करौली के चन्द्रवंशी जादों राजवंश (पुराणिक यादव /यदुवंशी ) क्षत्रियों के त्रिभुवनगिरि दुर्ग का इतिहास —-

करौली के चन्द्रवंशी जादों क्षत्रियों (पुराणिक यादव /यदुवंशियों ) के त्रिभुवनगिरी दुर्ग का इतिहास

बयाना के राजा विजयपाल जी की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ  पुत्र तिमनपाल ने तुर्कों से अनेक लड़ाई लड़ी | शाह कंधार से लड़ाई में हार जाने के बाद बारह साल तक लापता रहे | उपरांत घुमते- घुमते पुन: बयाना की तरफ आये और अपनी धाय (जो जाति  की मीणा थी) के मकान पर चन्द रोज रहे | तिमनपाल जी यहाँ रहते अक्सर शिकार किया करते थे | एक रोज शिकार खेलते समय इन्हें जंगल में खुदारसी दास( मेढ़की दास) नाम के एक फकीर मिले, साष्टांग प्रणाम किया | अपने घोर संकट को बतलाते हुए शुभ आशीर्वाद! की इच्छा व्यक्त की और साधू ने उनके राज चिन्हों को देख (दुखों का ध्यान कर) आशीर्वाद में इन्हें पारस पत्थर दिया (जिससे छूते हि पत्थर सोना हो जाता है) साथ ही तिमनपाल को अपना भाला देतें हुए आज्ञा दी कि इसे लेकर सीधे चले जाओ, ध्यान रखना पीछे मत देखना, जहाँ तुम्हारा घोडा रुक जायें वहीं इस भाले को गाड देना जिससे तुम्हे अथाह जल के भंडार की प्राप्ति होगी । उपरांत राज्य की नींव डालना |
राजा साधू की आज्ञा पाकर चल दिए । घोडा घोर जंगल में एक पहाड़ी की तलाई में रुक गया । राजा ने उसी स्थान पर भाले को गाड दिया जिससे अथाह  जल स्त्रोत फूट निकला | जो कालांतर में “सागर’’ नाम से ख्याति को प्राप्त हुआ| जिले के परम तपस्वी साधू श्री गोमतीदास महाराजा ने इसी सागर के तीर के ऊपर (नहार खो) गुफा में तपस्या कर भगवत दर्शन किये | सागर पर प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ला दशमी को मेला भरता है | जिससे गंगा दशहरे  के नाम से जाना जाता है | मेले में हजारो श्रद्धालु सागर स्नान के साथ मंदिर दर्शन करते हैं |
त्रिभुवननगरी(त्रिभुवनागिर )  का विकास
राजा तिमानपाल ने इस जलाशय के ठीक ऊपर वाली पहाड़ी पर पारस पत्थर की सहायता से सम्वत 1105 के पुष्प नक्षत्र में किले की नीव डाली जो कालांतर में इन्ही(तिमनपाल जी) के नाम से (तिमनगढ़) ख्याति को प्राप्त हुआ | संवत 1115 मुताबिक 475 हिजरी में हुकूमत आरा हुए और फकीर की दुआ बरकत से फौज व सिपाही और हसमवोखदम सब सामान मयसर हुआ | और संग पारस के जरिये से तनख्वाह और मसारफ तामीर वगैहरा का सरजाम हुआ | मुल्क डांग में चम्बल से धोलपुर तक इनकी हुकूमत थी | मध्य प्रदेश के निकट इवगोडा नामक एक गाँव से विक्रम संवत 1190 की आषाड़ सुदी 11 [15जून 1523 ई 0] का शिलालेख मिला है जिसमे तवनपाल  या तहण पाल की उपाधि “परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर” लिखी मिलती है जिससे पता चलता है कि वह एक शक्तिशाली शासक था | इतिहासकारों के अनुसार उसके राज्य में वर्तमान अलवर का आधा भाग ,गुडगाँव ,भरतपुर  ,धौलपुर ,करौली और मथुरा का क्षेत्र तथा वर्तमान आगरा और ग्वालियर का भू –भाग सम्मलित था |
तिमनगढ़ का दुर्ग रणथम्भोर से कम नहीं है जहाँ लगातार युद्ध के बादल मडराने के बाद भी राजा तिमनपाल की तीन पीढ़ियों ने शासन किया |उस समय इस नगरी का नाम त्रिभुरानगरी  था |तिमनपाल जी लगान में लोहा इक्कठा करवाते थे जिसे पारस पत्थर की सहायता से सोना तैयार करते जिससे राज्य में विकास कार्य करते थे |पारस के विषय में किव्दंती है की राजा तिमनपाल ने एक बार खुश होकर अपने पुरोहित को यह पारस पत्थर कपडे में लपेट कर दान कर  दिया |पुरोहित जी खुशी –खुशी उसे लेकर जगनपौर होते हुए नीचे आ गये ,बाद में उन्होंने कपडे की पोटली को इस उद्देश्य से खोला देखें महाराज ने आज क्या इनाम दी है ,उसमे पत्थर वह भी विचित्र किस्म का ,गुस्सा खाकर उस पत्थर को नजदीक  के सागर नामक जलाशय  में फेंक चलते बने !राजा तिमनपाल को जब यह मालुम पड़ा कि पुरोहित जी महाराज पारस जैसे धन को सागर में फैंक गये है , तुरंत हाथियों को लोहे की सांकलों में बांध कर  सागर में छोड़ा गया परन्तु हाथी उसे ढूँढने में असफल रहे ।लोहे की सांकल जो उससे छू गयी वह तो सब सोने की हो गई |इस प्रकार उक्त पारस राजा को भी पुनः नहीं मिला ,जनश्रुतिनुसार पारस आज तक इसी सागर नामक जलाशय  में विद्यमान है |
तिमनगढ़ दुर्ग निर्माण काल —–
तिमनगढ़ दुर्ग के निर्माण काल को लेकर भिन्न -भिन्न मत सामने आते है , एक विद्धान ने लिखा है कि इसकी नींव संवत 1105 के पुष्प नक्षत्र में डली और धर्मपाल के बेटे कुंवरपाल ने यह किला यवनों से छीन लिया , उपरांत 1300 ईo में इस पर पुनः यदुवंशियों का अधिकार हुआ |
दूसरे का मानना है कि  संवत 1155 , मुताविक 475 हिजरी में इसका निर्माण हुआ तो तीसरा इसका निर्माण काल संवत  1057 में मानता है |वर्तमान किले में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे दुर्ग के निर्माण काल की पुष्टि की जा सके
इस दुर्ग के दो भाग हैं एक पुराना दूसरा नया जिन्हें क्रमशः जगनपौर , सुर्यपौर के नाम से जाना जाता है |यह स्वीकार किया जा सकता है की सूर्यपौर का निर्माण राजा तिमनपाल ने कराया हो क्यों कि उसमें ज्यादातर हिन्दू सभ्यता की झलक दिखाई देती है ।,दुतीय  विजय मंदिर गढ़ के सामान साधारण रूप से निर्मित  है जब कि  जगनपौर वाले हिस्से के सारे निर्माण कार्य उच्च शिल्प कला को समेटे हुए हैं |साथ ही प्राचीरों में समाई हुई बुद्ध और अजन्ता कालीन प्रतिमाएं स्पष्ट करती है कि किले पर कभी बौद्ध समुदाय का आधिपत्य रहा हो |
हमीर के रणथम्भोर के तख़्त पर बैठने के पश्चात् दिग्विजय का अभियान आरम्भ किया, दक्षिण में परमार के शासक भोज को परास्त कर  जब उत्तर दिशा में बढ़ने लगा तो रास्ते में आरा  ,चित्तोड़ ,पुष्कर ,खंडवा होता हुआ जब वह अपने दुर्ग को जाने लगा तो रास्ते में त्रिभुरा नगरी के शासक ने काफी सत्कार किया |इससे स्पष्ट होता है उस समय इस किले पर यदुवंशियों का शासन था |
जगनपौर के आमखास [आठ खाम्मों वाली छतरी ] तक निर्माणों को देखने से मालुम पड़ता है कि हिन्दू , जहाँ गणेश , महावीर आदि की प्रतिमा दरवाजों पर स्थापित करते हैं मुस्लिम चाँद कंगुरा आदि ! परन्तु उक्त सभी निर्माणों पर इनसे भिन्न चित्र देखने को मिलते हैं |हर दरवाजे पर प्रेत जैसी आक्रति जिसमे सिर पर सींग लम्बी मूंछ ,बड़े –बड़े दांत बाहर निकले दिखाई पड़ते है , जिन्हें देख कर कहा जा सकता है कि इस किले पर हिन्दू –मुस्लिम –जैन –बौद्ध सभ्यता के आलावा भी किसी अन्य सभ्यता का राज्य रहा होगा। इस प्रकार के सूक्ष्म चित्र करौली में “माँ साब ” के मन्दिर के बाहर भी देखने को मिलते हैं |
सम्वत 1400 के बाद यह किला जैनमत का अनुयायी हुआ। तलहटी गाँव के आरम्भ में एक जैन  प्रतिमा जिस पर मीतन गोत्र द्वारा XY  97 का निर्माण काल लिखा है, देखने को मिली साथ ही दूसरी प्रतिमा जिस पर गणेश जी की ,जिसके दोनों तरफ महावीर जी की खडी मूर्ति है देखी |
इसी सन्धर्व में किले के अन्दर के महलों के पास बाजार में गणेश आयुद्ध गणेश की प्रतिमाएं जहाँ दुकानों के मुख्य द्वारों पर देखने को मिलती हैं वहीं एक दुकान पर महावीर जी की बैठी प्रतिमा खुदी है |ऐसा माना जा सकता है कि उस समय दुर्ग में या तो सभी धर्मों को पूर्ण स्वतंत्रता थी अथवा बाजार का निर्माण काल बहुत पीछे का रहा हो |
बाजार के दोनों तरफ साठ दुकानें हैं ।जहाँ महल की तरफ की दुकानों पर मुस्लिम सभ्यता की झलक दिखलाई पड़ती है ,वहीं नीचे चल कर गणेश , महावीर की प्रतिमाएं खुदी मिलती हैं |कई –कई दुकानों के खम्भे मढ़े हुए हैं जो स्पष्ट करते हैं या तो इनका निर्माण बाद में हुआ अथवा ये दुकानें धनाड्यों की रही हों |
तिमनगढ़ का पतन यदुवंशियों की वंशपरम्परा समाप्त ——–-गद्दी नशींन होते ही तिमन पाल जी ने जहाँ राज्य का विकास कर अमन चैन कायम किया वहीं उन्हें बड़ी चिंता सता रही थी ! ‘किस प्रकार बाप की नीली घोडी और हीरा वापिस आये जिन्हें बादशाह कंधार विजय चन्द्र गढ़ की लूट के समय ले गया ‘ समय निकलता गया तिमन पाल जी भी बुजुर्ग हो गये |उन्होंने अपने बड़े लड़के धर्मपाल से उक्त विषय का जिक्र किया परन्तु धर्मपाल जी शायद इतनी दूरी की लड़ाई से कतराते थे हिम्मत नहीं पड़ी परन्तु तिमन पाल के अंतिम पुत्र हरया  [ हरपाल ] ने बहादुरी का परिचय दे अकेला ही कंधार गया वहां कुछ समय चतुराई से पितामह की अमानत को सुरक्षित ला पिता को प्रदान करदी |राजा इसकी होशियारी एवं बहादुरी से बहुत प्रभावित हुए |इन्होने जहाँ गद्दी का वारिश बड़े बेटे धर्मपाल को बनाया वहीं शासन के सारे हकूक [अधिकार ] हरपाल को दिए |
राजा तिमन पाल धर्म प्रिय शासक थे इसी वजह से इन्हें “धर्माधिकारी ” का ख़िताब मिला |इन्होने 32 साल राज्य किया और संवत 11 47 में गुजर गये |इनके ग्यारह संतानें थी |
संवत 1147 में तिमन पाल के स्वर्गवासी होने के पश्चात् धर्मपाल जी गद्दी नशीन हुए परन्तु हुकुमत के सारे अधिकार तिमन पाल जी अपनी मौजूदगी में पहले ही  हरपाल को दे दिए थे |इस लिए हरपाल ने धर्म पाल जी की हुकूमत तसलीम नहीं की और नाही धर्मपाल जी को हुकूम आरा ठहराया |धर्मपाल नाम के शासक रहे ।किले पर पूर्ण रुप से हरपाल का कब्ज़ा था |उपेक्षा एवं बेइज्जती ने राजा धर्मपाल को किला छोड़ने को मजबूर कर दिया |धर्मपाल कुछ सिपाहियों को ले जंगलों में होते हुए चम्बल दरिया के किनारे पहुंचे जहाँ शहर व किला धौलपुर समय पाकर आवाद किया उस समय इस क्षेत्र का नाम  ” ” “धौलीडेरा “था जो कालान्तर में धौलपुर नाम से पुकारा जाने लगा |
प्रजा हरपाल को  ‘हाकिम ‘ शब्द से पुकारती थी |हाकिम हरपाल की आगे की औलाद खारी गुजर  , तोड़वाल कहलाये |इस प्रकार तिमन गढ़ पर हाकिम हरपाल काविज रहे उधर धौलपुर में राजा धर्मपाल राज्य करते रहे  ,राजा धर्मपाल की सात शादियाँ हुई जिसमें दो फरजंद हुए |
1 –कुंवरपाल ——गद्दी के बारिश हुए |
2 –बडनपाल ——-इनकी औलाद गौन्हजे  जादों कहलाए |
राजा धर्मपाल ने कई बार धौलागिरी वर्तमान धौलपुर के किले से तिमनगढ़ पर चढ़ाई की परन्तु हरपाल ने धर्मपाल को हर वार परास्त किया | कुछ वर्षों बाद धर्म पाल के पुत्र कुंवर पाल ने झिरीक़े पास  गोलारी में एक किला बनवाया जिसका नाम कुंवरगढ़ रखा | कुछ समय बाद कुंवरपाल ने हरपाल को मार कर तिमणगढ़ पर अपने पिता का अधिकार स्थापित किया | इधर हरपाल के मारे जाने की घटना से आशंकित होकर बयाना के मुस्लिम शासक ने तवन गढ़ पर घेरा डाल दिया | धर्मपाल ने अपने पुत्र द्वारा चम्बल के किनारे निर्मित निकटवर्ती कुंवरगढ़ दुर्ग में शरण ली परन्तु यहाँ भी आक्रान्ता द्वारा घेर लिए जाने पर उसने भीषण युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त किया | कुवरपाल बड़े होने के कारण राज के वारिश हुए |संवत 1159 मुताविक हिजरी 519 में गद्दी नशीन हए |इन्होने अपने राज्य का विस्तार किया तथा बयाना व तिमनगढ़ दोनों दुर्ग उनके अधिकार में रहे |उन्होंने दीर्घ काल तक शासन किया |जैन साहित्य में मुनि जिनदत्तसूरी के 1157 ईo में कुंवर पाल के शासनकाल में तवनगढ़ आगमन तथा एक कलशाभिषेक समारोह में भाग लेने व राजा कुंवरपाल से उनकी भेंट का उल्लेख मिलता है |त्रिभुवनगिरि के यदुवंशी राजा कुमारपाल ने जैन मुनि जिनदत्त सूरी से प्रतिबोध प्राप्त किया था  ,और उन्हें एक चित्रित काष्ठ फलक भेंट किया था  |जिनदत्त सूरी ने संवत 1169में आचार्य पद प्राप्त किया था , अतएव उक्त काष्ठ  फलक का निर्माण काल संवत 1175के लगभग माना जा सकता है |इस काष्ठ फलक में एक जिनालय है जिसके दाहिनी तरफ जिनदत्त सूरी  की व्याख्यान सभा है |आचार्य के पीछे दो भक्त श्रावक एवं सामने एक शिष्य व महाराजा कुंवरपाल बैठे है |महाराजा के साथ रानी तथा दो परिचारक भी विद्यमान  है |कुछ इतिहासकारों का मत है कि एक काष्ठ  फलक पहिले उस ग्रन्थ के साथ था ,जिसे यदुवंशी राजा कुंवरपाल ने  लिख वाया था और यह काष्ठ फलक अन्य ग्रन्थ चन्द्रपन्नति सूत्र के साथ लगा दिया गया है |इससे सिद्ध होता है कि उस समय में ही तिमनगढ़  दुर्ग में जैन सभ्यता का उदय हुआ होगा जिसके प्रतीक दुर्ग में दिखाई देते है | सन 1196 ई. में मुहम्मद गौरी ने अपने सिपहलसालार कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ यादव राज्य पर जबरदस्त आक्रमण किया | कुंवरपाल ने अप्रतिम साहस और पराक्रम का परिचय देते हुए आक्रान्ता का सामना किया परन्तु विजयश्री से वंचित रहा | यहाँ घोर संग्राम हुआ शायद ही राजस्थान में उस समय एसा जौहर अन्य कहीं  हुआ हो जैसा यहाँ हुआ | पुरुष अधिकतर काम में आ गये और स्त्रियों ने सामूहिक जौहर कर लिया , कहने का तात्पर्य यवनों ने किले पर कब्ज़ा कर लिया | बयाना और तवनगढ़ दोनों दुर्गों पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो गया | डॉo ओझां जी के अनुसार मुहम्मद गौरी ने सन 1195 ई. में तवनगढ़ पर अधिकार कर लिया था | डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार मुहम्मद गौरी द्वारा तवनगढ़ पर अधिकार कर लिए जाने के साथ ही यादवो की दूसरी राजधानी तवनगढ़ या त्रिभुवनगिरी के गौरवशाली स्वर्णिम युग का पटाक्षेप हो गया | समकालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने अपनों तवारीखों में इस घटना का उल्लेख किया है | हसन निजामी द्वारा लिखित ‘ताज-उल-मासिर’ तथा मिन्हाज सिराज कृत ‘तबकाते नासिरी’ में तवनगढ़ के गौरी के अधिकार में आने तथा उसे बहाउद्दीन तुगरिल के अधिकार में  रखने एवं उसके शासनकाल में वहाँ की व्यापारिक प्रगति का उल्लेख हुआ है | इस विवरण के अनुसार हिंदुस्तान के दूरस्थ प्रदेशों जैसे  मध्य एशिया तथा खुरासान आदि के व्यापारी वहाँ आते थे ।
वैसे इस किले पर यवनों ने कई बार हमले किये कभी यवन हर जाते तो कभी यदुवंशी, एक बार इसी हार के कारण कुंवरपाल को गोलारी के किले में भी समय काटना पड़ा एक समय ऐसा  भी सुनने को मिला की इस युद्ध में से कुछ फोजें चाहें भगोड़ी हो गयीं  और अपनी प्राण रक्षा के वास्ते नजदीक के जंगलों में शरण ली और शनैः-शनैः जंगलों को साफ कर गाँव बसा लिए | इसी किले के दूर जंगलों में छोटी छोटी बस्तियों में जो आबादी दिखाई पडती है वह उन्ही भगोड़ों द्वारा आबाद की गयीं हैं । बादशाही युद्ध के साथ ही तिमनगढ़ के यदुवंशियों की वंश परम्परा समाप्त हो गयी | सन 1196ई0 से सन 1327 ई0 तक यहां के जादों तितर -,वितर ही रहे ।कुछ जादों लोग चम्बल नदी पर करके सबलगढ़ के जंगलों में चले गए और उसी स्थान पर “जादोंवाटी “नाम से अपना राज्य स्थापित कर लिया ।कुछ अन्य प्रदेशों में विस्थापित जोकर वहीं रहने लगे तथा कुछ ने यहां से विस्थापित होकर अपने पुराने क्षेत्र अलवर जिले के मेवात में  छोटे -छोटे ठिकाने जैसे सरहता ,तिजारा आदि वसा कर जीवनयापन करने लगे जिन्होंने बाद फिरोज तुगलक के शासनकाल में  दबाव में आकर या अपने ठिकानों को बचाने के उद्देश्य से इस्लाम धर्म अपना कर खानजादा व मेव कहलाने लगे।
तिमनगढ़ के अंतिम शासक कुंवरपाल रहे जिनकी आठ शादियाँ हुई | जिनसे चार पुत्र हुए |
-: राजा कुंवरपाल के पुत्र :–
1. अजयपाल  – अजयपाल तिमनगढ़ से भागकर अपनी ननिहाल रीवा चले गए | जिनके सहनपाल और सोंगरमल पुत्र हुए |
2. कायमपाल – ग्राम बसई जिला धोलपुर में रहे जिनकी संताने डडोरिया जादों कहलाते हैं
3. आनंदपाल –इन्होने ब्रज क्षेत्र (मथुरा) में रहे और मोजा नरी-सेमरी आबाद किया तथा इनकी संताने ब्रजवासी जादों कहलाये जिनके वंशज एटा जिले में राजा अवागढ़ हैं |
4. मनोहरपाल – इनकी संतान जिला बुलंदशहर में आबाद हैं | और समरीवार जादों कहलातें हैं
सन्धर्व—-

1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन
21-बयाना-ऐ कांसेप्ट ऑफ हिस्टोरिकल आर्कियोलॉजी -डा0 राजीव बरगोती
22-प्रोटेक्टेड मोनुमेंट्स इन राजस्थान-चंद्रमणि सिंह
23-आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया रिपोर्ट भाग ,20.,पृष्ठ न054-60–कनिंघम
24-रिपोर्ट आफ ए टूर इन ईस्टर्न राजपुताना ,1883-83 ,पृष्ठ 60-87.–कनिंघम
25-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटर्स -भरतपुर ,पृष्ठ,. 475-477.

लेखक–– डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन 
गांव-लाढोता, सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह ,राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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