मथुरा के प्राचीन चन्द्रवंशी जादों (पुराणिक यादव /यदुवंशी ) क्षत्रियों का इतिहास —-

  • मथुरा के प्राचीन चन्द्रवंशी जादों (पुराणिक यादव /यदुवंशी ) क्षत्रियों का इतिहास—–

ब्रज की इस प्राचीन जाति के लोग चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं इनका मूल पुरुष यदु था, जिसके नाम पर इस जाति के लोग यदुवंशी या यादव कहे जाते थे , जो आजकल  जादों क्षत्रिय (राजपूत ) कहे जातें हैं

कैसे कहलाये ब्रज में चन्द्रवंशी राजा ययाति के पुत्र यदु के क्षत्रिय वंशज  “यादव ” से जादों ——

महाराजा नहुष पुत्र ययाति एवं दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के पुत्र यदु  के वंशज कालान्तर में  यादव से जादों कैसे तथा कब से कहलाये इस का विवरण आज के समय में जानना अति आवश्यक हो गया है। क्यों कि आजकल कुछ विशेष जातियों के लोग अपने स्तर को ऊँचा उठाने हेतु सनातन धर्म एवं सभ्यता के रक्षक क्षत्रिय वर्ग के गौरवशाली पौराणिक इतिहास की वंशावलियों में येन -केन प्रकारेण अपने पूर्वजों के नामों  को जोड़कर आज के समाजों को भृमित करने के लिए अपना नया झूठा इतिहास बनाने में बहुतायत से लगे हुए है।हालांकि वास्तविकता सभी जानते है ।आश्चर्य की बात तो ये है कि वे सदियों से चले आ रहे सनातन हिन्दू संस्कृति को जीवित रखने वाले धार्मिक पुराणों ,ग्रंथों ,उपनिषदों तथा वेदों में लिखे हुए इतिहास को भी झुठला रहे है जिनको दुनियां ने आदिकाल से आज तक मान्यता प्रदान की है।
यादव से जादों शब्द की उत्पत्ति भाषा-व्याकरण की एक सामान्य प्रक्रिया है जो इस प्रकार है–
पद पाठ च-‘यज्ञा यज्ञीयामिति यज्ञा ।यज्ञीयम  ‘ इत्थं विच्छेद कृते यज्ञयपद्स्य आदिभूतो यकार : तत्र-तत्र सर्वोपि य: अन्तस्थानांम आदि : जशब्द : = जाकरूप ध्वनिजार्यते ,सुस्पस्ट इति ।अर्थात यकार: चवर्ग- तृतीयत्वेन जकारेणोंच्चाणीय: l-( शुक्ल यजुर्वेद संहिता )
उक्त भाषा व्याकरण नियमों के अनुसार ‘य ‘वर्ण बोलचाल की भाषा संस्कति में ‘ज ‘वर्ण में परवर्तित हो जाता है। ब्रज  क्षेत्र के कवियों तथा इतिहासकारों ने ब्रजभाषा में “य” को “ज” के रूप में  उच्चारित किया गया है ,जैसा कि यमुना = जमुना ,यवन =जवन , यज्ञ = जग्य , यजमान  = जजमान , यशोदा = जसोदा,यश = जश ,यदुपति = जदुपति ,यादव =जाधव , यम = जम, यादवराय = जादोंराय , यद्धपि = जद्धपि , यदुकूल  = जदुकुल ,यदुवंशी = जदुवंशी आदि ।इसी प्रकार यदु को जदु ,यादव को जादव उच्चारित किया गया जो कालान्तर में जादव से जादों हो गया जिसे आजकल जादों राजपूत “जादौन” लिखते है ।हिन्दी साहित्य का अध्ययन के अध्ययन करने पर पाया गया कि ” यादवा या यादव ” शब्द का अपभ्रंशरूप 16 वीं – 17 वीं शताब्दी के भक्ति काल में  दिखाई देता है। कुछ विद्वानों के अनुसार “यादव” संस्कृति का शब्द है जिसका  हिंदी में अर्थ  “जादव ” है जिससे जादों हुआ।भक्ति रचनाओं में तुलसीदास एवं सूरदास  ने अपने श्रेष्ठ रचनाओं जैसे रामायण ,सूरसागर ,आदि में जदुवंश ,जादों ,जदुपति ,जादवपति ,जादोंराय आदि शब्दों का प्रयोग बहुतायत से किया है ।
तुलसीदास जी ने रामायण में कुछ इस प्रकार लिखा है—
जब जदुबंस कृष्न  अवतारा।
होइहि हरन महा महिभारा।।
कृष्न तनय होइहि पति तोरा ।। .
बचनु अन्यथा होइ न मोरा।
इसी प्रकार  इस चौपाई में भी यद्धपि के स्थान पर जद्धपि शब्द लिखा गया है ।
जद्धपि जग दारुन दुःख नाना।
सबते कठिन जाति अपमाना ।।
इसी प्रकार कुछ अन्य कवियों के छंदों में भी “य”के स्थान पर “ज” शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो इस प्रकार है—
उग्रसेन नृप के तपत , यह न सभा तुम योग्य।
अव मथुरा भेजहु अरहि ,भुव पति जदुकुल योग्य।।
तुमसौं कौं रन एरियो , जदुवंश नारद हूं कहो।
जवनेस सो सुनि इक्क ,संकु अनीक लै दूत उम्महो।।
जिहिं आयकैं मथुरापुरी ,जरदाय जादव बुल्लये ।
जव वेश माधव रात, सुब्बहि जानि माधव नै लये।।
वसुदेव जादव को तनुज ,रु कृष्ण नामक नाम है।
बृंयहू कहो तब विष्णु हो ,मम बेर -बेर प्रनाम है।।
हमसों जुगान्तर  मैं पूरा मुनि वृद्ध गर्ग यहें कही।
जदुवंस मैं बसुदेव ग्रह ,अवतार हरि लैहिऐं सही ।।
अतः चक्रवर्ती चन्द्रवंशीय क्षत्रिय महाराजा  नहुष के पुत्र ययाति के ज्येष्ठ पुत्र “यदु ” से  प्रारम्भ हुए कुल को यदु-कुल या यदुवंश  तथा उनके वंशजों को  यादव या यदुवंशी क्षत्रिय कहा गया है।इसके प्रमाण सनातन वेदों ,उपनिषदों ,पुराणों ,महाभारत ,तथा अठारह वीं सदी के बाद लिखे गए  क्षत्रियों के कुलों के आधुनिक  इतिहास में भी भारतीय इतिहासकारों,लेखकों  एवं 18वीं से 19वीं शताब्दी के अंग्रेज इतिहासकारों जैसे कर्नल टॉड , सी.टी. मेटकाल्फ़ , एम.कनिंगघम , कैप्टन पी पावउलेट ,कैप्टन बिंगले , एम.ऐच ,इलियट , एम.ए.शेररिंग , जेम्स बुरग्रेस , ऐच.ए.रोस , आर.वी. रसेल ,  ब्रिग्ग्स जॉन ,    विलियम क्रूके, जे.डव्लू.वाटसन , एफ .एस .ग्राउस , एफ .ई . पार्जितर , मेजर एच.ई. ड्रेक -ब्रोचमन ,सी.एस.बेयलेय , आदि ने भी अपनी भारतीय राजवंशों पर लिखी पुस्तकों में ,इनके द्वारा तत्कालीन लिखे हुए विभिन्न प्रान्तों के डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटीयर्स में जो  भारतीय वंश एवं जातियों (Tribes &Castes ) का वर्णन किया है उसमे भी वर्तमान करौली राज्य जादों राजवंश ,जैसलमेर राज्य के भाटी यदुवंशी राजवंश ,देवगिरि राज्य के जादव राजवंश ,कच्छ एवं भुज के जडेजा राजवंश ,जूनागढ़ के चुडासमा ,रायजादा ,रा खगार ,सरवैया राजवंशो  , तथा मैसूर के ओड़ियार या बढियार राजवंश के राजाओं के वंशजों को “यादव या यदुवंशी क्षत्रिय लिखा है ।स्वयं कर्नल जेम्स टॉड नें अनाल्स ऑफ जैसलमेर में भाटी वंश के इतिहास में समस्त यदुवंशियो के लिए यदु और जादों  शब्दों का प्रयोग किया  है। अनेकों भारतीय इतिहासकारों ने भी इन राजवंशों के वंशजों के नाम के साथ “यादव या यदुवंशी ” वंश उपनाम भी लिखा है जिसके अनेकों प्रमाण है। शोधों से ये ज्ञात होता है कि इतिहासानुर भक्तिकाल से पूर्व चन्द्रवंशीय क्षत्रिय यदुवंशीयों के लिये “यादव “शब्द का प्रयोग हुआ है ।कुछ पशुपालक जातियों ने तो 1920 ई0 के बाद अपने आप को श्रीकृष्ण भगवान का वंशज घोषित करने के उद्देश्य से इस “यादव ” शब्द को अपने नामों के साथ जोड़ कर अपने को श्री कृष्ण या यदु के वंशज बनने  प्रयास किया है जो निःशन्देह झूठ है।
यदु चन्द्रवंश के विख्यात राजा ययाति का ज्येष्ठ  पुत्र था | जब ययाति ने आपने विशाल साम्राज्य को अपने पुत्रों मैं विभाजित किया, तब भारत का दक्षिण-पश्चिम भाग यदु को प्राप्त हुआ था | इस प्रकार यदुवंशियों का आरंभिक निवास – स्थल भारत का वह भाग था, जहाँ उन्होंने दर्शान,महुश्मती, आवन्ति और चेदी के प्रसिद्धि  राज्य स्थापित किये थे | यदुवंशियों के एक प्राचीन राजा का नाम कीर्तवीर्य अर्जुन या सहस्त्रार्जुन था | उसके राज्य का विस्तार नर्मदा से हिमालय की तराई तक हो गया था उसके वंशज हैहयवंशी यदु कहलाये और उनकी राजधानी महिष्मति थी |
कार्तवीर्य अर्जुन के सौ  पुत्र थे | जिनमे सूर या सूरसेन, वृषसेन,मधु और जयध्वज आदि प्रधान थे | जयध्वज का पुत्र तालजंग हुआ | तालजंग के आनेक पुत्रों मैं वीतिहोत्र सबसे बड़ा था और उनमेसे एक का नाम भरत था जो बड़ा प्रतापी था | भरत के वृष,वृष के मधु और मधु के वृष्णि आदि अनेक पुत्र हुए | वृष्णि के कारण यह वंश वृष्णि/वार्ष्णेय कहलाया| मधु के कारण इस वंश की संज्ञा मधु/माधव भी हुई | यदु के नाम पर इस वंश को यादव वंश तो पहले से ही कहा  जाता था | इस वंश का यादव नाम अधिक व्यापक और सामान्य है |
लिंग पुराण मैं लिखा है, कि  कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्र सूरसेन के नाम पर ही यमुना तट का यह प्रदेश जिसे अब ब्रज कहते हैं, प्राचीन कल मैं शूरसेन प्रदेश कहलाता था | इस प्रकार पौराणिक यादव / जादों जाति का ब्रज से अत्यंन्त प्राचीन सम्बन्ध रहा है | जादवों की कई शाखाएं थी , जिनमे उक्त हैहय वंशीयों के अतिरिक्त वृष्णि , अंधक , कुकुर और भोज विशेष प्रसिद्ध थे | इनके कई राज्य थे , जिनमे आधिकांश मे राज्यतन्त्र ना हो कर गणतंत्र प्रचलित था | उनका अधिपति कोई परमपरागत राजा ना हो कर उक्त राज्यों के निवासियों द्वारा निर्वाचित होता था |
श्री कृष्ण के जन्म से पहले सूरसेन प्रदेश के कई जादव/जादों राज्यों ने अपना एक संघ बना रखा था | जो ‘’ अंधक-वृष्णि संघ  “ कहलाता था | श्री कृष्ण के कारण यदुवंश गौरवशाली हुआ | श्री कृष्ण के समय मे भी यह अंधक-वृष्णि संघ बना हुआ था | यह संघ अंधक और वृष्णि गोत्रों में पैदा हुए जदुवंशियों  का था | अंधक संघ के अधिपति उग्रसेन उस संघीय गणराज्य के राज प्रमुख निर्वाचित हुए थे | और मथुरा उनकी राजधानी थी | उग्रसेन की भतीजी देवकी का विवाह वृष्णि संघ के अधिपति सूरसेन के पुत्र वसुदेव जो शूरसेन के पुत्र थे, के साथ हुआ था | शूरसेन यदु की वृष्णि शाखा में उत्पन्न हुए थे | उन्होंने अपने नाम पर शोरपुर ( वर्तमान वटेश्वर ) बसा कर  अपना प्रथक राज्य स्थापित किया था | यह शूरसेन , अंधक वंशीय उग्रसेन के समकालीन थे | वसुदेव के देवकी से भगवान श्रीकृष्ण तथा दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम ( बलभद्र जी ) दो पुत्र  हुए | उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था , जिसका विवाह उस समय  के सर्वाधिक शक्तिशाली मगधराज जरासंध की दो बेटियों के साथ हुआ था  |
कंस बड़ा शूरवीर और महत्वकांशी योद्धा था उसने अपने ससुर जरासंध की सहायता से अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया और उन्हें राज्य प्रमुक के पद से हटा कर स्वयं अंधक-वृष्णि राज्य का स्वेछाचारी राजा बन गया था | अंत में , स्वयं के ही भांजे देवकीनंदन वासुदेव श्रीकृष्ण के द्वारा उसका अंत हुआ | उसका बदला लेने के लिए मगध-सम्राट जरासंध ने यदुवंशियों के विरुद्ध अठारह  बार भीषण आक्रमण किये थे | यधपि उनमे जरासंध को पूरी सफलता प्राप्त न ही हुई , तथापि उनसे यदुवंशियों की शक्ति का बड़ा हास हुआ था | अंत में उन आक्रमणों से बचने के लिए श्रीकृष्ण ने बड़ा नितिज्ञतापूर्ण कदम उठाया | उन्होंने सजातियों बंधुओ को सम्बोधित  करते हुए कहा कि  जिन जातियों ( यदुवंशियों की शाखाएं ) की वजह से जरासंध के आक्रमण होतें हैं | उन्हें मथुरा छोड़ देनी चाहिये। श्रीकृष्ण तो परमज्ञानी , दूरदर्शी एवं चतुर राजनीतिज्ञ  थे | उनकी यह राय बहुत से जादवों  को पसंद आई और थोड़े से कुकुर , महा-भोजियों के अतरिक्त  समस्त अंधक-वृष्णि संघ के यदुवंशी  इस सुझाव से सहमत हुए  तथा अधिकांश प्रमुख यदुवंशी श्रीकृष्ण के साथ मथुरा का परित्याग  करने को सहमत हो गये | इस योजना को इतिहास मैं महाभिनिष्क्रमण काल कहते  हैं | पुनर्वास के लिए सुदूर पश्चिम की और जाने का निश्चय किया था |
मथुरा से निष्क्रमण करने वाले यदुवंशियों को राजस्थान के पथरीले एवं रेतीले भाग में बसना उचित ज्ञात नही हुआ | यदुवंशी और भी पश्चिम की और बड़ते हुए आनर्त ( उत्तरी गुजरात ) और सौराष्ट्र की समतल एवं उपजाऊ भूमि में जाकर बस गए | आनर्त का राजा रेवत यदुवंशी   श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का ससुर था | अत: लोगो को वहां बसने में सुविधा थी | उन्होंने उस भू-भाग में समुद्र के तट पर द्वारका नामक एक रमणीक पुरी बसाई और उसे अपनी राजधानी बनाया तथा वहां उग्रसेन के लिए सुधर्मा सभा का निर्माण कराया।
महाभारत के युद्ध में जब  इस देश के अनेक राज्यों और उनमें  निवास करने वाली अनेक जातियों का सर्वनाश हो गया था, किन्तु द्वारका का यदुवंशी  राज्य तब भी बड़ा शक्तिशाली था | उसका कारण श्रीकृष्ण जैसे युगांतरकारी महापुरुष का  कुशल नेतृत्व था | जब श्रीकृष्ण के तिरोधान का समय आया; तब गांधारी के श्राप से द्वारका के यदुवंशियों  मे भीषण गृह – कलह हुआ; जिसके कारण उनमे से अधिकांश आपस मे ही लड़ कर मर गये | उस समय वहां वृद्धजन , विधवा स्त्रियाँ और बालक ही शेष रहे थे |
इस भयानक नर-संहार को देख कर बलराम जी को इतना  क्षोभ हुआ कि  वह समुद्र यात्रा को चले गये | और वहाँ से फिर नहीं लोटे | योगीश्वर श्रीकृष्ण दारुक सारथि सहित वापस प्रभास क्षेत्र से द्वारिका वापस आये और दारुक को सब वृतांत कह कर अर्जुन को लिवा लाने के लिए तथा अपने पिता वसुदेव एवं अंधक-वृष्णि संघ के राजप्रमुख उग्रसेन  को यदुवंशियों के इस भयानक नरसंहार की सूचना देने के लिए भेजा | उनका अभिप्राय यह था कि जो कुछ स्त्री , बच्चे और वृद्ध द्वारिका में  बचे हैं उनको अर्जुन यहाँ आकर लिवा ले जायें और अपनी इच्छानुसार उन्हें बसा दें | तथा अब हमारे पीछे इस यदुकुल का राजा वज्रनाभ होगा | तदुपरांत श्रीकृष्ण स्वयं देहोत्सर्ग क्षेत्र मे जरा नामक व्याध के तीर से परमधाम को पहुंचे | श्रीकृष्ण का अंत एक निराश राजनीतिज्ञ के रूप में हुआ, जो अपने गणराज्य की गांधारी के श्राप को सत्यापित करने की वजह से आंतरिक समस्याओं को सुलझाने में प्राह: असफल रहें |
जब अर्जुन को दारुक द्वारा द्वारिका के यदुवंशियों के उस सर्वनाश का समाचार मिला , तब अर्जुन के द्वारिका आने तक वसुदेव, देवकी ,उग्रसेन आदि अनेक वृद्धजनों एवं श्रीकृष्ण की रुक्मणी  सहित आठ पटरानियों ने भी शरीर त्याग दिए | अर्जुन जब द्वारिका आये तो उसे महान कोलाहल करते हुए स्त्रियाँ , बच्चे और वृद्धजन ही मिले | वह उन सब को लेकर चला , परन्तु मार्ग में ही क्षेत्रीय आभीरों ने सब धन सम्पति और कुछ स्त्रियों को भी लूट लिया | जैसे -तैसे शेष स्त्रियों को वहाँ से लाकर उनको श्रीकंठ ( पूर्वी पंजाब ) प्रदेश में बसा दिया | श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को अर्जुन ने अपने पौत्र परीक्षत के सुपुर्द किया | इसके बाद परीक्षत को इन्द्रप्रस्थ के राज्य सिंहासन पर बैठा कर पांडवगण अपनी जीवन लीला समाप्त करने हिवारे चले गये | कुछ समय बाद  परीक्षित ने वज्रनाभ को मथुरा के राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त किया |
इस समय जरासंध के आक्रमणों के कारण माथुरा प्रदेश की स्थिति अत्यंत ही दयनीय थी | इस बात से व्यथित हो कर वज्रनाभ ने परीक्षित को अपनी चिंतनीय व्यथओं  से अवगत कराया क्योंकि उस समय मथुरा एक निर्जन वन ही था | और वहाँ की प्रजा कहाँ चली गयी इस बात को लेकर वज्रनाभ जी बहुत व्यथित थे | क्योंकि राज्य का सुख तो तभी है जब प्रजा रहें |
तब परीक्षित ने वज्रनाभ का संदेह मिटाने के लिए महर्षि शांडिल्य को बुलाया । यही महर्षि शाडिल्य गोकुल में पहले  नन्द आदि गोपों के पुरोहित थे | शाडिल्य जी वहां  आये उनका विधि पूर्वक सत्कार किया |शांडिल्य ऋषि ने राजा परीक्षित  एवं वज्रनाभ  को इस प्रकार ब्रजभूमि का रहस्य बतलाया-    “ ब्रज  “ शब्द का अर्थ है व्याप्ति |  व्यापक होने के कारण ही उस भूमि का नाम ब्रज पड़ा है। सत्व, रज ,तम – इन तीन गुणों से अतीत जो परमब्रह्म  है  , वही व्यापक है । इसलिए उसे ब्रज कहतें हैं | इसलिए वज्रनाभ तुम तनिक भी चिंता न करो | तुम मेरी आज्ञा से यहाँ बहुत से गाँव बसाओ , इससे निश्चय ही तुम्हारे मनोरथों की सिद्धि होगी | योगीश्वर श्रीकृष्ण ने जहाँ जैसी लीलाएँ की हैं उसके अनुसार उस स्थान का नाम रख कर तुम अनेकों गावं बसाओ और इस प्रकार दिव्य ब्रजभूमि का सेवन करतें रहो | गोवर्धन , दीर्घपुर ( डींग ) , मथुरा , महावन ( गोकुल ) , नंदिगावं ( नंदगांव  ) और ब्रह्त्सानु ( बरसाना ) आदि में तुम्हें अपने लिए छावनी बनानी चाहिए । इस ब्रज भूमि पर मैं  तुम्हे आशीर्वाद देता हूँ , मेरी कृपा से यदुकुल शिरोमणि देवकीनंदन वासुदेवश्रीकृष्ण की लीलाओं के जितने भी स्थल हैं सबकी तुम्हें ठीक-ठीक पहचान हो जाएगी | वज्रनाभ इस ब्रजभूमि का सेवन करतें रहेने से तुम्हें किसी दिन परमयोगी यदुकुल पंडित उद्धव जी भी मिल जायेंगें फिर तो अपनी माताओं सहित तुम उन्हीं से इस पावन पवित्र मोक्ष दाहिनी यदुवंशियों की जन्मभूमि ,कर्मभूमि एवं रणभूमि का रहस्य जान लोगे। इसके बाद वज्रनाभ ने महर्षि शांडिल्य जी के आशीर्वाद से गोवर्धन( दीर्घपुर ),  मथुरा ,  महावन , गोकुल( नंदीग्राम ) और वरसाना आदि छावनी बनाये।और उद्धव जी के उपदेशानुसार बहुत से गांव बसाये | राजा परीक्षत ने इंद्रप्रस्थ से मथुरा में हजारों  बड़े -बड़े सेठों को बुलाकर मथुरा में रहेने की जगह दी । इसके अलावा परीक्षत ने मथुरा मंडल के ब्राह्मणों तथा प्राचीन वानरों जो भगवन श्रीकृष्ण के बड़े ही प्रेमी थे बुलाया और उन्हें आदर के योग्य समझकर मथुरा नगरी में यथायोग्य स्थान पर  बसाया | इस प्रकार राजा परीक्षत की मदद और  महर्षि शांडिल्य की कृपा से वज्रनाभ ने उन सभी स्थानों की खोज की जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रेमी गोप-गोपियों के साथ नाना प्रकार की लीलाएं की थीं । लीला स्थलों का ठीक ठीक निश्चय हो जाने पर उन्होंने वहां की लीला के अनुसार उस स्थान का नामकरण किया । भगवान श्रीकृष्ण  के लीला विग्रहों की स्थापना की तथा उन उन स्थानों पर अनेकों गांव वसाए । स्थान – स्थान पर भगवान श्री कृष्ण के नाम से कुण्ड ओर कूए खुदवाएं एवं कुंज व बगीचे लगवाये । शिव आदि देवताओ की स्थापना की। गोविन्द , हरिदेव आदि नामो से भववृद्धि गृह स्थापित किये । इन सब शुभ कर्मों के द्वारा वज्रनाभ ने अपने राज्य में सब ओर एक मात्र श्री माधव भक्ति     का प्रचार किया और बड़े ही आनंदित हुए | प्रजाजन सदा वज्रनाभ के राज्य की प्रसंशा कीया करतें थे | उद्धव जी से मिलने के बाद वज्रनाभ जी ने अपने पुत्र प्रतिबाहु को मथुरा का राजा बना दिया और माताओं को साथ ले , उसी स्थान पर जहाँ उद्धव जी प्रकट हुए थे , जाकर श्रीमदभागवत सुनने की इच्छा से रहेने लगे। यह स्थान गोवर्धन के निकट वृन्दावन के भीतर कुसुम सरोवर पर जो सखियों की विहार स्थली है वहन पर लताओं , अंकुरों और बेलों  के रूप में है वहीं पर  अवश्य ही परमयोगी प्रकांड पंडित उद्धव जी वहाँ निवास करतें हैं | इस प्रकार वज्रनाभ जी को ही मथुरा का पुनः संस्थापक के साथ-साथ यदुकुल पुनः प्रवर्तक भी माना जाता है ।इनसे ही समस्त यदुवंश का विस्तार हुआ माना जाता है। बज्रनाभ जी को ही भगवान श्री कृष्ण का प्रतिरूप माना गया है ।वज्रनाभ जी की ही बजह से ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा आरम्भ हुई।उन्होंने ही ब्रज में 4 प्रसिद्ध देव प्रतिमाएं स्थापित की थी ।मथुरा में केशव देव ,वृंदावन में गोविन्ददेव ,गोवर्धन में हरि देव ,बलदेव में दाऊजी स्थापित किये थे ।पुराणों में वज्र के पुत्र प्रतिबाहू , प्रतिबाहू के सुबाहु ,सुबाहू के शांतसेन और शांतसेन के शतसेन तक का वर्णन मिलता हैं | इन यदुवंशियों का राज्य ब्रज प्रदेश में सिकंदर के आक्रमण के समय भी होना पाया जाता है ।समय -समय पर शक, हूर्ण ,मौर्य,गुप्त और शिएथियन आदि ने इन शूरसेन वंशी यदुवंशियों के मथुरा राज्य को दबाया /छीना गया , लेकिन मौका पाते ही यदुवंशी फिर स्वतंत्र हो जाते थे ।जब चीनी यात्री हुएनसांग सन 635 ई 0 में भारत में  आया था उस समय मथुरा का शासक कोई सूद्र था ।लेकिन मथुरा के आस पास के क्षेत्र जैसे  मेवात ,भदानका / शिपथा (आधुनिक बयाना) ,कमन (8 वीं तथा 9 वीं सदी ) के शासक शूरसैनी शाखा के ही थे जिनके नाम भी प्राप्त है । इस काल में मथुरा पर शासन कनौज क्षत्रिय के गुर्जर -प्रतिहार शासकों था ।इस काल में यदुवंशी उनके अधीनस्थ रहे  ।लेकिन इसी समय में मथुरा के शासक यदुवंशी ( जादों ) राजा धर्मपाल , भगवान श्रीकृष्ण के 77वीं पीढ़ी में मथुरा के आस पास के क्षेत्र के शासक रहे है जिनके कई प्रमुख वंशज ब्रह्मपाल ,जयेंद्र पाल मथुरा के शासक 9 वीं सदी तक मिलते है इसके बाद महमूद गजनवी के काल में भी मथुरा /महावन पर (1018 ई.)यदुवंशी राजा कुलचंद का शासन था । जब मोहम्मद गजनबी ने स.1074 (1018 ई. )ने महावन पर आक्रमण किया था तब वहाँ के राजा कूलचंद ( कुल्चंद) से उसका भीषण युद्ध हुआ था | यधपि कुलचंद की वंशावली उपलब्ध नहीं हुई हैं , तथापि ऐसा प्राप्त स्रोतों से ऐसा अनुमान होता है कि वहाँ कोई जादों राजा था । इस युद्ध में कूलचंद की म्रत्यु हुई थी और उसका विशाल सैन्यवल  एवं राज्य महमूद गजनवी ने नष्ट कर  दिया था । जो जादों उस भीषण विनाष के बाद भी बच गयें थे , उन्होंने महावन के राजा कुलचंद जादव के भाई -बंध विजयपाल के नेतृत्व में मथुरा से हट कर श्रीप्रस्थ ( वर्तमान बयाना ) में एक नयें जादों राज्य की स्थापना की थी ।
उक्त विजयपाल के वंशजों ने ही कालान्तर में कामबन तथा बयाना में यादव राज्यों की स्थापना की थी और वहां  अनेक दुर्ग एवं देवालय बनवाएं | शूरसेन शाखा के भदानका /शिपथा (आधुनिक बयाना );त्रिभुवनगिरी (आधुनिक तिमनगढ़ ) पर कई शासकों  जैसे राजा विजयपाल (1043),राजा तिमानपल (1073), राजा कुंवरपाल प्रथम (1120), राजा अजयपाल जिनको महाराधिराज की उपाधि थी (1150) नें महावन के शासक थे । इनके बाद इनके वंशज हरिपाल (1180), सोहनपाल (1196)महावन के शासक थे ।इसी समय बयाना और त्रिभुवनगिरी पर राजा धर्मपाल दुतीय के बेटे कुंवरपाल दुतीय का शासन था जिसका युद्ध मुहम्मद गौरी एवं उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक से हुआ था ।इसके बाद भी महावन के राजा महिपाल यदुवंशी क्षत्रिय रहे है | मुग़ल शासन  के बाद के अंतिम काल में बयाना और कामबन पर भरतपुरनजाट राजवंश  ने अधिकार कर लिया था |
विजयपाल के वंशजों ने सन 1348ई0  में करौली राज्य की स्थापना की ।अंग्रेजी शासनकाल तक ब्रज में करौली ही जादों का एकमात्र प्रसिद्ध राज्य था , जिसकी परम्परा भगवान श्रीकृष्ण तक जाती थी। देश के स्वाधीन होने पर अन्य राज्यों के साथ करौली भी राजस्थान में विलीन हो गया | इस समय वास्तविक (पोराणिक )यादवो को जादों क्षत्रिय ( राजपूत ) कहा जाता है | जिनकी संख्या राजस्थान में करौली , धौलपुर  एवं  भरतपुर जिलों में ,  मध्य प्रदेश के भिंड , मुरेना( सबलगढ़ एवं सुमावली – जौरा क्षेत्र ), श्योपुर जिले में पाई जाती हैं इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के मथुरा , अलीगढ़ , आगरा , हाथरस , एटा , फिरोजाबाद , बुलंदशहर  , कानपुर ,इटावा ,कालपी , महुवा , बांदा , हमीरपुर एवं कोशाम्बी आदि जिलों में बहुत अधिक मात्रा में पाए जातें हैं | बिहार के भागलपुर , मुंगेर । पंजाब , हरियाणा तथा जम्बू में कुछ जिलों मैं भी सूरसेनी जादों पाएं जातें हैं ।भाटी यदुवंशी क्षत्रिय जैसलमेर ,बीकानेर ,हनुमानगढ़ ,जोधपुर में हैं।

सन्धर्व—
1-ऋग्वेद -दयानद संस्थान ,दिल्ली
2-यजुर्वेद -दयानन्द संस्थान ,दिल्ली
3-मनुस्मति -मनु कृत-वेंकटेश्वर प्रेस ,बम्बई
4-श्रीमद्भागवत महापुराण -गीताप्रेस ,गोरखपुर
5- संक्षिप्त महाभारत-गीता प्रेस ,गोरखपुर
6-वायुपुराण
7-विष्णुपुराण
8-हरिवंश पुराण
9-मत्स्यपुराण
10-अग्नि पुराण
11-रामायण तुलसी एवं बालमिक कृत
12-सूरसागर महात्मा सुरदास
13-राजस्थान का इतिहास -कर्नल जेम्स टॉड
14-हिस्ट्री ऑफ दी राजपूत ट्राइब्स -मेटकाल्फ़
15-हैंडबुक आफ राजपूतस -कैप्टन बिंगले
16-भारत का वृहत इतिहास (भाग 1,2,3)-रमेश चंद्र मजूमदार
17-राजपूताने का प्राचीन इतिहास -पं0 गौरीशंकर ओझा
18-गजनी से जैसलमेर -हरि सिंह भाटी
19-राजपूताने का इतिहास -जगदीस सिंह गहलोत
20-यदुवंश का इतिहास – महावीर सिंह यदुवंशी
21-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास प्रथम भाग -प्रभु दयाल मित्तल
22-मथुरा -ए डिस्ट्रिक्ट मेमॉयर -ग्रोउस
23-ब्रज का इतिहास प्रथम खण्ड-कृष्णदत्त वाजपेयी
24-मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास-प्रो0 चिन्तामणि शुक्ल
25-प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग-,सत्यकेतु विद्याशंकर
26-विद्याभवन राष्ट्रभाषा ग्रंथमाला पुराण -विमर्श -आचार्य बलदेव उपाध्याय
27-प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य -बाबू बृन्दावन दास
28-प्राचीन भारत का इतिहास रमाशंकर त्रिपाठी
29-पाणिनीकालीन भारतवर्ष -डा0 वासुदेव शरण अग्रवाल
30-दकन का प्राचीन इतिहास -जी0 यजदानी
31-राजपूत आफ सौराष्ट्र -वीरभद्र सिंह
32-सुर वंश का इतिहास -डा0 शिव बिन्देश्वरी प्रसास
33-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट – पी 0 पोवलेट
34-भारतीय पूरा -इतिहास कोश-अरुण
35-ऐष्यन्त इंडियन हिस्टारिकल ट्रेडिसन -पाजितर
36-अर्ली हिस्ट्री ऑफ राजपूत -सी0 वी0 वैद्य
37-जादों वंशियों का इतिहास -करौली का विजयपाल ,न019/27 ,अलवर पुरालेखय ,राजस्थान ,आर्काइव्ज आफिस ,बीकानेर
38-यादव वंशों  का इतिहास  संवत 867 विक्रमी से 1094 तक ,न0 269,8/27 ,अलवर पुरालेखीय , राज0 आर्काइव्ज आफिस ,बीकानेर
39-जैसलमेर ख्यात –डा0 नारायण सिंह भाटी
40-करौली ख्यात एवं करौली पोथी
41-यदुवंश -गंगा सिंह
42-जाटों का नया इतिहास-डा0 धर्मेंद्र विद्यालंकार

लेखक – डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन 
गांव-लढोता, सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह ,राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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