करौली के जादों (पौराणिक यादव/यदुवंशी ) चन्द्रवंशी क्षत्रियों के बहादुरपुर दुर्ग एवं वहां के तत्कालीन शासकों का इतिहास—-

करौली के जादों (पौराणिक यादव /यदुवंशी ) क्षत्रियों के बहादुरगढ़ दुर्ग एवं वहां के तत्कालीन शासकों का इतिहास – —–

करौली जिला मुख्यालय से मंडरायल मार्ग पर वन क्षेत्र में बहादुरपुर नामक एक जादों राजपूतों का एक मशहूर ठिकाना है ।कहा जाता है कि इस गांव को संवत 1603 ( सन 1546 ई0 ) में बसाया गया था।राजा गोपालदास ने इसका नाम बैकुण्ठपुर रखा था।इस गांव का नाम बहादुरपुर , महाराजा गोपालदास के छोटे पुत्र तुरसम बहादुर के सबलगढ़ स्थापित होने के बाद उनके नाम पर रखा गया ।यहाँ पर स्थित बहादुर किला अपने अतीत का साक्षी बनकर खड़ा हुआ है । यह दुर्ग भयंकर जंगल और एकाकी वातावरण में आज भी अपने गौरवशाली अतीत की गाथा को प्रकट कर रहा है । दुर्ग के मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों तरफ सुरक्षा प्रहरियों के लिए प्रकोष्ट बने हुएं हैं तथा साथ ही चारों तरफ मजबूत चारदीवारी(परकोटा)  है । दरवाजे के अन्दर उत्तर दिशा की तरफ एक बावड़ी तथा कुआँ है, जो दुर्ग के अन्दर प्रमुख जल स्त्रोत थे । बावड़ी के पास सहेलियों की बावड़ी अलग से हैं , उसके आगे ऊँचा बड़ा प्रवेश द्वार है । इस पर कलात्मक निर्माण की साफ झलक दिखाई देती हैं । दरवाजे पर 1589 ई. का एक शिलालेख है जिसमे गोपालपुर लिखा होने से प्रतीत होता है  कि इस किले का निर्माण   महाराजा चंद्रसेन के पौत्र राजा गोपालदास ने ही किया होगा ।
अकबर के शासनकाल में गोपालदास ने अपने पूर्वजों के खोये हुए राज्य पर पुनः अधिकार कर लिया था ।करौली के शासक राजा गोपालदास अकबर के समय में मुगल सल्तनत के मनसबदार थे। इन्होंने अपने क्षेत्र के भील /मीना आदि जनजातियों का दमन करके अपना क्षेत्राधिकार बढ़ाया ।संवत 1575 में गोपालदास ने अकबर को दौलताबाद का दुर्ग जीत था जिससे प्रसन्न होकर सम्राट अकबर ने इनको 2 हजार मनसब और रणजीत नगाड़ा निशान का सम्मान दिया ।मासलपुर के 84 गांव भी अकबर ने इनको जागीर में दे दिए।ये बहुत बलवान एवं धर्मात्मा राजा थे ।अकबर इनसे बहुत प्रसन्न एवं प्रभावित रहता था ।वह गोपालदास को भूमिया कह कर पुकारता था।जब गोपालदास जी अकबर के दरवार में जाते थे तो उनके आगे-आगे नगाड़ा बजता हुआ चलता था।सन 1566ई0 में अकबर ने राजा गोपालदास से आगरे के किले की नींव रखवाई थी।इन्होंने ही करौली के राजमहल में गोपाल मन्दिर बनवाया ।इस मंदिर में ही दौलतावाद से लाई गई गोपाल जी की मूर्ति स्थापित की गई ।यह मूर्ति आज भी मदन मोहन जी के मन्दिर में दाई ओर के कक्ष में देखी जा सकती है।इन्होंने मथुरा में यमुना नदी के किनारे विश्राम घाट पर मन्दिर बनवाया तथा मासलपुर ,झिरी  और बहादुरपुर में महल एवं दुर्ग बनवाये।

करौली ख्यात एवं करौली पोथी के अनुसार राजा गोपालदास ने ही सन 1587ई0  में बहादुरपुर दुर्ग की नींव डाली थी । इस दुर्ग के नीचे ही बरखेडे नदी बहती है ,किले के अन्दर चोक के सामने चार खम्भों पर एक दो मंजिला निर्माण है जो नृपगोपाल भवन कहलाता है ।इसके साथ ही जानना रहवास की इमारतें हैं। दुर्ग में दो मंदिर हैं जिनकी प्रतिमाएं  शायद किसी अन्य स्थान पर स्थापित कर दी गयीं हैं । किले के अन्दर कचहरी को एक मार्ग है जो आम खास कहलाता है ,  जिसमे बिना कोई लेटर्स लगाये 100 चीरी 18 फीट लम्बी आज भी लगी हुईं हैं जो देखने वालें को आश्चर्यचकित कर देतीं हैं।
महाराजा गोपालदास की मृत्यु (1569ई0) के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र द्वारिका दास अपने पिता की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठे तथा इनका राज्यभिषेक बड़ी धूम-धाम से बहादुरपुर दुर्ग में ही हुआ जिसमे चारों ओर से जदुवंशियों लोगों को बुलाया गया था।इनके सबसे छोटे भाई तुरसम बहादुर को बहादुरपुर किले का सूबेदार बनाया गया ।तुरसम बहादुर के वंशज बहादुर के जादों नाम से विख्यात हुए।इनके वंशज सबलगढ़ आदि में है ।
दुर्ग में कचेरी के पास “पंचवीर की एक छतरी ” है जो करौली के राजा द्वारकादास के एक अन्य पुत्र मगधराय की है , इसे मगदराय बाबोसा की छतरी कहा जाता है ,जहाँ लोग मनोतियां मांगने जातें हैं | कहा जाता है महाराजा द्वारकादास के स्वर्गवास के बाद ( 1605 ई 0) उनके पुत्रों में राजगद्दी को लेकर विवाद हो गया था  ( राजा द्वारिकदास के 6 पुत्र   { प्रताप सिंह ,सलेदूजु ,मुकुंददास ,मगदराय ,हरिदास ,शादूलजु  }थे जिनमें प्रताप सिंह सबसे बड़े थे )मगदराय बड़े उपद्रवी थे ।इनके वंशज ” पंचपीर ” जादों कहलाये ।कहा  जाता है कि झगड़े में मगदराय का सिर काट दिया गया और धढ़ बिना सिर के लड़ता रहा ओर दुर्ग के अन्दर कचहरी के पास तक पहुंच गया जहाँ पर छतरी बनी हुई है। अब बहादुरपुर देवता के नाम से पूजे जाते है।गद्दी को लेकर  विवाद बढने के कारण बड़े राजा द्वारिकदास के उत्तराधिकारी पुत्र प्रतापसिंह  ने राजा बनने से स्वयं इनकार कर दिया और अपनी ओर से अपने छोटे भाई  मुकुन्द दास को राजा का अधिकार दे दिया । मुकुन्द दास जी सन 1604 में बहादुरपुर की गद्दी पर बैठे ।इन्होंने बहादुरपुर में एवं करौली दोनों ही स्थानों की उन्नति करने की ओर ध्यान दिया ।इन्होंने बहुत समय तक बहादुरपुर दुर्ग से शासन किया ।इनके 6पुत्र थे जगमन (गद्दी के अधिकारी) , मदनमन (कर्णपुर बैठे ) ,देवमन (हाड़ौती बैठे ) , चतुरमन (मिझौरा ) तथा महामन (नारौली बैठे ) राजा मुकुन्द के वंशज “मुकुन्द जादों “कहलाये जिनकी संख्या करौली क्षेत्र में बहुत अधिक हैजगमन का राज्यभिषेक भी संवत1662 (  सन 1605 ई0)  में बहादुरपुर दुर्ग में ही हुआ था ।इनके समय में बादशाह जहांगीर का शासन था।इनका दर्जा 500जात व 400 की मनसबदारी में रखा गया।इनके शासनकाल में इनके भाई -बन्ध इनके विरोध में हो गए।मुक्तावत एवं बहादुर के जादों शाखाओं ने मिलकर विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया ।काफी समय की आपसी लड़ाई के उपरांत इन्होंने इनका  दमन कर दिया  इनकी मृत्यु सन 1643 ई0 में हुई ।इनके कई पुत्र थे ,परन्तु सब अयोग्य थे जिनमें अनुमन मुख्य था,  जिसके वंशज  “कोटरी ” या मिझौरा का परिवार है ।लेकिन यादव (जादों ) सरदारों की आमराय से जगमन के छोटे भाई छत्रमन को संवत 1700 (सन 1643 ई0)  में गद्दी पर बैठाया गया ।छत्रमन का राज्यभिषेक भी बहादुरपुर दुर्ग में ही हुआ था।इनका शासनकाल शांतिपूर्वक व्यतीत हुआ।करौली के राजकुल में अवश्य कलह रहा।

    छत्रमन बादशाह शाहजहां की तरफ से दक्षिण में युद्ध करने गए थे ,जिसमें ये औरंगजेब के साथ लड़ाई के नायक थे ।इनके राज्यकाल में कोई विशेष उल्लेखनीय घटना नहीं हुई। छत्रमन की  मृत्यु लगभग सन 1644 के लगभग हुई थी।इनके 10 पुत्र थे जिनमें बड़े पुत्र धर्मपाल(गद्दी के अधिकारी ), राव भूपाल  (इनायती व जखौदा )  ,संपत पाल ( भोंडेर /पुरान ) ,रामपाल  (रामपुरा -राजौर /मनोहरपुरा ) , हरदास (वसई ), विधनसहाय / विकन सहाय(घुडाकर ) । धर्मपाल दुतीय   स0 1701 (सन 1644ई0) में करौली के शासक बने तथा बहादुरपुर दुर्ग से अपनी राजधानी करौली ले आये।
बहादुरपुर दुर्ग में जयपुर के जयसिंह जी भी तीन माह एक शाही मेहमान बनकर रहे थे।

इस दुर्ग को गोपालपुर एवं बैकुण्ठपुर भी कहा जाता है ।यह दुर्ग भी बिना किसी उचित रख -रखाव  एवं सार -सम्भाल के अभाव में जीर्ण -शीर्ण अवस्था में होता जारहा है।असामाजिक तत्वों की शरणस्थली बना हुआ है ।यह दुर्ग सन 1569 ई0 से लेकर सन 1650 ई0 (राजा गोपालदास से लेकर राजा छत्रमन के शासनकाल तक ) करौली  राज्य की राजधानी रहा तथा जादों राजपूतों के गौरवशाली अतीत की  ध्वज-पताका लहराता रहा।इस बहादुरपुरगढ़  का सबसे अधिक विस्तार राजा गोपालदास जी के शासनकाल में हुआ था ।

सन्धर्व—-
1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल  गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,1905

लेखक–– डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन 
गांव-लाढोता, सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह ,राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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