करौली के चन्द्रवंशी जादों (पुराणिक यादव /यदुवंशी ) क्षत्रियों के मंडरायल दुर्ग का इतिहास —

करौली के चन्द्रवंशी जादों (पुराणिक यादव /यदुवंशी ) क्षत्रियों के मंडरायल दुर्ग का इतिहास–

मंडरायल का दुर्ग पूर्व-मध्यकाल का एक प्रसिद्ध दुर्ग रहा है।यह किला मध्यप्रदेश एवं राजस्थान के सीमांत प्रदेश पर स्थित है।चम्बल नदी के किनारे यह एक उन्नत पहाड़ी के शिखर भू-भाग पर स्थित है।इसका  निर्माण लाल पत्थरों से हुआ है।यह वन प्रदेश का पहाड़ी दुर्ग है।दुर्ग में ऐसा कुछ भी नहीं मिलता जिससे निर्माण तिथि पर प्रकाश डाला जा सके।

‎बयाना  के महाराजा विजयपाल के पुत्र मदनपाल  ने कराया था मंडरायल दुर्ग का निर्माण —-

जागाओं की पोथी में लिखे लेख के अनुसार इस मंडरायल दुर्ग का निर्माण बयाना के राजा विजयपाल की मृत्यु के बाद उनके पुत्र दूसरे क्षेत्रों में पलायन करके बस गये ।  विजयपाल के एक पुत्र मदनपाल(मण्डपाल) ने मंडरायल को आबाद किया और वहां एक किले का निर्माण सम्वत 1184 के लगभग करवाया था , जो आज भी खंडहर स्थित में मौजूद है।मेडिकोटोपो ग्राफिकल गजेटियर के अनुसार भी इस दुर्ग का निर्माण किसी यदुवंशी जादों राजा ने ही करवाया था , जिससे  राजा मण्डपाल की ही सम्भावना की जा सकती है ।इसका निर्माण कार्य भी 11वीं शताब्दी  के आस-पास होने की सम्भवना है।

    राजा घूगलदेव की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र अर्जुनदेव संवत 1384 मुताबिक हिजरी 714 में गद्दी मसन्द हुए | बुजुर्गो की खोई सम्पति अथवा शासन को पुन: हस्तगत करने के इरादे से रीवा से मय रानी के अपने  चार भाइयों को साथ ले चल दिये। जब मौजा मंगरौल इलाके सबलगढ़ पहुंचे तो वहाँ इन्हें एक घोड़ी हाथ लगी जिसको मालिक ने नेहस जानकर छोड़ दिया था , उपरांत इन्होने अपने बाहुबल से चम्बल के पास नींदर में गढ़ी बनाने के बाद मडरायल के किले को हस्तगत किया ।

यदुवंशी ‎महाराजा अर्जुनपाल जी ने पुनः किया मंडरायल पर कब्जा —–

महाराजा कुंवरपाल जी के  वंशज गोकुलदेव जी के पुत्र अर्जुनपाल ने ई0 1327 में मंडरायल के मियां माखन को परास्त कर अपने पूर्वजों के राज्य को फिर से प्राप्त करना प्रारंभ किया।मियां मक्खन अपनी मक्कारी ओर दुष्टता के कारण पूरे क्षेत्र में बदनाम था।प्रजा उससे पूरी तरह परेशान थी, अतः स्थानीय जनता ने भी अर्जुनपाल जी का साथ दिया।अर्जुनपाल जी ने मंडरायल के आस -पास रहने वाले मीणों तथा पंवार राजपूतों को परास्त कर अपने राज्य का विस्तार किया।उन्होंने ही  ई0 1348 में कल्याणपुरी नामक नगर बसाया तथा कल्याण जी का मंदिर बनवाया।कल्याणपुरी ही बाद में करौली के नाम से जानी जाने लगी।यह नगर भद्रावती नदी के किनारे स्थित था इस लिए भद्रावती नाम से भी जाना जाता था।
राजस्थान- मध्य प्रदेश की सीमाओ को विभक्त कर घाटियों और चम्बल दरिया के मध्य छोटी सी पहाड़ी पर अस्त-व्यस्त प्राचीरों से घिरा लाल पत्थर का कुछ निर्माण देखने को मिलता है जिसे मंडरायल दुर्ग के नाम से जाना जाता है |

मंडरायल वसने  की कितनी भूमिका समाज में व्याप्त है | एक जनश्रुति के अनुसार पूर्व समय में माण्डव्य ऋषि ने इस पहाड़ी पर तपस्या की और यहीं समाधिस्त  हो गए | इसकी पुष्टी तत्कालीन करौली नरेश भंवर पाल जी के शासन काल में सम्बन्धित तालाब को उलीचने पर हुई | राजा ने तालाब के सड़े और वदबूदार जल को निकलवा कर ज्यादा समय के वास्ते शुद्ध जल की  व्यवस्था हेतू खुदाई कराई | जब तालाब उलीचा जा रहा था |उस समय बीच तालाब में एक दिव्य छतरी दिखलाई दी जिसमे एक पात्र रखा हुआ था। पात्र में 5 आने और एक श्रीफल मिला। राजाज्ञा से उस तालाब सामग्री को निकलवा कर खुदाई करा शुद्ध जल से तालाब को भरा जाने लगा जैसे -जैसे जल तालाब में आता गया वैसे- वैसे ही जल का रंग खून दृश्य दिखने लगा | जिसे देख कर सभी आश्चर्य चकित रह गए | राजा ने पंडितों से मंत्रणा कर निकाली गई सामग्री को पुन: वहीं यथावत रखवा दिया | पुन: जल प्रवेश कराया गया । अब जल शुद्ध निर्मल रंग और गंधहीन दिखने लगा | उसी समय से राजा ने पांच आने के प्राश्चित में पांच ब्राह्मणों  की भोजन की व्यवस्था राज्यकोष से हर पूर्णमासी को इस तालाब पर करा दी | उक्त जनश्रुति अनुसार इस कसवे  का नाम माण्डव्य ऋषि के नाम  से मंडरायल पड़ा |

यहूदी शासन काल में मडरायल दुर्ग—–

वैसे मंडरायल दुर्ग के निर्माण काल का यहूदी शासन काल में हुआ अनुमान लगता है | उपरांत भी लोक गाथानुसार मकराना (मियाँ मकन) नवाब , मुसलमान जो तत्कालीन यवन बादशाह का मुंहलगा खुशामदी किलेदार था | उसके ही शासन काल में किले का निर्माण हुआ | मकराना से अपभ्रंश होते होते इसका नाम मडरायल हो गया | वैसे भी इस किले के सारे निर्माण मुस्लिम सभ्यता से प्रभावित हैं | इसलिए यह तो माना ही जायेगा की इस दुर्ग का निर्माण किसी मुस्लिम बादशाह और किलेदार के समय रहा |
मंडरायल किले में तालाब की पार पर त्रिदेव भगवान की सुन्दर प्रतिमाएं हैं | सेली वाले हनुमान तथा गहबरदान  की गुफा हिन्दू- मुस्लिम समाज के लिए विशेष श्रद्धा  के केंद्र बने हुए हैं | किले की पौर (मुख्य दरवाजा) इस बात के लिए प्रसिद्ध है कि प्रातः से सांय काल तक जिसमे सूर्य प्रकाश व्याप्त रहता है | किले की तलहटी में कम ऊँची प्राचीरों के घेरे में मन्दरायल कस्वा  है | जिसमे श्री बिहारी जी, सीताराम जी , तथा श्यामकुंज देवालयों की झांकियां विशेष दर्शनीय  हैं | ऊँटों द्वारा सबलगढ़ से व्यापार होता है | पत्थर का निर्यात कर खाद्य पदार्थों का आयात किया जाता है | इस क्षेत्र में दस्यों  का आतंक बना रहता है | मडरायल की सोभा का वर्णन करते हुए एक कवि  ने लिखा है —

ऊँचे ससे पहाड़ यांपे दुर्ग अति वाकों बनों |
         ठौंर ठौंर गुंजन की शोभा अति निराली है |
ऊँचें नीचें भवन यामे नगर की शोभा अपार |
               सभी बसत मात कैला रखवाली है ||
सभी बसत यामें उज्वल वर्ण चार ||
                थाना तहसील रहे इंतजाम भारी हैं ||
कह दासरामगुलाम भूपेश की छत्र छायाँ |
         सकल गुण खान मंडरायल मतवाली है ||

मध्य काल में यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था | मडरायल दुर्ग को ग्वालियर दुर्ग की कुन्जी  कहा जाता है | सन 1327 ई.में अर्जुनदेव ने इस दुर्ग पर अधिकार किया ।सन 1504 ई. में सिकन्दर लोदी ने इस दुर्ग पर अधिकार जमाया और इसमें उपस्थित सभी हिन्दू मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदें  बना दी गयीं । यहाँ पर काफी खून खराबा हुआ | यहाँ पर उस समय  विशाल उद्यान भी स्थित थे , जिन्हें सिकन्दर लोदी ने नष्ट कर दिया | गुजरात के सेनापति ततार खां ने सन 1534 ई. में यह दुर्ग तत्कालीन शासकों से छीन लिया । कुछ समय बाद यह बाबर और हुमायूँ के अधिकार में चला गया | अकबर के शासन काल में महाराजा गोपालदास ने इसे करौली राज्य में सम्मलित कर लिया | इसके बाद यह दुर्ग करौली राज्य के यदुवंशियों के अधिकार में ही बना रहा | इस दुर्ग में पहाड़ियों में पहाड़बंद बालाजी का मंदिर अधिक प्रसिद्ध है जहाँ लोग हनुमान जी के दर्शनों के लिए आतें जाते रहतें हैं। गाँव में एक जैन मंदिर भी है तथा यहाँ पर स्थित निर्गुण जी की समाधि  भी एक दर्शनीय स्थल है , जहाँ प्रतिवर्ष जेठ के महीने में निर्गुण जी का मेला लगता है | यहाँ से चम्बल नदी 5 किलोमीटर दूर है | चम्बल की घाटी में टपका की खो एवं धमोनिया जल प्रपात दर्शन करने योग्य हैं | वर्तमान में यह दुर्ग प्राय: खण्डहर  हो चूका है और जीर्ण-शीर्ण  अवस्था में अपने गौरवशाली अतीत की दास्ता को सीना ताने व्यक्त कर रहा है |

सन्धर्व—

1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स  -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन
21-बयाना-ऐ कांसेप्ट ऑफ हिस्टोरिकल आर्कियोलॉजी -डा0 राजीव बरगोती
22-प्रोटेक्टेड मोनुमेंट्स इन राजस्थान-चंद्रमणि सिंह
23-आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया रिपोर्ट भाग ,20.,पृष्ठ न054-60–कनिंघम
24-रिपोर्ट आफ ए टूर इन ईस्टर्न राजपुताना ,1883-83 ,पृष्ठ 60-87.–कनिंघम
25-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटर्स -भरतपुर ,पृष्ठ,. 475-477.

  1. लेखक–– डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन 
    गांव-लाढोता, सासनी
    जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
    एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि विज्ञान
    शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह ,राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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