिहासिक दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं अपितु अपनी बहुमूल्य  सांस्कृतिक एवं कलात्मक धरोहर के कारण भी विशिष्ट महत्त्व रखता है.

संदर्भ—

1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन
21-बयाना-ऐ कांसेप्ट ऑफ हिस्टोरिकल आर्कियोलॉजी -डा0 राजीव बरगोती
22-प्रोटेक्टेड मोनुमेंट्स इन राजस्थान-चंद्रमणि सिंह
23-आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया रिपोर्ट भाग ,20.,पृष्ठ न054-60–कनिंघम
24-रिपोर्ट आफ ए टूर इन ईस्टर्न राजपुताना ,1883-83 ,पृष्ठ 60-87.–कनिंघम
25-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटर्स -भरतपुर ,पृष्ठ,. 475-477.
26–राजस्थान का जैन साहित्य 1977
27-जैसवाल जैन ,एक युग ,एक प्रतीक
28-,राजस्थान थ्रू दी एज -दशरथ शर्मा
29-हिस्ट्री ऑफ जैनिज़्म -कैलाश चन्द जैन ।
30-ताहनगढ़ फोर्ट :एक ऐतिहासिक  सर्वेक्षण -डा0 विनोदकुमार सिंह
31-तवारीख -ए -करौली -मुंशी अली बेग
32-करौली ख्यात एवं पोथी अप्रकाशित ।
33- करौली का यादव राज्य, रणवाकुरा मासिक में (जुलाई 1992) कुंवर देवीसिंह महावा का लेख ।
34-राजपूताने का इतिहास पृ० 308, ले० डॉ० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ।

लेखक–– डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लाढोता, सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह ,राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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