यदुकुल शिरोमणि श्रीकृष्ण ,उनका समय एवं जदुवंशियों के विनाश का ऐतिहासिक अध्ययन–

यदुकुल शिरोमणि योगीश्, उनका समय एवं जदुवंशियों का विनाश—

ब्रज या शूरसेन जनपद के इतिहास में श्रीकृष्ण का समय बड़े महत्व का है। इसी समय प्रजातंत्र और नृपतंत्र के बीच कठोर संघर्ष हुए, मगध-राज्य की शक्ति का विस्तार हुआ और भारत का वह महाभीषण संग्राम हुआ, जिसे महाभारत युद्ध कहते हैं। इन राजनैतिक हलचलों के अतिरिक्त इस काल का सांस्कृतिक महत्व भी है। श्रीकृष्ण साधारण व्यक्ति न होकर युगपुरुष थे। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभा सम्पन्न राजनेता ही नहीं, एक महान् कर्मयोगी और दार्शनिक प्राप्त हुआ, जिसका गीता-ज्ञान समस्त मानव -जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है।

मथुरा नगरी इस महान विभूति का जन्म स्थान होने के कारण धन्य हो गई। मथुरा ही नहीं, सारा शूरसेन या ब्रज जनपद आनंदकंद कृष्ण की मनोहर लीलाओं की क्रीड़ा-भूमि होने के कारण गोरवान्वित हो गया। श्रीकृष्ण भागवत धर्म के महान् स्रोत हुए। इस धर्म ने कोटि-कोटि भारतीय जन का अनुरंजन तो किया ही , उसके द्वारा कितने ही विदेशी भी प्रभावित हुए। प्राचीन और अर्वाचीन साहित्य का एक बड़ा भाग कृष्ण की मनोहर लीलाओं से ओतप्रोत है। उनके लोक- रंजक रूप ने भारतीय जनता के मानस पर जो छाप लगा दी है वह अमिट है।

वर्तमान ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म लगभग ई० पू० 1500 माना जाता है। वे सम्भवतः 120 वर्ष से कुछ ऊपर की आयु तक जीवित रहे। अपने इस दीर्घ जीवन में उन्हें विविध प्रकार के कार्यों में व्यस्त रहना पड़ा। उनका प्रारम्भिक जीवन तो ब्रजमण्डल में बीता और शेष द्वारकापुरी में व्यतीत हुआ। बीच-बीच में उन्हें अन्य अनेक जनपदों में भी जाना पड़ा। जो अनेक घटनाएं उनके समय में घटीं उनकी विस्तृत चर्चा पुराणों तथा महाभारत में मिलती है। वैदिक साहित्य में तो कृष्ण का उल्लेख बहुत कम मिलता है और उसमें उन्हें मानव-रूप में ही दिखाया गया है, न कि नारायण या विष्णु के अवतार रूप में परन्तु परवर्ती साहित्य में प्राय: उन्हें देव या विष्णु रूप में प्रदर्शित करने का भाव मिलता है ।

कंस का शासन—-

श्रीकृष्ण के जन्म से पहले शूरसेन जनपद का शासक कंस था, जो अंधक वंशी उग्रसेन का पुत्र था। बचपन से ही कंस स्वेच्छाचारी था। बड़ा होने पर वह जनता को अधिक कष्ट पहुंचाने लगा। उसे गणतंत्र की परंपरा रुचिकर न थी और शूरसेन जनपद में वह स्वेच्छाचारी नृपतंत्र स्थापित करना चाहता था। उसने अपनी शक्ति बढ़ाकर उग्रसेन को पदच्युत कर दिया और स्वयं मथुरा के यादवों का अधिपति बन गया। इससे जनता के एक बड़े भाग का क्षुभित होना स्वाभाविक था। परंतु कंस को प्रनीति यहीं तक सीमित नहीं रही, वह शीघ्र ही मथुरा का निरंकुश शासक बन गया और प्रजा को अनेक प्रकार से पीड़ित करने लगा। इससे प्रजा में कंस के प्रति गहरा असन्तोष फैल गया। पर कंस की शक्ति इतनी प्रबल थी और उसका आतंक इतना छाया हुआ था कि बहुत समय तक जनता उसके अत्याचारों को सहती रही और उसके विरुद्ध कुछ कर सकने में असमर्थ रही।

कंस की इस शक्ति का प्रधान कारण यह था कि उसे आर्यावर्त के तत्कालीन सर्वप्रतापी सम्राट जरासंध का सहारा प्राप्त था। यह जरासंध पौरव वंश का था और मगध के विशाल साम्राज्य का शासक था। उसने अनेक प्रदेशों के राजाओं से मैंत्री-संबंध स्थापित कर लिये थे, जिनके द्वारा उसे अपनी शक्ति बढ़ाने में बड़ी सहायता मिली। कंस को जरासंघ ने अस्ति और प्राप्ति नामक अपनी दो लड़कियां ब्याह दीं और इस प्रकार उससे अपना जमता बना कर घनिष्ठ सम्बन्ध जोड़ लिया। चेदि के यादव वंशी राजा “शिशुपाल” को भी जरासंघ ने अपना गहरा मित्र बना लिया। इधर उत्तर पश्चिम में उसने कुरुराज दुर्योधन को अपना सहायक बनाया। पूर्वोत्तर की ओर आसाम के राजा भगदत्त से भी उसने मित्रता जोडी । इस प्रकार उत्तर भारत के प्रधान राजाओं से मैंत्री सम्बन्ध स्थापित कर जरासंध ने अपने पड़ोसी राज्यों काशी, कोशल, अंग, बंग आदि पर अपना अधिकार जमा लिया। कुछ समय बाद कलिंग का राज्य भी उसके अधीन हो गया। अब जरासंध पंजाब से लेकर आसाम और उड़ीसा तक के प्रदेश का सबसे अधिक प्रभावशाली शासक बन गया।

श्रीकृष्ण ने बड़े होने पर कंस को मार कर उसके अत्याचारों से मथुरा को मुक्त किया। अपने जामाता और सहायक का कृष्ण द्वारा वध सुन कर जरासंध का क्रुद्ध होना स्वाभाविक था। उसने शूरसेन जनपद पर चढ़ाई करने का पक्का विचार कर लिया। शुरसेन और मगध के बीच युद्ध का विशेष महत्व है, इसी लिए हरिवंश आदि पुराणों में इसका वर्णन विस्तार से मिलता है।

जरासन्ध की मथुरा पर चढ़ाई—

जरासंघ ने पूरे दल-बल के साथ शूरसेन जनपद पर चढ़ाई की। पौराणिक वर्णनों के अनुसार उसके सहायक कारूय का राजा दंतवक्र , चेदिराज शिशुपाल , कलिंगपति पौंड्र, भीष्मक-पुत्र रुक्मी काय अंशुमान तथा अंग, बंग, कोशल, दशार्ण, मद्र, त्रिगर्त आदि के राजा थे। इनके अतिरिक्त शाल्वराज, पवनदेश का राजा भगदत्त, सौवीरराज, गंधार का राजा सुबल , नग्नजित, काश्मीर का राजा गोनद , दरद देश का राजा तथा कौरवराज दुर्योधन आदि भी उसके सहायक थे । मगध की विशाल सेना ने मथुरा पहुंच कर नगर के चारों फाटकों को घेर लिया। सत्ताईस दिनों तक जरासंध मथुरा नगर को घेरे पड़ा रहा, पर वह मथुरा का अभेद्य दुर्ग न जीत सका। संभवत: समय से पहले ही खाद्य सामग्री के समाप्त हो जाने के कारण उसे निराश होकर मगध लौटना पड़ा।

दूसरी बार जरासंध पूरी तैयारी से शूरसेन पहुंचा। यादवों ने अपनी सेना इधर-उधर फैला दी थी। युवक बलराम ने जरासंघ का अच्छा मुकाबला किया लुका-छिपी के युद्ध द्वारा यादवों ने मगध सैन्य को बहुत चुकाया । श्रीकृष्ण जानते थे कि यादव सेना की संख्या तथा शक्ति सीमित है और वह मगध की विशाल सेना का खुलकर सामना नहीं कर सकती। इसीलिए उन्होंने लुका -छिपी वाला आक्रमण ही उचित समझा। इसका फल यह हुआ कि जरासंध परेशान हो गया और हताश होकर ससैन्य लौट पड़ा। इस युद्ध में संभवतः कारुष की सेना तथा चेदि-सेना कुछ कारणों से जरासंघ से अलग होकर यादवों से मिल गयी थी।

पुराणों के अनुसार जरासंध ने अठारह बार मथुरा पर चढ़ाई की । सत्रह बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। कृष्ण-बलदेव को जब यह ज्ञात हुआ कि जरासंघ और कालयवन विशाल फौज लेकर आ रहे हैं तब उन्होंने मथुरा छोड़ कर कहीं अन्यत्र चले जाना ही श्रेयस्कर समझा। वे उग्रसेन, बलराम तथा अन्य बहुसंख्यक यादवों को लेकर सौराष्ट्र की नगरी द्वारावती (द्वारका) में चले गये और वहाँ बस गये। शूरसेन जनपद पर जरासंध का आधिपत्य अधिक दिन तक नहीं रहा। कुछ समय बाद पांडवों की सहायता से कृष्ण ने जरासंध का वध करा दिया। जरासंध जैसे महापराक्रमी और क्रूर शासक का अंत कर देने से श्रीकृष्ण का यश चारों ओर फैल गया।

पांडवों ने अब श्रीकृष्ण की सलाह से राजसूय यज्ञ की तैयारी की। उन्होंने भारत के अनेक राज्यों को जीतकर अपना प्रभुत्व बढ़ाया। शरसेन जनपद तथा उसके आस-पास के राज्यों को सहदेव ने विजित किया। राजसूय यज्ञ बड़े समारोह के साथ संपन्न हुआ। चेदि का यादव नरेश शिशुपाल, जो जरासंध का बड़ा मित्र था, इस यज्ञ में कृष्ण द्वारा समाप्त कर दिया गया।

महाभारत युद्ध—

महाभारत युद्ध कौरव-पांडवों के घरेलू झगड़ों ने जब बड़ा वियम रूप धारण कर लिया और कृष्ण आदि की समझौते की चेष्टाएं विफल हो गयीं, तब एक भीषण युद्ध का होना अनिवार्य हो गया। इस युद्धाग्नि में इच्छा या अनिच्छा से आहुति देने को प्रायः सारे भारत के शासक शामिल हुए। पांडवों की ओर मत्स्य, पांचाल , चेदि, कारुय , पश्चिमी मगध, काशी और कोशल के राजा हुए। सौराष्ट्र-गुजरात के वृष्णि यादव भी पांडवों के पक्ष में रहे। कृष्ण, युयुधान और सात्यकि इन यादवों के प्रमुख नेता थे। बलराम यद्यपि कौरवों के पक्षपाती थे, तो भी उन्होंने कौरव-पांडव युद्ध में भाग लेना उचित न समझा और वे तो पर्यटन के लिए चले गये। कौरवों की ओर शूरसेन प्रदेश के यादव तथा माहिष्मती, अवंति, विदर्भ और निषद देश के यादव थे। इनके अतिरिक्त पूर्व में बंगाल, आसाम, उड़ीसा तथा उत्तर पश्चिम एवं पश्चिम भारत के सारे राजा और वत्स देश के शासक कौरवों की ओर रहे। इस प्रकार मध्य देश का अधिकांश, गुजरात और सौराष्ट्र का बड़ा भाग पांडवों की ओर था और प्रायः सारा पूर्व, उत्तर-पश्चिम और पश्चिमी विध्य कौरवों की तरफ। पांडवों की कुल सेना सात अक्षौहिणी तथा कौरवों को ग्यारह अक्षोहिणी थी।

दोनों ओर की सेनाएं युद्ध के लिए तैयार हुई। कृष्ण, द्रष्टधुमन तथा सात्यकि ने पांडव सैन्य की व्यूह रचना की । कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध मैंदान में दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने आ डटीं । अठारह दिन तक यह महाभीषण संग्राम होता रहा। देश का अपार जन-धन इसमें स्वाहा हो गया। कौरवों के शक्तिशाली सेनापति भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य आदि धराशायी हो गये । अठारह वें दिन दुर्योधन मारा गया और महाभारत युद्ध की समाप्ति हुई। यद्यपि पांडव इस युद्ध में विजयी हुए, पर उन्हें शान्ति न मिल सकी। चारों ओर उन्हें क्षोभ और निराशा दिखाई पड़ने लगी। श्रीकृष्ण ने शरशय्या पर लेटे हुए भीष्मपितामह से युधिष्ठिर को उपदेश दिलवाया। फिर हस्तिनापुर में राज्याभिषेक उत्सव सम्पन्न करा कर वे द्वारका लौट गये। पांडवों ने कुछ समय बाद एक अश्वमेध यज्ञ किया और इस प्रकार वे भारत के चक्रवर्ती सम्राट घोषित हुए। कृष्ण भी इस यज्ञ में सम्मिलित हुए और फिर द्वारका वापस चले गये। कृष्ण की यह अंतिम हस्तिनापुर-यात्रा थी । अब वे वृद्ध हो चुके थे। महाभारत संग्राम में उन्हें जो अनवरत परिश्रम करना पड़ा उसका भी उनके स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। कुछ दिनों बाद द्वारका के यादवों ने गृहकलह द्वारा प्रभास तीर्थ में अपना नाश कर लिया। श्रीकृष्ण भी सौ वर्ष से ऊपर की अवस्था (लगभग 120 वर्ष ) में गो-लोक सिधारे ।

यादव वंश का ह्रास–

द्वारका के यादवों का नाश एक प्रकार से यदुवंश की प्रमुख शक्ति का नाश था। भारत में अन्य कई भागों में भी यादवों के राज्य थे, परन्तु उनकी शक्ति और विस्तार प्रायः सीमित थे। श्रीकृष्ण ने अपने पराक्रम और बुद्धिमत्ता से यादवों का एक विशाल राज्य स्थापित कर लिया था। उन्होंने यादव-सत्ता की जो धाक भारत में जमा दी थी ।वह उनके बाद स्थिर न रह सकी। प्रभास के महानाश के अनन्तर जो लोग द्वारका में बचे उनकी दशा शोचनीय हो गयी। उग्रसेन, वसुदेव तथा कृष्ण की अनेक स्त्रियां, कुछ पुराणों के अनुसार, संताप से पीड़ित हो आग में जल मरीं। जो स्त्रियां, बच्चे और बूढ़े शेष रहे उन्हें श्रीकृष्ण के आदेशानुसार अर्जुन अपने साथ लिवा कर हस्तिनापुर की ओर चले। दुर्भाग्य से मार्ग में आभीरों ने उन पर हमला किया और कुछ स्त्रियों को वे लूट ले गये। अर्जुन इस पर बहुत क्षुब्ध हुए परन्तु वे आभीरों को रोक न सके। शेष यादवों को लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ पहुंचे और उन्हें यथास्थान बसाया । पुराणों से ज्ञात होता कि श्री कृष्ण के प्रपौत्र अनिरुद्ध के लड़के वज्र या वज्रनाभ को अर्जुन ने शूरसेन राज्य के सिंहासन पर अभिषिक्त किया।

महाभारत के बाद शूरसेन जनपद की दशा—-

वज्र के बाद से ईसवी पूर्व छठी शती तक के लम्बे अन्तराल में शूरसेन जनपद पर कौन-कौन से यादव या अन्य शासक हुए, इस का पता नहीं चलता। पुराणों के अनुसार महाभारत युद्ध से लेकर नंद- राजा महापद्मनन्द के समय तक तेईस राजाओं ने मथुरा पर शासन किया। परन्तु इन राजाओं के नाम आदि नहीं मिलते। पुराण संख्योल्लेख के अतिरिक्त इस विषय पर मौन है। संभवतः इन राजाओं में से कोई इतना प्रसिद्ध नहीं हुआ जिसकी चर्चा पुराणकार करते, अन्यथा जहां शूरसेन के पड़ोसी जनपद कुरु और पंचाल के अनेक शासकों के उल्लेख हैं वहां मथुरा के कुछ राजाओं के नाम भी दिये जाते।

इस काल में कुरु-पंचाल जनपदों का राजनैतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव शूरसेन जनपद पर अवश्य पड़ा होगा। शूरसेन की स्थिति इन दोनों शक्तिशाली राज्यों के बीच में थी। महाभारत युद्ध में शूरसेन और उत्तर-पंचाल ने कुरुओं की सहायता की थी। संभवतः इसके बाद भी इन तीनों राज्यों को मैत्री जारी रही। उपनिषद्-काल में पांचाल राज्य में तत्वज्ञान की उन्नति से शूरसेन जनपद ने भी प्रेरणा ग्रहण की होगी और वहां भी इस विषय का विकास हुआ होगा। कुरु-पंचाल में प्रचलित श्रेष्ठ भाषा का उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है। शूरसेन जनपद में भी उस समय इसी संस्कृत भाषा का प्रचलन रहा होगा। संभवतः यहां भी ब्राह्मण तथा आरण्यक-साहित्य का संकलन एवं कतिपय उपनिषदों का प्रणयन हुआ।। प्राक-बौद्धकाल में शूरसेन जनपद वैदिक धर्म का एक प्रधान केन्द्र था, जिसका पता बौद्ध साहित्य से चलता है।

सोलह महाजनपद- —

महात्मा बुद्ध के आविर्भाव के पहले भारत में सोलह बड़े जनपद थे । प्राचीन बौद्ध और जैन साहित्य में ये ‘ सोलस महाजनपद’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें से कई महाभारत युद्ध के पूर्व भी विद्यमान थे। इन सोलह बड़े राज्यों में एक शूरसेन भी था, जिसकी राजधानी मथुरा थी।

संदर्भ—

1-हरिवंशपुराण
2-श्रीमद्भागवत
3-विष्णुपुराण
4-पद्यपुराण
5-गर्गसंहिता
6-प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग -लेखक सत्यकेतु विद्यालंकार
7-ब्रज के धर्म -सम्प्रदायों का इतिहास -डा0 प्रभुदयाल मीतल ।
8-ब्रज का इतिहास (भाग 1, 2 -डा 0 कृष्णदत्त वाजपेयी ।
9-ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास -प्रभुदयाल मीतल ।
10-प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति -डा0 कृष्ण चंद श्रीवास्तव ।
11-मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास – प्रोफेसर चिंतामणि शुक्ल ।
12-प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य -लेखक बाबू वृन्दावनदास ।
13-पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ ऐशियन्ट इंडिया पंचम संस्करण कलकत्ता ,1950, -राय चौधरी ,
14-ग्रॉउज -मेमोयर द्वियीय संस्करण इलाहाबाद ,1882 ।
15-कनिघम -आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया -एनुअल रिपोर्ट जिल्द 20 (1882-83 ) .।
16-मथुरा के यमुना तटीय स्थलों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास -जयन्ती प्रसाद शर्मा ।
17-यदुवंश का इतिहास -लेखक श्री महावीर सिंह यदुवंशी ।
18-ब्रिज सेंटर ऑफ कृष्णा पिलग्रीमेज -लेखक ऐंटीविस्तले एवं फॉस्टन 1987।

19-१० छांदोग्य उपनिषद् (३, १७, ६), जिसमें देवकीपुत्र कृष्ण का उल्लेख है और उन्हें घोर आंगिरस का शिष्य कहा गया है।

20- उदाहरणार्थ तैत्तिरीय आरण्यक (१०, १, ६), पाणिनीय अष्टाध्यायी (४, ३, ६८) आदि । महाभारत तथा हरिवंश, विष्णु, ब्रह्म, वायु, भागवत, पद्म, देवीभागवत, धग्नि तथा ब्रह्मर्ववर्त पुराणों में श्रीकृष्ण को प्रायः भगवान् रूप में दिखाया गया है। तो भी इन ग्रन्थों में कृष्ण के मानव-रूप के दर्शन अनेक स्थलों पर मिलते हैं।

लेखक-डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गाँव-लढोता ,सासनी
जनपद -हाथरस,उत्तरप्रदेश
एसोसिएट प्रोफेसर कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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